साधो यह मुर्दों का गाँव


मेरी जीवन यात्रा भी वैसे ही उसी नीले आकाश के नीचे शुरू हुई थी जैसे इस संसार की खरबों करोड़ ज़िंदगियाँ जन्म लेती रहती हैं और जीवन मृत्यु के चक्र में विचरती रहती हैं………

फिर क्या है वह जो मुझे मेरी खुद की आँखों में विशेष बना देता है ? तुलना करूँ तो यही समझ में आता है कि यदि कुछ अलग है मुझमें तो वह है मेरी सही या ग़लत सोच , अनुभूतियाँ और अपनी आँखों में अपनी औक़ात की सही ग़लत पहचान। अंग्रेज़ी मे रंगरेज़ी करें तो कहेंगे खुद का बनाया गया मेरा ईगो ! मुझ मे अन्य के बनिस्बत कुछ भी विशेष नहीं है ।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत, एन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम्।

जो भी है इस जग में गतिहीन या गतिमान, बसा है इन सब में सर्वव्यापी भगवान त्याग भाव से सुख भोगो इनका, मत करो पराये धन से अनुराग।

हिंदीनेस्ट से साभार

कुछ एक महीने पहले एक भूतपूर्व सहकर्मी ने मुझे अंतर्जाल के आभासी माध्यम से एक संवाद भेजा था ।पढ़ कर कुछ क्षणों के लिये थोड़ा आहत तो हुआ पर शीघ्र ही मन में आश्चर्य, कुतूहल, से भर गया और मन मे अजीब से विचार उठने, उमड़ने, घुमड़ने लगे । मेरे सहकर्मी मित्र की उम्र मेरे से बहुत कम है छोटे भाई या पुत्र जैसे । हम शायद तीस साल बाद एक दूसरे के संपर्क में आये थे।

फिर ऐसा संवाद क्यो ? मेरे प्रति उसके संवाद मे कोई अनादर अथवा अपशब्द जैसी कोई चीज न थी । जो भी उसने लिखा बेबाक़ी से लिखा था । अपने पुराने दिनों के बारे में या कहें कि हमारे पुराने दिनों के बारे मे । क्षोभ था, ग़ुस्सा भी । अपने अनुभवों के बारे में तल्ख़ शब्दों में उसने लिखा था और जिस तरह के वातावरण में उन दिनों हम काम करते थे उसके बारे में आपबीती बयान की थी या यूँ कहें कि अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी की बात की थी । मेरे प्रति कोई आरोप न था।

खैर मैं इस बात को भूल गया था । पर आज जब महीनों बाद उसका दूसरा संवाद आया जिसमें उसने अपने शब्दों के लिये क्षमा माँगी तब भूली बात फिर याद आ गई ! मैंने उसके दूसरे संवाद का उत्तर कुछ इन शब्दों मे दिया ।

You are like a younger brother or more like a son to me. No need to ask for forgiveness… But how can I forget those times of stress and joy, failure and success, when we both worked at NDDB Anand. We were in it together. My exit from NDDB was not of a kind that I liked. But that was my fate. What else …I deliberately try to keep my negative memories out and by and large I have also succeeded in doing so. I have not been working since 2017……Started my website Vrikshamandir.com in 2019 and it has helped me keep busy and productive……….”

अब सोचता हूँ कुछ देर के लिये ही सही मैं अंदर से आहत क्यों हो गया था। खैर बात आई और गई। ज़िंदगी आगे खिसक गई !

लेकिन, विगत की खट्टी मीठी स्मृतियाँ, वर्तमान के अनुभव एवं सोच तथा भविष्य की आशा और निराशायें सब ही तो जी रही है मेरे साथ ।

जब तक मैं हूँ यह सब मेरे साथ रहेंगी । स्मृतियाँ, अनुभव, सोच, आशा निराशा का भँवर जाल । इन सबसे जाने अनजाने में लुका छुपा छिपी का खेल भी चलता रहेगा ।

जब मै नही रहूँगा तब यह क्या मेरी इन सब स्मृतियों , अनुभवों , सोच, आशाओं , निराशाओं के अवशेष रहेंगे । पता नहीं । हो सकता है कुछ क़िस्से रह जायें ।

पर क्या उन क़िस्सों का कथ्य सच तो क्या सच का आभास भी दे सकेगा ?

जीते जी देखता और महसूस करता हूं सच की खोज मे रत योद्धा सच पकड कर लाने का दावा करते है । फिर दूसरा योद्धा प्रकट हो एकदम विपरीत सच का दावा पेश कर देता है !

किसकी माने? किस आधार पर मानें ।

फिर याद आया कबीर दास का भजन! जिस को ले कर मैने एक दिन विडियो भी बनाया था और ट्विटर पर अपलोड भी किया था। ट्विटर पर मेरा हैंडल राग दरबारी के पात्र वैद्य जी के नाम पर है।

साधो ये मुरदों का गांव
पीर मरे पैगम्बर मरिहैं
मरि हैं जिन्दा जोगी
राजा मरिहैं परजा मरिहै
मरिहैं बैद और रोगी
चंदा मरिहै सूरज मरिहै
मरिहैं धरणि आकासा
चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं
इन्हूं की का आसा
नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं
मरि हैं सहज अठ्ठासी
तैंतीस कोट देवता मरि हैं
बड़ी काल की बाजी
नाम अनाम अनंत रहत है
दूजा तत्व न होइ
कहत कबीर सुनो भाई साधो
भटक मरो ना कोई

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