ते तणो खरखरो फोक करवो

This blog is dedicated to the memory of my mother, who left us on 5 May 2021 to the world she had come from. If she was with us would have loved listening to the embedded bhajan.

Thanks to Tushaar, my Twitter friend from Vadodara on whose website Bharat Parikrama, I read his beautiful story about belief in God. And the duality when in the light of some life experiences one sees the futility of such a belief. And some critical life events and moments of realization that trigger another quest to understand the meaning of life.

His story in Hindi is available at this link. When I first heard the bhajan embedded in the story’s text, I did not fully comprehend the meaning as I understood only a part of it.

But the rendition was such that it touched the core of my being. Every time I hear this bhajan there are tears in my eyes.

I listened to it several times to get the words and type out the same in Devnagri. I thought that the script would help me better understand the meaning. Once completed, I realised that I was making mistakes. Therefore, I decided to request Neela Gupta, again from Vadodara, who shared with me the transliteration of the verses in roman script and the meaning of the verses in English.

This is how she responded when I made a request for her help.

“Wah! What a beautiful start to the day! I had long forgotten to hear this Bhajan. I think it’s coming to me as a message. Just enjoying it first.

I love Narsimh Mehta and feel so fortunate to have known/ sung most of his Bhajans in school.

And by the way, my mom side family is descended from his lineage. My Nanaji was a principal of Bahauddin college in Junagadh”

I am loving the YouTube by Jayantibhai how well he has sung all the Bhajans.”

Thank you Tushar, Thank you Neela for your help and support.



हे जे गमे जगद्गुरु देव, जगदीश ने ते तणो खरखरो फोक करवो

नरसी मेहता

हे जे गमे जगद्गुरु देव जगदीश ने,ते तणो खरखरो फोक करवो।-१

हे जे आपणों चिंतव्यो अर्थ काईं,नव सरे उगरे एक उद्वेग भरवो।-२

हे हूँ करू हूँ करूँ एज अज्ञानता शकट नो भार जे श्वान ताणें।-३

हे सृष्टि मंदाण छे सर्व एणी पेरे जोगी जोगेश्वरा कोक जाणें।-४

हे निपजे नर थी तो कोई न रहे दुखी शत्रु मारि ने सऊ मित्र राखे।-५

हे रहे न रंक कोई द्रष्ट आवे नहीं भवन पर भवन पर छत्र दीखे।-६

हे रितु लता पत्र फल फूल आपे यथा मानवी मूर्ख मन व्यर्थ सोचे।-७

हे जेह ना भाग्य माँ जे समे जे लख्यूं तेह ने समे तेज पोंहचे।-८

हे ग्रंथ गडबड करी वात ना करी खरी जेहने जे गमे तेने पूजे। -९

हे मन कर्म वचन आप मानी लहे सत्य छे एज माँ एम सूजे ।-१०

हे सुख संसारी मिथ्या करी मानजो कृष्ण विना बिनू सर्व काँचू।-११

हे जुगल कर जोडि करी नरसैंयो एम कहे जन्म प्रति जन्म हरि ने जांचू । -१२
It is meaningless to regret for whatever happens as it is that the God Almighty likes- 1

No matter how much you keep thinking and planning, it doesn't happen that way . Save yourself from that Udveg... Restlessness - 2

Man in his ignorance thinks he is the doer. Just like a dog who walks under the bullock cart and thinks that he is carrying the whole burden of the cart. - 3

Only few Yogis know that the whole cosmos is beyond us, it's created by Him.- 4

If man had his way,nobody would be unhappy as everyone will do away with enemies and keep company of only friends. -5

There will be no distinction of poor and wealthy as all the mansions will look the same. - 6
According to the season, the tree/ climber(lata) will give leaves, flowers and fruits but the foolish human mind keeps thinking/wishing for it in vain.-7 

One will get exactly whatever is destined to come to him at a particular time. - 8

Reading/ availability of so many knowledgeable books/ scriptures ( granth) is at the root of all this Gadbad. Let one worship whoever he can connect to or like. - 9

I am thinking/realizing it's best to live according to what seems true to one's wisdom, karma and speech (man, karma and vachan).-10

O Sansaaris, know that all this that you think as happiness (sukh) is maya( mithya) . Everything is temporary ( kaccha) without Krishna. He is the one who is forever, permanent truth. - 11

Joining both hands, Narsaiya says that let me wish only for God ( Hari) in every lifetime.-
12

नीला द्वारा प्रेषित ऊपर अंग्रेज़ी में लिखे भजन के अर्थ का हिंदी अनुवाद तो मैंने किया ही, साथ में अपनी सीमित समझ से चिंतन मनन भी किया । जो कुछ मुझे समझ में आया नीचे लिख रहा हूँ। आपकी टिप्पणियों, सुधार, अतिरिक्त और भिन्न समझ से किये विवेचन का स्वागत रहेगा। त्रुटियों के लिये मैं क्षमा चाहूंगा ।


१- पछताना व्यर्थ है क्योंकि जो कुछ भी होता है केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा ही होता है ।

ठीक तो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें।दास मलूका तो कह गये हैं “अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम”। पर यह दोहा आलसी लोगों के लिये ही सही है। वैसे आलसी भी तो न पाने पर पछताते हैं । जिजीविषा या जीने की अदम्य इच्छा मानव ही क्या हर जीव के मूल में है। हमें कर्म तो करना ही है। शरीर का ध्यान रखना, खाना, पीना , साँस लेना भी तो कर्म ही है। हिंदू या सनातन मान्यता है कि हमारा अगला जीवन कर्मफल पर निर्भर होगा। अन्य जो ऐसा नहीं मानते उन्हें भी तो कर्मफल के अनुसार ही जन्नत या दोज़ख़ नसीब होगी। और जो इन दोनों पुनर्जन्म और केवल एक जीवन वाली मान्यता से इंकार करते हैं वह भी इतना तो मान लेंगे कि इस जीवन में कर्म से ही जी सकते हैं। कर्मफल से ही जीवन चलता है। सवाल है कैसा कर्म ?

शांति मंत्र के बाद ईशोपनिषद के पहले श्लोक में कहा गया है;

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्ते, त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम्

जो भी है इस जग में गतिहीन या गतिमान,बसा है इन सब में सर्वव्यापी भगवान। सुख भोगो कर के इन सब का त्यागमत करो पराये धन से अनुराग ।

दूसरा श्लोक है;

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः.एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति कर्म लिप्यते नरे।

कर्म करते हुये इस भांति तुम , रखो शत वर्ष जीने की इच्छा, मार्ग तुम्हारे लिये अन्यथा नहीं कोई । इस पथ पर नर कर्मलिप्त नहीं होता ।

“कर्म अलिप्त” कर्म से जन्म मृत्यु के चक्कर से छुटकारा मिलता है। दोनों श्लोकों के अर्थ पर साथ साथ मनन से स्पष्ट समझ आती है। पहला श्लोक एक सैद्धांतिक विवेचन का आधार रखता है तो दूसरा श्लोक पहले के साथ मिल यह स्पष्ट करता है कि कैसे उस सिद्धांत को कार्यरूप में लायें।

२- हम कितना भी सोचें, योजनाये बनायें , प्रयत्न करे ज़रूरी नहीं कि जैसा हमने चाहा वैसा हमेशा ही होता हो। कर्म तो करना ही है ।अपना चाहा न प्राप्त होने पर मानसिक उद्वेग होना स्वाभाविक है। ऐसी बेचैनी से अपने आप को बचाना चाहिये।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं, “होइहें सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढावहिं साखा ”।

३-मनुष्य अपनी अज्ञानता में सोचता है कि वह कर्ता है। जैसे कोई कुत्ता बैलगाड़ी के नीचे चलता है और सोचता है कि वह गाड़ी का सारा बोझ उठा रहा है।

आख़िर सृष्टि मे मनुष्य की औक़ात ही क्या है। सिवाय उसके अहंकार जनित अज्ञान के। बरबस आदि शंकराचार्य के आत्मषटकम / निर्वाणषटकम में कहे इन श्लोकों की याद आ जाती है।

Photo of painting by Dr Rama Aneja
मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥

मैं मन नहीं हूँ, न बुद्धि ही, न अहंकार हूँ, न अन्तःप्रेरित वृत्ति;
मैं श्रवण, जिह्वा, नयन या नासिका सम पंच इन्द्रिय कुछ नहीं हूँ
पंच तत्वों सम नहीं हूँ (न हूँ आकाश, न पृथ्वी, न अग्नि-वायु हूँ)
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: 
न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥

मैं नहीं हूँ प्राण संज्ञा मुख्यतः न हूँ मैं पंच-प्राण स्वरूप ही,
सप्त धातु और पंचकोश भी नहीं हूँ, और न माध्यम हूँ
निष्कासन, प्रजनन, सुगति, संग्रहण और वचन का;
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।  

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ 
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥ 

न मुझमें द्वेष है, न राग है, न लोभ है, न मोह,
न मुझमें अहंकार है, न ईर्ष्या की भावना 
न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, 
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।  

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् 
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् 
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥

न मुझमें पुण्य है न पाप है, न मैं सुख-दुख की भावना से युक्त ही हूँ
मन्त्र और तीर्थ भी नहीं, वेद और यज्ञ भी नहीं
मैं त्रिसंयुज (भोजन, भोज्य, भोक्ता) भी नहीं हूँ वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।


न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: 
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥

न मुझे मृत्य-भय है (मृत्यु भी कैसी?), न स्व-प्रति संदेह, न भेद जाति का
न मेरा कोई पिता है, न माता और न लिया ही है मैंने कोई जन्म
कोई बन्धु भी नहीं, न मित्र कोई और न कोई गुरु या शिष्य ही
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।



अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ 
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥ 



मैं हूँ संदेह रहित निर्विकल्प, आकार रहित हूँ 
सर्वव्याप्त, सर्वभूत, समस्त इन्द्रिय-व्याप्त स्थित हूँ   
न मुझमें मुक्ति है न बंधन; सब कहीं, सब कुछ, सभी क्षण साम्य स्थित
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।
आचार्य शंकर रचित निर्वाण षटकम्‌ ||

४- केवल कुछ योगी ही जानते हैं कि पूरा ब्रह्मांड हमारी समझ के बाहर है, यह उनके द्वारा बनाया गया है।

५-यदि सब कुछ मनुष्य के चाहे अनुसार होता, तो कोई भी दुखी नहीं होता क्योंकि हम अपने शत्रुओं का नाश कर देते ताकि केवल अपने मित्रों की संगति रख सकें।

६-तब तो गरीब और अमीर का कोई भेद नहीं होता और सभी मकान एक जैसे दीखते ।

७-वृक्ष ऋतु के अनुसार, लता, पत्ते, फूल, फल देता है लेकिन मूर्ख मानव मन ही मन में सोचता/चाहता रहता कि ऐसा हर मौसम में हो।

८-नियत समय पर हर एक को जो कुछ भी नियत है, वह ठीक वैसा ही मिलेगा।

९- बहुत सारे सारे ज्ञान भरे ग्रंथों का का पढ़ना और न समझना शायद इस भटकी हुई सोच के मूल में है। जो जिससे जुड़ सकता है या पसंद कर सकता है, उसकी पूजा करें।

१०- मेरी समझ सोच रहा ऐसा जीवन ही अच्छा जीवन है जिसे मनुष्य अपने मन, कर्म और वाणी तीनों को सत्य पर आधारित कर जिये।

११- हे संसारियों, जान लो कि यह सब जिसे तुम सुख समझते हो, वह माया (मिथ्या) है। कृष्ण के बिना सब कुछ अस्थायी (कच्चा) है। “वह”, “वह” है, जो हमेशा के लिए है , स्थायी है , सत्य है।

१२- दोनों हाथ जोड़कर नरसैया कहते हैं कि मुझे जन्म दर जन्म केवल एक कामना है भगवान (श्री हरि) की।

ईशोपनिषद के श्लोकों का हिंदी मे पद्यात्मक अनुवाद यहाँ उपलब्ध है।

Published by Vrikshamandir

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4 thoughts on “ते तणो खरखरो फोक करवो

  1. Comment by Hemendra Joshi on Facebook
    “Amazing . How nicely dedication is depicted by Adi Kavi Narsinh Mehta ..incredible and equally wonderful u have translated and explained with reverence !👏👌👍⚘“

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