Saneechar’s Chabutara

सनीचर के चबूतरे से

सनीचर का परिचय उन्हीं के शब्दों में

 

This space is for musings from Saneechar a character from Hindi satire novel “Raag Darbari” by Shrilal Shukla. Raag Darbari is available in English translation also.

I first met Saneechar on Twitter. We used to exchange messages . After some months or may be a year we decided to meet. Saneechar rang the call bell at my home in Gurgaon and I opened the door. We both were strangers to each other till we met that day as we hadn’t seen each other earlier.

I have my twitter ID as “Vaidyaji” a character from Raag Darbari. We both love Rag Darbari. In fact there are a number of us on twitter who have taken their identity on the names of characters from Raag Darbari. Raag Darbari was written in late sixties. The depiction of rural life in India as given in Raag Darbari is unmatched. Even today if you live and observe village life, specially in north India, shadow of many characters of Raag Darbari can be found from among the village folk who live there. In more than one respect this novel is timeless and unmatched.

Saneechar introduces himself in his first post. Let’s read about Saneechar in his own words.

इस हरे–भरे इलाके में एक मकान ने मैदान की एक पूरी–की–पूरी दिशा को कुछ इस तरह घेर लिया था कि उधर से आगे जाना मुश्किल था। मकान वैद्यजी का था। उसका अगला हिस्सा पक्का और देहाती हिसाब से काफ़ी रोबदार था, पीछे की तरफ़ दीवारें कच्ची थीं और उसके पीछे, शुबहा होता था, घूरे पड़े होंगे। झिलमिलाते हवाई अड्डों और लकलकाते होटलों की मार्फत जैसा ‘सिम्बालिक माडर्नाइज़ेशन’ इस देश में हो रहा है, उसका असर इस मकान की वास्तुकला में भी उतर आया था और उससे साबित होता था कि दिल्ली से लेकर शिवपालगंज तक काम करनेवाली देसी बुद्धि सब जगह एक–सी है।

मकान का अगला हिस्सा, जिसमें चबूतरा, बरामदा और एक बड़ा कमरा था, बैठक के नाम से मशहूर था। ईंट–गारा ढोनेवाला मज़दूर भी जानता था कि बैठक का मतलब ईंट और गारे की बनी हुई इमारत–भर नहीं है। नं. 10 डाउनिंग स्ट्रीट, व्हाइट हाउस, क्रेमलिन आदि मकानों के नहीं, ताकतों के नाम हैं।

जिस चबूतरे का ज़िक्र किया है उसी चबूतरे पर एक शख़्स जो दिखने में सम्पूर्ण भारत के किसी भी ग्राम संस्कृति का मौलिक ब्राण्ड एम्बेसडर बन सकने के लिए बिलकुल उपयुक्त है, भाँग पीसता है। उसकी भाँग पूरे ग्रामीण अंचल विशेष रूप से मेरी बैठकी में तो लोकप्रिय है ही। सबसे अहम् बात है कि यह बात वह स्वयं भी बड़े आत्मविश्वास के साथ जानता है। उसकी पी.एचडी. इसी काम में है। निश्चित रूप से इसे करने में उसने किसी भी सामान्य शोधकर्ता की तरह इधर-उधर ताका-झाकी नहीं की है। वह मौलिक रूप से उसकी अपनी ही है, उसका कोई गाइड या सुपरवाईजर नहीं।

जब वह भाँग पीसने से मुक्त हो जाता है तो उसी चबूतरे पर किसी हाकिम-हुक्काम की तरह बैठने की कोशिश करते हुए ग्राम जन-जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी सटीक राय बिना किसी झिझक, डर और लम्पटता के देता है जो अकाट्य होती है।

आगे और भी

Published by

Vrikshamandir

A novice blogger who likes to read and write and share