Practical and Productive

I posted a blog about two distinguished persons whom I met in person in 2017 and their life story, passion and unique impactful work that they were doing left a deep impression on me.


Guruji Ravindra Sharma and Shri Deepak Suchde whom we fondly addressed as Baba, in February 2017 at the Development Management Institute, Patna.

While I was able to visit the karmabhoomi of Baba in Bajwada on a couple of occasions and attend with him several meetings in Delhi, I could not meet Guruji except for one meeting in Patna. Both of them are, unfortunately, no more.

I had also met Dr Prasad Teegalpalli at Patna.

We reconnected, thanks to social media, after four years! We have been exchanging messages and writing occasional emails for some months now. One day I watched a video lecture of his on YouTube. He has over the years developed and innovated trying out a pedagogy which as he puts it makes learning both practical and productive. He has been able to organize sales of over 500000 copies of books of Mahatma Gandhi through his students as part of assignments thatthe student needs to carry out.

I contacted him, and he kindly agreed to have a semi-structured conversation on Zoom about his life, work and views about “practical and productive” business management education, which he has successfully tried out for nearly two decades.

Dr Prasad Teegalpalli teaches Business Management at the National Institute of Industrial Engineering (NITIE).

I have great pleasure in sharing this recorded conversation. He speaks about his life journey, beliefs and his passion at work as a teacher.



Some excerpts from our conversation.

Gandhi is such a Nasha I call it Nasha very carefully, I’m using the word नशा very carefully एक बार चढ जाता है फिर उतरता नही

When practical becomes productive, the value system increases, this is a very, very important point, when practical becomes productive, the value system develops, head, heart and body is engaged in the whole process.

And this particular tailoring skill I got almost from birth itself because my mother used to take care of a family of four members by tailoring. So, I picked up tailoring, and I used to work as a tailor from school to my postgraduate level.

बेचो बेचो बेचो, बेच बेच कर सीखो, सिखाई बेच कर सीखो, जितना सीखा पूरा बेचो


I also found some pictures taken that day in February 2017. Displayed in the gallery below.


The following video clip was taken in February 2017 during our visit to Kaliachak village in Nalanda District of Bihar. Dr Prasad explaining to students mathematical formulas through a simple inexpensive toy.


A matter of height

Photo: Painting by Dr Rama Aneja

I read this poem by Dr Pradip Khandwala on Facebook. I have attempted a translation in Hindi. I am posting on Vrikshamandir with his permission.

डाक्टर प्रदीप खांडवाला की यह मैंने कविता फेसबुक पर पढी और उसका हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास किया है, उनकी अनुमति से वृक्षमंदिर पर ।


A matter of height 

Strange it is to die
after shuttering a shop.

But that’s what happened to a friend of mine.
He died while locking up the past!

He was unlucky.

But when you die shutting out you open the future, don’t you, to fresh life?

In my life from time to time
I have abandoned much – relationships, memories, way of life, places.

On each occasion I thought I had grown.

Had I?

I remember how I had bolted from pain when demise was closing in on my mother.
And when I left my people to go abroad.
And when I changed my profession.
And when I abandoned a love.

I had wanted more and more and the past offered less and less.

But I measured my height recently
after years of a lengthening biodataand
how come I find that I have grown shorter?
ऊंचाई का माजरा

अजीब बात है दूकान बंद कर मर जाना,
वर्षों से चल रही दुकान पर लगा ताला

पर यह ही तो हुआ मेरे एक दोस्त को,
वह अतीत की दुकान को बंद करते हुए मर गया!

वह बदकिस्मत था।

लेकिन जब हम अतीत के दरवाज़े बंद करते हैं, तब ही तो खुलते हैं दरवाज़े भविष्य के। एक नये जीवन के लिए?

मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ । समय - समय पर मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया है - रिश्ते, यादें, जीने का तरीका, स्थान।

हर मौके पर मुझे हर बार लगा कि मैं बड़ा हो गया हूं ।

पर क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ?

मुझे याद है कैसे मैं दर्द से लड़खड़ा गया था,
जब आसन्न मृत्यु मंडरा रही थी ले जाने मेरी मां को,
और जब मै अपने लोगों को छोड़ विदेश जा रहा था,
और जब मैंने अपना पेशा बदल दिया था,
और जब मैंने एक प्यार को छोड़ दिया।

मैं और अधिक चाहता था,अतीत ने हमेशा कम और
कम की ही पेशकश की।

पर जब मैंने हाल ही मे अपनी ऊंचाई मापी,
बरसों बाद अतीत के पन्नों से भरे अपने जीवनवृतांत से,
ऐसा क्यों लगा,
कि मैं छोटा हो गया हूँ?
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जिप्सीनी आँखों थी , अँधेरी रात के तारे

Photo: Paiting by Dr Rama Aneja

यह ब्लाग लिखना तो शुरू हुआ था एक कहानी “अँधेरी रात के तारे” के बारे में जो “जिप्सीनी आँखों थी” नामक पुस्तक से है।“जिप्सीनी आंखो थी“ पूरी पुस्तक यहां इंटरनेट आर्काइव से यहाँ पर उपलब्ध है । पर यहाँ मै “जिप्सीनी आँखों थी” से केवल एक कथा “अंधेरी रात के तारे” के बारे में लिख रहा हूँ ।

सार्थक संवाद” नामक वेब साइट पर मैंने यह कथा सबसे पहले पढ़ी । कैसे मैं इस अंतर्जाल की वेब साइट पर पहुँच गया, मुझे ठीक से याद नहीं। पर शायद मैं खोज रहा था एक भारतीय की जिसकी रग रग में भारतीयता परिलक्षित होती थी। गुरू जी रवींद्र शर्मा की। जिनसे मैं जीवन केवल एक बार मिला ।

पर लिखते समय याद आ गई दो व्यक्तियों से जिनकी सोच और काम दोनों से मै बहुत प्रभावित हुआ। दो व्यक्ति जिन की मुलाक़ातों ने अमिट छाप छोड़ी वह थे , बाबा दीपक सुचदे जिनके बारे में मैंने एक ब्लाग लिखा था। दूसरे थे गुरू जी रवींद्र शर्मा । विधि का विधान है अब दोनों नहीं रहे दोनों अंधेरी रात के तारे !

हैं नहीं, पर अब भी कहीं दूर से टिमटिमा रहे हैं । बुला रहे हैं मुझे । इस जीवन काल में तो नहीं पर शायद अगर फिर जन्म मिला तो शायद उनका साथ मिले ।

कैसे मिलना हुआ ? संयोग था डेवलपमेंट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट पटना का वार्षिक समारोह । इंस्टिट्यूट के तत्कालीन डायरेक्टर प्रोफ़ेसर के वी राजू के आमंत्रण पर मैं वहाँ गया और बहुत से विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी और अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले लोगो से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ।

उन दिनों की रह गईं उनकी यादों में दोनों की यादें प्रमुख हैं ।गुरू रवींद्र शर्मा जी ने भारतीय परंपरा और संस्कृति प्रेरित विकास की अवधारणा को विस्तार से समझाया था। मैंने आदिलाबाद जा कर उनके साथ कुछ समय बिताने का मन भी बनाया पर यह हो न सका । गुरू जी रवींद्र शर्मा के बारे में जब सोचता हूँ, उनकी एक बात अब भी मेरे कानों में गूंज उठती है । “मै सायकिल उठा कर निकल जाता था “देखने”, कुछ देखने नहीं । अगर हम कुछ देखने निकलेंगे तब हम वही देखेंगे जो देखने के लिये निकले थे और कुछ नहीं देख पायेंगें। अगर “केवल” देखने निकलेंगे तब हम बहुत कुछ देख सकेंगे।”

सार्थक संवाद वेब साइट पर ब्लाग लिखने वालों में से हैं श्री आशीष कुमार गुप्ता । वह इरमा (Institute of Rural Management Anand ) के छात्र रहे हैं। सार्थक संवाद वेब साइट पर आशीष जी का परिचय कुछ इस प्रकार से दिया गया है “ आशीष कुमार गुप्ता ने जबलपुर के निकट इंद्राना गांव में जीविका आश्रम और अध्ययन केंद्र की स्थापना की है। IRMA से अध्ययन करने के बाद, आशीष कुमार गुप्ता ने आदिलाबाद में श्री रवींद्र शर्मा जी के साथ वर्षों बिताए, जिन्हें प्यार से गुरुजी के रूप में जाना जाता था । आशीष कुमार गुप्ता कई सामाजिक कारणों से जुड़े हुए हैं, उनका मुख्य ध्यान गुरुजी के कार्यों को प्रकाशित करने पर है और उसी से प्रेरित हो कर , वह भारतीय समाज को अपनी छवि को सही करने के लिए पुन: उन्मुख करने पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं ।”

गुरू जी रवींद्र शर्मा जी के कुछ विडियो यहां पर उपलब्ध हैं ।

श्री आशीष गुप्ता द्वारा गुरू जी की परिचय
गुरूजी का संबोधन ओआरएफ फाउंडेशन के समारोह में

बाबा दीपक सुचदे ने न केवल कृषि की अनोखी परिभाषा “वे अक्सर कहते थे “ कृषि सूक्ष्मजीव से महाजीव ( मनुष्य) की यात्रा है। सूक्ष्मजीव ( किटाणु, परजीवी आदि) अपना जीवन दान करते हैं अन्य जीवों और मानव के लिये भोज्य पदार्थों की संरचना के लिये । सूक्ष्मजीवों की मोक्ष यात्रा का प्रारंभ इसी जीवन त्याग से होता है” । बाबा ने कृषि को एक आध्यात्मिक आयाम से देखने की दृष्टि ही नहीं दी पर इस अवधारणा को कार्यरूप में ज़मीनी स्तर पर भी सफलतापूर्वक कर भी दिखाया । मै कई बार देवास ज़िले के बजवाडा गाँव मे मे स्थित उनके कृषितीर्थ पर भी गया । पर उन्हें अपने वृक्षमंदिर पर बुलाने में असफल रहा । किन कारणों से ? इसका वर्णन मेरे ब्लाग बाबा दीपक सुचदे न रहे पर विस्तार से उपलब्ध है ।

बाबा दीपक सुचदे के कुछ विडियो

Baba Deepak Suchde on Natuco farming

Baba speaking in presence of Sadguru

सार्थक संवाद वेब साइट पर प्रकाशित यह कहानी “ अंधेरी रात के तारे” मुझे बहुत पसंद आई। आशा है स्नेही पाठकों को भी यह कथा पसंद आयेगी । पढ़ें सोचे समझें गिने धुनें !


किशनसिंह चावडा बीसवीं शताब्दी के गुजरात के ख्यातनाम लेखक रहे हैं, जिन्होंने कई सारे वृतांत लिखे हैं। इनमें से अधिकांश प्रसिद्ध गुजराती कवि श्री उमाशंकर जोशी जी की पत्रिका संस्कृति में १९४७ के कुछ समय बाद से “जिप्सीनी आंखोथी” (जिप्सी की आंखो से) शीर्षक से प्रकाशित होते रहे हैं। इन सभी लेखों का संकलन करके “अमासना तारा” (अमावस्या के तारे) नाम से एक गुजराती पुस्तिका प्रकाशित की गई थी, जिसका हिन्दी अनुवाद कृष्णगोपाल अग्रवालजी के द्वारा अंधेरी रात के तारे शीर्षक से किया गया और उसे सोमैया पब्लिकेशन लिमिटेड के द्वारा प्रकाशित किया गया था। प्रस्तुत लेख उसी पुस्तक से लिया गया है और ऐसी और भी रोचक एवं बोधक कथाएँ हम आपके समक्ष प्रस्तुत करते रहेंगे। इस घटना का कालखंड उन्नीसवीं शताब्दी का अंतभाग अथवा बीसवीं शताब्दी का प्रारंभ होगा।


पिताजी जब कभी बाहर जाते, तब माँ बहुत उदास हो जाती थी। इस वजह से ही या न जाने और किसी वजह से, पिताजी जब तक अनिवार्य कारण न हो, तब तक दूर की यात्रा क्वचित्‌ ही करते थे। एक दिन सूरत के गुरूद्वारे से तार आया। पिताजी को तुरंत सूरत आने की गुरू महाराज ने तार से सूचना दी थी। उन दिनों किसी के यहाँ तार आना बड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग माना जाता था। अकसर कोई बुरी खबर हो, तो ही किसी के यहाँ तार आता था। पूरे मुहल्ले में बात फैल गयी कि हमारे यहाँ तार आया है। धीरे-धीरे लोग पूछताछ को आने लगे। तार में कोई बुरा समाचार तो था नहीं। अतः चिंता का स्थान कुतूहल और उत्साह ने ले लिया।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ का जमाना। साधारण लोगों के लिए सूरत-अहमदाबाद जाने का प्रसंग भी दो-चार साल में एकाध बार ही आता था। और, बम्बई – कलकत्ता जाना तो सुदूर विदेशयात्रा के समान कठिन और विरल माना जाता था।

पिताजी के सफर की तैयारी होने लगी। माँ की सहायता के लिए बड़ी मौसी और मामी आ पहुंची। पार्वती बुआ एक पीतल के चमकदार डब्बे में चार मगस के लड्डू ले आयी। पिताजी के पाथेय का प्रश्न इससे आधा हल हो गया। बिस्तर के लिए मामा अपनी नयी दरी लेते आये थे। लल्लू काका धोबी चार दिन बाद मिलने वाले पिताजी के कपड़े उसी रोज इस्त्री करके दे गये। शाम को भजन हुआ। रात को भोजन के बाद पुरूषोत्तम काका ने लालटेन की रोशनी में पिताजी की हजामत बना दी। पिताजी मध्यरात्रि की लोकल से जाने वाले थे। इतनी रात गये सवारी मिलना मुश्किल होता था। अतः दस बजे ही घर से निकल जाने की बात तय हुई। साढ़े नौ बजे तांगा लाने के लिए मामा लहरीपुरा गये। हमारे परिचित मुस्लिम स्वजन मलंग काका का तांगा चौराहे पर ही खड़ा था। मामा के कहते ही वे आ गये। उन्होंने रात को ग्यारह बजे तक गपशप कर के पिताजी के बिछोह का विशाद कुछ हद तक हलका कर दिया। लेकिन तांगा जाते ही कठिनाई से रोके हुए माँ के आँसू बरस पड़े। मौसी, मामी और बुआ माँ को ढाढ़स बाँधती रही और आधी रात बीते घर गयी। हम भी लेट गये।

माँ जब भी मुझे अधिक लाड-प्यार करती, मैं समझ जाता कि वह अत्यधिक दुःखी और अस्वस्थ है। आज भी वैसा ही प्यार करने लगी। मेरा शरीर सहलाती जाती थी और हिचकियाँ लिये जाती थी। उसे सांत्वना देने के लिए मैं भी उसे सहलाने लगा। लेकिन इसका परिणाम उलटा हुआ। माँ रो पड़ी। मेरी उम्र उस समय कोई बारह वर्ष की रही होगी। माँ मुझे अत्यधिक प्रिय थी। पिताजी के प्रति आदर-भाव था, लेकिन उनसे कभी-कभी डर भी लगता था, जब कि माँ से तो निर्भयता का वरदान मिल चुका था। मैं माँ के पास ही लेट गया और उसके पल्‍ले से उसके आँसू पोंछने लगा, लेकिन जैसे-जैसे पोछता गया वैसे -वैसे अश्रुधारा अधिकाधिक बहने लगी। मेरा भी जी भर आया। उसके अविरत आँसू देख कर मेरी आखें भी छलक पडी। लेकिन मुझे रोते देख कर माँ के आँसू अनायास रूक गये। मुझे और पास खींच कर उसने आँचल से मेरी आँखें पोंछी। इस दरमियान वह एक शब्द भी नहीं बोली थी। मैं बोलने की हालत में था ही नहीं।

आखिर माँ ही बोली। उसकी आवाज रूलाई से नम हो रही थी। कहने लगी, “बैटा, मैं तुझे बहुत अच्छी लगती हूँ ना?” इसका जवाब क्या देता! आँसूभरी आंखों से एकटक उसे देखता रहा। आँखो का उत्तर पढ़ कर वह फिर बोली, “तेरे बापू मुझे उतने ही अच्छे लगते हैं। वे जब कभी बाहर जाते हैं, मैं विहव्ल हो जाती हूँ। इस बार तो मेरी बेचैनी और भी बढ़ गयी। गुरू महाराज ने तार भेजकर न जाने क्‍यों बुलाया है। … न मालूम रामजी की क्‍या मरजी है। … चल अब सो जा।” इस प्रकार बातें करते हुए हम एक-दूसरे का आश्वासन बन कर सो गये।

पाँचवे दिन शाम को पिताजी लौट आये। माँ तब तक उदास ही रही, परंतु पिताजी को देखते ही उसकी आँखों में जीवन उमड़ आया। गमगीनी पर आनंद की लहरें छा गयीं। मैं भी पुलकित हो उठा। वायुवेग से समाचार फैल गया। स्वजनों का आना शुरू हुआ। घर में जहाँ कुछ समय पहले शून्यता छायी थी, वहाँ जिंदगी की हिना महक उठी। सबको विदा कर के हमने एक साथ भोजन किया। मैं हमेशा पिताजी के पास ही, पर अलग बिस्तर पर सोता था। हमारे बिस्तर के सामने ही माँ सोती थी। रात को प्रार्थना कर के हम सो गये।

बहुत रात बीते हिचकियों की आवाज से मैं जाग गया। देखा, कि माँ और पिताजी आमने सामने बैठे हुए बातें कर रहे थे और माँ की हिचकी बंधी हुई थी। मैं धीरे से उठा और माँ की गोद में जा छिपा। पिताजी को इतना व्याकुल मैंने शायद ही कभी देखा था। माँ की गोद से उठ कर मैं उनकी गोद में जा बैठा। वे मेरे सिर पर हाथ फेरते रहे। उनके स्वर मैं अस्वस्थता थी। माँ को संबोधित कर के वे कहने लगे, “तुम हाँ कहो, तभी मैं सूरत की गद्दी का स्वीकार कर सकता हूँ। गुरू महाराज ने स्पष्ट कहा है, कि तुम्हारी सम्मति हो, तभी मेरा संन्यास सार्थक हो सकता है।”

“आपको गद्दी देने की गुरू महाराज की इच्छा है, इसकी शंका तो वे पिछली बार जब यहाँ आये थे, तभी मुझे हो गयी थी। नारायणदास ने मुझसे कहा, तो मैंने समझा कि मजाक कर रहे होंगे। इसीलिए मैंने आपसे स्पष्ट पूछा भी था। आपने उस समय तो ना कह दी थी, लेकिन आपके मन की कशमकश में उस समय भी भाँप गयी थी। फिर सूरत की गद्दी जयरामदास को देने की बात चली और मैंने मन को मना लिया। अब की बार तार आया, तब से तो मैं कुशंका से पागल हो रही हूँ….!!” माँ की हिचकियाँ चलती रहीं।

“लेकिन देखो न नर्मदा,” पिताजी की वाणी में व्याकुलता थी, “जयरामदास को गद्दी देने को अब गुरूजी की इच्छा नहीं है। उनका कहना है, कि हमारे कुल का त्याग उच्च कोटि का है। पिताजी के दान की शोभा बढ़ानी हो, मंदिर की प्रतिष्ठा संभालनी हो और निरांत संप्रदाय को जीवित रखना हो, तो मुझे गद्दी स्वीकार करनी ही चाहिए।” सहसा माँ की हिचकियाँ रूक गयी। आँसू आँखों में ही रूक गये। आवाज कुछ अजीब सी मालूम हुई। बोली, “देखिए, आपके आत्मकल्याण के मार्ग में आकर मैं अपने धर्म से विचलित होना नहीं चाहती, लेकिन यह हमारे लिए बड़े कलंक की बात होगी।”

“दीक्षा लेने में कलंक है, यह तुम से किसने कहा? मैं कुछ दुःख, निराशा या जिम्मेदारियों से भाग कर तो संन्यास ले नहीं रहा। संसार का सामना न कर सकने की कायरता के कारण संन्यास लिया जाए, तो उसे कलंक कहा जा सकता है। जब कि मैं तो सब प्रकार से सुखी जीव हूँ और फिर, मैं तो तुम्हारी सम्मति के बाद ही यह कदम उठाना चाहता हूँ। तुम्हारी रज़ामंदी न हो, तो मुझे गद्दी नहीं चाहिए।!” पिताजी की आवाज़ में कंपन था। वे अभी स्वस्थ नहीं हुए थे।

“मैं जिस कलंक की बात कह रही हूँ, उसका कारण बिलकुल अलग है,” माँ ने कहा। “मेरे कहने का मतलब यह है, कि लोग कहेंगे कि बाप-दादा की संपत्ति सीधी तरह से विरासत में नहीं मिली, तो साधु बन कर हथिया ली। पिता ने उदार मन से जो संपत्ति मठ के लिए दान कर दी थी, उसे बेटे ने महंत बन कर भोगा। हमारी तो संपत्ति भी गयी और इज्जत भी गयी। आपके संबंध में कोई इस प्रकार का संशय व्यक्त करे, तो मेरे लिए तो वह मर जाने जैसा होगा।”

पिताजी गंभीर हो गये। मेरे सिर पर उनका हाथ फिरता रहा। लालटेन की रोशनी उन्होंने कुछ तेज की। कमरे में प्रकाश छा गया। माँ की आंखे पिताजी की आंखों की गहराई में उतर कर कुछ खोज रही थी। वे अपने स्वाभाविक धीर-गंभीर स्वर में बोले, “तुम बिलकुल ठीक कह रही हो, नर्मदा। यह मुझे पहले ही सूझना चाहिए था। न जाने कैसे यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं आयी। मेरे मन में एक ही लगन थी कि गुरू महाराज की आज्ञा का पालन करना चाहिए। लेकिन अब तुम्हारी बात समझ में आती है। कल सुबह ही तार कर के गुरूजी के चरणों में अस्वीकृति भेज दूंगा।”

मेरी उपस्थिति से बेखबर होकर माँ ने पिताजी के पाँव छू लिये।


Dr. Kurien and the first BOHO dinner

RK Nagar
RK Nagar

BOHO, or whatever this acronym stands for, is the Social club of the National Dairy Development Board established after we moved to the campus in 1970.

The dinner was organised on the 1st of April 1971. The venue, main lobby of the old hostel. Apart from NDDB staff and their families, we had some participants from Amul as well. No need to mention, Dr and Mrs Kurien were there to take part in the fun.

Shri Anirudhan, Assistant Secretary, NDDB was ‘elected’ as the first BOHO king by random picking of slips from a bowl. It is a different thing that all the slips had only one name. He was a great sport and carried out his ‘Duty’ as the King with aplomb. 

One part of the dinner was ‘party games’ and on agenda was a very popular game where participants pick a slip from a bowl, read the slip and enact what is in the slip. It could be a dance step, singing a song or a mimicry act whatsoever. 

When the bowl passed at Dr. Kurien, he picked a slip too. He was a great sport and ready to enact what the message on the slip demanded. He opened the slip, read it, folded it, looked at the expectant audience, smiled and kept quite. He then showed it to Mrs Kurien, then they both smiled. We were all anxious to know what message does the slip contain and eagerly looked forward to his act. 

But he just kept smiling. When all of us wanted to know what is he going to do, he passed the slip to master of ceremonies-Ashok Koshy and asked him to loudly read it. 

And the slip said, “What would you do if you were the Chairman of NDDB”. 

This is called some ‘party luck’. 

Pictures courtesy G Rajan and SB Sen Mazumdar

A polygraphed magazine Facts and Solid non Facts was started and a competition to suggest a name for the club was organised by Shri Ashok Koshy, IAS the then Executive Assistant to Chairman NDDB and later Director ( Administration ) who was the moving force behind organising this social club. Entry fee was Rs 1/-. A total of31 entries were received. Finally the jury selected BOHO as the official name of the club. If I remember correctly it was PT Jacob who suggested the name BOHO and got the prize of Rs 31/- Many believe that B in Boho stands for Buffalo making BoHO as Buffaloes of the highest order. The opinion is highly divided as B stands for many other words in English. 😁🙏🏼



Story of a “hut” standing tall in the midst of the Athirappilly falls

crop person showing toy pistols
Is it green or yellow ? How does one know ?

When was the hut standing tall in the midst of Athirappilly falls, was made and who built it

Social Media and Reality

The other day I read the Facebook post by my friend Ananthanarayana Sharma which in fact is a forward posted by another Facebook user OLD BOMBY.

I decided to write to Krishnan who does not have a Facebook account.

Krishnan worked with NDDB in 1970s. After retirement from his last job at RBI he is settled and lives on his ancestral plantation near Cochin. He is connected with NGOs in the area concerned with human and environmental issues in Athirapilly area.

Krishnan wrote

Thank you. Though I started to hear this story about a month back, this is the first time that I am reading about this in some detail.

Sadly, this is totally untrue.

In fact, to get the truth, I just talked to Sivanunny an Athirappilly based tribal who was one among the five people who was engaged in the construction of the structure.


Sivanunny who with his four other colleagues built the hut
G Krishnan had earlier written a blog about human and developmental issues around Athirappilly for Vrikshmandir.

Another person named Shaju who was also involved in the work is also personally  known to me.

This is the hut that Sivanunny and his colleagues built


When I visited the place for the first time in 1996,this structure did not exist at all.

After I settled in Kerala in 2000, I started visiting Athirappilly  at least twice a week in connection  with the anti- dam agitation.

Even  in 2001,this structure was non existent. It was constructed only in 2002, by a group  of 5 employees  of the newly formed Vana Samrakshana Samithi(VSS) as instructed by the then DFO, Induchoodan!

The shed  was basically  meant to protect the two watchmen  from the sun during the day.

The watcher’s presence became necessary to prevent the drunk Mallus  from entering the water and get drowned. Good quality teak  obtained from the local forest was placed into the cracks among the rock and fixed with concrete. It lasted till 2018 when a group of wild elephants destroyed  the shead.

Hence what is visible  today is the renovated structure.The material obtained  from the forest lasts only  for about 2 years and gets replaced.The small shead at the Falls is very much a media celebrity  in Kerala.

However, the locals continue to have a hearty laugh every time they read or hear about the English Man and his wife! Incidentally, tourists  started visiting the Athirappilly  falls only  in the 1950’s when a pucca road road through  the forest came up to facilitate the construction  of 2 upstream dams.



कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग १ और २

रश्मि कांत नागर
रश्मि कांत नागर

कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग -१

सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ी नाट्यकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था की, “हर बुद्धिमान महिला को जितनी जल्दी हो सके शादी कर लेनी चाहिये और हर एक बुद्धिमान पुरुष को शादी में जितनी देर हो सके उतनी देर करनी चाहिये”।

हमारा मित्र उनके इस कथन से बहुत प्रभावित था। मुझे नहीं पता की जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने स्वयं अपने इस कथन का खुद कितना अनुसरण किया या नहीं, परंतु हमारा मित्र, मुझे ऐसा लगा जैसे वह ठीक ऐन मौक़े पर अपने आप को बुद्धिमान साबित करना चाह रहा था। हम ऐन.डी.डी. बी. के कैम्पस में रहते थे और दिल्ली के लिये रवाना होने से पहले, भाई साहब हॉस्टल के सामने सड़क पर अपना सूटकेस रख कर, अपनी खोपड़ी खुजलाते इस दुविधा से निपटने का निष्फल प्रयास कर रहे थे। ये घटना जून १९७१ की है। तब हम सब जवान थे ।

हम में से कुछ तब और अब

हम उनकी ये दुविधा समझ रहे थे। हमें मालूम था की उनकी सगाई छोटी उम्र में ही हो गयी थी और अगर गाँव में रहते तो शायद न सिर्फ़ उनका बालविवाह हो चुका होता, पर वह अधिक नहीं तो कम से कम २-३ बच्चों की पिता भी बन चुके होते। मुझे पूरी तरह से ज्ञात नहीं, मेरा अनुमान है कि वे अपनी मंगेतर से प्रेमपत्रों के माध्यम से जुड़े रहे होंगे। एक तरफ़ शादी का लड्डू खाने को आतुर मन और दूसरी और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का प्रभाव। बलिहारी उन प्रेमपत्रों की।

हम ठहरे उनके शुभचिंतक मित्र।समझाया, “भाई, जल्दी कर वरना गाड़ी छूट जाएगी और सिर्फ़ शादी के लड्डू के सपने मिलेंगे”। यह समझिए धक्का मारना पड़ा महाशय को आनन्द रेलवे स्टेशन पहुँचाने में। अगर दोपहर दो बजे की बड़ोदा लोकल छूट जाती तो बड़ोदा से दिल्ली जाने वाली राजधानी छूट जाती, समय पर नहीं पहुँचते और मुहूर्त निकल जाता। सोचिए, सही निर्णय दिलवाने में हम मित्रों की कितनी अहम भूमिका रही होगी, क्योंकि ७० के दशक में आवागमन की सुविधाएँ सीमित थीं।

अपने इस निकटतम मित्र की शादी को लेकर हम सभी उत्साहित थे। कैम्पस में रहने वाले कोई बीस एक नौजवान कुँवारों बे बीच, यह पहला शेरदिल था  जो अपनी आज़ादी की क़ुर्बानी देने जा रहा था। याद रहे बचपन में हुई सगाई और बाथरूम में पढ़े गये प्रेमपत्र। उनकी भी तो अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 

शाम क़रीब पाँच बजे हम में से एक बोला, “अरे यार, ये तो वाक़ई शादी करने चला गया। इसके बिना अपन तीनों शाम को बोर हो जायेंगे। दूसरा बोला, “हमारा तो ठीक है, पर उसकी ‘लोटिया भागोल’ वाली प्रेमिका का क्या होगा? जब उसे पता चलेगा तो वह लड़की तो अपने बाल नोच लेगी, सर फोड़ लेगी, रो रो कर बुरा हाल हो जायेगा बेचारी का। हो सकता है आत्महत्या भी कर ले”।

“यह तो बड़ी गंभीर स्थिति हो गयी”, तीसरा बोला और उसने सुझाव दिया की हम तीनों, लोटिया भागोल वाली हमारे मित्र की प्रेमिका से मिल कर उसे समझायें ताकि वो कोई भी आत्मघाती कदम ना उठाये।

हमने ऐसा ही किया। हमारे मित्र की प्रेमिका- कपिला बेन से मिले, उन्हें समझाया। पहले तो उन्होंने बहुत आँसू बहाए, पर इस बात पर मान गयी कि वह कोई भी ग़लत कदम नहीं उठाएँगी। ठुकरायी हुई प्रेमिका कुछ भी कर सकती है, यह बात हम तीनों को परेशान कर रही थी।

कपिला बेन ने सिर्फ़ एक काम किया। अपने दुःखी मन के सारे भाव एक पोस्ट कार्ड पर उँड़ेले, और तुरंत उसे रेलवे स्टेशन जाकर RMO के हवाले कर दिया। पत्र लिखते समय कपिला बेन के आंसू बड़ी मुश्किल से रूके होंगे, फिर भी तो- तीन तो चिठ्ठी पर टपक ही गये। कपिला बेन क्योंकि “लोटिया भागोल” से थीं, उनका हिन्दी ज्ञान सीमित था, लिहाज़ा खुला पत्र यानी पोस्ट कार्ड में उन्होने हिं -गुजराती मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया।

हमारे मित्र का भाग्य बहुत अच्छा था। पोस्ट कार्ड दिल्ली पहुँचा। पोस्टमैन की दस्तक पर उस दिन सौभाग्य वश कपिला बेन का पत्र सीधे उन्ही के हाथ लगा।

मित्र ने पत्र पढ़ा तो चेहरे का रंग उड़ गया। तुरंत घर के पास वाले तारघर पहुँचे और हमें तार किया, “किसी कपिला बेन का पत्र है, माजरा क्या है? तुरंत छान-बीन करो और मुझे बताओ। भाग्य ये पत्र मेरे पिताजी के हाथ नहीं लगा वरना अनर्थ हो जाता”।

क्योंकि हम तीनों कपिला बेन पहले मिल चुके थे, हमने तुरन्त जवाबी तार किया, “सब कुछ नियंत्रण में है”। तार मिलते ही हमारे मित्र की जान में जान आयी, विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हुआ और कोई एक सप्ताह बाद वो नयी नवेली दुल्हन के साथ सकुशल आनन्द आ पहुँचे ।

आप सोच रहे होंगे के हमारा ये मित्र कौन था। ये कोई और नहीं,इसी वृक्षमन्दिर के प्रणेता श्री शैलेंद्र कुमार थे। कपिला बेन हम तीन मित्रों- बेहला, गोरे और मेरी कल्पना का नतीजा थीं, और मेरी टूटी-फूटी गुजराती ने प्रेमपत्र को साकार रूप दे दिया। पत्र पर गिरे आँसू भी नक़ली थे- आख़िर पानी की दो बूँदे गिरा कर कार्ड हिलाया और हो गया काम!

आख़िर अच्छे मित्र ऐसे नाज़ुक मौक़े सम्भालने के लिए ही तो जाने जाते हैं! 

कथा, एक मित्र के ब्याह की और हमारे बापू की भाग -२

मित्र के ब्याह की कथा आगे बढ़ायें, इसके पहले हमारे “बापू” से परिचय करवाना अत्यंत आवश्यक है। 

बापू, हमारे सम्माननीय बापू, कौन थे और उनका नामकरण कैसे हुआ यह अपने आप में ही एक कहानी है। पहले इसे पढ़िये। इस सारी कहानी में “बापू” की असली पहचान आपसे छिपायी जायेगी क्योंकि मैं अपने ख़िलाफ़ मानहानि का कोई मुक़द्दमा नहीं चाहता।

ऐन.डी.डी.बी कार्यालय ने जब कैम्पस से काम करना प्रारंभ किया, तब नए इंजिनीयर्स की भर्ती हुई। बापू इनमे से एक थे। ओहदे में तो हमारे बराबर ही थे, परंतु उम्र में शायद हमसे ४-५ वर्ष बड़े रहे होंगे। ऑफ़िस के बाद जब हम लोग खेल कूद और हंसी मज़ाक़ में लगे थे, बापू अपनी गम्भीर मुद्रा में, हाथ में ब्रीफ़केस लिये हमें भी अपनी तरह गंभीर बर्ताव करने की सलाह देते। “तुम अफ़सर हो, कुछ बड़ों की तरह, अफ़सरों की तरह व्यवहार करो। यह क्या सारे समय बच्चों की तरफ़ कूद-फाँद करते रहते हो”। 

बापू का यह रोज़ का प्रवचन हो गया था। हद तो जब गयी, जब बापू अपना ब्रीफ़केस लेकर छुट्टी के दिन भी दफ़्तर आने लगे और अपना रटा रटाया प्रवचन हम पर बरसाने लगे।

गोरे से ये बर्दाश्त नहीं हुआ। वैसे बापू ने गोरे को कभी भी प्रवचन झाड़ने की कोशिश नहीं की क्योंकि गोरे बापू से काफ़ी सिनीयर थे, गोरे को बापू के प्रवचन मुझ पर झाड़ना नहीं भाया। गोरे ने कहा, “नागर, इस बापू का कुछ इलाज़ करना पड़ेगा”। 

क्या करें, “बापू” के नाम मशहूर कर दें”, मैंने पूछा। 

“यही सही होगा”, गोरे ने सहमति जताई। 

“पर पहले उसे बताना होगा ना कि हमने उसे “बापू” के नाम सम्बोधित करना तय किया है, और ये करेंगे कैसे”, गोरे ने प्रश्न किया। 

आख़िर, “बिल्ली के गले में घंटी बांधने का ज़िम्मा मैंने उठाया”। गोरे और मैं बापू से मिले। 

मैंने बापू क़ो असली नाम से सम्बोधित करते हुए वार्तालाप शुरू किया, “आपका कहना सच है। ये बचकाना बर्ताव अब हमें बंद करना चाहिये। हम आपकी सीख का सम्मान करते हैं और अब से आपको एक सम्मानजनक तरीक़े से बुलाना चाहते है। अपर आपको आपत्ति ना हो तो हम आपको “बापू” के नाम से बुलाना चाहते हैं। ये सम्बोधन सिर्फ़ महात्मा गाँधी के लिये प्रयोग किया जाता है, क्योंकि सारा देश उनसे बहुत प्यार करता है, उनका बहुत सम्मान करता है और हम भी आपका बहुत सम्मान करते हैं”।

वह तुरंत मान गये। आख़िर सम्मानजनक सम्बोधन किसे नहीं भाता? 

अगले २४ घण्टों में वह सारे कैम्पस में “बापू” के नाम से मशहूर हो गये। 

अब लौटते हैं, हमारे मित्र की शादी पर। शादी सम्पन्न हुई और मित्र पत्नी सहित आनंद लौटने वाले थे। दिल्ली से बेहला को तार कर खबर भेजी की ‘फ़लाँ फ़लाँ ट्रेन से बड़ोदा पहुँच रहे हैं, स्टेशन पर मिलो’। रिक्वेस्ट नहीं आदेश था। 

मैं और बेहला, बेहला की मोटरसाइकल से बड़ोदा पहुँचे। स्टेशन पर एक नयी फ़ीयट टैक्सी तय की इस शर्त के साथ कि ‘अगर हमारे साहब आये, तो ही हम टैक्सी का उपयोग करेंगे। अगर नहीं आए तो हम कोई पैसे नहीं देंगे’। टैक्सीवाला मान गया। 

हमें नहीं पता कि हमारा मित्र किस डिब्बे में सफ़र कर रहा है और ट्रेन सिर्फ़ पाँच मिनट ही रुकने वाली थी। तो हमने तय किया की हम प्लेटफ़ार्म में उस जगह खड़े होंगे जहां बीच का डिब्बा आता है। फिर एक एंजिन के तरफ़ के डिब्बों की तरफ़ जायेगा और दूसरा विपरीत दिशा में। 

हमने सारी ट्रेन छान मारी। ट्रेन के छूटने की सीटी भी बज गयी, पर हमारा दोस्त नदारद। हम लौटने ही वाले थे की बेहला की नज़र दुल्हन के भेष में प्लेटफ़ार्म पर अकेली खड़ी एक लड़की पर पड़ी। 

“नागर, कहीं ये तो किरन नहीं है? अगर है तो शैलू कहाँ है? मैंने कहा, “चल पूछ लेते है कि आप शैलेंद्र की बीबी हो क्या”। पर बेहला ने पास जाकर निहायत शरीफाना अन्दाज़ में पूछा, ‘क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’

“हाँ”, उत्तर मिला।

“शैलेंद्र कहाँ है?”, मैंने पूछा।

“आगे, इंजिन के पास ब्रेक वान से बक्सा लेने गये हैं”, किरन बोली। 

मैं इंजिन की तरफ़ बढ़ा ही था कि कुली के सर पर एक भारी- भरकम बक्से के साथ शैलेंद्र को आते देखा। 

आम दिनों जैसा पहनावा हमारे मित्र का और साथ सजी-संवरी दुल्हन। लगता ही नहीं था कि भाई नयी नयी शादी करके आया है। 

कोई दो महीने बाद, एक दिन किरन ने हमें ये बताया कि वह बड़ोदा स्टेशन पर बेहला और मुझे देख कर डर गयी थी। वो सोच रही थी की ये दो गुंडे जैसे लड़के क्यों मुझे घूर रहे हैं। उसकी जान में जान आयी जब बेहला ने पूछा, “क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’ बेचारी क्या करती, उन दिनों फ़ोटो आईडेनटीटी का प्रचलन जो नहीं था। उसे तो सिर्फ़ हमारे नाम मालूम थे। 

हाँ, उसदिन हमें पता चला की हमारी शक्लों- सूरत किसी भले शरीफ़ आदमी जैसी नहीं, गुंडो जैसी है। पर क्या करते, ऊपर वाले ने जैसी सूरत दी है, उसी से गुज़ारा सारी ज़िन्दगी करना पड़ेगा! 

ख़ैर, टैक्सी में सामान रखा, किरन और शैलेंद्र पिछली सीट पर बैठे और मैंने टैक्सी वाले से गाड़ी रवाना करने को कहा। 

टैक्सी वाले ने प्रश्न किया, “पर आपके साहब कहाँ हैं, वो नहीं आये क्या”? 

हमने शैलेंद्र की और इशारा किया तो टैक्सी वाले ने ऐसा मुँह बनाया जैसे हमने इसके साथ कोई मज़ाक़ किया है। बेचारे का मुँह देखने लायक़ था। 

अब लौटते हैं, बापू पर। 

शैलेंद्र की टैक्सी के कैम्पस के पहुँचेने के ठीक दो घंटे बाद हमारे प्रिय बापू को आनंद से दिल्ली प्रस्थान करना था। ये मात्र संयोग था की शैलेंद्र का दुल्हन के साथ आनंद पहुँचना और बापू का तबादले पर जाना एक ही दिन था। शैलेंद्र D12 और में D11 में रहते थे। मैंने बापू को हमारी बिल्डिंग के नीचे खड़े देखा। वे बड़े बैचैन लग रहे थे। 

मैंने पूछा, “बापू, कोई ख़ास बात है क्या?”

“दुल्हन का मुँह देखना है”, बापू बोले।

मैंने कहा, “ऊपर आ जाओ”, और शैलेंद्र को बताया की बापू किरन को देखने ऊपर आ रहे हैं। कमरे में गोरे, बेहला और नन्दी नैथानी और अन्य नौजवान कुवांरे भी मौजूद थे । चाय पकौड़ी का दौर चल रहा था ।

बापू आए और जैसे ही एक ख़ाली कुर्सी पर बैठे, शैलेंद्र ने किरन को आवाज़ दी, “किरन, तनिक इधर आओ, ये हमारे बापू हैं, इनका पैर छू लो”। 

किरन को मालूम नहीं था की माजरा क्या है। उसने लम्बा घूँघट निकाला, बाहर के कमरे में आई और जैसे ही वो बापू के पैर छूने नीचे झुकी, बापू झट से खड़े हुए और फ़ौरन भाग खड़े हुए। 

हम सब की हंसी छूट गयी, पर किरन सकपका गई और शैलेंद्र से पूछा, “ये बापू कहाँ चले गए? चाय के लिए भी नहीं रुके”। 

हम क्या बताते। बापू ऐसे भागे की सीधे दिल्ली जाकर ही साँस ली। 

कोई दो महीनों बाद मेरा दिल्ली जाना हुआ। बापू मिले तो बहुत उखड़े उखड़े थे। मैंने पूछा, क्या बात है? ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हो?”

“तू शाला बहुत बदमाश है। शैलेंद्र की दुल्हन का मुँह भी नहीं देखने दिया। और साला मेरा पैर छूने क्यों बोला?” बापू ग़ुस्से में बोले। 

“अरे तो इसने इतना दुःखी होने की क्या बात है? अगली बार आनन्द आओ तो मुँह भी देख लेना और मुँह दिखाई भी दे देना”, मैंने कहा। 

“धत बदमाश कहीं का”, बापू की मुझे ये आख़िरी गाली थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने ऐन.डी.डी.बी. की नौकरी छोड़ दी और किसी इंजिनीयरिंग कॉलेज में पढ़ाने चले गये। शायद उन्हें वहाँ अधिक आज्ञाकारी शिष्य मिले होंगे। 

बापू को उनका नया काम अवश्य ही अधिक भाया होगा क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार, वे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद से सेवानिवृत हुए। 

शादी की शैलेंद्र ने, दुल्हन का मुँह नहीं देखने दिया उसने और बापू से डाँट पड़ी मुझे। कैसी विडम्बना, हाय रे कलियुग।


Have I got it right ? क्या हम सही पकड़े हैं ?

Today Anas Haqqani tweeted. See the screenshot of the tweet and a couple of replies are give in text below.

If you have, like me, all the time in the world to spend and really want to know who this moron is click here

Yes, he is now a Talibani Minister in Afganistan. He was one of the negotiators with Americans at Doha.


There is a news item on Tribune today suggesting this tweet may be the cause of a spate of shootings of innocent civilians in Kashmir.

Two tweets by a Haqqani Network scion which glorified the destruction of statues in Somnath have stirred social media users and given food for thought to intelligence agencies here.

Making a reference of his visit on Tuesday to Ghazni, a city past its prime, Anas Haqqani glorified Mahmud Ghaznavi and his act of breaking the Somnath temple idol.”

Haqqani’s first tweet in Pashto went unnoticed where he made no reference to Ghazni’s foray into Somnath though he did say that the medieval age ruler had been a breaker of idols. His second tweet, an hour later, was in English and it specifically mentioned that he had “smashed the idol of

This set the social media on fire with some Afghans berating him for digging up the past, others hailing his statement and Indians largely pointing out that the Somnath Temple today shines in full glory whereas Ghazni is a dust bowl.

Having read the above, I recalled writing of our learned historian cum story telling intellectual Romila Thapar on Somnath that I had read many years ago in a monthly journal of the Communist Party of India.

Memory loss is a natural phenomenon in old age of lesser mortals like me. I wanted to quote her words of wisdom on this controversy. But if I quote someone it has to be backed by an authentic source. That is “sina quo non” in the times that we live in.

And since I have a lot of time to waste no no spend these days I searched and found a reference.

The following quotes are what Romila ji had opined after extensive research in a subject that leftist liberal marxists like her ( these words are deliberately chosen to portray the oxymoron nature of marxists) . Yes in contemporary times they are liberals and nationalists are conservatives.

And the comic tragedy is that neither the marxists liberal nor nationalist conservatives know who they are.

“Not unexpectedly, the Turko-Persian chronicles indulge in elaborate myth-making around the event, some of which I shall now relate. A major poet of the eastern Islamic world, Farrukhi Sistani, who claims that he accompanied Mahmud to Somanatha, provides a fascinating explanation for the breaking of the idol.11 This explanation has been largely dismissed by modern historians as too fanciful, but it has a significance for the assessment of iconoclasm. According to him, the idol was not of a Hindu deity but of a pre-Islamic Arabian goddess. He tells us that the name Somnat (as it was often written in Persian) is actually Su-manat, the place of Manat. We know from the Qur’an that Lat, Uzza and Manat were the three pre-Islamic goddesses widely worshipped,12 and the destruction of their shrines and images, it was said, had been ordered by the Prophet Mohammad. Two were destroyed, but Manat was believed to have been secreted away to Gujarat and installed in a place of worship. According to some descriptions, Manat was an aniconic block of black stone, so the form could be similar to a lingam. This story hovers over many of the Turko-Persian accounts, some taking it seriously, others being less emphatic and insisting instead that the icon was of a Hindu deity.

THE identification of the Somanatha idol with that of Manat has little historical credibility. There is no evidence to suggest that the temple housed an image of Manat. Nevertheless, the story is significant to the reconstruction of the aftermath of the event since it is closely tied to the kind of legitimation which was being projected for Mahmud.

The link with Manat added to the acclaim for Mahmud. Not only was he the prize iconoclast in breaking Hindu idols, but in destroying Manat he had carried out what were said to be the very orders of the Prophet. He was therefore doubly a champion of Islam.13 Other temples were raided by him and their idols broken, but Somanatha receives special attention in all the accounts of his activities. Writing of his victories to the Caliphate, Mahmud presents them as major accomplishments in the cause of Islam. And not surprisingly, Mahmud becomes the recipient of grandiose titles. This establishes his legitimacy in the politics of the Islamic world, a dimension which is overlooked by those who see his activities only in the context of northern India.

BUT his legitimacy also derives from the fact that he was a Sunni and he attacked Isma’ilis and Shias whom the Sunnis regarded as heretics.14 It was ironic that the Isma’ilis attacked the temple of Multan and were, in turn, attacked by Mahmud in the 11th century and their mosque was shut down. The fear of the heretic was due to the popularity of heresies against orthodox Islam and political hostility to the Caliphate in the previous couple of centuries, none of which would be surprising given that Islam in these areas was a relatively new religion.

Mahmud is said to have desecrated their places of worship at Multan and Mansura. His claims to having killed 50,000 kafirs (infidels) is matched by similar claims to his having killed 50,000 Muslim heretics. The figure appears to be notional. Mahmud’s attacks on the Hindus and on the Shias and Isma’ilis was a religious crusade against the infidel and the heretic.

But interestingly, there were also the places and peoples involved in the highly profitable horse trade with the Arabs and the Gulf. Both the Muslim heretics of Multan and the Hindu traders of Somanatha had substantial commercial investments. Is it possible then that Mahmud, in addition to religious iconoclasm, was also trying to terminate the import of horses into India via Sind and Gujarat? This would have curtailed the Arab monopoly over the trade. Given the fact that there was a competitive horse trade with Afghanistan through north-western India, which was crucial to the wealth of the state of Ghazni, Mahmud may well have been combining iconoclasm with trying to obtain a commercial advantage.”

~ Romila Thapar Click here for the full article



There is another article in right wing online portal Opindia.

They quote not our desi Romila Thapar but an equally worthy historian/ writer story teller from the west Richard Davis.”

“In ‘Lives of Indian Images’, 1999 (Princeton University Press), Richard Davis mentions Ghaznavi wanted to destroy the idols as his duty as a Muslim.

Excerpt from Lives of Indian Images’ by Richard Davis, 1999 (Princeton University Press).

Let me end this post by linking a tweet by Times Now where in the daughter of a Kashmiri Pandit Bindroo who was shot by terrorists sends a reply and challenge to the terror mongers.


Brihadiswara Temple

Dr. MPG Kurup
Dr. MPG Kurup

Former Executive Director National Dairy Development Board

Indian Art , History , Culture , Architecture and Vedic India

Art , Architecture and Culture

Thanjavur Brihadiswara Temple : (also called Peryaudayar Kovil

Located south of Kaveri , built by Chola King Rajaraja Chola in 1010 AD : however construction : additions , Alterations , and Modifications , went on in bits and pieces for centuries : largest temple in south India , built in 44 Ha of land .

The Temple architecture is complex , Dravidian style , rock cut , Chola Temple style .The temple construction is immersed in mystery , no one including Google or Wikipedia , provide answers.

The Temple tower (Raja Gopuram ) is 216 ft tall and has a huge granite block some 80 mt and 7.7 ft wide , at the very top. No one offers any explanation on how it reached the top.

Prathishta : Lord Shiva , but the Temple has shrines for many of the Gods in the Hindu Pantheon.

The temple and also the city of Thanjavur is famous for its Art and Culture : the classical Indian Dance form “Bharatha Natyam ” originated in Thanjavur !

So also the South Indian Classical Music , popularly known as ” Carnatic Music ” : origin attributed to Music Samrat Thyagaraja !

Source : Text and Pictures : Google / Wikipedia