ज़िंदगी

और एक शाम

एक-सा स्वाद छोड़ जाती है
ज़िन्दगी तृप्त भी व प्यासी भी, लोग आये गये बराबर हैं
शाम गहरा गयी, उदासी भी! ~ धर्मवीर भारती

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास, दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं ~ फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम परिंदों से ज़ियादा आज़ाद तो नही, शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो, ~ इरफान सिद्दीक़ी

बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा,मगर वो शाम किसी शाम भी नहीं आई ~ अजमल सिराज

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं ~ वसीम बरेलवी