Geetha VK, Oorumooppathi (Kadar Tribal Leader) from Vazachal Settlement, near Athirapilly, Trissur


G Krishnan
G Krishnan

G.Krishnan started his career  in the NDDB  as a Graduate  Apprentice in 1973 and subsequently  worked in the Planning Division and the Oilseeds and Vegetable Oil Wing. In 1978,he went on deputation to CLUSA and worked in the  vegetable  oil project for a brief period.

Krishnan left NDDB in 1978 and worked in the banking sector. He was for a number of years Senior Economist with the Central Bank of India, and the Reserve Bank of India Mumbai. After opting  for voluntary retirement from the Bank in 2000,he has been actively  involved  in various environmental  struggles in the Southern Western Ghats.Krishnan has also been  involved in various  RTI related issues in Kerala.He is presently  settled  in a small agricultural  farm in Kerala and finds happiness in the company his rubber  and nutmeg  trees.


The blog titled ‘Aching Joys’which appeared a few days back in Vrikshamandir contained two photographs of a lady attired in a blue dress,surrounded by three others.Clearly,the lady in blue sort of looked out of place in the midst of three city slickers (an expression which I learned from Prof. Michael Halse!).

Soon after it’s publication,a few of my former friends and colleagues started contacting me to know a little more about rubber and other plantation crops.However,most were curious to know more about the mysterious lady in blue!

Surprise,surprise. Though unfamiliar to many of us,this mysterious character is one of the better known and widely recognized faces in Kerala as well as environmental activists. She is Geetha V.K, the first woman chieftain or ‘Oorumooppathi’ of a tribal settlement in Kerala,belonging to the forest dwelling Kadar community.

In Malayalam, Kadar means forest dwellers.They live in small communities and eak out a living from the forest.Today,there are only about 1800 Kadars in India and 90% of them live in nine settlements near our neighborhood. They do not undertake farming or any other form of agriculture. Essentially, they survive by collecting honey and medicinal plants from the forest in which they live. They consume a lot of fish too which is available in abundance in the Chalakudi river,on the banks of which most of their settlements are located.

Geetha is only 32 years old and is the first person from her community to complete schooling.Being the tribal chief –incidentally,as per protocol,any outsider,including government officials require her consent to enter the settlement.

Being the Oorumooppathy,many would imagine her to be aggressive and fierce.On the contrary, she is a rare and soothing presence in the middle of the dense Western Ghat forests. With her mild manners and soft spoken words, she has amazed each one of us who have known her and worked with her.

Top row from left to right; 1- Geetha with Bhoomika Award 2018 for environmental protection 2- Geetha leading the anti dam agitation at Vazachal settlement Bottom row from left to right 1- Wives of former NDDB employees with Geetha 2- Athirappilly Falls 3- Vazachal settlement 4- Another view of Athirappilly falls

The only time I have seen her assuming an aggressive avatar is when the officials of the State Electricity Board appears in the vicinity. This is explained by the fact that her community had to undergo three wholesale displacements during the past 100 years to make way for new hydroelectric electric projects in the midst of dense forests.

Today, her community is being threatened once more as the State Electricity Board has drawn up plans for a new project in the vicinity of their settlement. However, for the past 20 years she and her people have successfully prevented the state authorities from proceeding from the project and thereby preventing one more eviction.

For the purpose,she has successfully mobilized public opinion within the State and filed 2 suits in the Kerala High Court, which rightly points out the fact that the two new proposed projects are planned in land which has been legally entrusted to them by the very same government under the Forest Rights Act-2006.

Geetha was barely 12 years old when I met her for the first time in early 2000’s.During those days,we used to closely interact and work with the Kadar community under the umbrella of the NGO named River Research Centre. Initially,as a 12 year old, she was part of a children’s group known as ‘Kuttykoottam’ organized,guided and nurtured by one of Kerala’s prominent Environmentalist,the late Dr.Latha Anantha.

Realizing her potential, Latha took her under her wings and inculcated the spirit of idealism,empathy for her downtrodden Kadar community and love for nature.This was the beginning of Geetha ‘s celebrated journey which won her respect,awards and national recognition. We ,who have worked with her and known her see her as an embodiment of courage, determination and hope.


अनुभूति -१२

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

आज से करीब पचास साल पहले मै अपने जन्म स्थान को छोड़ कर आनंद, गुजरात चला आया।

मूलतः बिहार का ।

आनन्द में ही एक कसबे मे लोन लेकर घर बनाया। बच्चों की पढ़ाई, शादी वहीं हुई। जब हम इस घर मे आए, हमारे आस पास सिर्फ वहां के परा मे रहने वाले स्थानीय परिवार के लोग थे। अजीब सा लगता था। बहुत ही सौहार्दपूर्ण लोग। । उनके छोटे छोटे बच्चे पढ़ने आते। एक अजीब परिपाटी देखने को मिली।

स्वाभाविक नाम से किसी को बुलाया जाता। प्रकाश, पका हो जाते, विनीत, बोपला, शान्ति शान्ता, यशोद जस्सी और न जाने कौन कौन और कैसे कैसे।

सब हमारे यहाँ आते और घर बाहर की बाते होती। कभी नही लगा हम बाहर के है और वे पराए। 

इन्ही परिवारों मे एक नटू भाई का परिवार। पत्नी का नाम यशोदा, जस्सी बेन। हमारे परिवार के हर सदस्य से बाते करना उनका हाल चाल पूछना।

लेकिन मेरी पत्नी से बेपनाह आत्मीयता। रात बिरात जब भी कोई बात करनी हो, आवाज दे देती, बेन, हू जस्सी, आव्यूं छूं। और बस बाते शुरू ।

मेरी पत्नी बीमार पड़ीं, रोज आ कर हाल पूछ जाना। इधर उनके परिवार को जब भी कोई तकलीफ हुई, बेन, मेरी पत्नी हाजिर। 

हर पूर्णिमा को अम्बा जी के मन्दिर जाती और बिना पूछे या कहे हमारे लिए प्रसाद लाती, बेन सारू थयी जाए न, एटला माटे, बीजू कयी नयी।

मेरे पास आती, बैठती और दुनिया भर की बाते।। चालीस साल से हमारा और जस्सीबेन का सम्बन्ध इसी क्रम से चलता आ रहा है।

मैं अब हरिद्वार आ गया।उन्हे बिना बताए।

मेरे बेटे बहू से भर पेट शिकायत। साहेब खोटो कीधो, आम ने आम जता रह्या ।आवशे तो पूछी शूं।

अभी मै आनन्द गया था। एक दिन जस्सीबेन आ गयी।

साहेब, आ नहीं चाले।

तमे जता रहो, अणे मने नही बताव्या। आदि से अन्त तक की आत्मीय बातें। दुख सुख, शिकायत की बातें। ढेर सारी बेबाक बाते। मैने मजाक में कहा जस्सी बेन हू तमारो एक फोटो पाड़ी लऊ छूँ।

कल हम दोनो मे कोई रहे, न रहे।

एक फोटो लिया।

बोली, साहेब उभा रहो तमारे आगे, माथा उपर आंचल ना होए तो लोको शूं केहशे।

क्या है उनका मुझ से रिश्ता। क्यो इतनी आत्मीयता। नही समझ पाया। चालीस साल।

अपने को बहलाने के लिए बस कुछ कह देते है।

शायद अनुभूति इसी को कहते होंगे। 

जस्सीबेन के दो फोटो भेज रहा हू।

शायद ये कोई जवाब दे दे।


अनुभूति -7


मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

ज़िन्दगी किसी की मोहताज़ नही होती। हमारी हर कोशिशों के वावज़ूद, हम जितनी कोशिश करते है, हम ही ज़िन्दगी के मोहताज होते चले जाते है।


ज़िन्दगी का विवेक, ज़िन्दगी जीने का शऊर, ज़िन्दगी को समझने का सलीका, ज़िन्दगी के समझने से आती है, समझाने से नही। उसके लिये नही चाहिये कोई डिग्री, कोई कॉलेज, कोई युनिवर्सिटी, कोई कागज़, कोई कलम, या कोई दावात
!


जिनका ज़िक्र मै इस पोस्ट मे कर रहा हू, उनका नाम शौकत है। मै उन्हें शौकत मियां या मौलाना कहता हूं और वे मुझे हुज़ूर कहते हैं। 

शौकत भाई कबाड़ी वाले हैं। पिछले पचास साल से कबाड़ का धन्धा करते हैं सुबह अपना रिक्शा लेकर निकलते है और शाम के चार पांच बजे तक जो भी मिलता है ले कर लौट जाते है। हमारे धर्मशाला का कबाड़ भी वही ले जाते हैं। दोपहर के समय इसी धर्मशाला के सामने अपना रिक्शा लगा कर कुछ समय के लिए आराम करते है। 


अक्सर हम मिलते है और कुछ तुकी, कुछ बेतुकी हर सब्जेक्ट पर खुल कर बातें होती है। ऐसे ही एक दो औकेजन पर ज़िन्दगी और ज़िन्दगी के करिश्मों पर बात हुई।

ज़िन्दगी की हकीकत और ज़िन्दगी के करिश्मों की बात इस तथाकथित “अनपढ़”, “कबाड़, भंगार खरीदने, बेचने वाले” आदमी के मुंह से सुन कर हतप्रभ रह गया।

कितनी बड़ी सच्चाई, निखालिस हकीकत बेहिचक, सहज और बेबाक लफ्ज़ो मे बयां कर गये शौक़त भाई !


बोले “हुज़ूर जानते है, मै हर सुबह बिस्तरे से उठ कर और रात को बिस्तरे पर जाने से पहले चार चीज़ें याद करता हूँ। और वे चार चीज़ें है, क़फन, क़व्र, क़यामत और ख़ुदा। कभी न पाँचवीं
चीज़ याद की, न सोचा।

और जब सुबह अपना खाली रिक्शा लेकर निकलता हू तो बस एक ही ख़याल रखता हू, परवरदिगार ने इस दुनिया में भी तो खाली हाथ भेजा था। जो मिलेगा, उसकी ही दुआ होगी। मेरी क्या हस्ती है। उसका हिसाब कभी गलत नही होता।

कभी जब उनका रिक्शा लबालब भरा होता है और मै मज़ाक करता हू, अरे शौकत भाई, आज तो अच्छी खरीदारी हो गई, तो हंस के कहते हैं, देने वाले के पास तो बहुत था  मेरा दामन ही छोटा पड़ गया। उसने भी सोचा होगा कि जितना आसानी से खींच सकता है, उतना ही देना चाहिए। बस बहुत है। अल्लाह का क़रम।

और जिस दिन उनका रिक्शा बिल्कुल खाली होता है और पूछता हूँ, तब भी उसी हंसी के साथ, “आज मेरी इबादत मे कोई कमी रह गयी होगी। आज मै इसी लायक़ था। उसके हिसाब मे कोई गलती होने का सवाल ही पैदा नही होता। कल फिर देगा। 


 हमेशा हंसते रहते हैं शौकत मियां। दिन में तीन बजे, बिना किसी नागा के शौकत भाई और मेरे सामने बैठे मास्टर जी, टेलर मास्टर और सामने के धर्मशाला के संरक्षक तीनो एक साथ बैठ कर चाय पीते है।

पैसा बारी बारी से देना होता है, आज एक तो कल दूसरा, फिर तीसरा और तब आप देखें, ज़िन्दगी और ज़िन्दगी का मज़ा क्या है। उनकी बेबाक हंसी के ठहाके आस पास के पांच सात मकानों तक सुनाई देते है।


कौन कहता है ज़िन्दगी किसी की मोहताज होती है?

ज़िन्दगी जीने का हुनर आना चाहिए।

ज़िन्दगी निहायत ही खूबसूरत और हसीन है, ऊपर वाले की नियामत है। प्रीस्टीन है। पुनीत है। पावन है। पवित्र है। अनमोल है। बेमिसाल है।


बस इसके क़रीब आने का इल्म और हिम्मत होनी चाहिए। हौसला होना चाहिए। 


शौकत भाई के कुछ फोटो अपलोड कर रहा हू।


Sri Ranganathaswamy Temple

Dr. MPG Kurup
Dr. MPG Kurup

Former Executive Director, National Dairy Development Board

India : Art , History , Culture , Architecture , Vedic India

Art , Architecture , Culture


Sri Ranganathaswamy Temple

Located in Srirangam , Thiruchirapally District , Tamil Nadu

Legend : Built by a lady called Hampi , in 817 – 894 AD : Historically , the first main structure was built by Chola King Dharma Varman in 8th Century AD ! But floods in Kavery destroyed that and was rebuilt by Choka King Killivalavan .

The Temple was under Cholas till 13 th century , then Pandians and finally Vijayanagara Empire by the 13th century . The present Temple Complex was built under the Vijayanagara Empire .Temple site is an island in River Kavery , with Kolli Dam on one side.

A most sacred Vaishnavite temple with Lord Maha Vishnu as the Presiding Deity. There are some 50 shrines inside for different deities in the Hindu Pantheon , 7 holy Theerthas (pools) , 21 Gopurams and consecrated gateways ! The Raja Temple is the tallest gopuram in Asia : 237 ft.

Ranganathaswamy Temple is the largest functional Hindu Temple in the world : Angkor Wat Temple , Combodia is much larger , but is now only a monument , not a functional temple) : Srirangam Temple : area is 155 acres , perimeter wall is 4 km long !

The Ranganathaswamy Temple , Srirangam , Thiruchirapalli , Tamil Nadu is now UNESCO world heritage centre and attracts over a million tourists , global as well as domestic .In addition thousands of Devotees from all over the country.

Pictures : Clock wise , from top left :1. Main Temple entrance , 2. Panoramic View of the island and temple complex , 3. Ariel View Srirangam , 4. Temple Complex , 5. Colourful Gopuram Remaining pictures : Temple art : carvings on black granite :

( Source : Text and Pictures. : Google / Wikipedia)

अनुभूति

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है। 

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

जब मैंने उनसे वृक्ष मंदिर पर लिखने का आग्रह किया तो उत्तर मिला;


आप ने मुझे इस प्लैटफार्म पर कुछ लिखने को कहा। मेरा सौभाग्य। बहुत हिचक होती है। और सच पूछिए तो डर लगता है। डर लगता है कि जिस रिश्ते को संजो कर रक्खा है वह सलामत रख पाऊगा कि नही। और मै अब इस उम्र मे गंवाना नही चाहता। आप मेरे लिए एक छोटे भाई की तरह आए। किरण मेरी पत्नी की गोतनी की तरह आई। पूरे कैम्पस मे वही उनको दीदी कह कर बुलाती। आप मुझे आदर से बुढ़ऊ कहते। टुटुल मेरी हथेली पर खुश होता। यादों के इस गलियारे के हरेक नुक्कड की मादकता को सदाबहार रखना चाहता हूं। फ़्रैज़ाइल तो नही है, संवेदनशील जरूर है। इसकी प्रिस्टीनीटी को संजोए रखना चाहता हूं इसीलिए अपने को समेट लिया। पोटली बांध ली और समय समय पर खोल कर अपने को रीजुभिनेट या रीचार्ज करता हूं। अभी तक तो निभा पाया हूं आगे भी निभ ही जायेगी। ~ मिथिलेश

मेरा उत्तर था 

🙏🏼 मन की आँखों के सामने पुराने दिनों की यादें कौंध गईं । जैसे चलचित्र ! आँखें नम हैं हृदय भारी है आपकी सहृदयता और स्नेह में अभिभूत । मैं समझ रहा हूँ आप की भावनाओं को । हरिद्वार आकर चर्चा करूंगा पर कब पता नहीं शायद कभी नहीं पर अस्थियाँ तो शायद वहीं बहाई जायें .. खैर कुछ ज़्यादा ही भावुक हो गया .. पर आप के सामने नहीं तो कहाँ .. ऐसा कर पाता ~ शैलेंद्र

बतकही आगे बढ़ी और अब प्रस्तुत है मिथिलेश कुमार सिन्हा उर्फ़ “एम के” के अपने से और पढ़ने वालों सब से बोलते लेखों का पहला अंक । शीर्षक मैंने दिये हैं ।

अनुभूति

नि:शब्द शून्य की प्रतिध्वनि

कभी आप ने अपने अन्दर के नि:शब्द शून्य की प्रतिध्वनि और बाहर के कोलाहल के वार्तालाप को , ए डायलौग बिटवीन द ईको औफ योर विस्पर फ्रौम ऐन ऐव्सोल्यूटइनर वैक्युयम ऐन्ड द केयोटिक नोयायज आउटसाइड, को सुना है?

या सुनने की कोशिश की है? या सुनने की इच्छा रखते है ?आजमा कर देखिए।जस्ट ट्राइ इट।एक दैविक अनुभव।

ए डिवाइन एक्सपीरियन्स।यह प्रभुत्व की नोक झोंक है।एन आरगुमेन्ट टू एस्टावलिश सुप्रिमेसी।न कोई जीतता है, न कोई हारता है।

फिर भी क्रम चलता ही रहता है, सतत।

नन सरेन्डर्स।

सूर्योदय होने पर युध्द घोष और सुर्यास्त पर शान्ति घोष। लेकिन अन्त नही।परन्तु महाभारत और गीता भी यही जन्म लेते हैं।सुनते तो सब हैं, कोई अर्जुन बन जाता है, कोई दुर्योधन ही रह जाता है।

चयन अपना अपना।औप्शन इज़ इन्डिविज्युल। वास्तव में ज़िन्दगी बहुत ही सुन्दर है।निहायत ही हसीन, बेइन्तहां खूबसूरत।करीब आइए, आगोश मे लीजिए, महसूसकीजिए। रूहानी गुदगुदाहट के लिए।

आपका ज़मीर आप को इनवाइट कर रहा है।जस्ट टेक अ स्टेप ऐन्ड ज्वायन द सेलिब्रेशन। ए वैरी नैच्युरल पार्टिशिपेशन।

प्लीज़ डू नौट हेज़िटेट, डू नौट वेट।नो वन कैन पुश फ्रौम आउटसाइड। वन हैज़ टू टेक द जम्प हिमसेल्फ।

नो मैटर हाउ मच अननोन इट मे बी।

    

High Stakes
Dr Kurien played hard games with high stakes. When he presented NDDB’s …
A ringside view of the Operation Flood programme
Before India liberalized its economy and before IT professionals made India matter …

Rameshwaram

~ Dr MPG Kurup former Executive Director National Dairy Development Board

India : Art , History , Culture , Architecture , Vedic India

History , Culture


Ramanathaswamy Temple : Rameswaram


Sanathana Dharma is commonly referred to as ” Hinduism ” in India , even though the term only refers to the practical and functional aspects of Sanathana Dharma : And Hinduism is the overwhelmingly Hindu !

I am neither a Historian nor an Enthusiast of Sanathana Dharma ! My prime objective in starting these feature posts was to place before the ” am janatha ” , basic information on the enormity of the Levels of achievements of this 5000 years of the unbroken Indian Civilization : Culture , Arts , Architecture , Literature and Spirituality !

Adding to the numbers and size of the Hindus is not part of the ajenda : Sanathana Dharma does not believe in conversions of followers of other faiths to Hindus ! And yet one in seven of all persons on Earth is Hindu !

Ramanathaswamy Temple , located on the Rameswaram Island . The Temple was under the Pandyan Dynasty during the 15th Century , but came under the rule of the Sethupathis , a breakaway group , of the Madurai Nayaks by 1520. AD !Jaffna Kings also contributed to the Temple construction !

The Temple is dedicated to Ramanatha : Shiva : the Jyothirlinga , here , is believed to have been installed and consecrated by Lord Rama himself on his way back from Lanka , for worshipping Shiva and to atone the sins of Brahmahathya for killing Ravana and many others in battle . See Rama Theertha : picture on bottom right , is the Pond Sree Ram used for his daily ablutions !

The Ramanatha Temple had been , over the centuries under the control several dynasties and powers , including the Islamic invader Malik,Kaufer , finally was taken over by the Vijaya Nagara Empire.

Sita Devi is believed to have died in Rameswara . Rama Sethu is identified as the mass of soft sand and floating stones ( Pumice Stones / Lime Stones) from Pampan Island towards the Sea. The Temple architecture is stunning and intricate and has several long corridors with thousands of pillars in them. The third corridor is the longest temple corridors in the world : 197 metres and with 1210 pillars.

Ramanathaswamy Temple is one of the Char Dham Temples and also one of the 12 Jyothirlingas in the Country : the Southern Most.

Source: Google / Wikipedia


संध्याकाल जीवन का

जीते है मरने के लिये

हर क्षण होते व्यतीत

वर्तमान में धुन भविष्य की

गुनगुनाते पूर्वराग*

होते वर्तमान में अतीत

हुआ वह जिसे चाहा

हुआ वह भी जो न चाहा

मानते है अब होना था जो

आशा और आकांक्षाओं के फेर में

वह ही तो हुआ

*पूर्वराग =Nostalgia



कथा-वार्ता:  ईश्वर पैसें दरिद्दर निकलें

“कथा-वार्ता:  ईश्वर पैसें दरिद्दर निकलें

कल ‘दीया दीवारी‘ थी

आज बुद्धू बो की पारी है! प्रात:काल ही उठ गया। दरिद्दर खेदा जा रहा था।माँ सूप पीटते हुए घर के कोने कोने से हँकाल रही थीं। आवाज करते हुए प्रार्थना कर रही थीं। यह प्रार्थना दुहराई जारही थी।

ईश्वर पैसें दरिद्दर निकलेंईश्वर का वास हो,दरिद्र नारायण बाहर निकल जाएँ। दरिद्र भी नारायण हैं।रात में दीप जले,पूजा हुई,खुशियाँ मनाई गयीं,राम राजा हुए।लक्ष्मी का वास हुआ।अब दरिद्रता का नाश हो।यह निर्धनता नहीं है। यह मतलब नहीं निकलना चाहिए कि हमारी गरीबी दूर हो गयी। निर्धनता और दरिद्रता में अंतर है।

निर्धनता में व्यक्ति का स्वाभिमान बना रहता है। दरिद्रता व्यक्ति की गरिमा को नष्ट कर देती है। उसका आत्मबल छीन लेती है। निर्धन होना अच्छा हो सकता हैदरिद्र होना कतई नहीं। राम राजा हुए हैं तो स्वाभिमान लौटा है। ऐसे में दरिद्रता कैसे रह सकती है। हमने उसे हँकाल दिया है।

— Read on yahansedekho.blogspot.com/2020/11/blog-post_15.html