दीपक सुचदे जी ( बाबा) अब न रहे !

नर्मदा जी के तट पर ध्यान मग्न बाबा दीपक सुचदे जी

मैं उनसे २०१७ में पहली बार मिला । मिलने के बाद मैंने नीचे लिखा मेल उन्हें भेजा था । फिर भोपाल होते हुये उनकी कर्म भूमि नर्मदा जी के तट पर लगे मालवानी ट्रस्ट के बजबाडा, देवास स्थित फार्म पर फ़रवरी / मार्च २०१७ में गया और दो दिन रहा भी। उनके गुरू डाभोलकर जी द्वारा विकसित “अमृत कृषि” के सिद्धांतों पर यह फार्म दर्शकों से चल रहा था। या यू कहे कि बाबा द्वारा चलाया जा रहा था। इसे कृषि तीर्थ नाम से जाना जाता है। हज़ारों लोगों को प्रशिक्षण दिया गया इस केंद्र से ।

दीपक जी,

प्रणाम,

आपसे मिलने की इच्छा साल से मन मे थी , पर मानवी के सिर्फ़ चाहने और प्रयत्नों से ही कार्य पूरे नहीं होते भगवत कृपा भी होनी चाहिये

आख़िर पटना मे आप मिल ही गये

अहेतुक , अकारण मे जो होता है वहउनकेद्वारा ही संभव है

संपर्क मे रहूँगा २८ फ़रवरी को भोपाल मे मिलूँगा और आपके साथ दिन आपके फ़ार्म पर रहूँगा

आशा है शीघ्र ही आप हमारे गाँव चतुर बन्दुआरी , गोरखपुर के वृक्षमंदिर पर भी आयेंगे

धन्यवाद

आपका सेल्फ़ अप्वाइंटेड सचिव
😀😀

शैलेन्द्र

बाबा से मेरा संपर्क लगभग दो साल का ही रहा । पर लगता है हम एक दूसरे को वर्षों से जानते थे । अक्टूबर २०१९ में वह मेहसाणा मे नेटुको फ़ार्मिंग पर एक सेमिनार में बोलने के लिये जाने वाले थे। हमने व्हाटसएप पर मेसेज एक दूसरे को लिखे ।

बाबा ने फ़ोन किया वे चाहते थे कि मैं मोती भाई चौधरी जो मेहसाणा दूध उत्पादक सहकारी संघ के द्वितीय चेयरमैन थे उनके बारे में लिखूँ । बाबा के कहने पर जो मैंने लिखा वह नीचे उद्धृत है।

मोती भाई चौधरी

फ़ोटो मेहसाणा दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की वेब साइट से साभार

स्वतंत्रता संग्राम के अग्रगण्य सेनानी सरदार पटेल की प्रेरणा, मोरारजी भाई के मार्गदर्शन और त्रिभुवन दास भाई के नेतृत्व मे खेडा जिल्ला दूध उत्पादक सहकारी संघ की स्थापना सन 1946 मे हुई। त्रिभुवन दास भाई के प्रयत्नों से डा. कुरियन और एच एम दलाया जैसे मैनेजर और तकनीकी विशेषज्ञ तथा अन्य कारगर इस संस्था से जुड़े।खेडा जिल्ला दूध उत्पादक सहकारी संघ के सफल संचालन, विकास एवं प्रसार से प्रभावित हो “बिन सहकार नहिं उद्धार” का यह प्रयास गुजरात के अन्य ज़िलों मे हुआ।

मान सिंह भाई के नेतृत्व और मोरार जी भाई के मार्ग दर्शन तथा खेड़ा जिल्ला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के सहयोग से मेहसाणा जिल्ला सहकारी दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की स्थापना हुंई। मान सिंह भाई पहले अध्यक्ष थे मेहसाणा दुग्ध संघ के । उनके ट्रैफ़िक दुर्घटना में दुखद अवसान के बाद मोती भाई दूसरे अध्यक्ष बने ।

धीरे धीरे यह प्रयास गुजरात के अन्य जिलों मे फैला और दुग्ध संघों की स्थापना हुई। 1973 मे गुजरात के तत्कालीन दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों का राज्य स्तर पर संगठन गुजरात मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन बना ।

मोती भाई गुजरात मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।डा. कुरियन और मान सिंह भाई तथा मोती भाई मे एक दूसरे के प्रति बहुत सम्मान और आदर की भावना थी। “ बिन सहकार नही उद्धार “ के मंत्र से अभिमंत्रित कर्मयोगी सहयोगी थे, जो वह तीनों ।

मेरा सौभाग्य था कि मुझे एनडीडीबी आणंद मे 1968 से 2000 के दौरान विभिन्न पदों पर फ़र्ज़ बजाने का अवसर मिला था।मान सिंह भाई को मैंने दूर से ही कई बार देखा था। नमस्कार किया था । बात कभी नही की। बहुत शालीन और भव्य व्यक्तित्व के धनी थे मान सिंह भाई ।

मैं डा. कुरियन का एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेंट १९७४ मे बना । फ़ेडरेशन बन चुका था । डा कुरियन एनडीडीबी, गुजरात गुजरात मिल्क फेडरेशन के अध्यक्ष थे ।

सत्तर के दशक मे मोती भाई को पहली बार देखा ।फिर तो उनसे थोड़ी बात करने का मौक़ा भी मिला। पर मै ज़्यादा बोल नही पाता था । उनकी सादगी, वेशभूषा, धोती, कुर्ता और टोपी और चेहरे पर सदैव विराजमान मुस्कान बरबस ही इस साधारण से दिखने वाले “असाधारण” व्यक्तित्व की ओर अनायास आकर्षित करती थी।

जब मै डा.कुरियन का एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेट बनाया गया तब डा साहब ने मुझे स्पष्ट निर्देश दिये थे । यदि कोई भी किसान मुझसे मिलने आये उसे तुरंत मेरे पास लाना और अगर मै व्यस्त हूं तो एक काग़ज़ पर लिख कर भेजना मै बाहर आ जाऊँगा । पर मोती भाई जैसे कर्म योगियों के लिये यह नियन न था । सीधे डा. कुरियन के कमरे मे जा कर बैठ जाते थे। डा. कुरियन कमरे मे न हो तो मै मोती भाई के साथ बैठ जाता और डा. कुरियन को ख़बर भिजवा देता कि मोती भाई आ गये हैं।

मोती भाई और डा. कुरियन दोनों के व्यक्तित्व रहन सहन, वेशभूषा, बातचीत करने का लहजा एक दम अलग थे पर एक अत्यंत आश्चर्य जनक वैचारिक सोच की “एका” थी की दोनों सोच मे। डा कुरियन मोती भाई की बातों का और मोती भाई की दी सलाह का बहुत सम्मान करते थे और उसपर अमल भी ।इन दोनों मे और तब के गुजरात के अन्य अग्रणी दूध उत्पादक सहकारी संस्थाओं के नेतृत्व पर विराजमान महानुभावों मे जो पारस्परिक समझ और आदर का भाव और साथ मिल निष्ठा पूर्वक काम करने का जज़्बा था उसी कारण गुजरात देश मे ही नही वरन विश्व मे आदर्श दूध उत्पादक सहकारी संस्था अमूल बना पाया।

जब जब फेडरेशन मे कर्मचारियों की तनख़्वाह बढ़ाने की बात उठती थी डा कुरियन इस बारे मे बहुत कड़ा रूख अख़्तियार करते थे । उनके अनुसार दूध उत्पादक संघ के बहुतायत सदस्यों ( जो संघों के मालिक है) की आमदनी उनके अपने ही संघ के कर्मचारी के वेतन से कम होती है ।साथ मे कर्मचारी को छुट्टी, एलएटीसी, मेडिकल आदि अन्य सुविधाये भी । अत: वेतन बढ़ाने का निर्णय बड़ा कठिन होता था ।

जब डा. कुरियन पर वेतन वृद्धि के लिये बहुत दबाव बढ़ता था डा. कुरियन कहते थे ठीक है अगर मोती भाई मान ले तो मै मान जाऊँगा । फिर बीच का कोई मोती भाई रास्ता निकालते थे ।

बहुत सी यादें है पर क्या क्या लिखूँ !

जीवन के संध्या काल मे अब लगता है कि नियंता व्यक्ति की “नियति” का निर्णय उसकी “नीयत” देख कर करता है ।आपकी नीयत तो साफ़ थी, है और रहेगी। आपने ख़ुद कुछ प्रयोग किये, सीखा और उस पद्धति के प्रचार प्रसार मे जीवन समर्पित किया है।

बाबा, आप मेहसाणा जा रहे हो मोतीभाई की कर्म भूमि मे । मै नही आ पा रहा खेद है । वहाँ जा कर आप के नेटुको फ़ार्मिंग के प्रसार मे और बल मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है ।

सप्रेम,

शैलेन्द्र कुमार

सेल्फ़ अप्वाइंटेड पी ए टू दीपक सचदे जी
भूतपूर्व एक्ज़िक्यूटिव असिस्टेट तथा डायरेक्टर चेयरमैन आफिस आफ डा. कुरियन


हमें क्या पता था कि बाबा हमें छोड़ चले जायेंगे ।

मेहसाणा से लौटने के बाद मैंने उन्हें हमेशा की तरह पुन: संपर्क किया । हमारे बीच इन मेसेजों का आदान प्रदान हुआ

फिर २८ अक्तूबर को उन्होंने यह विडियो शास्त्री जी के बारे में भेजा ।

यह उनका भेजा अंतिम संदेश है ।

फिर मेसेज आया पूर्णिमा का गुड़गाँव से । पूर्णिमा ने प्रसंशनीय काम किया है शहर में रहते हुये भी घर की छत पर अमृत कृषि के सिद्धांतों का पालन कते हुये अपने सफल क्रांतिकारी प्रयोगों द्वारा। बाबा बहुत मान करते थे पूर्णिमा का ।

फिर लंबी बात की मैंने और पूर्णिमा ने !

बाबा का पुत्र वत्सल माँ के देहांत के बाद बाबा के साथ बजवाडा में ही रहता है । उस दिन बाबा की तबीयत ठीक न थी पर वत्सल के बहुत मना करने के बाद भी अपना दिल्ली मे नियत कार्यक्रम के लिये ट्रेन से बाबा निकल पड़े और वह यात्रा उन्हें हमसे बहुत दूर ले गई । ट्रेन में ही उन्होंने देह त्याग कर सद्गति प्राप्त की ।

अपने लंबे जीवन काल में बहुत से लोगों से मिला पर अनोखे व्यक्तित्व का धनी, कर्मठ, अपने ध्येय के लिये पूर्ण समर्पित, साधारण , सरल और सदा मगन मानुस से भी हो सकता है मैं नहीं जानता था जब तक मैं उनसे न मिला था ।

बाबा को वृक्षमंदिर पर आने का आमंत्रण दिया । कार्यक्रम भी बन गया । टिकट बुक हो गये। गोरखपुर में रोटरी क्लब में संबोधन और कृषि और विकास क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित लोगों से मीटिंग और गाँव में किसानों से मीटिंग सब व्यवस्था हो गई ।

जाने के पहले दो दिन पहले बाबा का फ़ोन आया ।

“आपसे बात करनी है”

“बाबा सब व्यवस्था हो गई है आपकी गोरखपुर और वृक्षमंदिर यात्रा की ।”

“इसी बारे में बात करनी है । आप मुझे अपने गाँव क्यों ले जाना चाहते हैं ?”

“बाबा आप आयेंगे लोगों से किसानों से मिलेंगे वृंक्षमंदिर पर हम आप की सिखाई पद्धति से अमृत कृषि करेंगे…”

“पर आप को क्या फ़ायदा होगा?”

मैं भौंचक रह गया । क्यों पूछ रहे है बाबा यह सवाल । कुछ देर चुप रहा पर फिर उन्होंने कहा

“आप तो केनेडा चले जायेगे । पेड़ पौधे किसान का साथ चाहते हैं। उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति महसूस करते हैं ।अगर आप अपने गाँव में रहने लगे मैं अपने खर्चे से आउंगा ।”

मैं समझ गया बाबा क्या कहना चाहते हैं

वे अक्सर कहते थे “ कृषि सूक्ष्मजीव से महाजीव ( मनुष्य) की यात्रा है। सूक्ष्मजीव ( किटाणु, परजीवी आदि) अपना जीवन दान करते हैं अन्य जीवों और मानव के लिये भोज्य पदार्थों की संरचना के लिये । सूक्ष्मजीवों की मोक्ष यात्रा का प्रारंभ इसी जीवन त्याग से होता है”

बाबा ने अपनी तो अपनी मोक्ष यात्रा का आरंभ मानव देह त्याग कर कर किया । प्रार्थना है परम परमेश्वर से उन्हें सद्गति मिले !

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