वृक्षमंदिर हिंदी में

कथा, वार्ता, संवाद और भी बहुत कुछ

कुछ गद्य और पद्य तुक बंदी भरे और आधुनिक अतुकांत भी। जब लिखे गये थे बड़े अर्थपूर्ण लगे थे । अब जब पढ़ता हूँ तो कभी तो अंतर्मन को छू जाते हैं और कभी कभी तो लगते हैं एकदम नीरस और उबाऊ। पर है तो स्वरचित । अपने हैं सो सम्मान के हक़दार भी ।

मैंने लिखना बहुत देर से शुरू किया। पहले जो लिखा करता था अक्सर फाड़ कर फेंक दिया करता था । नब्बे के दशक में लिखे कुछ पन्ने मिले । उन लिखे पन्नों को और आज कल फ़ुरसत में जो लिख पाता हूँ उसी को यहाँ संकलित करने का यह प्रयास है । पूर्णत: स्वांत: सुखाय।

आप की प्रतिक्रिया, आलोचना, सराहना सब का स्वागत है ।

अपने होते कौन है ? कहा जायेगा वह जो हमें अपनायें और जिन्हे हम अपनायें वह है अपना ।

अब अपनाना क्या है ? हम उन्हीं को अपनाते हैं जिनसे संबंध बन जाये और बने रहें । चाहे घर परिवार के सदस्य, मित्र, अकिंचन अहेतुक जीवन यात्रा में मिल कर साथ रहने वाले फिर भले ही बिछड़ जाने वाले ।

अब संबंध क्या है ? वर्षों पहले लिखी अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं

संबंध एक सामाजिक बंधन
संबंध एक नियम का वर्तन
संबंध एक सांसारिक पहचान
घडियाली आँसू झूठी मुस्कान

क्या है सच क्या है सच
क्याहै सुख क्या है दुख
क्या है लोभ क्या है त्याग
माया क्रंदन मिथ्या बंधन

जीवन नित्य स्वयं का वंदन
बँधे स्वयं जो वह है बंधन
समय बदलते हो परिवर्तन
ऐसा बंधन कैसा बंधन

7/12/1991

जब अपने” अपने साथ होते है तब हमे उन्हें उतना याद करने की फ़ुरसत भी नही रहती जितना उनके चले जाने के बाद !

हमारे “अपने” तो चले जाते हैं एक एक कर ।

अब नये सिरे से लिखना प्रारंभ कर रहा हूँ तो संवाद और विमर्श की दिशा बदलने का मन कर रहा है ।

रह जाते हैं पेड़, पशु, पक्षी, अन्य जीव जन्तु और इमारतें, घर पगडंडियाँ , सड़कें …जो बन जाते हैं खंडहर ।पर रह जाते हैं इनमें से कुछ हमारी कई पुश्तों तक !

क्या वह हमारी बातें सुनते हैं ? हम जो करते हैं , क्या वह उसे देखते हैं? वही तो हो सकते हैं मानवी जीवन के मूक दर्शक, अपने अंतस में हमारे सारे क़िस्सों और चिठ्ठों के, हमारी ऐतिहासिक विरासत संजोये ।

वृक्षमंदिर एक मंच है । यहाँ पर बहुत कुछ लिखा जायेगा ।कुछ अपने द्वारा और कुछ अपनाये गये “दूसरों” द्वारा जो अपने हो गये ! बातचीत, बतकही, विचार, विमर्श, व्यंग कुछ सामयिक कुछ बीती और आपबीती घटनाओं पर !

आख़िर बतकही के भी तो कई रंगरूप हैं।बतकही क़िस्सो में होती है, क़िस्सों मे होती हैं बातें, और बातों में होती है; बकैती, बतफरोशी, बतफरेबी, बतकुच्चन, बड़बोली, बतबुज्झी…

इस मंच पर यह सब और बहुत कुछ और पाया जायेगा ।

कुछ मेरे द्वारा लिखा स्वरचित कुछ मित्रों द्वारा। यहाँ रश्मि कांत नागर और मनुबंश का उल्लेख आवश्यक है। दोनों ने मेरा साथ दिया । वृक्षमंदिर पर अंग्रेज़ी में रंगरेज़ी तो की ही पर हिंदी में भी लिखा। दोनों को स्नेहपूर्ण धन्यवाद !

आशा है आगे चल कर और भी मित्र हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में वृक्षमंदिर के लिये लिखेंगे ।

अब तक जो लिखा जा चुका है उसमें से कुछ के लिंक नीचे दिये गये हैं

चतुर बंदुआरी के पिपरेतर के बाबू

आस्था भेद और व्यावहारिक जीवन दृष्टि; एक संवाद

दीपक सुचदे जी (बाबा) अब न रहे

भारत में पत्रकारिता

कोरोना टाइम्स

मै अम्मा हू

शब्दों का घालमेल और उसकी परिणति

अखाड़ा से व्यायामशाला तक का सफ़र

एक दुपहरी

हम विकास चाहते हैं

हिंदू घरों और मंदिरों में देवी देवताओं के चित्र और मूर्तियाँ क्यों है



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