अनुभूति – 4

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

परिभाषाओं के पीछे परेशान मैने सुख या खुशी की परिभाषा के लिए एक पोस्ट लिखा था। इस साइट पर देखा तो गुदगुदी हुइ। या यूं कहें कि खुजली हुई।


हरिद्वार में हूं, बहुत कुछ देखने को सीखने को मिला।

साधु संतों के साथ, नीचे और फ़ोटो स्लाइड शो में

अभी दो दिन पहले एक हजार से ज्यादा युवक, अपना घर, परिवार छोड़ कर नागा पंथ में शामिल हो गये। कपड़े उतार कर फेंक दिये, सारे बाल उतरवा दिये, एक सफेद लंगोट बांध ली, गंगा में स्नान किया, ललाट पर हल्दी रोली की चौड़ी लकीर लगाई, और बस टोली में शामिल हो गये। सब के सब अच्छे घर से।


जो प्रश्न मेरे दिमाग में घिरनी बन कर सतत घूम रहा है, वह है “खुशी किसे हुई,जो नागा बने या जिन्होंने इतने लोगों को नागा बनाया “।सुख किसे मिला। किसी से पूछा नही, नही तो मुझे भी उसी टोली मे मिला देते।


लेकिन प्रश्न मुंह बाए खड़ा है।


कोइ मदद। कोई अपना।


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