यह ब्लॉग वसंतराव कुलकर्णी की जीवन यात्रा का भावुक वर्णन है, जिनका नाम ‘वसंत’ उनके कार्य से मेल खाता था। वे जहां-जहां गए, हरियाली फैलाई—पेड़ लगाए, बगीचे संवारे। लेखक की उनसे पहली मुलाकात 1969 में मुंबई की आरे कॉलोनी में हुई, फिर 1972 में आनंद के एनडीडीबी में, 1984 में मुंबई के डेयरी बोर्ड कैंपस में, 1997 में जलगांव डेयरी में और अंतिम 2006 के बाद बोरीवली के ज्येष्ठ नागरिक संघ में। वसंतराव ने डेयरी संस्थानों को हरा-भरा बनाया, सेवानिवृत्ति के बाद एजेंसी चलाई और चुनौतियां स्वीकारीं। वे लेखक के जीवन में वृक्ष की छाया जैसे रहे—एक अनोखा संयोग और प्रेरणा।
