मैं अम्मा हूँ

वृक्षमंदिर का आम है मेरा एकलौता पूत लाया

मैं अब बूढ़ी हो चुकी हूँ बहुत बूढ़ी । मेरा एकलौता पूत जब मेरे पास होता है तब बहुत बतिआता है ।एक दिन हमेशा कि तरह उसने सवाल किया, ए अम्मा तोर उमिरि का है रे?

मैं बोल पड़ी अस्सी ! बस क्या था मेरे बोलते ही सब हंस पड़े ।बाबू बोला “का अम्मा तें दस साल के पहली जब हम पैदा भइंली ? तब वह सत्तर साल का था। मैं खिसिया गई । पता चल गया मैं बुढ़ा गई। अब जब बाबू कहता है “अम्मा मै बूढ़ा हो गया” तब मैं कहती हूँ “ हाँ तब हमहूं वृद्धा हो गइलीं । अब जब बच्चे मेरी उम्र पूछते हैं तो मैं पहले उनकी उम्र पूछ कर जबाब देती हूँ । बाबू मेरा सबसे बड़ा लड़का है । जब वह अपनी उम्र बता देता है मै अठारह जोड़ कर अपनी उम्र बताती हूँ ।क्योंकि जब वह पैदा हुआ तब मैं अठारह साल की थी ।

पहले मैं हमेशा सही सही बतला देती थी । सब बच्चे खुश हो जाते थे ।मैं भी मन ही मन मुस्कुराती बच्चों को देखती रहती थी । सब आपस में बात करते अपनी और दूसरे की उम्र और न जाने कहाँ कहाँ के सवाल पूछते और मैं बतला देती थी सही सही । परिवार मे किसकी शादी कब हुई, कौन सा बच्चा किस साल पैदा हुआ , किसकी शादी में कितना दहेज मिला, जब मैं दिल्ली आई तब घी, गेहू, चावल आदि सबका भाव किया था सब बतला देती थी ।

बच्चे आपस में बिजी हो जाते । कोई गले में हाथ डाल भींच लेता कोई नाक पकड़ लेता । सबसे छोटी बेटी नीलम मुझसे सबसे ज़्यादा चिपकती है । मैं नीलम के के साथ रहती हूँ जो। बाक़ी पाँचों की शादी हो गई । सबकी घर गृहस्थी है , ठीक से हैं । मेरे पास आते रहते हैं । नीलम काम पर बाहर जाये घर पर नहीं हो तो कोई न कोई आ ही जाता है रह जाता है। वैसे देखभाल के लिये आजकल ज्योति है । पहले डीके था ।

देवरिया शहर से कोई दो कोस पर एक छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ था। गोरे लाल शाही मेरे बाबूजी मुख़्तार थे माँ दुबली पतली छोटी सी बहुत प्यारी थी। पिता जी से हम सब बच्चों की उतनी नज़दीकी नहीं पर माई से सबका बहुत लगाव था। जबसे मैंने होश सँभाला माई को मैंने कफ और दमा की बीमारी से जूझते ही पाया। पर माई थी बड़ी कर्मठ। पिता जी कचहरी जाते थे रोज़। हमारे गाँव में हमारा कोठा था पक्की बिल्डिंग सीमेंट वाली। पुराना खपड़ैल वाला मकान तो था ही जिसमें हम सब रहते थे। पर कोठे के निचले तल्ले पर गाय बैल बांधे जाते थे और ऊपर एक बड़ा कमरा और खुली हवादार छत थी। पूरा गाँव दीखता था वहाँ से । बरगद के बड़े पेड़ के नीचे बना वह स्कूल भी ।

कोठे पर से सड़क भी दीखती थी जो हमारे गाँव से होती हुई देवरिया को बरहज से जोड़ती थी। मैं गाँव के स्कूल में पढ़ने जाती थी जो सड़क के पास था। धान के खेतों में से टेढ़े मेढ़े मेड़ों पर से गुज़रते बहुत अच्छा लगता था। बरसात के मौसम में धान के खेतों में पानी भरा होता था। बहुत अच्छा लगता जब छोटी मछलियों और कीड़ों का शिकार करता वह सारस मिल जाता था। हमें देंख कर वह उड़ नहीं जाता और लगता था जैसे बात करना चाहता है। हमारी दोस्ती हो गई थी। मैं और मेरी सहेली जब कहते थे “ऐ सारस बाबा ऐ सारस बाबा तुहार बिआह हो गइल ?”

उत्तर में वह सारस पंख फड़फड़ा कर नाच देता और हम ताली बजा खूब हंसते थे। कई बरसातों में सारस नचाना हमारा खेल बन गया था । जितनी बार हम उसके बिआह की बात करें वह नाच देता। फिर न जाने एक दिन वह सारस कहाँ चला गया।

एक दिन पता चला मेरी भी शादी होगी और मैं भी सारस की तरह अपना गाँव छोड़ किसी दूसरे गाँव चली जाऊँगी।

मेरी शादी बहुत कम उम्र में तेरह साल की उम्र में हो गई। गौना तीन साल बाद जब मैं सोलह साल की थी तब हुआ । और फिर मैं फिर बंदुआरी के पिपरेतर के बाबू लोगों के घर बहू बन आ गई । जब मेरी शादी हुई मेरे पति जयबक्स तब पढ़ रहे थे। शादी बाद मैं अपने गाँव में थी पर मेरे पति को बाबूजी ने अपने पास देवरिया बुला लिया वहीं से उन्होंने इंटर पास किया फिर आगरा गये आगे पढने के लिये पर तब तक मैं बंदुआरी आ चुकी थी ।

पांचवी तक पढ़ी मैं गाँव के स्कूल में । आगे पढ़ने के लिये पास के दूसरे गाँव में स्कूल था पर बाबूजी नहीं चाहते थे मैं अकेले स्कूल जाऊँ । देवरिया ले जाकर पढ़ाने की बात तो किये बाबूजी पर कभी ले नहीं गये। मैं अपनी माई के साथ ही रही और घर का काम काज सँभाला । खाना बनाना वहीं से मैंने सीखा । चंद्रावती मेरी छोटी बहन पैदा हो गई थी।विमला का जन्म मेरी शादी के बाद हुआ ।

रवि प्रताप, इंद्रजीत, त्रिलोकी और शंभु मेरे सब भाईयों सबकी पढ़ाई देवरिया में हुई। मेरी बहन मुन्नी का जन्म बहुत बाद मेरी शादी के बाद में हुआ। रविप्रताप, चंद्रावती और शंभू नहीं रहे ।मैं सबसे बड़ी अब भी जिये जा रही हूँ ।

अभी और बहुत कुछ लिखना है पर तबियत ठीक नहीं रहती। बिस्तर पर ही पड़ी रहती हूँ। मन में बहुत सी यादें उमड़ती घुमड़ती रहती है। ठीक से बोल नहीं पाती । मेरे बच्चे बहुत ख़्याल रखते हैं मेरा । पर मेरा मन तो करता है मैं उनका ख़्याल रखूँ । पहले की तरह खाना बनाऊँ। सब के साथ बैठूँ ।

२०१२ में जब मैं पहली बार फिसल कर गिरने के कारण दो तीन महीने बिस्तर पर पड़ी रही तब नेहा आती थी । मुझे बहुत अजीब सा लगा। नीलम को कहा अपनी दोस्त को क्यों हर हफ़्ते बुलाती हो और आती भी है तो क्यों मुझसे ही बात करती है नेहा । बाबू को भी कहा पर दोनों मिले हुये थे। दोनों काम करते थे तब। मेरे बिस्तर पर पड़े अकेले पन को दूर करने के लिये नीलम ने यह उपाय सोचा था। ख़ैर कुछ दिनों में नेहा और मैं एक दूसरे से खुल कर बात करते थे।

एक दिन बात ही बात में खाना पकाने की बात निकली । फिर क्या था नेहा जब भी आती फिर खाने के बारे मेरी बात करती। वह पूछती मैं बताती । बाद में नीलम और नेहा ने मिल कर मेरे खाना बनाने की रेसिपी लिख डाली। नीलम अब खाना पकाने लगी है। नई नई चीज़ें बनाती है। मेरे बच्चों में लक्ष्मी बहुत लगन से अच्छा खाना बनाती है। सुधा भी। अब तो आशा भी काम्पिटिंशन में आ गई है। सुधा मेरे साथ थी तब बहुत काम करती थी सीखती भी बहुत जल्द थी। नीलम तो पता नहीं कहाँ कहाँ की किताबें ख़रीदती रहती है । कुर्री की भी बहुत किताबें हैं। बाबू , लक्ष्मी , सुधा , आशा, रंजना , नीलम पढ़ने में ठीक थे। कोर्स के अलावा बाहरी किताबों को पढ़ने का शौक़ सब को था। नीलम को और मेरे पोते पोतियों और नाती नतिनियो को भी पढ़ने का शौक़ है।

यह सब उन्हें बाबूजी से मिला होगा। बाबूजी पढ़ते तो थे ही पर बच्चों को पढ़ने के लिये प्रोत्साहित भी करते थे। मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता था पर समय कहा मिलता था। घर का सारा काम मै करती थी।


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