विकसवा है कहां ? यहां है पर है भी नहीं !

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मानव सभ्यता के कुछ बुद्धिजीवी विशेषज्ञों का मानना है कि ”विकास” का पृथ्वी पर अवतरण सर्वप्रथम जंबूद्वीप के भारत खंड मे हुआ था।

चूँकि बुद्विजीवी विशेषज्ञों का एक मत होना लगभग असंभव सा है, स्वाभाविक है कि बहुत से बुद्विजीवी विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार, विकास सबसे पहले अफ़्रीकी-भू भाग में अवतरित हुआ और वहाँ से विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पहुँचा। 

ख़ैर, जो हुआ होगा, सो हुआ होगा । हम तो न बुद्धिजीवी हैं, और न ही विशेषज्ञ । अत:: बुद्धिजीवी कुकुरहाव में न पड़ कर, क़िस्सा कहानी और लोक संस्कृति की अलौकिक ~ बतकही- बकवास – बकैती – बदगुमानी – बलकुच्चन – बडबोली से भी आगे बकचोदी की परंपरा मे यह साधारण सा विमर्श “विकास” की जीवन यात्राओं के बारे में है।

आगे पढ़ना है तो पढ़ें अन्यथा अपना समय बर्बाद करने के लिये हमें विश्वास है कि आप के पास अन्य बहुत से साधन तो होंगे ही। 

जीवन यात्रा की जगह जीवन यात्राओं कहना उचित ही है। आख़िर जन्म मरण के चक्र से अछूता कौन है। “विकास” कैसे बचता ? विशेषत:, जब जंबूद्वीप के भारत खंड में जन्मे “विकास” के बारे में चर्चा हो रही हो।

जंबूद्वीप के भारत खंड मे पुनर्जन्म होता था, होता है और होता रहेगा।अत: सिद्ध हुआ कि यदि जब भी “विकास” भारत में जन्म लेगा तो फिर पुनर्जन्म लेगा ही । यह बात दीगर है कि पुनर्जन्म भारत में न हो कर चीन, अमरीका, या रवांडा में हो। 

तो हुआ यूं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक बार फिर “विकास” पुनर्जन्म ले जंबूद्वीप के भारत खंड में प्रकट हुआ। 

शैशव काल में गांधी बाबा और उनके अनुयायी कांग्रेसियों ने “विकास” को पाल पोस कर बड़ा किया। वैसे गांधी बाबा कह गये थे कि स्वतंत्रता प्राप्ति बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिये था ।

पर मजबूरी थी।

कुछ लोगों का मानना है कि चाहते हुये भी कांग्रेस अपने को भंग न कर सकी।

आख़िर विकास पैदा हो गया था। बच्चा था। उसके लालन पालन के लिये अभिभावकों की आवश्यकता थी। ध्यान दें, अभिभावक नहीं अभिभावकों की ज़रूरत थी, क्योंकि विकास की जन्मते ही बहुआयामी ( राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक आदि ) दिशाओं में प्रगति होने लगती है।

दुर्गावतार इंदिरा जी का जमाना आया। “विकास” गरीबी हटाओ की पैजनियां बांध ठुमुक ठुमुक चलने लगा । छोटे छोटे कदम उठाने लगा। फिर इमरजेंसी आई विकास अचानक बचपन को दुलत्ती मार टिन टिना कर अंग्रेज़ी की रंगरेज़ी मे ”टीन” (Teen) हो गया।

फिर एक दो साल जय प्रकाशियों ने अंत्योदय आदि का काढ़ा पिला देखभाल की बड़ी कोशिश की।

दवा ढूँढने में लगे भारतीय चिंतक अर्थशास्त्रियों ने केवल देश में ही नहीं वरन विदेशों में भी शोध किया। शिक्षक बने, सरकारों के, संयुक्त राष्ट्र संघ की संबद्ध संस्थानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सलाहकार बने । पर इस रोग की दवा भारत में पैदा हुये “विकास” को नहीं मिली।

विकास का विकास अवरुद्ध हो गया था । अर्थशास्त्री डागदरों ने बीमारी का नाम हिंदू रेट आफ ग्रोथ रखा। यह रोग भारत में ही पाया गया और दुनिया के किसी अन्य देश में अब तक नहीं पाया गया। कुछ मज़ाक़िया डागदरों के अनुसार चूँकि भारत में हिंदू लोग बहुसंख्यक हैं अतः: हिंदू रेट आफ ग्रोथ को पनपने का मौक़ा मिला ।टीन एजर “विकास” की प्रगति की दर अवरुद्ध हो गई। सालों तक इसका इलाज किया गया। 

इस बीच गाय पट्टी और हिंदी हृदय भूखंड में विशेषत: और सारे भारत में भी मंडल कमंडल को ले अच्छी राजनीति चली । 

बड़ा खुश था “विकास” । वयस्क होने लगा । “विकास” की राजनीति से ज़्यादा कुछ लेना देना नही था। राजनीतिज्ञों ने तो पिछली शताब्दी के नौंवे दशक तक आते आते देश को कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया था।देश का सोना बैंक आफ इंगलैंड को गिरवी रखना पड गया। नरसिंह राव जी को तो मजबूरन भारतीय अर्थ व्यवस्था को मुक्त करना पडा। “विकास” को कुछ ऐसे ही अवसर की तलाश थी। वह लोगों मे घुलमिल गया। जहां उसका मन लगा विकास उनके साथ जुड गया ।

किसी की न सुनता था ”विकास”।एक दम बिगडैल। इधर कभी इधर कभी उधर विकास यहां वहां आता रहा जाता रहा। कभी भी देश में जम कर न रहा।

शताब्दी बदली !

इक्कीसवीं सदी का पदार्पण हो गया। समय आख़िर समय होता है। विकास का विकास हो इसके लिये समय रूकने वाला थोड़े ही है। 

पहले वाजपेयी जी फिर बाद में मनमोहन जी ने सोनिया जी के निर्देशानुशार “विकसवा” का जवानी में ख्याल रखा। 2014 तक “विकास” जवानी की दहलीज़ पर दस्तक मारने लग गया। 

2014 में जंबूद्वीप के भारत खंड में भारी परिवर्तन आया। ऐसा परिवर्तन कि जनता जनार्दन का एक तबका मानने लगा कि वास्तविक स्वतंत्रता 1947 में नहीं पर 2014 में मिली। 

“विकास” को लगने लगा कि वह मनुष्य है। मंझोली हैसियत का मनुष्य । “विकास” को यह समझ आ गई कि उसका जन्म, शैशव, जवानी सब उसके जैसे मंझोली हैसियत के मनुष्यों के नाते हुआ। गांधी बाबा, नेहरू जी, इंदिरा जी, बीच वाले “आये गये“ जी, बाजपेयी जी , मनमोहन जी आदि का कुछ विशेष योगदान तो रहा नहीं

मोदी जी आये तब तक विकास अधेड़ हो चुका था। 

उसे अपने देश के “यथार्थ” को झेलने मे अफनाहट और घबराहट होने लगी थी।

उसकी सोच भी अब अपनी थी ।

ऐसा कहा जाता है कि “रागदरबारी” मे श्रीलाल शुक्ल लिखित “पलायन संगीत” पढ़ने के बाद बहुत विचार कर उसने घर छोड़ने का मन बना लिया ! 

विकास को लगा वह वास्तव मे मंझोली हैसियत का मनुष्य है ।अब वह पलायन मे है और इधर उधर भटक रहा है। अपने पूर्ववर्ती विकासों की तरह ! वैसे कभी कभार जब फ़ुर्सत में होता है तब भारत भ्रमण पर भी आ जाता है और लोगों को एहसास दिला देता है कि उनका विकास हो रहा है। और जिन्हें ऐसा एहसास हो जाता है वह स्वयं विकास करने लगते हैं । है न ग़ज़ब की बात ।

सुना है विकास की माताश्री फिर गर्भ से है।

जल्द ही चुनाव बाद एक नया विकास जन्म लेगा ।

पलायन–संगीत 

तुम मँझोली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फँस गए हो।

वही फैलता है, वही उछलता है। कीचड़ से बचो। यह जगह छोड़ो। यहाँ से पलायन करो।वहाँ, जहाँ की रंगीन तसवीरें तुमने ‘लुक’ और ‘लाइफ़’ में खोजकर देखी हैं; जहाँ के फूलों के मुकुट, गिटार और लड़कियाँ तुम्हारी आत्मा को हमेशा नये अन्वेषणों के लिए ललकारती हैं; जहाँ की हवा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, जहाँ रविशंकर–छाप संगीत और महर्षि-योगी-छाप अध्यात्म की चिरन्तन स्वप्निलता है…।

जाकर कहीं छिप जाओ। यहाँ से पलायन करो। यह जगह छोड़ो।नौजवान डॉक्टरों की तरह, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के लिए हुड़कनेवाले मनीषियों की तरह, जिनका चौबीस घण्टे यही रोना है कि वहाँ सबने मिलकर उन्हें सुखी नहीं बनाया, पलायन करो।

यहाँ के झंझटों में मत फँसो। अगर तुम्हारी किस्मत ही फूटी हो, और तुम्हें यहीं रहना पड़े तो अलग से अपनी एक हवाई दुनिया बना लो। उस दुनिया में रहो जिसमें बहुत–से बुद्धिजीवी आँख मूँदकर पड़े हैं। होटलों और क्लबों में। 

शराबखानों और कहवाघरों में, चण्डीगढ़–भोपाल–बंगलौर के नवनिर्मित भवनों में, पहाड़ी आरामगाहों में, जहाँ कभी न खत्म होनेवाले सेमिनार चल रहे हैं।विदेशी मदद से बने हुए नये–नये शोध–संस्थानों में, जिनमें भारतीय प्रतिभा का निर्माण हो रहा है। 

चुरुट के धुएँ, चमकीली जैकेटवाली किताब और ग़लत, किन्तु अनिवार्य अंग्रेज़ी की धुन्धवाले विश्वविद्यालयों में। वहीं कहीं जाकर जम जाओ, फिर वहीं जमे रहो।यह न कर सको तो अतीत में जाकर छिप जाओ। 

कणाद, पतंजलि, गौतम में, अजन्ता, एलोरा, ऐलिफ़ेंटा में, कोणार्क और खजुराहो में, शाल–भजिका–सुर–सुन्दरी–अलसकन्या के स्तनों में, जप-तप-मन्त्र में, सन्त-समागम-ज्योतिष-सामुद्रिक में–जहाँ भी जगह मिले, जाकर छिप रहो। भागो, भागो, भागो। यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा है।

~ रागदरबारी , श्री लाल शुक्ल


Published by Vrikshamandir

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2 thoughts on “विकसवा है कहां ? यहां है पर है भी नहीं !

  1. बाकी पता नहीं, आजकल विकास राजनैतिक गलियारों एवं गोल भवन से तो गायब लग रहा है । चर्चा में है ही नहीं । शायद लौट आए, वैसे प्रतिबंधित शब्दों की सूची से तो बच गया है ।।

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