चतुर बंदुआरी के पिपरेतर के बाबू लोग

कथा में ही शायद “अमरत्व” की नींव पड़ती हो !
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

पहला चरण

मेरा जन्म जिस परिवार में हुआ था उसे हमारे बचपन में कहा जाता था चतुर बन्दुआरी के ”पिपरेतर के बाबू“। पिपरे तर के  इस लिये क्योंकि हमारा दो खंड वाला, एक बड़े और एक छोटे आँगन वाला, मिट्टी की भीतों से बना खपड़ैल वाला घर,जो गाँव में सबसे बड़ा था, एक विशालकाय पीपल के पेड़ के नीचे था। 

खपड़ैल है की छत अब भी है घर के कुछ पूरब के ओसारे पर ।

अब वह पीपल का पेड़ नहीं रहा । पता नहीं क्यों काट दिया गया या क्या हुआ । फिर नीम का पेड़ लगाया गया । वह भी न रहा । कुछ साल पहले मुन्ना बाबू की बरसी पर हम सबने मिल फिर से पीपल का पेड़ लगाया क़रीब क़रीब वहीं जहां वह पुराना पीपल का पेड़ था । 


 


मैं हूँ, पर मैं कौन हूँ ?

क्या इस परिवार में जन्म लेने का निर्णय “मेरा” था?
मैं नहीं जानता।

मैं तो अब तक यह भी न जान पाया कि मैं हूँ कौन ! कभी कभी
अपने से सवाल करता हूँ "मैं कौन हूँ?" और "मैं यहाँ क्यों हूँ ?”

पर जैसी सबकी होती है मेरी भी इति तो निश्चित है । जीवन के संध्या काल
में जब सोचने बैठता हूँ तब जो बीत गया वह ज़्यादा याद आता है। शायद
इसलिये क्योंकि अब आगे कुछ ज़्यादा है ही नही। जितने साल जीवन के बाक़ी
हैं वह बोनस हैं नहीं तो ठेठ भोजपुरी में कहें तो "घलुआ" हैं ।अब तक जी
लिये लगभग सारी तरकारी तो ख़रीद चुके । जीवन के बाक़ी "वर्ष" बस मिर्च
और धनिया हैं ।बीते जीवन की सचाई को समझने के प्रयास में
कुछ मिर्च मसाला भी तो चाहिये न।

हम में से कुछ लोग गंभीरता से इस सवाल का जवाब बुढ़ापे में आने पर ही
तलाशते हैं कि "मैं कौन हूँ?"।

चलिये मै भी एक बार फिर गंभीर हो लेता हूँ, कुछ देर के लिये ही सही !

कुछ साल पहले लिखना शुरू किया था अपने बारे में ।
वह जिसे मैं खुद नहीं जानता उसके बारे में ।

है न हैरान करने वाली बात!
पर जो है सो है और वह नीचे लिख रहा हूँ ।

इतिहास : इति का अट्टहास: भूत

ज्ञानी , अनुभवी कहते हैं इतिहास से सबक़ लो। अपने इतिहास से । सीख को कार्य रूप मे लाओ ।रहो वर्तमान मे पर भूत काल से मिली सीख, शिक्षा को काम में लाओ और आगे बढ़ो । तुम्हारा भविष्य सुगम हो जायेगा

सीख कीनिकाली निचोड़, उसे परिष्कृत , परिवर्धित कर कहा, हे मेरे बीते दिन, अब मेरा पीछा छोड़ो। वर्तमान की समस्याओं से जूझने दो।माना ,थोड़ा सा ही सही पर जब तक मैं जीवित हूँ तब तक तो मेरा भविष्य भी तो है न ! उसकी भी चिंता तो करनी ही है न !

कितनी बार कोशिश की फिर भी मेरा पिछला जीवन, बीत चुका जीवन, मेरा पीछा नही छोड़ता ।

बहुत विकट कार्य है । कितनी बार कोशिश की लिखने की,पूरा नही हुआ ।नये सिरे से फिर से लिखना शुरू किया।हर वक़्त परिपेक्ष्य बदल जाता है । दृष्टि बदल जाती है ।

मेरा इतिहास,अब तक हुई इति का अट्टहास, अति साधारण पर क्रूर है, करूण है ,कसैला है ,मधुर है, तिक्त है,लावण्यमय है । इसका वर्णन जटिल है ! मन में विचार उठता है क्या मेरे बीते दिनों में ही मेरे भविष्य की नींव पड़ी थी?

गाँव मे जन्मा,पढ़ा, बडा हुआ कालांतर मे शहर मे शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की तलाश मे गाँव छोड़ निकल गया ।शहरों मे भटका , कुछ मेहनत, कुछ सीख पाकर और कुछ भाग्य फल से परिवार और समाज मे कुछ मान्यता और शायद कुछ प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति भी बना ।पर मैंने तो गाँव छोड़ दिया पर यह मेरा गाँव मेरा पीछा नही छोड़ता, लगभग आधी शताब्दी बीत जाने पर भी ।

कभी क्षणिक अथवा अल्पकालीन आत्मबोध , कभी गर्व, कभी सुखानुभूति , कभी अपराध बोध , कभी असहाय बोध और कभी घोर दुख और किंकर्तव्यविमूढता के जालों मे सना बसा मेरा अब तक का जीवन मेरा पीछा नही छोड़ता ।

बुढवा बाबा, माई, भइया, बाबा, मम्मा, मम्मू लोग, काका,मुन्ना बाबू, बाबूजी, बिंदू फूआ …छोटकू बाबा, परमहंस काका, रजई पांडे, शीतला काका, अरविंद …….कितनी लंबी फ़ेहरिस्त है ……उन सब की जो सब एक एक कर चले गये।

कुछ धुँधली सी कुछ गहरी परत दर परत पडी अनजान गह्वरों मे पड़ी हैं उनकी यादें । उनके द्वारा किये गये उपकार, उनके प्रति अपने कर्तव्यों की अवहेलना का बोध, जो अक्सर स्वयं जाने अनजाने मे प्रकट हो बयां कर जाती हैं मेरे भूत को । कभी तो मै उन्हे एक चल चित्र की तरह अनुभव करता हूँ। क्षणिक पल तो मै स्वयं उस चल चित्र मे चलायमान हो जाता हूँ । वर्तमान को भूल सा जाता हूँ । जब धुँधली नम आँखों से झलकते अश्रु कण गालों पर पड़ते हैं तब वर्तमान चुभने सा लगता है ।

सिनेमा पटल पर तेज़ रोशनी की चुभने और उसमें आते , विलीन होते पात्र , घटनाये और अनुभव भूत के गर्त मे विलीन हो जाते हैं और मै फिर अपने को वर्तमान की कठोर दहलीज़ पर खड़ा पाता हूँ ।

आँसू पोंछ चलता हूँ, दहलीज़ के अन्दर, एक दूसरी भूल भुलैया मे जहाँ से हो कर शायद अनजान भविष्य की राह निकलती हो ।

भव ईशस्य: भविष्य

भव शब्द की व्युत्पत्ति भू धातु से है । भू यानि है अथवा होना । होना तो वही है जो ईश मान्य होगा । जो अभी हुआ नही और जो होने को है उसे जानते नही उसके बारे मे सिर्फ सोच सकते हैं ।स्वप्न देख सकते हैं ।उद्दात्त क्रिया वाचक शब्दों मे संकल्प कर सकते हैं ।स्वप्न और संकल्प परस्पर जुड़े होते हैं । स्वप्न संकल्प नही होते पर अधिकांश संकल्प स्वप्नों पर आधारित होते हैं।

मेरे बचपन के सपने क्या थे ? आख़िर किस सामाजिक , आर्थिक और पारिवारिक परिवेश के धरातल पर इन सपनों का ताना बाना बुना गया होगा ? क्या हमारे भूत काल के कुछ अनुभव हमारे भविष्य को जीने में कोई मदद कर सकते हैं ? क्या जो मेरे सपने थे उन्हें मैं वास्तविक जीवन में जी सका ? आख़िरमैंकौनहूंबहुतसेअनुत्तरितप्रश्नहैं।

भाव से स्वभाव

किसी भी जीव के जन्म का उसकी सहमति या असहमति से कोई लेना देना नही है । जन्मने वाला बस जन्म ले लेता है ।

जब जन्म हो ही गया तब, किसी भी अन्य प्राणी की तरह, स्वाभाविक इच्छा होती है जीने और जीते रहने की।आख़िर मरना कौन चाहता है ! क्षण दर क्षण मरते जीव को जीते रहने का अहसास ही उसे जीवित रखता है ।

जीवन के शुरुआती दौर मे मिले माता के प्रेम वात्सल्य, परिवार जनों का स्नेह, पारिवारिक वातावरण तथा बड़े होने पर मिली शिक्षा, सामाजिक प्रभाव, जीवन मे मिली ठोकरेंऔर उपलब्धियाँ , अनुभवों और अन्य बहुत से आयामों के प्रभावों से बनती है व्यक्ति की पहचान । पहचान बनाता कौन है ? क्या व्यक्ति स्वत: सतत सचेत हो कर अपनी पहचान बनाता है अथवा यह प्रक्रिया अपने आप ही होती रहती है ?

बचपन और जवानी मे अपने मूल पहचान पर ध्यान देने का न तो समय होता है न आत्म बोध ।

मेरी पहचान बहुत से औरों की तरह अपने आप बनी या यूँ कहें कि बस बन ही गई । पहचान की पहचान तो बाद मे बनती है ।

मेरे पास एक नाम, एक परिवार, एक स्थिति, जीवन में कुछ हैसियत या अभाव है, सांसारिक संपत्ति की मालिकी है, लेकिन क्या सवालमैं कौन हूं?” का उत्तर ऊपर वर्णित किसी भी विशेषता का उल्लेख करके पूरी तरह से दिया जा सकता है ।

इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करने से पहले मुझे इस संवाद में एक और परिप्रेक्ष्य लाने की आवश्यकता है।

लगता है इस एक आसान से सवाल का जो दूसरे अक्सर हमसे पूछते हैंआप कौन हैं?” का जवाब देना भी आसान है ।

सही भी है हम उत्तर तो दे देते हैं । लेकिन हमारा उत्तर हमारे जीवन काल में एक ही या एक दूसरे से मिलते जुलते भी नहीं हो पाते हैं।

आप कौन हैं?” इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए, हमें पहले क्या इस प्रश्न का उत्तर खोजने की आवश्यकता नहीं है? किमैं कौन हूँ?”

क्योंकि जब तक मुझे नहीं पता कि मैं कौन हूं, मैं किसी अन्य द्वारा पूछे इस सवाल का जवाब कैसे दे सकता हूं किआप कौन हैं?”

हम में से कुछ लोग ही आधा जीवन बीतनेके बाद या उसके आसपास ही गंभीरता से इस सवाल का जवाब तलाशने लगते हैं किमैं कौन हूँ?”

”असल ” में मैं कौन हूँ ?

यक्ष प्रश्न है जिसके बहुत से उत्तर होते हुये भी मेरे लिये यह एक अनुत्तरित प्रश्न बना हुआ है । मेरी उत्तर पाने की खोज अब भी जारी है इस जीवन काल मेंउत्तर मिलेगा तब ज़रूर बताऊँगा ।

 

पीपल का पेड़


दीना बाबू और हम सब मिले थे मुन्ना बाबू की बरसी पर और निर्णय लिया था कि पीपल का पेड़ लगायेंगे। दूसरे ही दिन पेड़ लगा दिया गया और पिछले सात सालों में इतना बड़ा भी हो गया। और बहुत से निर्णय भी लिये थे पर उनकी चर्चा कभी बाद में या कभी कभी नहीं। कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जो कहीं या लिखी नही जा सकती केवल महसूस की जा सकती हैं । यदि शब्द ब्रह्म है तो हुआ करे। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उन बातों का जिनका हम वर्णन न कर सकते हैं या न करना चाहते हैं ब्रह्म भी नहीं करा सकता । पर क्या वह बातें, वह सामूहिक निर्णयों का भी मनुष्यों की भाँति ही एक निश्चित जीवन होता है? कुछ काल बाद वह मर जाते हैं? मुझे लगता है नहीं। हमारी बातें, हमारे निर्णय, हमारे अकेले के या सामूहिक निर्णय कहीं नहीं ब्रह्मांड में घूमते रहते होंगे, मौक़े की तलाश में । और कर जाते हैं अच्छा या बुरा।

 

अब वह पेड़ बड़ा हो गया है ।

आज इन सब बातों को सोचते लिखते बाबा नागार्जुन की कविता याद गई !

एक दिन, लगभग सात साल पहले, अम्मा से बात हो रही थी मैंने पूछा अम्मा पुराना पीपल जिसके नीचे पिपरे तर के बाबू लोगों का घर था किसने और कब लगाया था।

अम्मा की जानकारी मे उनके गाँव से सबसे पहली दुल्हन जो हमारे परिवार में ब्याहीं थी उन्हे मउसी कहा जाता था। अम्मा दूसरी और मुन्ना बाबू की पत्नी तीसरी महिला थीं अम्मा के गाँव से जो दुल्हन बन पिपरेतर वालों के यहाँ ब्याहीं और परिवार का अंग बनी।

मौसी के बच्चा नहीं होता था। उन्हें किसी ने बताया कि दरवाज़े पर पीपल का पेड़ लगाओ और हर शनिवार वहाँ शंकर जी को जल चढ़ाओ। वही किया उन्होंने । पीपल का पेड़ लगा बढ़ा परिवार का नाम उसी पर पडा। मेरे बचपन में मउसी वाला घर ( कमरा) छोटकी खंड के दक्षिण पश्चिम में था। साथ वाला दक्षिण पूरब वाला कमरा अम्मा का था। दक्षिण पश्चिम के एकदम कोने वाला कमरा सउरी वाला कमरा था यानि सौरिगृह जहां बच्चों का जन्म होता था।

मौसी किसकी पत्नी थी अम्मा ठीक ठीक तो नहीं बता पाईं । बाद में सोचने के बाद पता लगा कि शायद वह बंशबहादुर सिंह की पहली पत्नी

पर मेरे छ पुरखों के नाम ज़रूर गिना गईं । जयबक्स सिंह, विश्वनाथ सिंह, देवनारायन सिंह, बंशबहादुर सिंह, घिसिरावन सिंह , आसमान सिंह .. बाबा आसमान सिंह आसमान से आये होंगे ।

 

बुढवा बाबा

देव नारायण सिंह जिन्हें हम बुढवा बाबा कहते थे, अपने समय के कर्मठ किसान थे ।बंदुआरी, चचौली और सतहरा तीन गाँवों में कुछ हिस्से की उनकी ज़मींदारी थी । शायद चार आना या पच्चीस प्रतिशत। मैं बहुत छोटा था जब उनका देहांत हुआ।बहुत सी यादें हैं उनकी ।

एक फ़ोटो है भी है उनकी गोद में बैठा मै। फ़ोटो रविप्रताप मामा ने ली थी । शायद यह पहली फ़ोटो रही होगी परिवार में किसी की। खो गई थी यादों की तरह। मिल गई है।

ज़मींदारी के अलावा खुद अपनी खेती जम कर करते थे। अपनी ज़मींदारी के काफ़ी रकबे पर उन्हीं की किसानी की बदौलत ज़मींदारी उन्मूलन के बाद भी हमारे परिवार को काफ़ी ज़मीन मिली और ज़ब्त न हुई।

जब मैं उनके बारे में सोचता हूँ याद आता है दुआरे पर की जाड़े की धूप में सुखाई जा रहा भुट्टो की बालियाँ और किनारे पर लगभग परगास तेली की दीवार से लगे बैठे बुढवा बाबा।सामने उनका ढेर से पीले और उनके बीच कुछ चटक लाल ( मैरून) रंग के भुट्टो का ख़ज़ाना । मैं उन भुट्टो के बीच खेल रहा हूँ । बुढवा बाबा घुटने तक की धोती और ऊपर मिर्ज़ई पहने किसी सोच में मगन हैं पर बीच बीच में मुझे देख मुस्कुरा भी रहे हैं ।

फिर याद आती है उनकी बड़के आँगन में ज़मीन पर पड़ी निर्जीव देह । सफ़ेद कपड़े में लिपटी । मैं समझ न पा रहा था कि आख़िर घर में सब क्यों रो रहे हैं। बाबू जी , मेरे पिता, जो मुझे देवरिया से गाँव ले कर गये थे एक दम टूट से गये थे । मेरी याद में मैंने मृत अवस्था में पड़े किसी को सबसे पहले देखा होगा तो वह ही थे । दीपावली का दिन था। पूरे गाँव में दिया न जला । सम्मान था उनका। बाबूजी, जब तक जीवित रहे दीवाली के दिन गमगीन बैठे रहते थे । हमें दीपावली मनाने की छूट थी पर बाबूजी की हर दीपावली उदास ही रही।

बाबूजी दसवीं के आगे पढ़ना चाहते थे। मेरे पितामह भइया नहीं चाहते थे पढ़ाई पर खर्च हो।वह चाहते थे बड़े हो कर बाबूजी खेती बाड़ी का काम सँभाले । पर बुढवा बाबा ने , जो अनपढ़ थे, अपने नाती बाबूजी को पढ़ाई करने के लिये कहा और भइआ को मानना पड़ा ।

भइआ और बाबा

मेरे बाबा का नाम विश्वनाथ सिंह था पर सबकी तरह मै भी उन्हे “भइआ” कहता था।

मेरे “बाबा” थे विंध्याचल सिंह भइआ के छोटे भाई। बहुत स्नेह मिला उनसे । अब न भइआ रहे न बाबा। न मेरे पिता न उनके दोनों भाई। बाबा के सबसे बड़े लड़के मुन्ना बाबू जो मुझसे पाँच साल बड़े थे वह भी हमें छोड़ कर चले गये । अब उम्र के हिसाब से मैं घर में सबसे बड़ा। पर घर में पद से दीना बाबू बाबा के दूसरे बड़े लड़के मेरे चाचा हैं । पर मुझे अपना बडा मानते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनसे छोटे सुरेश बाबू से भी आदर ही मिला। अरविंद बाबू नहीं रहे।

पर घर भी तो वह घर न रहा। पर मैं भी तो जैसा बचपन, जवानी और अधेडावस्था में था अब वै सा न रहा। मेरी, सोच, मेरे डर, मेरी प्रसन्नता और शांति पाने के स्रोत आदि भी तो बदल गये । तो अगर वह घर न रहा तो क्या हुआ। संसार में क्यों कोई वस्तु या अवस्था है जो शाश्वत एक रूप रहती है। परिवार घर संबंधों पर बनते हैं । जब उन संबंधों में बदलाव होता है तब परिवार घर वालों की सोच भी बदल जाते हैं ।

संबंध एक सामाजिक बंधन 
संबंध एक नियम का वर्तन
संबंध एक सांसारिक पहचान 
घडियाली आँसू झूठी मुस्कान  

समय बदला परिवेश बदला हम सब बदल गये। पर पुरानी स्मृतियाँ जो मानस पटल पर अंकित हो गई है क्या मिट सकती हैं? हाँ ज़िंदगी जीने के नशे में कुछ देर या लंबे समय के लिये हम भूल भी जायें पर मौक़ा मिलते ही पुन: प्रकट हो अंदर से सालती हैं।

क्या है सच क्या है झूठ
क्या है सुख क्या है दुख
क्या है लोभ क्या है त्याग
माया क्रंदन मिथ्या बंधन 

मैंने खुद से गाँव छोड़ते समय अपने आप से बहुत से वायदे किये थे क्या मैंने पूरे किये ? कौन से पूरे किये मैंने ?


जीवन नित्य स्वयं का वंदन 
बँधे स्वयं जो वह है बंधन
समय बदलते हो परिवर्तन 
ऐसा बंधन कैसा बंधन 

भइआ और बाबा आदर्श भाई थे । दोनों के कार्यक्षेत्र बंटे थे। आपसी समझ बिन बोले ही कठिन से कठिन मसलों पर एक जैसी होती थी।

जब तक दोनों जीवित थे और मैं उनके साथ गाँव में रहा करता था कभी भी दोनों में कोई मतभेद न देखा। भइआ बंदुआरी की खेती की देखभाल करते थे। बाबा चचौली और सतहरा की । बाबा असकतिआते थे बंदुआरी छोड कर कही जाने में। भइआ हल्के से इशारा भर करते थे , “बाबू बहुत देर होत बा हो” । बाबा चुप कुंछ जबाब नहीं देते थे। फिर बाबा जब लोटा ले खेत की ओर निकलते तब उनके जाने के बाद भइआ ज़रूर मुस्कुरा कर कहते थे “ अब हमार बाबू जइहें” । और वास्तव में बाबा सीधा पानी और किसी आदमी को ले कर निकल देते थे। कहा जाता है पहले एक टट्टू था पर मेरे समय में न था।

फिर एक दिन बाबा गये गोरखपुर सायकिल ख़रीदने । हमारे घर की शायद पूरे गाँव में ख़रीदी गई पहली सायकिल थी । हरकुलिस सायकिल थी मुझे याद है ! मुन्ना बाबू और मैं दोपहर बाद से ही कितनी बार पांडे के दुआरे दौड़ दौड़ कर जाते देखने कि बाबा साइकिल ले कर कब आयेंगे। काका भी बीच बीच में उठ कर आ जाते । पाड़ें के दुआरे से बांसगांव से उनवल वाली कच्ची सड़क साफ़ दीखती थी।

देर शाम जब दूर सड़क पर बाबा नंई साइकिल ले कर आते दीखे तब मुन्ना बाबू और मैं (उनकी पूंछ) दौड़ते हुये सड़क पर मैना की बारी में बाबा के पास जा कर ही रुके और कभी बाबा कभी सायकिल को निहारते रहे और फिर उनके साथ ही ख़ुशी से भरे गाँव में अपने घर तक आ गये । बहुत दिनों तक चर्चा रही सायकिल की, ख़रीदी की, उसके उपयोग और फ़ायदे की ।

इसी तरह की गर्वीली ख़ुशी तब हुई थी जब स्कूल पर हैंड पंप लगा था । न जाने क्या अजूबा लगा था। एक दम चमत्कार । बिना रस्सी गगरी और कुयें के पानी ज़मीन से चांपाकल को हाथ चला कर निकल आता था । उस दिन खेतों के बीच से घर लौटते मुझे जो ख़ुशी मिली थी उसे सोच कर इस बुढ़ापे में भी मुस्कुरा उठता हूँ ।

फिर जब पटिया पर कुआँ खुद रहा था तब की खुशी , कुतूहल “ कब पनिआ निकली “ वाली कई दिनों की सोच ! कितने मज़दूर लगे थे काम पर । फिर एक दिन जब पानी निकला, कटी मिट्टी की सीढ़ियों से उतरते हम सब ने देखा ज़मीन में से पानी आ गया था। गर्मी के दिन थे । कुयें के अंदर बहुत ठंडा रहता था। अक्सर मन ललचाता था वहाँ जाने को पर घर के किसी बड़े के साथ ही जा सकते थे। बाबा ज़रूर ले जाते थे ।

भइआ को तैरना अच्छा लगता था। बाबा को बिल्कुल नहीं। तीन पोखर थे गाँव में । बरपरवा, तेलिया के, पुरनका । एक पोखर थी हमारे घर के ठीक पीछे । भइआ बरपरवा में नहाने जाते थे। एक बार मुझे ले कर गये मैं उनके पेट से चिपक कर पानी में खूब खेला । पर घर आ कर जो बुख़ार हुआ उससे बहुत विवाद हो गया। बाबा भइआ को बिना उन्हें संबोधित किये डाँट रहे थे। “मरदे सामी लइका के ले के पोखरा में गइलें । गंदा पानी से बोखार हो गइल। कुछ ते खयाल कइले होत” ।

भइआ एक दम चुप !

फिर उसके बाद मैं कभी गाँव में पोखरे में नहाने न गया। आज भी मुझे तैरना नहीं आता । कोशिश की सीखने की जब श्रीलंका में था तब और पिछले साल यहाँ टोरंटो में प्रशिक्षक से पर ज़्यादा फ़र्क़ न पड़ा। बरपरवा की तैराकी में प्रायमरी जो न पास की ।

हरि अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। 
सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। रामचंद्र के सुंदर चरित्र करोड़ों
कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।

बाबूजी, दादा, काका और मुन्ना बाबू

बाबूजी, जयबक्स सिंह मेरे पिता बंदुआरी मे दसवीं कक्षा से आगे पढ़ने वालों में शायद पहले रहे होंगे ।अपने पिता के बारे में लिखना या तो बहुत आसान नहीं तो बहुत कठिन है। क्या लिखें क्या न लिखे ?

इतना सारा है और कुछ भी नहीं।

कुछ भी नहीं क्योंकि जब उनके जीवन के अंतिम तीन सालों के बारे में सोचता हूँ तब सोच वही अटक जाती है । कुछ ज़्यादा याद नहीं आता । बस उनकी उनका अंदर सालता दर्द , उनकी पीड़ा जिसे वह बोल कर व्यक्त भी नहीं कर सकते याद आती हैं । अंतिम दस दिन गुड़गाँव के मैक्स अस्पताल में जब मैं रातों में उनके कमरे में रहता था जब वह चिल्लाते थे ऐसी ऐसी गालियाँ जो हमने कभी उनके मुँह से न सुनी थी, निकलती थीं। जब अल्ज़ाइमर का पूरा प्रकोप नहीं था , जब वह बोल पाते थे अपने कमरे में उन्होंने बुलाया । दरवाज़ा बंद करने को कहा। अम्मा अंदर आना चाहती थी । बाबूजी ने अम्मा को कमरे के अंदर आने से मना कर दिया । मुझसे बिस्तर पर पड़े पड़े बोले “ बाबू अब हम्मीर जाये द” । “ ई कइसी हो सकला बाबूजी” मैंने कहा। अपने दोनो हाथों से मेरे हाथ थामे जिस कातर विनीत भाव से वह बोल रहे थे बरबस मुझे रुलाई आ गई । उनकी आँखों में भी आंसू थे। जानते थे वह, अंदर ही अंदर उन्हें शायद आहट आ रही थी बुलावा आ गया है । पर हमारा कर्तव्य भी तो था । दवा चलती रही। अल्ज़ाइमर अपना रोब प्रकोप दिखाता रहा। हम सब कभी कभी हार से जाते पर अम्मा लगी रहती। खाने का ध्यान रखना, नहलाता तो डीके या जो कोई देखभाल करता वह करता पर अम्मा भी पहुँच जाती। नारंगी के छिलके को सुखा कर पीस कर बेसन में मिला बुकवा लगा कर नहलाने से उनके शरीर का सूखापन न के बराबर रहता। खाते नहीं थे ।

बाबूजी की शुरुआती नौकरी पहले राज्य  सरकार और फिर केंद्रीय सरकार में थी। ट्रांसफ़र बहुत होते थे । लालगंज-आज़मगढ़,रहीमगंज,  नानपारा, बहराइच, जौनपुर, देवरिया कहाँ कहाँ न रहे बाबूजी कृषि विभाग के इंस्पेक्टर और ज़िला अधिकारी पद पर रहते हुये । १९५० के दशक के मध्य से  केंद्रीय सरकार की नौकरी  और फिर १९७५ की इमरजेंसी के बाद एक स्वायत्त संथा में लंबे समय की नौकरी की फिर जीवन पर्यंत स्वायत्त संस्थाओं से ही जुड़े  रहे ।   

दादा हमारे बाबू जी के छोटे भाई ।बचपन में मुझे उनसे बहुत स्नेह और सब प्रकार का सहयोग मिला। दादा पेशे से वकील पर वकालत बाद  में पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई चीनी मिलों के उच्च प्रबंधन में कार्यरत रहे। उनके जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में उनके बाक़ी परिवार से  संबंधों में खटास आई। ज़मीन को ले मुकदमेबाजी हुई। जो अब भी चल रही है। बाबूजी का उसमें प्रत्यक्ष तो नहीं पर अप्रत्यक्ष रूप से घसीटा जाना स्वाभाविक ही था ।मैं भी बीच में पड़ा पर बहुत देर हो चुकी थी। आपसी विश्वास जो संबंधों को जोड़े रखता है की जगह  परिवार में एक दूसरे के प्रति  अविश्वास की जैसी सुनामी आ गई हो । 

यहीं से पिपरेतर के बाबू की व्यथा कथा प्रारंभ होती है । 

 लिखूँगा इस पर कभी विस्तार से । हिम्मत जुटानी पड़ेगी । 

पर पहले काका और मुन्ना बाबू के बारे में … अभी बाक़ी है। 

श्याम नारायण बाबा, परमहंस बाबा, छोटकू बाबा घर के न होते हुये भी घर के जैसे 

पट्टीदारी में श्याम नारायण बाबा बाबूजी से बड़े थे और पढ़े लिखे थे । चीनी मिल में नौकरी करते थे। पर दसवीं पास थे या नहीं मुझे याद नहीं। हम उन्हें चिन्नी बाबा कहते थे। बाबूजी को बहुत मानते थे। जब चीनी मिल में सीज़न की लंबी छुट्टी होती , श्याम नारायण बाबा गाँव पर ही रहते थे। हमारे घर “पिपरेतर” अक्सर रोज़ सुबह आ जाते थे । खाना खाने अपने घर चले जाते थे।बड़ा स्नेह था लगता ही नहीं था कि वह हमारे घर के नहीं हैं । पान खाते थे। मुस्कुराते रहते थे। भइआ और बाबा सब से बहुत लगाव था।

एक बार छुट्टी में गाँव आये तो मिल का रेडियो ले आये। बड़ा सा डब्बा बांसगांव से डेढ़ कोस सिर पर रखे चल कर एक आदमी रेडियो गाँव लाया आगे आगे श्याम नारायण बाबा सफेद धोती और धारी दार क़मीज़ पहने चले आ रहे थे। पर अपने घर न जाकर सीधे हमारे घर पर आये । रेडियो वही रखवाया। मैंने रेडियो पहली बार देखा।आनन फ़ानन दो बांस काट कर लाये गये और एंटेना के दोनो सिरे बांसों पर बांध कर दुआरे पर चौगान में गाड़ दिये गये । फिर हुआ इंतज़ार सूरज ढलने का । शाम हुई नहीं कि काफ़ी लोग जमा हो गये कुछ लोग चारपाई पर कुछ मचिया या मूँज के बने बीड़ा पर या ज़मीन पर आसन जमा बैठ गये। तब मैं आठवीं या नवी मे पढ़ रहा था गोरखपुर में 1958 या 1959 की बात है।चिन्नी बाबा ने कहा “ शैल रेडियो चलइहें “ । शैल गर्व से फूल रहे थे । रेडियो के बड़े डब्बे के साथ एवर रेडियो की बैटरी का अलग से छोटा डब्बा भी था। अब हड़बड़ी में बैटरी का तार लगा नहीं रेडियो से और मैं रेडियो के बड़े नाब घुमा घुमा रेडियो स्टेशन ढूँढ रहा था। “बोले गावे” वाले बक्से से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। चिन्नी बाबा बोले “ ए शैल बैटरिया लगउले बाट ? “

तब मुझे ध्यान आया और रेडियो और बैटरी को जोड़ जब नाब घुमाया खडखड की आवाज़ आने लगी फिर अचानक धीरे और फिर ज़ोर से साफ़ आवाज़ आई। कोई शास्त्रीय संगीत गा रहा था। “बस बस अब छोड़ द मत हिलाल” चिन्नी बाबा बोले । कुछ देर बाद जब गाना ख़त्म हुआ उदघोषक की आवाज़ आई। “ यह आकाश वाणी का लखनऊ केंन्द्र है” ! सब के चेहरे चमक रहे होंगे पर रात के अंधेरे में दिखाई नहीं दे रहे थे पर विज्ञापन इस अजूबे रेडियो का गाँव पर पिपरेतर के दरवाज़े पर बजना अचंभित करने वाली घटना थी । फिर तो हर शाम भीड़ लग जाती । समाचार, गीत शास्त्रीय संगीत सब सुने जाते। शास्त्रीय संगीत समझ में तो शायद किसी के भी नहीं आता था पर सुना खूब जाता। कोई कुछ बीच में बोले तो दूसरे चुप करा देते। बाद में चुटकियाँ ली जाती। एक दूसरे की नासमझी पर । न जानते हुये सिर्फ़ मान कर कि संगीत आनंददायक है भिन्न रागों की व्याख्या का प्रयत्न भी होता था।

 

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Vrikshamandir

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3 Comments

  1. मै कौन हूँ? इस अनुत्तरित प्रश्न के विमर्श का प्रस्तुतिकरण गंभीर है! मैंने भी कुछ एक बार इस प्रश्न के उधेड़बुन में खुद को लगाया परन्तु काफी माथा-पच्ची करने के बाद खाली हाथ वापस लोट आया। मुझे ‘मैं कौन हूँ ‘पर अब बिचार करना अनन्त की परिकल्पना करने जैसा लगता है।
    अतः अब या तो इस विषय पर सोचता ही नहीं हूँ या गीता और बुद्ध के उपदेशों से काम चला लेता हूँ।
    ईश्वर इस प्रश्न के उत्तर पाने में आप की सहायता करे।
    चरणस्पर्श
    अनिरुद्ध

    1. मैं कौन हूँ ? यक्ष प्रश्न है । जिसका कोई समाधान नहीं मिला है । आपकी प्रतिक्रिया सही है। पर यह प्रश्न मानव सभ्यता और सोच में आदिकाल से रचा बसा रहा है। यदि किसी को उत्तर की एक झलक मिल भी जाय तब शब्द ही नहीं मिलते । मन अंतर्मुखी हो जाता है । खो जाता है । भारतीय मनीषियों ने श्रुति और स्मृति ने इस प्रश्न का उत्तर संकेतों में मनन करने के लिये दिये हैं । आदि शंकराचार्य ने मैं कौन का उत्तर (?) आत्मषटकम में दिया है It is said that when Ādi Śaṅkara ( in eighth century AD) was a young boy of eight and wandering near River Narmada, seeking to find his guru, he encountered the seer Govind Bhagvadpada who asked him, “Who are you?”. The boy answered with these stanzas, which are known as “Nirvāṇa Shatkam” or Ātma Shatkam”. Swami Govindapada accepted Ādi Śaṅkara as his disciple. The verses are said to be valued to progress in contemplation practices that lead to Self-Realization. -From Wikipedia “ https://youtu.be/W07vZbJ_g74

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