वृक्ष मंदिर

One winter afternoon in 2012, I was sitting alone at Vriksha Mandir. Looking at the greenery around and the bright blue sky with specks of white clouds drifting in the sky above, I felt I wasn’t alone but my past,my present and perhaps my unknown future were all with and in me.
I penned these lines and later edited the same. I try to translate it in English but the translation doesn’t convey what I felt and wrote in Hindi.

गाँव से बाहर ऊसर धरती पर जो थी बंजर

लगाया, संजोया गाँव से बाहर पिता ने   वृक्ष मंदिर 

 होते थे वहाँ तब तीन महुआ और एक जामुन के पेड़ 

एक कुआँ भी था, 

पानी भी हाँ साफ़ पानी था तीन चार फ़ुट ज़मीन के नीचे 

पीते थे पानी, जहाँ प्यासे चरवाहे और खेल खेलते घुमंतू बच्चे

हम तो बस खडिया बीनने जाते थे 

दिये की कालिख से पुती अम्माँ की चूड़ी से चमकाई 

काली पट्टी पर नरकंडे की क़लम से लिखने क ख ग घ ।

पिता के पहले शायद उनके पिता के समय के वह पेड 

मूक अपने स्थान से देखते रहे सब कुछ निस्प्रिह, नितांत, एकांत मे 

कैसा लगता होगा उन्हे यह बदलाव । 

गाँव से बाहर ऊसर बंजर धरती पर बना वृक्ष मंदिर

आया यहाँ मिटाने थकान, वहां जहाँ कोई शोर नहीं

पक्षियो के झुंडो का कलरव, कोयल की कूक, पेड़ों की डालियों से बोलती सरसराती बयार उमड़ते घुमडते बादल, गरज कर बचपन की याद दिलाते हैं, हँसाते हैं डराते हैं

चमकती हैं बिजलियाँ , कौंध जाती हैं यादें बचपन की 

उस  तृप्ति का अहसास जो बचपन बाद जब भी लौटी कभी छींटे सी कभी मूसलाधार ।

अजनबी और अनजान धुँधली  यादों की शांति मे दीखने लगते  हैं चलचित्र से

चेहरे बहुत से कुछ पुराने, जाने पहचाने कुछ नये भी लगते हैं 

अपने 

अपनो से ही तो होती है अपनी पहचान

जब अपने बदलते हैं और नये अपने आ जाते है जीवन मे 

होता है बदलाव अपनी पहचान मे भी ।

चेहरे जो अब झाँकते नही, मुझ मे दूसरों की तरह,बस होते हैं 

जैसे होता हूँ मै, अपने मे, अपने से अनजान 

होते हैं बस पेड़, पक्षी, धरती , बयार और आसमान 

अकेलेपन से मिलता है अब सुख, वही अकेलापन जो देता था घर से बिछुड़ने का दुख 

पर तब थी ज़रूरत अनजान दुनिया बनाने का अपनी पहचान 

क्या ऐसा ही होना है इस  वृक्ष मंदिर  का 

आख़िर यह जो है मेरी काया जिसने पाई एक से ज़्यादा पहचान 

आज का घर कल का श्मशान ! 

2012 

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Vrikshamandir

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