चिंता, आशा, ममता और मैं

A couple of days ago, my dear friend and former colleague, Dr SC Malhotra, sent me a whatsapp message forwarding a video clip. He has done many audio stories for Vrikshamandir which can be accessed here. Dr Malhotra is a prolific commentator on blogs that are posted on Vrikshamandir.

His text message forwarding the video clip forwarded read;

“I always thought that WA university fowards are bullshit…. but … this person speaks something true. Similar to Geeta Gyan: क्यूँ चिंता करते हो …..”

Video clip sent by Dr SC Malhotra

I replied to Dr Malhotra; “बहुत बढ़िया बोला है । 1990 के दशक में Deepak Chopra की एक किताब ख़रीदी थी । पढ़ी भी । उसमें भी कुछ ऐसा ही वर्णन था।”

फिर मूड बना मैंने अपने आप से कहा चलो आलस छोड़ो कुछ इस विषय पर लिखो।

चिंता, आशा, ममता और मैं

डाक्टर मल्होत्रा द्वारा भेजे विडियो क्लिप देखने के बाद मुझे पूज्य दादा जी पांडुरंग शास्त्री आठवले से सुना यह प्रसंग याद आया।

बात उन्नीस सौ नब्बे के मध्य के दशक की है। मै आणंद में नौकरी करता था। दादा जी पाण्डुरंग शास्त्री और स्वाध्याय परिवार से जुड़ चुका था। वडोदरा के किसी गाँव मे दादा जी आने वाले है मेरे मित्र और सहकर्मी प्रवीण भट्ट को जब यह जानकारी मिली तो वह दादा जी के दर्शन के लिये तैयार होने लगे। मुझ से पूछा और मै भी झट से तैयार हुआ । फिर हम पहुँच गये माही नदी के पार उस गाँव में जहां दादा जी स्वाध्यायियों के बीच बैठे थे । जाड़े के दिन थे। सूरज अभी डूबा न था।दादा जी चिंता के विषय पर उठाये गये प्रश्न के उत्तर में एक उदाहरण दे कर समझा रहे थे।

दादा जी कह रहे थे, “भगवान जन्म के साथ ही मनुष्य को दो नौकरानियाँ दे देते हैं। एक “चिंता” दूसरी “आशा” । मानुष बड़ा हो कर भूल जाता है कि चिंता और आशा नौकरानियाँ है और उनसे घरवाली की तरह बर्ताव करने लगता है। यहाँ तक की अपनी घर वाली की जगह अपना अधिक से अधिक समय समय चिंता और आशा के साथ बिताता है।”

मुझे लगता है इस विषय में मैं अकेला नहीं हूँ। चिंता और आशा तो जीवन पर्यन्त साथ रहती हैं । कमबेस हो सकता है । एक ओर चिंता आशा की उड़ान को रोके रखने में कारगर है वही आशा, चिंता की बदलियों को हटा, मानवी को कर्तव्य पथ पर चलने के लिये सहायक बन सकती है। पर कैसे ?

संवाद को आगे बढ़ाने के लिये तब बातचीत, बहस, बकवास, बकैती, बड़बोली, बदगुमानी, बतफरेबी, बतफरोशी, बकचोदी में से किसी भी एक और एक से अधिक विधाओं का उपयोग किया जा सकता है।

जैसे दादा जी ने कहा था यह तभी संभव है जब हम आशा और चिंता को नौकरानी समझें और उनसे उसी तरह का व्यवहार करें । घरवाली जैसा नहीं । पर यह बहुत कठिन कार्य है ।

अपनी बात करूँ , और सच में कहूँ तो विशेषकर बुढ़ापे में बातें छुपाने का या अगम बगडम बोल निकल जाने का कोई फायदा तो होता नही, इसलिये जो कुछ कहूँगा कोशिश रहेगी कि जो कहा वह बतर्ज खर्री खेल फरुख्खाबादी ही हो । पर हूँ तो आदमी ही इसलिये गलती भी हो सकती है।

पहले जब मै जवान था लगता था जो दिन हैं ज़िंदगी के बहुत हैं । मैं जवानी में बुढ़ापे के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता था। समय भी नहीं होता। बहुत सी आर्थिक और पारिवारिक समस्याओं से निपटना होता था। काम पर भी बहुत सी कठिनाइयों से जूझना होता था।

पहले लगता था ज़िंदगी बड़ी लंबी है। पर अब तो लगने लगा है कि कुछ ही दिन, महीने या साल बचे हैं इस जीवन के।

प्रभु जाने !

2020-2022 के दौरान कोविड का भारत से दूर लंबा प्रवास, हृदय रोग और कैंसर से उत्पन्न परिस्थितियों से जूझ कर निकल आने पर यह अहसास भी है ही कि जितने भी दिन बचे हैं वही हैं और बहुत है।

बहुत से परिवार के, मित्र और सहकर्मी मुझे छोड़ कर अपनी अनंत अनजान यात्राओं पर चले गये । जब उनकी याद आती है तब तो मन में अक्सर प्रश्न उठता है करता है कि मैं क्यों रह गया ।

मुद्दे की बात यह है।

उम्र खिसकती रही, बचपना मरता गया, जवानी चढ़ती गई फिर ढल भी गई। बुढ़ापा आ गया। अब वृद्धावस्था का इंतज़ार है।

पर अब भी “मर गये” बचपन और “ढल गई” जवानी की यादें अक्सर उभर आती है अचानक बिन पूछे बिन बताये! ग़ज़ब !

यही हाल “चिंता” का है । चिंता का उत्पात ख़त्म ही नहीं होता। ग़नीमत है मेरे साथ साथ मेरी “चिंता” भी बुढा गई है अतः अब उतनी तेज तर्रार नहीं है ।

“आशा” का भी वही हाल है । वैसे शेष जीवन तो अब केवल बिताना ही है । जो करना था कर चुके । जो होना था हो चुका। जो है सो है।

अब बुढ़ापे में चिंता और आशा से जब भी बात होती है तो दोनों कहती है दादा जी के प्रवचनों के बाद आप ने कोशिशें तो बहुत की पर हम से पीछा न छुड़ा सके । ऊपर से आपने एक और “मित्र” ममता जो पाल रखी है। आपकी जो “ममता” है न उसी के नाते तुम्हें यह सब हुआ, हो रहा है, और आगे भी होता रहेगा।

ममता, सुधि पाठकों आपको बता दूँ मेरी कुछ पूर्ण और बहुत सी अपूर्ण इच्छायें हैं । उन्हें अब भी मै भुला नहीं पाता। चिंता और आशा अब ममता को अच्छी तरह से जानने लगी हैं।

उम्र खिसकती रही, बचपना मरता गया, जवानी चढ़ती गई फिर ढल भी गई। बुढ़ापा आ गया। अब वृद्धावस्था का इंतज़ार है। पर अब भी “मर गये” बचपन और “ढल गई” जवानी की यादें अक्सर उभर आती है अचानक बिन पूछे बिन बताये! ग़ज़ब !

मैंने गाँव छोड़ दिया पर गाँव ने मुझे अब तक न छोड़ा। मैंने एनडीडीबी छोड़ दी पर मेरी “पुरानी” एनडीडीबी ने मुझे अब तक न छोड़ा।

ममता और मूर्खता दोनों शब्द म से शुरू होते हैं। लगता है कि ममता, ममत्व और मूर्खता में घनिष्ठ आपसी संबंध है।

मेरा गाँव मेरे बचपन का गाँव न रहा , मेरा परिवार प्रतिष्ठित था, दूर दराज तक “एका” के लिये जाना जाता था अब पहले जैसा न रहा।

पुरानी एनडीडीबी और आज की एनडीडीबी में कोई साम्यता नहीं है ।

समय बदला, बदलते समय में संदर्भ और सत्ता के साथ समीकरण बदले । बहुत कुछ वह हुआ जो न होना चाहिये था, पर शायद होना था इसलिए हुआ।

पर फिर भी दिल है कि मानता नहीं । यह वस्तुस्थिति को न मानना और चिपके रहना ही तो ममता है और नहीं तो ममता और क्या है ?

फिर भी, आज भी मुझे गाँव, गाँव के परिवार और पुरानी एनडीडीबी से उतना ही लगाव है जितना पहले था।

एनडीडीबी छोड़ने के बाद गुड़गाँव में ग्रोटैलेंट कंपनी में कार्यरत हुआ। कंपनी के बोर्ड का मेंबर और कर्मचारी नंबर दो बना। मेरे मित्र और भाई समान श्री अनिल सचदेव तथा बोर्ड के सभी सदस्यों और कर्मचारियों सभी से सम्मान मिला। जीवन एक नई डगर पर चल पड़ा। एनडीडीबी का कर्मचारी नंबर पंद्रह जिसने वघासिया बिल्डिंग वाले आफिस के किचन से मई 1968 से नौकरी शुरू की थी उसने सन 2000 अगस्त से अनिल के घर के बेसमेंट को अपना आफिस बना नया काम शुरू किया। ग्रोटैलेंट और SOIL से जुड़ा हूँ अब भी। लगाव भी उतना ही है ।

मेरी घरवाली को मेरी इन दो नौकरानियों मेरी चिंता और आशा से शुरू से ही तकलीफ़ रही है । आख़िर उसकी भी तो वही नौकरानियाँ है । चिंता, और आशा । साथ मे ममता भी है !

आप की भी अपनी चिंता, आशा और ममता होंगी 😃🙏।

क्या ख़याल है ? ब्लाग लिखेंगे आप या अपने कमेंट्स से इसे और आगे बढ़ाने में मदद करोगे ?

आवाहन है जुड़िये , संवाद को आगे बढ़ाइये । सुनील शुक्ल ने कहा कभी कभी बात अड़ जाती है।

संवाद को आगे बढ़ाने के लिये तब बातचीत, बहस, बकवास, बकैती, बड़बोली, बदगुमानी, बतफरेबी, बतफरोशी, बकचोदी में से किसी भी एक और एक से अधिक विधाओं भी का उपयोग किया जा सकता है।

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5 thoughts on “चिंता, आशा, ममता और मैं

  1. सर प्रनाम, बकैती और बकवास से ही सुवास निकलता है, चिंता और आशा सही में हमेशा साथ रहतीं हैं, हो सकता है नौकरानियों की तरह परमेश्वर ने दिया हो, पर रहतीं अपना बनकर और कहें तो मनुष्य को polygamy का आननद देतीं है, ये जातीं कभी नहीं। साथ साथ चलतीं हैं।

    मेरी माँ कहती थी, चिंता चिता तक ले जाती है- वो शायद सच ही है,वास्तव में जीवन के अब जब कि कुछ वर्ष राह गए हैं, चिंता साथ साथ है।

    आशा को कैसे भूल जाएं, ये तो रोज बताती रहती है कि अभी हम जवान हैं, अपने को बुजुर्ग न मानना ही आशा का होना है। केशव की दो लाइन देखें:

    केशव केशन अस करी, जस अरिहूं कराय।
    मृगनयनी गज गामिनी,बाबा कहि कहि जाय।।

    यहां कवि केशव अपने सफेद बालों के लिये शिकायत कर रहे हैं, कि “जैसा इन सफेद बालों ने किया वैसा तो किसी को दुश्मन भी न करे, अच्छी सुंदर नवयौवनाएँ बाबा कह कह चली जातीं हैं”

    अब इसे आशा का प्रकोप कहें या जो, परंतु सही है चिंता और आशा तो रहतीं हैं साथ साथ, जबतक जीवन है।

    ममता के लिए सोचना पड़ेगा, यदि ममता अपनो से- तो सही में सोचना पड़ेगा। आज की दुनिया में ममता जब अपने जाये में पिता माता के प्रति घटती जा रही है तो अन्य की बात क्या करें

    किसी शायर की पंक्तियां याद आतीं हैं:

    जो दर्द दिया अपनो ने दिया, गैरों से शकायत कौन करे।
    जो जख्म दिए कांटों ने दिए, फूलों से शिकायत कौन करे।।

    हां, इतना मंटा हूं कि ममता को झटका लगता है, कमजोर पड जाती है, पर सही में मरती तो नहीं- एक हल्का धागा से बंधा रहता है अपनो से।

    आप बहुत अच्छा लिखते हैं, एस सी मल्होत्रा जी को अच्छी तरह से जनता हुन, उनकी हुनर की दाद देता हूँ, सन 1998 में मुझे कनाडा भेजते समय पासपोर्ट, वीसा बनवाते समय, मेरे पिताजी के मध्य नाम में त्रुटि के लिए एक करारा कमेंट किया था उन्होंने- “वाह बेटा, बाप का नाम ही भूल गए” आज तक याद है उनकी नसीहत।

    आप दोनों को प्रणाम। थोड़ी बकैती तो हो ही गयी😊

    1. डा॰ पी के श्रीवास्तव,
      नमस्कार ।

      आपका प्रणाम स्वीकार ।।
      बकलौली चलती रहे ….. जीना इसी का नाम है ।।

  2. शैलेन्द्र जी, (श्रेष्ठि कहुँ ??)

    बहुत ही रोचक रचना का गठन कर प्रस्तुत किया है आपने । सत्य और सत्य के सिवा कुछ भी नहीं लिखा ।।
    हमारी जो भूरी भूरी प्रशंसा की है आपने, अच्छी लगी ।।
    प्रभु की व्यवस्था अद्भुत होती है …. पहले मैं सोचा करता था कि ये ज्ञान, ध्यान, मोह- माया का त्याग जवानी या गृहस्थ अवस्था में क्यों नहीं आता !! फिर अपने आप ही समझ में आया कि अगर ऐसा होता तो यह सृष्टि आगे कैसे बढ़ती !!

    ईशवर की अनुकम्पा पर WA university का एक और छोटा सा video भेजूंगा WA पर ….. (यहाँ सलंगन करना नहीं आता ), उचित लगे तो श्रोताओं के लिए चेप देना ।।

  3. बात सही बोले हो भाई पर एक बात समझ नहीं आई,
    देना था चिन्ता और आशा दोनों को तलाक़, और बूढ़ोती में ममता से ब्याह क्यों रचाई?

    1. प्रिय मित्र, ममता का संग तो होश सँभालते ही रहा। हर एक मानवी का अपनी अपनी लौकिक और अलौकिक ममतायें होती हैं। फर्क केवल इतना की बुढ़ापे में आ कर चिंता और आशा बता रही है कि ममता के बारे में ।

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