सहज मानवता और स्नेहिल आतिथ्य

My contribution to the Souvenir brought out on the occasion of the 75th birthday of Charutar Arogya Mandal , Chairman Dr. Amrita Patel. I will try an English translation and post the same later. The souvenir was brought out in English, Gujarati and Hindi. I chose to write in Hindi.

अगस्त या सितंबर १९६८ का हल्की बारिश वाला दिन मै आणंद रेलवे स्टेशन से ट्रेन से कंजरी के लिये निकला।

डा॰ माइकल हाल्स (माइक)  नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के संस्थापक सदस्यों मे से एक थे और कुछ माह पहले ही भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद से आणंद आये थे । उन्हीं के कहने से मै कंजरी स्थित पशु आहार संयंत्र की एनिमल न्यूट्रिस्ट डा॰ अम्रिता पटेल से मिलने जा रहा था। 

उसी साल मई से मैने एनडीडीबी मे नौकरी शुरू की थी। अपना गाँव, फिर गोरखपुर के बाद अब आणंद का सारा माहौल एकदम नया था।

नई जगह ,नये लोग, फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी न बोल पाने से अंग्रेजीदां लोगों से मिलने जुलने मे हिचकिचाहट से भरा, मै जब मिस पटेल से मिला तो लगा ही नही मै किसी अजनबी से मिल रहा हूँ। 

कैटलफीड संयंत्र का संचालन,प्रबंधन, फ़ीड फारमुलेशन मे विभिन्न पदार्थों के मिश्रण की प्रक्रिया , गुणवत्ता आदि विषयों पर चर्चा मे समय कैसे बीता पता न चला। दोपहर खाने का समय हो गया था । मिस पटेल ने कहा खाना खा कर जाओ जब तक मै कुछ कहूँ उन्होने  घर से लाया टिफ़िन खोला, दो मे से एक रोटी और पालक के सालन का कुछ भाग एक प्लेट मे रख मुझे दे दिया !  

१९६८ के आषाढ़ के उस दिन मिस पटेल से पहली बार मिलने पर उनके व्यवहार मे घुली सहज मानवता और स्नेहिल आतिथ्य की आकर्षक विशिष्टता मानस पटल पर बार बार कौंध जाती है। 

एनडीडीबी मे उनके साथ काम करने और नज़दीक से जानने का मौक़ा मिला। १९७४ मे डा॰ कुरियन के एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेंट और १९८७ मे मानव  संसाधन प्रभाग मे निदेशक पद पर मेरी पर हुई नियुक्तियों मे मिस पटेल ने अहम भूमिका निभाई ।

१९७४ मे एक दिन अचानक फोन आया।

“तुम्हारा नाम प्रस्तावित किया है मैने डा॰ कुरियन के एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेंट पद के लिये”

ज्यादा टिकता नही है कोई उनके साथ इस पद पर”

मिस पटेल कह रही थीं।

मै भौंचक रह गया । बहुत ना नुकुड की।

अंत मे मैने कहा “अंग्रेजी अब बोल तो लेता हूं पर अच्छी अंग्रेजी लिखने मे दिक्कत होती है” ।  

मिस पटेल नही मानी बोली;

” जा कर डाक्टर कुरियन से मिल लो वही निर्णय लेंगे”

कुछ मिनटो मे डा॰ कुरियन का फोन आ गया। दोपहर बाद जा कर मिला उनसे मिला ।ना नुकुड की कोशिश यहां भी नाकाम रही।  

वह अपनी ही बोलते रहे, क्या करना होगा, किस तरह गोपनीयता सुरक्षित रखना ज़रूरी होगा, यह काम २४ घंटे का है, आदि। अंत मे हिम्मत कर मैने कहा;

” सर मै इस पद के लिये लायक नही हूं”

डा॰ कुरियन बोले “मिस पटेल हैज सेड दैट यू आर सूटेबल”!

अब आगे कुछ बोलना बेकार था। सोचता हूं  मिस पटेल का यह कहना कि “ज्यादा टिकता नही है उनके साथ कोई इस पद पर” शायद बहुत गहरी सोच का परिणाम रहा होगा।

आखिर मैने डा॰ कुरियन के एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेंट और बाद मे डायरेक्ट (चेयरमैन’स आफिस) के पदो पर बहुत दिनो तक लगभग १९७४ से १९९८ तक जुडा रहा। एनडीडीबी में कुल ३२ साल १९६८ से २००० तक !

कैसे मालूम था मिस पटेल आपको कि मै इतने दिन टिका रहूंगा !

सितंबर २०१२ जब मिस पटेल चेयरमैन एनडीडीबी का कार्यभार सँभाल रहीं थी

मानव संसाधन प्रभाग के निदेशक पर मेरी नियुक्ति तो मिस पटेल का लगभग एक तरफा निर्णय था । मै तिलहन और वानस्पितिक तैल विभाग का निदेशक था पर मिस पटेल की योजना थी कि री- आरगेनाइजेशन बाद मानव संसाधन विभाग बनाया जाय। इस बार भी इफ बट की बातें उठी पर सब दरकिनार करते हुये मिस पटेल ने यह निर्णय लिया। मुझे इस काम मे सफलता मिली या न मिली पर मिस पटेल से सहयोग पूरा मिला ।

वैसे एनडीडीबी मे मिस पटेल के साथ काम करने का मौक़ा पहली बार मुझे मिला जब मै लगभग एक महीना १९७४ मे बतौर एनडीडीबी कर्मचारियों के दल के सदस्य के साथ इंटरनेशनल डेयरी कांग्रेस, नई दिल्ली के आयोजन मे सहायता के लिये भेजा गया था।

एक विकासशील देश पहली बार मे हो रहा यह आयोजन इतिहास तो रच ही रहा था पर एक भारतीय महिला का सेक्रेटरी जनरल होना भी हम सब के लिये गौरव का विषय था।मिस पटेल की कार्य संपादन क्षमता विशेषकर योजनाबद्ध सिलसिलेवार काम कैसे पूरा हो, कौन क्या करे,समय से कौन सा कार्य निष्पादित हुआ या न हुआ पर समय समय से सामूहिक चर्चा वाली कार्यशैली नज़दीक से देखी।

जब एचएम पटेल साहब की तबीयत ख़राब हुई और अहमदाबाद अस्पताल मे उन्हे भरती करा दिया गया था तब डा॰ कुरियन ने कहा कि मिस पटेल अकेली अहमदाबाद नही जायेंगी और मुझे साथ जाने को कहा । मै लगभग पाँच दिन उनके साथ रहा।

एचएम साहब को अस्पताल मे आ कर देखने वालों का तांता तो लगा ही रहता था। पर जब समाचार आया कि एचएम साहब के विरोधी राजनीतिज्ञ “दिखावे” की हमदर्दी दिखाने का ढोंग रच ताम झाम सहित फूलों का गुच्छा ले कर आ रहे हैं और मिस पटेल को वहाँ उनके स्वागतार्थ खड़ा होना पड़ेगा तब वहाँ  मिस पटेल का  दूसरा रूप देखने को मिला।

गहरी आंतरिक पीड़ा थी, क्षोभ था, पर पिता के पास रहना था सभ्यता का तक़ाज़ा। अस्पताल के कई चक्कर लगाये थे मैने मिस पटेल के साथ साथ। मुश्किल से मानी थी लौटने को पिता के पास।

यह विडंबना ही है मानवी त्रासदी।

पिता के देहावसान पर अंत्येष्टि की पूरी तैयारी और हमारे समाज मे पुत्र से जो अपेक्षा होती है उसे पुत्री ने उसे भलीभाँति निभाया । फिर शुरू हुई चरोतर  आरोग्य मंडल और अस्पताल का कार्यभार संभालने की क़वायद जो पिता की धरोहर ही नही पर मिस पटेल की सोच से जुड़ी प्राथमिकताओं – पर्यावरण एवं स्वास्थ्य से जुड़ी हैं । मैने नज़दीक से देखा है जाना है इन विषयों मे मिस पटेल कितना रुचि रखती है ।

मुझे याद आता है मिस पटेल की वह बात जो वह हर महिला अफ़सर की नियुक्ति के पहले उनसे साक्षात्कार के वक़्त होती थी । औपचारिकताओं और कुछ अन्य प्रश्नों के बाद साक्षात्कार के अंत मे मिस पटेल हर एक से पूछती थी;

“अगर यह नौकरी तुम्हें मिलती है तो कितने साल काम करोगी?”

“पुरुष प्रधान समाज मे महिलाओं को सोच विचार कर प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी मे आना चाहिये । बराबरी के साथ काम करना होगा क्योंकि महिला किसी भी तरह कार्यपालन  मे पुरुष से कम नही”  

“देखो शादी करना, घर चलाना, बच्चों को पालना, संस्कार देना उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है जितना किसी संस्था मे काम करना उसका संचालन करना। कुछ को प्रोफ़ेसन और घर दोनो चलाना होता है वहीं बैलेंस की बात आती है।”

“शैलेन्द्र तुमसे ऐसा नही कह सकते है पर मै कह रही हूँ

मैने  निर्णय  लिया कि सारा जीवन प्रोफ़ेसन  को दूँगी  और कर भी रही हूँ   इसलिये साफ़ साफ़ बताओ कि अभी कितने साल काम करने का इरादा है? पर  जितने साल कहो उतने ज़रूर करना।”

कितनी कठिन राह चुनी आपने मिस पटेल और चुनी डगर पर चलती रहीं इतने सालों तक।प्रोफ़ेशनल और  पर्सनल ज़िंदगी का बैलेंस हमेशा रखा।

कुछ पारिवारिक ज़रूरतों और कुछ अन्य कारणवश मैने २००० मे एनडीडीबी से प्रीमैच्योर रिटायरमेंट लिया। पर मुझे हर्ष एवं संतोष इस बात का है कि मुझे मिस पटेल के साथ  काम करने का मौक़ा मिला । कसौटी पर खरा उतरा या नही राम जाने  पर मुझे और किरन को भी एचएम परिवार के  बहुत से सदस्यों को जानने का मौक़ा मिला । यह नाता अब तक क़ायम है चाहे हम कितनी भी दूर हों ।

आपकी पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर किरन और मेरी तरफ़ से  ढेरों शुभकामनायें ! एक बार फिर आपको आपकी मानवता को नमन,

शैलेंद्र

%d bloggers like this: