चर्चा फ़िराक़ गोरखपुरी की

मैं गोरखपुर के एक गाँव से हूं । रघुपति सहाय ‘फ़िराक़ गोरखपुरी’ भी गोरखपुर के एक गाँव से थे। मैं तो अभी भी “हूं”। मैं भी कभी न कभी “हूं” से “था” तो हो ही जाऊँगा पर “था” हो जाने के बाद परिवार और कुछ स्नेही जनों को छोड़ शायद ही मेरे बारे में कोई … Continue reading चर्चा फ़िराक़ गोरखपुरी की

बीता जीवन स्मृतियों का वन

जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल ही तो है जीवन का जीवन सीमित पर अज्ञात घटनाओं, अनुभवों, कहे, अनकहे, न कह पाये, किये, न किये, न कर पाये पेड़, पौधे और झाड़ियाँ प्रेम,घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, काम, क्रोध लोभ, मोह इच्छा,अनिच्छा के फल रंग बिरंगे पाप और पुण्य के बीज समय के झोंकों और आँधियाँ … Continue reading बीता जीवन स्मृतियों का वन

समय है हमारी बूढ़ी माँ

समय है हमारी बूढ़ी माँ देखा है सालो तक बदलते मौसमों को जिसने  अपनों को, अपने जनों को, हम सब बच्चों, लड़के लड़कियों,जवानों,अधेड़ों, बूढ़ों, सबको वसंतों में ही नहीं वरन सर्दी, गर्मी, बरसात, पतझड़,  सभी मौसमों में संभाल, संजो कर रखा जिसने  समय है हमारी बूढ़ी माँ  अब जब अक्सर वह अपने भूत या अनजाने … Continue reading समय है हमारी बूढ़ी माँ

आदमी और मौसम

आदमी और मौसमदोनों जन्म लेते हैं, बढ़ते हैसमय के साथ ढलते बदलते हैंबचपन, लड़कपन, जवानी, अधेडपन फिर बुढ़ापासर्दी, गर्मी, बरसात, पतझड़, फिर वसंतअवस्थायें ही तो है निरंतर बदलते आदमी और मौसम कीदोनो एक जैसेमर कर फिर जन्म लेते हैं