Birds in our backyard-II

<strong>रश्मिकांत नागर  </strong>
रश्मिकांत नागर

अपने छात्र जीवन की “एक” कारस्तानी का बयान कर रहे हैं।
यह कहानी नहीं, सत्य घटना है। 

Nagar had posted a blog titled Birds in our backyard on August 17, 2021. That was spring of 2021. Winter is about to get over and the spring of 2022 will usher in a week or so as we are experiencing the cusp of weather season change in Ontario.

With the arrival of winter, some birds bid adieu for the season. They were the House Finch, Finch, Grackles, Blue Jays and American Robin. Those who decided to stay with us through the winter were the Cardinals, House sparrows, Doves and Chickadees.

Downy Woodpeckers, on the other hand, remained ‘occasional visitors’, suddenly showing up for a couple of days and then again disappearing for weeks.

We wanted as many of them to stay close to us. So, we moved the feeder in the patio along with a heated birdbath so that the birds and Squirrels both have access to drinking water through harsh Canadian winter when the temperatures drop to minus and stay below freezing for days together.

And this helped those birds that stayed with us through the winter. They came every day and stayed in the yard virtually throughout the day. Whereas Cardinals, Sparrows and Chickadees preferred to eat from the feeder, the Sparrows decided to care for the ground feeder friends too- Doves, and some cardinals. They always shook the feeder tray violently and dropped plenty of feed on the ground not only to help ground feeder birds but also the Squirrels.

The new arrangement invited a new bird that we had never seen in our yard before- Black Eyed Junco. Here is a picture:

Juncos came in groups, hopped around the ground and fed on the seeds dropped on the snow-covered ground by the sparrows and cardinals. It was a treat to watch them sportily jump around and pick seeds from the snow-covered yard. They too, like sparrows came in hoards, pecked on the fallen seeds and flew away and returned after 10-15 minutes. This pattern continued right from sunrise till sunset.

And then we had another beauty- Nuthatch. This little bird was seen late in the last season, but this winter, she has been around almost through the entire winter. Here she is:

Nuthatch behave more like Chickadees- they come one at a time, land on the feeder tray, pick the seed and fly away. They do it throughout the day and never seem to get tired.

And who enjoyed warm water bath the most? Of course the Doves and the Squirrels. See them here having the fun:

And now that the Spring has knocked at the door, we are looking forward to seeing our visitors of the last season all over again. Arrivals have already begun. We had the first pair of American Robins visit us last Saturday-19th March. They announced their arrival with their melodious call from a treetop before descending in the yard.


“Eagerly awaiting return of this little beauty- The House Finch”.

A happy spring to all our feathered friends.



आँख मिचौली; कथा पुरानी, संदर्भ नया

<strong>रश्मिकांत नागर  </strong>
रश्मिकांत नागर

अपने छात्र जीवन की “एक” कारस्तानी का बयान कर रहे हैं।
यह कहानी नहीं, सत्य घटना है। 

आप में से बहुतों ने शायद यह कथा पहले भी सुनी या पढ़ी हो । मैंने इस कथा को एक नए संदर्भ में प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया है। अगर पसंद आये, तो आगे बढ़ाइयेगा अन्यथा आप ने तो पढ़ ही ली है!

चित्र godhdwallpapers.com के सौजन्य से

क्योंकि कथा युगों पुरानी है, स्वाभाविक है कि इसका प्रारम्भ वैकुंठ से हो। क्षीरसागर के मध्य, शेष शैय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु अपने चरणों के निकट बैठी अपनी भार्या देवी लक्ष्मी को सम्बोधित कर बोले, “देवी, हम दोनों सतयुग के प्रारम्भ से लेकर, अब कलियुग के इस चरण तक इसी तरह अकेले असीमित क्षीरसागर को कब तक निहारते रहेंगे? हमने तो कभी किसी बदलाव का अनुभव ही नहीं किया। क्यों ना कुछ नवीन किया जाये”। 

देवी लक्ष्मी ने कहा, “नाथ, मै समय समय पर भूलोक जाकर धनाढ़्य और ग़रीबों के बीच जाकर अपना मनोरंजन कर आती हूँ। बहुत समय बीत गया है आप भू लोक गये नहीं। अगर आप यहाँ अकेले बैठे बैठे उकता गए हैं, तो आप भी एक बार भूलोक विचरण कर आइये, मन बहल जायेगा”। 

पर में वहाँ करूँगा क्या”, भगवान पूछ बैठे। 

“तनिक अपनी निगाह अंतहीन सागर से हटा कर नीचे भूलोक की और कीजिये। सतयुग, त्रेता और द्वापर से हट कर ये कलियुग अनूठा है। देखिये मानव जाति ने कितनी प्रगति की है। आमोद- प्रमोद के नए संसाधन जुटाए हैं, नए खेलों का आविष्कार किया है, तीज-त्योहारों की धूम मची है। होली-दीवाली, बीहु-बैसाखी, उत्तरायण-पोंगल, ओणम- लोहरी, गरबा-नवरात्रि और ना जाने क्या क्या। जाइये कुछ मनोरंजन आप भी कर आइये।” देवी लक्ष्मी ने उत्तर दिया। 

“अच्छा सुझाव है तुम्हारा देवी। में शीघ्र भूलोक जाऊँगा, मानवों के साथ कुछ नये खेल, जो उन्ही ने बनाये हैं, खेलूँगा”। 

“कोई लाभ नहीं होगा मानव रचित खेलों में भाग लेकर। आप हर स्पर्धा में विजयी होंगे और पराजित मानव शीघ्र ही निरुत्साहित होकर खेल छोड़ आपको अकेला छोड देंगे। और आप निराश होकर वापस शेषशैया पर ……..”

“तुम्हारा आशय समझ गया देवी, परंतु ऐसा कौन सा खेल है जो पुराना होकर भी इस काल में लोकप्रिय हो”? भगवान ने पूछा। 

“आँख-मिचौली”! ये वो खेल है जो कभी पुराना नहीं होता। आपने तो ये खेल हर युग में खेला है। बस आपको तो भूलोक में जाकर, खेल प्रारंभ कर कहीं छुपना है। आपको ढूँढने का कार्य तो मानव करेंगे”। देवी लक्ष्मी के इस उत्तर के साथ, खेल चयन की प्रकिया पूर्ण हुई। 

“परन्तु भूलोक में मुझे छिपना कहाँ होगा? आधुनिक संसाधनों से युक्त ये चालाक मानव तो मुझे शीघ्र ही ढूँढ निकालेगा और मेरा सारा प्रयत्न विफल हो जायेगा”, भगवान ने संशय व्यक्त किया। 

“सारे उत्तर मुझ से ही चाहिए ? कभी कभी अपने नवग्रहों की सलाह भी ले लीजिये”, एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ लक्ष्मी ने वार्तालाप को नया मोड़ दे दिया। 

पर भगवान को निराशा ही हाथ लगी। नवग्रहों के सुझाव भी सामान्य ही निकले। आख़िर धरती पर गुफा-कन्दरा हो, पहाड़ की चोटी हो, सागर की गहराई हो या आसमान की ऊँचाई, कौन सी ऐसी जगह है, जहाँ लम्बे समय तक मानव धृष्टि से छिपा जा सकता है? 

“क्यों नहीं भूलोक पर जाकर किसी महात्मा से पूछ लेते। हो सकता है, आपकी समस्या का समाधान आपको वहीं मिले”। देवी ने सुझाया। 

जैसे ही भगवान भूलोक जाने निकले, देवी बोल उठीं, “अरे तनिक वेश-भूषा तो बदल लो। इस रूप में जाओगे तो प्रयोजन पहले ही निष्फल हो जायेगा”। 

भेष बदल कर भगवन भूलोक में एक ऐसी जगह पर उतरे जहां एक महात्मा दीर्घ समय से समाधिस्थ थे। महात्मा ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, उनके होंठों पर हल्की मुस्कुराहट आयी और अपने समक्ष खड़े एक सामान्य व्यक्ति को सम्बोधित कर बोले, “भगवान, भूलोक पर आपका ये अनायास पदार्पण? क्या प्रयोजन है आपका”? 

“भगवान? कौन भगवान? मैं तो एक पथिक हूँ भाई। थकान से मुक्ति पाने एक ऐसे विश्राम स्थल की खोज कर हूँ, जहाँ बिना किसी विघ्न लम्बे समय तक विश्राम कर सकूँ”। 

महात्मा मुस्कुराये और पूछ बैठे, “तो क्या आपने आँख- मिचौली खेलने का विचार त्याग दिया है”? 

भगवान मुस्कुरा कर बोले, “आपसे क्या छिपा है? अब आप ही बताइये छुपने की सर्वोत्तम जगह कौन सी है”? 

“मानव हृदय”। “आज का अज्ञान मानव आपको धरती के हर कोने में ढूँढेगा, हर तरह से आपको रिझाने का प्रयास करेगा, पूजा-अर्चना करेगा, भजन कीर्तन करेगा, व्रत-उपवास करेगा, परन्तु अपने हृदय में कभी झांकने का प्रयास नहीं करेगा। आप के इस कलियुग की यही सबसे बड़ी विडम्बना है”। 

“पर भगवान , इस खेल में आपको मानव की कुछ सहायता करनी पड़ेगी, वरना आप युगों तक ऐसे ही छिप कर बैठे रह जायेंगे”। मानव आपको अपने अन्तर में ढूँढने का प्रयास तभी करेगा जब उसे सही दिशा में इंगित करने वाला एक योग्य मार्गदर्शक मिले, और वो मार्गदर्शक भी आप ही को भेजना होगा”। 

तब से शुरू हुआ ये खेल अभी भी जारी है। ईश्वर समय समय पर योग्य मार्गदर्शक भी भेजता है, पर हम तो हम हैं- विकसित मानव, कहाँ फ़ुर्सत है हमें ईश्वर को खोजने की, अपने अन्तर में झाँकने की? अभी तो बाहरी चकाचौंध से आँखे हटने का नाम ही नहीं लेतीं। हाँ, हममें से कुछ ग़िने-चुने इस खेल का हिस्सा ज़रूर हैं, पर अधिकांश? या तो ईश्वर को बाहर खोजते हुए या फिर ईश्वर से दूर, बहुत दूर। 

और मानव हृदय में छिपे भगवान शायद ये सोच रहे है, “पता नहीं, वैकुंठ कब लौटना होगा”?



On the proposed amendments to the NDDB act; A view point

<strong>रश्मिकांत नागर  </strong>
रश्मिकांत नागर

अपने छात्र जीवन की “एक” कारस्तानी का बयान कर रहे हैं।
यह कहानी नहीं, सत्य घटना है। 


The Government’s recent move to amend the NDDB act 37 of 1987 has drawn a lot of attention. In this article, I have attempted to analyse how the proposed amendments can be more effective by restructuring NDDB in the larger interest of the entire agricultural sector, including the dairy sector.

In the last few days, there have been numerous posts regarding the proposed amendments to the NDDB act 37 of 1987 on social media. The reactions have been mostly angry or emotional. Some see in it a covert attempt by the private sector to gain entry into the management of NDDB and thus a veiled attempt to tone down the body corporate’s principal mandate to promote dairying on cooperative lines based on the famous ‘Anand pattern’, wherein the entire value chain is owned by millions of small milk producers across the country and is successfully managed by professionals as the employees of the cooperatives.

I Before I go further, I want to remind the readers that, over the last fifty years, the dairy cooperatives spearheaded by ‘Amul’ have emerged as a force to recon with.

They have not only emerged as the ‘price-quality’ leaders, but have played a key role in disciplining the entire sub sector. Dairy cooperative are a trend setter in empowering the small farmers and an example to follow to empower farmers in other sub sectors of Indian agriculture. Dairy cooperatives have given the farmers- especially the resource poor small farmers, a sense of dignity that must not only be upheld on all counts but must also be extended to producers of other agricultural commodities.

Having said that, I would like to share my thoughts on why the amendments inthe act have been thought of? Are these amendments really necessary? Will they rob NDDB of its operational freedom? Will they position private sector against the cooperative sector? Is the government seeing in the proposed amendments an opportunity to strengthen NDDB and reposition it as an institution that can extend the application of the principles of ‘Anand pattern’ of value chains to other sub sectors of agriculture?

At this juncture it is necessary to recall some facts about NDDB’s operations during the “Kurien era”- the period during which the three phases of “Operation Flood” that made India the largest milk producer in the world, implemented.

1. Funding: The project was implemented without any direct budgetary provision from the consolidated funds of India. Whereas the first phase was implemented entirely out of monetisation of dairy commodities gifted by the European Union, second phase was implemented by a combination of gift commodities and funding by International Development Association (IDA), the soft landing affiliate of the World Bank. Funding for the third phase was with considerably reduced commodity aid and mainly from the World Bank’s main affiliate- IBRD which carried a burden of interest applicable on such loans to country governments.

This funding, especially during the first two phases gave NDDB immense flexibility to fund the action items related to the Institution building as grant to the cooperatives, and it could fund infrastructure building at interest rates substantially lower than normal landing rates of the commercial banks. NDDB could also offer its funding linked techno- professional support services to the cooperatives at nominal turn key fee rates thus considerably lowering the later’s loan repayment liabilities. By placing surplus funds in high interest paying deposits with banks and other institutions, NDDB generated adequate income to meet most of its staff costs and other overheads.

2. Subsidiaries: During this period, NDDB did create subsidiary companies like the Indian Immunologicals (IIL) and the Indian Dairy Machinery Company (IDMC) besides encouraging private investment in manufacture of equipment and machinery to meet the demand placed by a large and time bound project. The idea behind creating these subsidiaries was to make inputs available to the cooperatives at the most competitive price and thus save them from exploitative pricing by handful of established companies in the business. It must be noted here that none of the subsidiaries created by the NDDB were dealing with milk business to be in competition with the cooperatives. Even the Mother Dairies of Delhi and Kolkata managed by NDDB were sourcing their entire requirement of milk from the dairy cooperatives of other states.

3. Pilot Projects: NDDB also experimented by starting pilot projects in other sub sectors of agriculture namely, fruit and vegetables, inland fisheries, Tree growers cooperatives etc. out of its own resources. The idea was to test if the principles of the cooperative model that it is implementing for fairy sector can be applied to other sectors of agriculture and forestry.

4. Oilseeds and Edible Oil Project: On a larger scale, NDDB implemented the edible oils project by replication of the Anand pattern of cooperatives. This project too was funded entirely out of commodity aid and generated enough funds to provide liberal grants to the Oilseeds cooperatives for institutional build up.

NDDB thus was never in direct competition with the cooperatives. All its actions were fully geared to support creation of strong, commercially viable and fully farmers’ owned businesses.

But it all changed at the turn of the century. In 1998, the government of India allowed private sector entry in the dairy sector on the pretext that there are large areas not serviced by the cooperatives even in the milksheds demarcated for the cooperatives and the entry of private sector will boost milk production in these areas. Now the cooperatives had to face a private operator who could easily poach in the milkshed painstakingly developed by it over three decades.

What changed for the NDDB: 

In early years of the century, following changes took place in the national economic scene. These developments may have led NDDB to rethink on its strategy to shore up its resources.

1. Following conclusion of Operation Flood III, it did not have a plan to move forward for the fourth phase. In any case, commodity aid and loans from soft landing affiliate of the World Bank were completely ruled out. Commodity aid for the edible oil project too dried out.

2. To continue with the fourth phase, NDDB needed to generate its own resources. It did not have enough funds to continue with loan-grant pattern of project funding.

3. As the interest rates of the commercial banks and companies fell, its income from fixed deposits declined.

4. By Virtually shelving the vegetable oil project and limiting ‘Dhara’- a brand that had emerged as the price- quality leader in packaged oil segment, NDDB not only limited itself to dairy sub sector but also irretrievably lost the highly potential net revenue generating opportunity.

5. Landing rates of commercial banks became more competitive than that of NDDB and required much less paper work. Thus even the cooperativesbegan to look towards banks for funding expansion plans.

6. NDDB’s subsidiaries did not generate profits as expected to meet NDDB’s growing overheads due to implementation of the recommendations of the pay commission.

7. NDDB lost a large pool of qualified and experienced techno-professionals with many opting for VRS and joining the competing private sector.

8. NDDB lost income tax exemption granted to it vide clause 44 of the NDDB act 37 of 1987, when the provision was omitted w.e.f 1st April 2003 notified vide the Finance act 20 of 2002.

To sum it up, the external environment completely changed for NDDB to continue with the well established pattern of funding and supporting the projectsin the dairy sector on grant-loan pattern.

It is my personal judgement that, faced with this challenge, NDDB was left with no option but to think of other ways to shore up its resources. It therefore opted to create two new subsidies: 1. The Mother Dairy Fruit and Vegetables Limited in direct competition with the very cooperatives it was primarily mandated to promote and establish pan India presence of the brand ‘Mother Dairy’, 2.NDDB Dairy Services to provide a complete array of support services to the dairy sector- primarily to ‘cooperative companies’ that it had begun to promote after conclusion of Operation Flood. It banked heavily upon its already depleted and relatively inexperienced pool of techno- professionals to compete in the market to earn a surplus after meeting the overheads.

It was a gamble that failed. As the media reports (Money control and Cobraposts) suggest, nearly 400 crores have been lost since creation of these two companies.

It is in light of these facts that we need to understand the move to amend the NDDB Act.

1. Until recently- till National Dairy Project NDP-I (A six year program staring 2012-13 as a centrally sponsored scheme) was approved with World Bank-IDA/GOI funding, the government, despite its representation on the board never questioned the management of NDDB, presumably because the act provided NDDB absolute operational freedom that included creating subsidiaries, deployment of funds, recruitment and deciding the terms of employment. Now that it is public knowledge that NDDB’s losses are massive, is there a realisation that NDDB funds are after all public funds and must be in safe hands? And, that the representatives of the government on the board of directors have failed in their duty by not bringing the losses to the notice of the government?

2. Did the losses reach this magnitude because, the operational freedom got interpreted as ‘freedom to be non-transparent’? Did the freedom from CAG audit mean freedom from being non accountable?

3. Having given the private enterprises entry in the dairy sector, should the NDDB continue to serve only the cooperatives and the producer companies? It is after all “National Dairy Development Board” and NOT “National Cooperative Dairy Development Board”.

A quick look at the proposed amendments may throw some light on the intend of the government.

Following sections of the principal act (37 of 1987) are proposed to be amended: 8,9,16,43 and 48.

Let us start in the reverse order. In section 48, the clause is amended to include ‘the manner of recruitment’. Given the fact that NDDB’s techno- professional competency must always be at a higher level so that the ‘NDDB Dairy Services’ can be a net revenue earning subsidiary, this amendment is fully justified. It will effectively shut personal preferences based recruitment, placement and promotions- an area where transparency was sadly lacking.

At this juncture I would like a serious consideration of the suggestion made by BM Vyas regarding creation of an all ‘India Dairy Service’ (on the lines of IAS, IPS, IRS ETC) so that the subsidiary- National Dairy Services is primarily manned by experienced professionals drawn from the ‘Indian Dairy Service’cadre.

Amendments to section 43 provide that the provisions of the ‘Right toinformation act 2005’ and the ‘Central vigilance commission act of 2003’. Thus amendment must, in fact be welcomed in the larger public interest of transparency.

Amendment to section 16 that seeks to make the working of subsidiaries created by NDDB and hold the management of these companies accountable must also be welcomed. I feel that this amendment shall send a warning signal if and when the subsidiaries make losses or indulge in questionable transactions. Having a common board for NDDB and it’s subsidiaries will ensure smooth coordination as was the case when NDDB and the Indian Dairy Corporation (IDC) coordinated prior to their merger as new body corporate in 1987. The CEOs of the subsidiaries must be held accountable for prudence in managing the finances of the company they head.

Coming to section 9, that seeks to limit the term of the directors of NDB and its subsidiaries, age beyond which they can not serve on the board etc. is also a well thought of amendment. The existing provision gives a sitting director / CEO virtually unlimited tenure and derive financial benefit beyond legitimate retirement age so long as he/she can ‘manage’ the political dispensation in the government.

Now, section 8, the proposed amendment to which has generated most heat and angry reactions. Prima facie, this amendment seeks to provide covert entry to private sector by providing for an additional director who would be a professional from the private sector.

I am of the view that this particular amendment should result in having a management team at the helm that can take the organisation forward, have a vision and the ability to deliver on the vision to serve the larger interest of farmers. The proposed amendment falls short on this expectation.

My reading is that this amendment is not well conceived. If the government’s real intend is to re-establish the credibility of NDDB as a dynamic professional body that it was during the ‘Kurien era’, then this amendment is grossly inadequate. I am of the view that the board should consist entirely of professionals. I therefore suggest that the two proposed directors representing government should be one each from the Ministry of AH&D and the other from the Ministry of Finance, preferably from the cadre of all India Accounts and Audit service. Other two directors representing the cooperatives must also be professional CEOs of dairy cooperatives and not the chairman of cooperatives who invariably are active politicians.

The government must also keep in mind that whereas the private sector can raise funds in more than one ways, for the cooperatives the options are limited, especially for those that are not strong enough to get funding from commercial banks. Diverting NDDB funds to finance private sector in the guise of ‘startups’ will be counter productive. If the government insists on having a professional from the private sector and divert NDDB’s resources to private sector, it must provide adequate justification for it. The person representing the private sector then must be someone who has a proven record in agricultural-business management. As of now, providing a professional representing private sector doesn’t seem to make any sense.

The focus of the government must,therefore, be on re-structuring NDDB as a truly service oriented professional body. A dynamic and transparent NDDB can then be entrusted with the task of applying the principles of ‘Anand pattern’ to other sub sectors of Indian agriculture to create value chains that are fully owned and operated by the farmers organisations. It is time to rebuild NDDB around a leadership that believes in expansion- the way Dr. Kurien did rather than confine itself to one sub sector-dairying, just because it is named “National Dairy Development Board”.

Vrikshamandir is your tonic !

I have not been active on Vrikshamandir for some time. I have not been keeping well. It all started in mid November. One thing led to another. I sent a letter to some friends about my current health condition and also shared a link to a story which I read yesterday and liked most. I am sharing some responses I received on the same.


Greetings !

………

I am sharing a weblink  link to a story. I follow this website.  Reminds me of the kind of literature I would get to read in my childhood. Straight simple and written from the heart. Life was simple then there were few choices and satisfaction from what one got in return from one’s effort was “satisfying “ in itself. Failing and not achieving a desired result was not a stigma. Joint families took care of both the successful and failed ones. Focus was “family” not the individual. Family was the social unit that propelled individuals to greater heights and took care of those who didn’t do well. 

I am reminded of a story my mother told me. 

My great grand father was the single child of his parents. He was uneducated. Hardworking, a farmer and a man of character though he did give at times licence to his tongue and  come out with standard bhojpuri abuses for those workers who would come late or were found wanting. But he took great care of all those who worked on our fields.  He put his foot down and supported my father to study beyond tenth standard. My grand father was opposed to further studies beyond matric by father. 

Any way the incident was that a worker stole raw  “Dal” from our house and when the matter came to light my great grand father said “ Give some lemons 🍋 from our tree as when he cooks the Dal he might enjoy it better with some lemon juice”. For then there was this family that extended beyond immediate family. Yes there was rampant untouchability and exploitation too. Am I then talking of exceptions ?  

Excerpts 

पिताजी जब कभी बाहर जाते, तब माँ बहुत उदास हो जाती थी। इस वजह से ही या न जाने और किसी वजह से, पिताजी जब तक अनिवार्य कारण न हो, तब तक दूर की यात्रा क्वचित्‌ ही करते थे। एक दिन सूरत के गुरूद्वारे से तार आया। पिताजी को तुरंत सूरत आने की गुरू महाराज ने तार से सूचना दी थी। उन दिनों किसी के यहाँ तार आना बड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग माना जाता था। अकसर कोई बुरी खबर हो, तो ही किसी के यहाँ तार आता था। पूरे मुहल्ले में बात फैल गयी कि हमारे यहाँ तार आया है। धीरे-धीरे लोग पूछताछ को आने लगे। तार में कोई बुरा समाचार तो था नहीं। अतः चिंता का स्थान कुतूहल और उत्साह ने ले लिया।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ का जमाना। साधारण लोगों के लिए सूरत-अहमदाबाद जाने का प्रसंग भी दो-चार साल में एकाध बार ही आता था। और, बम्बई – कलकत्ता जाना तो सुदूर विदेशयात्रा के समान कठिन और विरल माना जाता था।

पिताजी के सफर की तैयारी होने लगी। माँ की सहायता के लिए बड़ी मौसी और मामी आ पहुंची। पार्वती बुआ एक पीतल के चमकदार डब्बे में चार मगस के लड्डू ले आयी। पिताजी के पाथेय का प्रश्न इससे आधा हल हो गया। बिस्तर के लिए मामा अपनी नयी दरी लेते आये थे। लल्लू काका धोबी चार दिन बाद मिलने वाले पिताजी के कपड़े उसी रोज इस्त्री करके दे गये। शाम को भजन हुआ। रात को भोजन के बाद पुरूषोत्तम काका ने लालटेन की रोशनी में पिताजी की हजामत बना दी। पिताजी मध्यरात्रि की लोकल से जाने वाले थे। इतनी रात गये सवारी मिलना मुश्किल होता था। अतः दस बजे ही घर से निकल जाने की बात तय हुई। साढ़े नौ बजे तांगा लाने के लिए मामा लहरीपुरा गये। हमारे परिचित मुस्लिम स्वजन मलंग काका का तांगा चौराहे पर ही खड़ा था। मामा के कहते ही वे आ गये। उन्होंने रात को ग्यारह बजे तक गपशप कर के पिताजी के बिछोह का विशाद कुछ हद तक हलका कर दिया। लेकिन तांगा जाते ही कठिनाई से रोके हुए माँ के आँसू बरस पड़े। मौसी, मामी और बुआ माँ को ढाढ़स बाँधती रही और आधी रात बीते घर गयी। हम भी लेट गये।……..

आगे पढने के लिये यह लिंक दबायें 

https://saarthaksamvaad.in/अंधेरी-रात-के-तारे-माँ/

The promoter of SaarthakSamvad is an ex IRMAN. 



Now some responses;

“Good to know that you are doing better than before and the recovery plan is sort of working. May you recover quicker than what everyone expects and give them a surprise. I pray for a miracle. 🙂 I read your account. I guess you are a lucky person to have such great souls around you. That was the time when such generous उदार दिल लोग हुआ करते थे l डांटना और गाली देना भी प्यार करने का एक तरीका था यही समज आती है । I am sure so much of genuineness, values and goodwill for all which is visible in you comes directly from there.

We can be ग्रेटफुल about these gifts showered upon us. I read the story from the link. The first thought after reading it is that women have such unmatched wisdom, clarity and foresight. If only men had been led by her innate capacity bring out the best in any situation, unearth the subtle emotions, and deep understanding of the social Tana bana, world would have been different today. It’s a beautiful story. Kishansinh Chavda is well known and celebrated author. Thanks for sharing it.”


“This made my day already. Thank you for sharing it. Loving regards”


“The way you wrote the following msg speaks of your excellent n healthy mind. Mind resides in the body. 1/5th of what we eat ( including medicine ) becomes your mind. The toxicity of your body is under control. This is what I deduced. Great going Sir.But recite Achyuta Anantha n Govinda 108 times.”


“Glad to know that you are getting better and better. Good sign. You will soon get over weakness too. Keep up the positive attitude and all will be well. Sarthaksamvad took me to my childhood. The life was so simple, relationships so pure that in today’s time it appears more like a utopian concept. Our generation will certainly appreciate such stories, but for the modern generation- it may well be ‘Tales from a backward Indian Society of the bygone era’. Anything which is out of present context will be laughable for the present and coming tech era generations.

Take care and if you feel energetic enough, work on Vrikshamandir- that is your tonic. “


One winter morning in Anand

The year 1991. I was still nine years away from leaving the National Dairy Development Board.

I had always thought that God willing I will retire and live in Anand till I breathe my last and be taken to Kailash Bhoomi for cremation. I had my former colleagues and friends in the great City, the Milk Capital of India, Anand.

I am still in touch with some of them. Though Corona and old age has taken a heavy toll and many dear ones left us.

Anand is the city where I got my first regular job. A place that not only gave me a job but a sense of purpose and a way of life to live attempting to do good for others.

I had moved out of the campus where I had lived from 1970 in the Chummery, now Guest House, Trainees Hostel as the first warden, D -12, C-10 and B-4.

I had moved out to my own house behind NDDB Campus near the Institute of Rural Management Main Gate. These twin houses with a common wall were built by my dear friend Behla and me. There were no buildings in that area of Mangalpura when we moved. That’s a separate story.

Those days I had dual responsibilities heading the Human Resources function in the Dairy Board and also looking after the Chairman’s Office.

It was Sunday and the office was closed. I received a call early morning around 6 AM from Dr Verghese Kurien our founder Chairman. It was rather unusual. He would normally come to office on Saturdays for an hour or two or when he had an appointment. But on a Sunday it was rare.

He said

“Kurien here”

“Good Morning Sir”

“I am going to meet Devilalji our former deputy prime minister”

“Where Sir”

Dr Kurien mentioned the name of the village where Devilal Ji was staying the previous night. Some of you would recall that Devilal ji undertook a Chetna Yatra to awaken masses particularly rural people after his stint with the Government was over. This yatra was for over a year.

I would receive such calls from Saheb wherein he would not ask me to do anything but just inform me. I was supposed to understand and respond.

I said “Sir do you want me to come with you ?”

He said said “ Okay, but bring latest copies of NDDB and GCMMF Annual reports. I will send the car to pick you up from home. I said “No sir ask the driver to pick me up from office as I will go there to pick up the reports”

As planned the car arrived and I went to Dr Kuriens home and we both were driven to that village. I don’t remember the name of the village but it was off Borsad road.

When we arraigned at the farmers home where Chaudhry Devilal was staying I noticed the Chetna Rath; a bus. I went inside and announced that Dr Kurien is here to call on Devilal ji.

We were welcomed and taken inside the Rath. It was an air conditioned bus with the washroom towards the end. A large bed and couple of chairs plus the usual paraphernalia for storage of luggage e etc.

After a wait of about five minutes or so Chaudhry Saheb arrived. We got up and greeted him. By that time we had already been offered a glass of Lassi each. The Utterly Butterly Milkman wasn’t fond of milk or milk products and only used milk to whiten coffee. I had finished my glass of lassi.

Devilal ji requested the hosts to arrange for some coffee for Dr Kurien.

Now only we three were in the Rath. They both started talking. It was clear that my job was to be an interpreter.

Dr Kurien thanked Chaudhry Saheb for the help and support that NDDB, GCMMF and he received from Chaudhry Saheb while Devilal Ji held the Agriculture Ministry portfolio and Deputy Prime Ministership. Dr Kurien also explained how strong both the NDDB and GCCMMF have become over years serving the cause of farmers. Dr Kurien handed over to Chaudhry Saheb the NDDB and GCMMF Annual reports that I was carrying.

Now it was the turn of Devilal Ji to share the purpose of his undertaking Rath Yatra to awaken farmers. He shared reminiscences of his visit to China where he had been to villages and found the villages to be fully developed having all modern facilities. Devi Lal ji was carrying long sheets of papers in bundles which he showed us. These were lists of Class One Officers, Secretaries, Joint Secretaries, Ambassadors etc. Devilal ji pointed out that there are hardly any one among them who come from a rural background.

I was translating where necessary and found that they both were liking each other and conversing freely appreciating each other’s view point.

Dr Kurien said, “Sir, NDDB now has an asset base of Rs 3000 crores.” Devilal said “Balram Jakhar Teri Madad Karta hai? ( बलराम झाखड तेरी मदद करता है? Dr Kurien said “Yes Sir” and again started talking about the financial strengths of the organisations he headed. Devilal Ji was listening aptly but all of a sudden his voice boomed “ Yeh Paisa Teri Maut ka Karan Banega.” “यह पैसा तेरी मौत का कारण बनेगा).

I was stunned at the raw, straightforward statement coming from a farmer politician. I had the onerous talk of translating this. Dr Kurien was looking at me. Not that Dr Kurien did not understand Hindi at all. But this statement of Devilal Ji came so suddenly that like me he too was taken aback. I composed myself and translated it as “ Sir, Sir is saying that the asset base of NDDB will create problems for you.”

They continued to talk and after a some time DrKurien and I bid farewell to Devilal ji and headed back home.

I was thinking as to how NDDB assets will create problems for Dr Kurien. He did not take any salary from NDDB from 1965 till he left in 1998 and also stopped getting any remuneration except sitting fees and travel reimbursement etc. from GCMMF as he was then an honorary Chairman of both bodies.

That was 1991.

In 2022, some thirty two years later the Government of India now proposes to put a private sector representative on the board of NDDB. By amending the NDDB Act 37 of 1987 passed by the parliament to replicate Anand Pattern Cooperatives across the country. Please click here for the Government’s offer seeking public opinion on the proposed amendments.

Devilal Ji’s words reverberate in my minds ears … Yeh Paisa Teri Maut ka Karan Banega. यह पैसा तेरी मौत का कारण बनेगा ।

Dr Kurien lived all his life in Anand. Tirelessly worked against exploitation of farmers by private traders. Stalwarts like Sarvashi TK Patel, Morarji Bhai Desai, Babubhai Jasbhai Patel, Jaswant Lal Shah, Motibhai Chaudhry, Thiru Paramshivam and many many others were his mentors and supporters. I don’t recall all the names.

All the Prime Ministers right from Jawahar Lal Nehru , Lal Bahadur Shashtri, India Gandhi, Rajiv Gandhi, Devegowda Ji, all supported the work that he was doing. Manmohan Singh hi, Bajpai Ji and Modi Ji have all supported the policy of cooperatives owned and commanded by producers of agricultural commodities.

I was thinking as to how NDDB assets will create problems for Dr Kurien.

True many at times in the past there were periods of opposition from bureaucrats, private operators and even “academics”. But NDDB stood United and if required there was intervention from highest level as it happened in 1983 when all the officers of NDDB resigned and the Govt set up a Committee under Shri LK Jha to suggest ways to strengthen NDDB and IDC. That report paved the way for the passage of the NDDB Act 37 of 1987.

Why, therefore, there is a hurry to bring about a change and put private sector representative on NDDB Board and all its subsidiaries. Why can’t a high powered committee look at the issues? If there has been some internal assessment why don’t they make the report public so that the rationale for doing what they propose to do is clear.

Very difficult to understand. There has been a petition going round in response to the Government’s offer asking for public comments. It has been started by BM Vyas and his former associate at GCMMF, Manu Kaushik. I have signed on it. The document can be accessed by clicking on this link.

Dr Kurien is no longer among us but his work, his teachings, his philosophy that was, is and will remain with us as long as farmers do not find their rightful place in nations economy. We all celebrated his birth centenary on 26 November. Glowing tributes were paid by his institutions and by the State and Central Government Ministers in public functions organised in Delhi Anand and several other cities in November 2021. Tinkering with an act in this casual manner is not a good sign.

Or as Devilal Ji said Yeh Paisa Teri Maut ka Karan Banega and the idea is to kill his philosophy too!

A better alternative could be, as a friend of mine wrote “ It would appear that NDDB has now become irrelevant, just as the Milk Marketing Board of UK, and must either be restructured to cover all agricultural commodities or simply dissolved.”


अपूर्व सुंदरी

<strong>बनारस के बाबा, ट्विटरगंज से </strong>
बनारस के बाबा, ट्विटरगंज से


वैसे सुनने मे आता है कि यह कहानी सच्ची है !

ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं, “पेशे से रिसर्च मे एक मजदूर हूं।एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और दू गो IIT का तमगा लिये आवारा घूमता रहता हूं।यहा पर कहानियां सुनाता हूं कल्पनाओं मे घोल कर” !



एगो कहानी सुनाते हैं, बात तब की है जब हम ओरिजनल काशी वासी थे। एक इंटरव्यू देने गये थे दिल्ली CSIR में, Senior Research Fellow का ।

ससुरा बोर्डे में मार कर दिए, वो इसलिए कि एगो वैज्ञानिक महोदय जो इंटरव्यू ले रहे थे उन्होंने ये कह दिया की लेड को प्लंबम नहीं कहते हैं ।

अब हम अंइंठा गये वहीं पर की कहते ही हैं। ससुरा हमारा इंटरव्यू तुरंते खत्म हो गया और हम वापस चले आए। डिपार्टमेंट से तीन लोग गये थे , हमारा रूममेट, हमारा रिसर्चमेट और हम। जब रिजल्ट आया तो उन दोनों का सलेक्शन हो गया पर हमारा नहीं हुआ था ।

बस हम तीर की तरह निकले कमरे से और जाकर चेतसिंह घाट पर बैठ गये।

मुंह फुलाए नाक से हवा छोड़ते जब चार पांच पुरवा चाय पी चुके बैठे गरियाते हुए तो एक अपूर्व , हजारों में एक सुंदरी लाखों में एक पोज देते आ गयी, एकदम सजी धजी, साथ में प्रोफेशनल फोटोग्राफर लिए ।

उन लोगों वहीं फोटो शूट करना था चेतसिंह घाट पर और हम बैठे थे महल के दरवाजे पर ।
अब वो अपूर्व सुंदरी आईं और अंग्रेजी में बोलीं की हटो यहां से ।

हम तो उस समय बाबा से लड़ने को तैयार थे उनका क्या सुनते , हम बोलें में “ना हटब , अब बोलअ”

बिचारी सुंदरी हैरान परेशान चिल्ला के हमारी शिकायत कर दी फोटोग्राफर से जो नाव पर सवार सवा हाथ का कैमरा लिए इंतजार कर रहे थे । एगो चिल्लाते हुए आया तो चायवा वाला पूछा हमसे , “का कहत हवन स भाय” तो हम बोले की “कहत हौ की हमके पनिया में फेंक दिहें ”

तो चायवा वाला बोला “त सारे के एहर का आवे के जरूरत हौ,कूद जाईत सार नइया से गंगा जी में “

अब भाई साहब जो बवाल मचा उधर, उन्होंने पुलिस को फोन कर दिया और हमने हास्टल में । जो लिहो लिहो हुआ था उस दिन कि सब लाठी खा लिए, फोटोग्राफर का कैमरा भी टूट गया और अपूर्व सुंदरी भी चार लाठी खाकर नाव में बैठ गयी ।‌‌

अगले दिन सब बीएचयू भी आए थे फोटो शूट करने, हास्टल वालों ने पहचान लिया जो सब भउजी, भउजी कह के हूट किए की सिक्योरिटी सुपरवाइजर तिवारी जी को आना पड़ा ।

बाद में हमको बुलाया गया तब तक ना सलेक्शन होनें का गुस्सा उतर गया था, लड़कों को चाय समोसा खिलाना पड़ा तब जाकर उधर शांति हुई ।‌

और सब जाते जाते भी अपूर्व सुंदरी को भउजी का तमगा देकर चले गए !


क ख ग घ

क से कबूतर, क से कमल, क से किताब

बात उस जमाने की है जब मुझे केवल बोलना आता था । पढ़ना लिखना नहीं। ज़ाहिर है उम्र तब बहुत कम थी । अब यह सब बताने की क्या ज़रूरत ? जीवन के संध्याकाल में जब अक्सर यादें भी याद आ कर भूलने लगती हों तब यादों को याद कर उन्हें बताने की प्रक्रिया मे वह और उभर कर आती है।मैं उन्हें लिपिबद्ध भी कर पाता हूँ ।औरों के लिये नहीं तो अपने लिये ही सही ! जो है सो है!

शायद पाँच या छ साल का था। स्कूल नहीं था गाँव में। तहसील से कुछ सरकारी अधिकारी आये, स्कूल खोलना था। बाबू देव नारायण सिंह ( बुढवा बाबा, मेरे प्रपितामह) ने उन्हें सलाह दी कि स्कूल सड़क से लगी हमारे खलिहान के पास की ज़मीन जहां अखाड़ा हुआ करता था और अब भी है, उसके दक्षिण पश्चिम कोने पर स्थित मिठाउआ आम के नीचे से शुरू हो । बस शुरू हो गया इस्कूल और शुरू हो गई मेरी पढ़ाई ।

शिक्षा पहली से पाँचवीं तक वहीं बेसिक प्राइमरी पाठशाला चतुर बंदुआरी में हुई। केवल एक साल जब मैं तीसरी में था बाबूजी अपने पास ले गये देवरिया । बाबूजी तब देवरिया में ज़िला कृषि अधिकारी के पद पर तैनात थे। तब वहाँ मारवाडी स्कूल गरुडपार मे मेरी पढ़ाई हुई । देवरिया में ही मुझे सिर पर से बंदर ने काटा था । से भूकंप का अनुभव भी वहीं पहली बार हुआ

क ख ग घ … वर्णमाला मैंने अपने गाँव में मिठउआ आम के पेड़ के नीचे ज़मीन पर बैठ कर सीखी। लकड़ी की काली पट्टी पर जिसे दिये की कालिख लगा माई, अम्मा, मझिलकी मम्मू की शीशे की चूड़ी से रगड़ कर चमकाया जाता था। नरकंडे की क़लम से खडिया को पानी में घोल कर बनी स्याही से लिखा जाता था। नरकंडा और खडिया गाँव में उपलब्ध थे।एक घर बढ़ई भी गाँव में थे ।अब भी हैं।

जब मेरी पहली मुलाक़ात से हुई तब जाकर पता चला कि क से कबूतर और क से कमल और भी बहुत से शब्द है । वैसे जब मैने लिखना पढ़ना सीखा तब तक मैंने कबूतर या कमल नहीं देखा । किताब थी या नहीं ठीक से शायद नहीं। थी तो कैसी थी वह भी याद नहीं । शायद उसी किताब में कबूतर और कमल का फ़ोटो देखा हो। से पंडुख या पंडुखी तो बहुत थी गाँव पर । पर कबूतर से ठीक से पहचान शहर आ कर ही हुई। बरसात के बाद उनवल से बांसगांव वाली कच्ची सड़क के दोनों ओर के कुछ गढ्ढों में पानी भरा रहता था। कमलिनी के फूल पहली बार मैंने शायद उसी में देखे होंगे।

मौलवी सुभान अल्लाह और बाबू सुरसती सिंह पढ़ाते थे । बाद में हंसराज मास्टर साहब आने लगे । मौलवी साहब की चेक की क़मीज़ सफ़ेद धोती, काली पनही, पहनते थे । छाता हमेशा साथ रहता था। जब किसी को दंड देना होता वह छतरी बड़े काम में आती थी। कुंडी गले में लगा कर खींच कर उलटी तरफ़ से दो चार बार पिछाडा पीट दिया जाता था । पर मुझे कभी मार नहीं पड़ी। आख़िर हमारे पेड़ के नीचे स्कूल शुरू हुआ था ।

बहुत कुछ याद नहीं है पर मिठउआ पेड़ के आम की सुगंध और मिठास भरा ललाई लिये गूदा अभी भी नहीं भूला है ।

कुछ किताबें थी घर पर। रामचरित मानस, कल्याण के बहुत से अंक, श्रीमद् भगवद्गीता, गोरखपुर की क्षत्रिय जातियों का इतिहास आदि आदि। गीता पर पढ़ना विष्णु राव पराड़कर द्वारा शुरू किये गये दैनिक “आज” से ही शुरू हुआ होगा। दिल्ली के टेंट वाले स्कूल में जब मै छठवीं में पढ़ रहा था, मेरे बाबूजी ने नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक “ ज्ञान सरोवर” जिसका मूल्य एक रुपया था जन्मदिन पर भेंट की थी। दिल्ली की बात है । और यह तब की बात है जब हमारे यहाँ जन्मदिन शहरों में ही मनाया जाता था, मेरे गाँव जैसे गाँवों में तो क़तई नहीं। म

से काका भी होता है ।पर काका नाम ज्ञान सिंह था । काका के बारे में ज्ञ शीर्षक के अंतर्गत लिखा जायेगा।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ख से ख़रबूज़ा, ख से ख़रगोश , ख से ख़लील

ख़रबूज़ा तो नहीं पर “फूट” जिसकी रिश्तेदारी ककड़ी परिवार में रही होगी देखा था । पांडे लोगों के घर के पीछे ऊत्तर की ओर वाले खेत में मकई बोई जाती थी । मचान भी होती थी चिरई उड़ाने के लिये । बड़ा अच्छा लगता था मचान पर बैठ चारों ओर देखने पर । ऐसा लगता था जैसे मै सारी दुनिया देख रहा हूँ।

ख़रबूज़ा बहुत बाद में जब भइया (मेरे पितामह ) भटौली बाज़ार से आया तो देखा और फूट की याद आ गई।

फूट नाम शायद इसलिये पड़ा होगा कि बड़ा हो कर फूट जाता था।

ख से खस्सी भी होता है। खस्सी का मांस जिसे कलिया या गोश्त या बाद में मीट भी कहने लगे भटौली बाज़ार से लाया जाता था।

भटौली बाज़ार से ख़रीद कर लाया कलिया या खस्सी का गोश्त ही शायद मुझे पहले पहले खिलाया गया होगा । वैसे गाँव में ख से ख़लील मियाँ के यहाँ भी कभी कभी बाबू लोग खस्सी कटवाते थे । मनौती माने गये बकरे की बलि की प्रथा आज भी है । यह घर के बाहर दुआरे पर एक किनारे में किया जाता था।

ख से ख़रगोश जब १९६८ मे आणंद में नौकरी शुरू की । १९७० मे जब एनडीडीबी कैंपस बना हमने से कुछ लोग रहेवासी बने तब एक आइएएस अफसर डेपुटेशन पर आये ।सहकर्तव्यपालक बने, मित्रता हुई जो अब भी बरकरार है। हम दोनों की तब शादी नहीं हुई थी। वह तब तीन बेडरूम वाले बंगले में रहते थे । मै बाइस कमरों वाले हास्टल का नया नया वार्डन बनाया गया एक सोने का कमरा, बैठकी और स्नानागार एवं शौचस्थान मेरे हिस्से आये। मेरे मित्र के पास दुनाली बंदूक़ थी । काली रंग की फ़ियेट कार और आलिवर नाम का छोटा सा कुत्ता भी था।

एनडीडीबी कैंपस से के पास ही आणंद वेटेरिनेरी कालेज कैंपस है । तब वेटरिनरी कालेज कैंपस का बहुत सा हिस्सा ख़ाली झाडीझंखाड से जिनमे बहुत से ख़रगोश रहते थे । शाम ढले सियारों की हुआं हुआं शुरू हो जाती थी । एक दिन हमारे मित्र को शिकार करने का मन किया । रात को गाड़ी ले कर वेटरिनरी कैंपस में बंदूक़ और अपने छुटकू से कुक्कुर आलिवर सहित निकल पड़े वेटरिनरी कालेज कैंपस में। हेड लाइट आन थी । कई ख़रगोश गाड़ी की आवाज़ सुन झाड़ियों से बाहर निकल आये । बंदूक़ चली। कुछ धराशायी हुए। उठा कर एनडीडीबी हास्टल लाये गये और वहाँ साफ़ सफ़ाई काट कटाई बाद मसाला वसाला डाल ख़रगोश के गोश्त का कलिया बना । ज़्यादा तो याद नहीं पर खाने वालों को कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया ।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ग से गाँव, ग से गाय, ग से गाभिन

मेरे गाँव का नाम चतुर बंदुआरी है। पर गाँव में रहने वालों में जैसा हर जगह होता है कुछ लोग अवश्य चतुर रहे होंगे और चतुराई के लिये प्रसिद्ध भी।फिर चतुर बंदुआरी नाम कैसे पड़ा ? बताया गया इसका कारण है कि तहसील मे एक और गाँव का नाम बंदुआरी है ।मेरे वाली बंदुआरी के किसी चतुर का उठना बैठना हाकिम हुक्काम से रहा होगा और उसी ने “चतुर” बंदुआरी के आगे डलवा दिया होगा। और हमारा गाँव चतुर बंदुआरी कहा जाने लगा। दूसरी बंदुआरी बंदुआरी खुर्द के नाम से जानी जाती है।

बंदुआरी यानि वन की दुआरी । यानि वन का द्वार । वन बहुत पहले रहा होगा। हमारे बचपन में तो नहीं । वन तो नहीं पर बाग ज़रूर थे जिन्हें हम बारी कहते थे।

छोटकी बारी, बडकी बारी हमारी थी । मैना की बारी और सकुंता की बारी हमारे पट्टीदारी के परमहंस बाबा की थी ।पुन्नर बाबा के परिवार की बारी रेहारे के आगे थी खाल में जहां बाढ़ का पानी आता था। अब बारी भी न रही । कुछ पेड़ ज़रूर है । कुछ नये पेड़ और बाग लगाने का प्रयास भी हुआ है । चतुर बंदुआरी वृक्षमंदिर भी उन्नीस सौ नब्बे के दशक में शुरू किया गया ।

मेरे बचपन में घर पर तीन जोड़ी बैल हल चलाने गाड़ी ढोने के लिये थे । गाय की जगह भैंस का दूध ज़्यादा पसंद किया जाता था । दो भैंसों की याद आती है करिअई और भुइरी। करिअई बहुत दूध देने वाली थी। बाद में पता चला मुर्हा नस्ल की थी। गाभिन थी। प्रसव के दौरान बच्चा मर गया था। जिस रात वह प्रसव पीड़ा में थी उस दिन शाम से ही मुन्ना बाबू (मुझसे पाँच साल बडे चाचा) गमगीन थे । रात में जब करिअई भैंस के बच्चे के बारे में दुखद समाचार मिला मुन्ना बाबू भोंकरिया कर बहुत देर रोये। मै भी उनकी देखा देखी रोने लगा। बचपन में मैं मुन्ना बाबू की पूँछ कहा जाता था। हरदम उनके साथ घूमने खेलने के लिये तत्पर ।

बहुत दिनों बाद जब मैं शहर में पढ़ने के लिये भेजा गया तब रविवार को गाँव आने पर गाय बंधी थी। हरियाणवी थी ।बहुत मान से रखा जाता था।

हमारे समय मे गीताप्रेस नामक सांड हुआ करता था। गायों को गाभिन करने का ज़िम्मा उसी पर था।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

घ से घर, घ से घरौंदा

चतुर बंदुआरी का हमारा घर दो खंड का था मतलब दो आँगन वाला था अब भी है। लगभग पौन एकड़ से थोड़ी कम ज़मीन पर बना यह घर पर पूरब की ओर एक पीपल का विशालकाय वृक्ष था । साथ मे लगा एक तेली परिवार का घर था । बाबा लोगों ने उन्हें अपनी ज़मीन माली लोगों के घर के पास दे कर बदले में उनकी ज़मीन ले ली थी । इस तरह पिपरे तर के बाबू लोगों के घर का क्षेत्रफल और बढ़ गया ।घर के बाहर पीपल का एक विशाल पेड़ था। हमारा परिवार पिपरेतर के बाबू लोगों के नाम से जाना जाता था।

अब वह घर बस यादों का घर बन कर रह गया हैं । कुँआ था । अब भी है। पर कुयें का पानी ही पिया जाता। वह नल यानी चाँपा कल जब बड़े आँगन में लगा तब शायद मेरी उम्र बीस एक साल रही होगी यानी पचास साल पहले । अब भी चलता है। पहले पाइप कुढ़ें से पानी खींचता था। अब पता नहीं शायद बाद में। पाइप ज़मीन में गाड़ा गया हो । दरवाज़े पर के कुयें पर गागर भर पानी सिर पर डाल कर नहाने में बड़ा मज़ा आता था। पानी निकालने के लिये बिदेसी अथवा अन्य लोग तैनात रहते थे। साबुन का इस्तेमाल भी वही पर पहली बार किया गया होगा।

सरसों के तेल का दिया या ढेबरी , लालटेन, लैंप रोशनी के यही साधन थे।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

Kurienomania

Rajesh Nair
Rajesh Nair

Rajesh Nair was a member of the faculty at IRMA in Marketing and PQM areas from 1999 for over five years. He left academics in 2004 to move full-time to the corporate world, where, over the years, he has held leadership roles in a few reputed companies. 


Photo of a painting by Dr (Mrs) Rama Aneja

Rajesh Nair started teaching at IRMA in 1999 and I left NDDB in 2000. We never met. Thanks to Facebook we connected. I have great pleasure in posting, with his permission, three reminiscences that he wrote about Dr V Kurien.

26 November 2020

The board room of IRMA’s ETDC was cram-full that morning. Two management development programs were on. Both groups of trainees had assembled for a joint session. When some colleagues and I went in at the invitation of the program directors, there was no place to sit. The housekeeping staff helped tow chairs from next door.

Everyone sat in utter silence.

The clock struck 10:00. Outside, off the auditorium, the Amul-Carillon chimes played a jingle announcing the time. That very moment, as though robotically programmed, the enormous door of the board room opened. Dr. V. Kurien, Chairman of IRMA and GCMMF, walked in. His executive assistant trailed him.

All rose.

The trainees appeared awestruck by their maiden meeting with the Father of the White Revolution, the architect of Operation Flood.

“The apex co-operative, which you claim you’re running, is an underperforming organization. And I’m not surprised. With people like you at the helm, how will it ever perform?”

Kurien took his seat. He adjusted the microphone, and commanded in his hallmark husky, magisterial voice: “Please be seated.” 

He surveyed his audience. He caught a glance of us, the faculty. For a millionth of a second, a hint of smile flashed across his face. 

He then turned to the program directors. Taking cue, one of them gave a crisp description of the programs and the participants. Wasting no time, the professor requested: “Sir, everyone has been eagerly waiting for this session. Could you please share a few inspiring words?” 

Kurien gladly obliged. He had a predictable stock of storyline for such occasions. People in the Institute had listened to it countless times – how he was thrown into the dusty town of Anand by an accident of fate; how Tribhuvandas Patel discovered him; how that became his breakthrough moment; how that changed the lives of the dairy farmers of Gujarat; how Amul was born. How he founded NDDB. How he built IRMA. “Brick by brick.” 

And on. And on. 

Yet, even to those who were sampling the same narrative the umpteenth time, there was a tinge of freshness, a new twist, an unexpected detail, an amusing embellishment. Always. That made Kurien a consummate raconteur. 

He told the trainees: “So ladies and gentlemen, you should appreciate you’re at an institution with a difference. This is a school with a soul. My graduates are not only rigorously trained professionals, they have dedicated themselves to the cause of the deprived and the marginalized. They possess a rare gift. Of empathy and integrity. Of goodness.” 

He paused. And rounded up: “I wish you a productive week. I hope the faculty will exceed your expectations. I’m sure ETDC housekeeping and catering are making your stay comfortable.” 

One of the program directors suggested: “Sir, some of them may have questions. In case you have time, Sir.” 

“A couple of questions.” 

A man, seemingly in his early fifties, seized the opportunity: “Dr. Kurien, is it true that IRMA graduates are committed to the deprived? I know graduates who …” 

Kurien snipped him: “Introduce yourself first.” 

“I am an officer of the Indian Forest Service. I am presently …” 

“STATE. YOUR. NAME.” 

Grabbed by the throat and yoked, the officer obeyed. He meekly uttered his name. 

Kurien demanded: “What do you do?” 

“Sir … uh … I am the Managing Director of … uh … XX State Co-operative Milk Marketing Federation, Sir.” 

“What business do you, a Forest Service man, have in an apex dairy co-operative?” 

The forester turned anemic. He attempted nevertheless: “Sir … I am …” 

A colleague whispered in my ear: “He’s ruined. Hadn’t anybody briefed him?” 

Kurien turned ballistic: “The apex co-operative, which you claim you’re running, is an underperforming organization. And I’m not surprised. With people like you at the helm, how will it ever perform?”

The officer appeared as though he was run over by an asphalt roller. 

Not in a mood to be kind, Kurien nuked him: “Your home state lost substantial green cover in the past decade. There was a time when your state had rich biodiversity. Not any longer. Under the watch of people like you, most of the trees got felled. Animals got poached. You’ve managed to ruin the pristine forests. Now you’re sitting in a farmers’ organization, all set to destroy it. Why should people like you, who lack vision, who have no managerial skills, who know no Marketing, hold a key position in an apex co-operative federation? Such roles should go to graduates of an institute like this. My boys and girls don’t get paid proportionate to their talent, to their good work. But they have dedicated themselves to the needy. Most of them. And you … you must go to the forests.” 

Annihilated, the officer slumped in his chair. 

India was yet to test Agni-III missile back then. Kurien’s weaponry was two generations more advanced than DRDO’s. He had already possessed Agni-V. 

Kurien, who nobly secured the livelihood of millions of farmers, who built institutions of eminence, who masterminded the Taste of India, was lethal. At times. 

In his centenary year that commences today, I join the fraternity to celebrate the phenomenon Kurien was.


9 September 2018

Rarely did one spot Dr. Kurien unescorted. His executive assistant almost always trailed him. Or another aide or a guard. So, when Suresh (Prof. M R Suresh – Suresh Maruthi) and I saw Kurien all by himself on the walkway that stretched from ETDC to the library via the faculty building, we were surprised. We had just stepped out of our offices for Ramsingh’s chai. Seeing the Chairman walk toward us, we paused. It was a quiet October afternoon. There were intermittent eruptions of loud laughter from the basement hall of the library, where the GCMMF executives were holding their biannual Hoshin Kanri. 

As Kurien came close, Suresh and I greeted, in near perfect sync, “Good afternoon, Sir.” 

He liked the coordinated, schoolboyish greeting he got. He warmly responded, “Good afternoon.” 

Unable yet to veil my surprise seeing him unaccompanied on the walkway, I asked, “Sir, is there anything we should help you with?”

The Chairman replied, “No, thank you.” He pointed to the library basement and said, “The Federation boys are running Hoshin Kanri. Let me check if they’re discussing their business plan or gossiping. Time for a dose of surprise.” 

He smiled. That signature, mischievous grin! 

It was now Suresh’s turn to ask, “Sir, may we escort you to the basement?” 

“No, I’m good. Thank you for asking. You carry on for your tea.” 

Ah, he had rightly guessed we were going for tea. 

We stood watching Kurien walk westward toward the library. His gait was measured yet stately. 

He slowly descended the steps and went near the black granite plaque, which bore the name “RAVI J. MATTHAI LIBRARY” in chrome finish. He looked at it for a few seconds. He was probably examining if the plaque was cleaned and polished well. He then pushed open the doors of the basement hall and went in. The laughter and commotion that had occasionally emerged from there now totally ceased.

“Of the many virtues Kurien radiated, Passion, Rigor, Integrity, Drive, and Empathy stood out. Not all these are hardwired, and collectively, in every leader. “

Kurien was a leader of numerous dimensions. He deeply influenced the character and unrelentingly honed the competence of the people who worked for him. His leadership style was an intriguing bricolage of foresight, tenacity, autocracy, and compassion. He was volatile at times, with nasty ways. My former colleague the late Prof. Shiladitya Roy used to quip, “Dr. Kurien is the perfect human version of a stochastic process.” Throwing a surprise at the “boys” in the middle of their business planning workshop was a ploy only he could perfectly play. Kurien was larger than life to the people around him. They worked for him or served him as though he owed them no explanation. They believed in him. To quote the man himself, “For those who believe, no explanation is necessary; for those who do not, no explanation is possible.” 

My tribute to the Milkman of India on his sixth anniversary.


26 November 2017

One of my prized professional milestones was that I got to work in an institution Dr. V. Kurien founded, during a period when he was not just alive, but active and at the helm. 

Kurien, the Milkman of India, the creator of Amul, the genius behind Operation Flood, was also the founder of IRMA. 

When I was at IRMA as a member of the faculty, Kurien was the Chairman. Yes, he was “my Chairman.” Even today, I proudly boast in my circles that “Dr. Kurien was my Chairman.” Of the many virtues Kurien radiated, Passion, Rigor, Integrity, Drive, and Empathy stood out. Not all these are hardwired, and collectively, in every leader. If Kurien was inspiring, larger than life, and peerless, that was because of this PRIDE factor. And that made Kurien the Lion King in his domain. That also made him tough and ruthless. Mostly. He appeared to run his institutions autocratically, like a tyrant. But then he was immensely compassionate too. He had his subtle humor to boot, his lighter vein, that infectious discreet warmth. If you tuned well, matched the frequency, you felt it, enjoyed it. Here is a sample from July 1999.

A new cohort of students had just joined IRMA and completed their induction program. The induction, which also comprised a phase of village stay, was allegedly IRMA’s approximation of concentration camps. The induction ended with the Chairman addressing the newcomer students. He and Mrs. Kurien then hosted them a high tea. 

The venue for High Tea that year was Students’ Activity Center. Kurien and Molly Kurien arrived and took their seats in the comfortable sofas IRMA Estate had meticulously laid for them. The faculty, staff, senior students, and assorted other invitees had gathered for tea. 

The new students were excited to be in the company of the Father of White Revolution, recipient of the World Food Prize and the Magsaysay, the founder of their graduate school. That made them forget (and forgive) the acclimatization program the Institute had just put them through, which some of them felt was no short of “institutionalized torture.” 

Kurien had class – looks, gait, word. When he hosted tea, it had to be a class apart. Tea, coffee, and a fine spread of savories and nibbles arrived from the ETDC kitchen, with men in impeccable white serving. The new students were visibly impressed, and relished the snacks. 

Seeing that Kurien was sitting with no tea or snacks, Ajith Somarajan, a member of the new batch of students, walked up to him. He cleared his throat and attempted, “Sir, may I get you a cup of tea or coffee?” 

“His leadership style was an intriguing bricolage of foresight, tenacity, autocracy, and compassion. He was volatile at times, with nasty ways.”

Pat came the reply, “No, thank you. No tea or coffee for me now. I’ll have my whisky at 7:30 in the evening, which Mrs. Kurien will fix me.” He then flashed his rare smile. 

From the cluster of students, a sudden voice arose, “Sir, when do you take milk?” 

Kurien’s reply was supersonic, “I don’t take milk. I don’t like its taste.” Again, that rare flash of smile. 

Today is the 96th birth anniversary of the legendary Father of White Revolution. 

My homage.


Sad day for India’s Small and Marginal Farmers. Is there an alternative?

RK Nagar
RK Nagar

 

purple petaled flowers in mortar and pestle
Photo by PhotoMIX Company on Pexels.com

Friday, the 19th November 2021, the day when Prime Minister Narendra Modi announced his decision to repeal the three historical Farm Laws shall be remembered by millions of underprivileged Indian farmers as the darkest day in their life. They will feel cheated, abandoned and thrown under the bus by a daring Prime Minister, who had shown the determination to take on the powerful nexus of large farmers, politically controlled APMCs and the powerful Punjab-Haryana based lobby of ‘Adhatiyas” in league with a corruption ridden FCI.

Does it mean that the interest of small farmers will be sacrificed for ever? Will they ever have access to a market mechanism that empowers them to legitimately get a fair share of consumer’s rupee spent on value added agricultural commodities? The present system, unless challenged with a credible alternative will continue to exploit the vulnerable section of the farming community forever.

On the other hand does the impasse that resulted in PM’s announcement to repeal the farm laws present other opportunities to create a credible alternative that is both legal, financially independent and one that has the potential to empower millions of small farmers? Does it present a new opportunity for a public-private partnership between a government agency and the farmers?

The way ahead:

And he wouldn’t need the nod of parliament to implement this alternative.

In my view, yes. And at the center of this opportunity are three positives that the central government can capitalise on right away.

First: the Food Corporation of India. The organisation that is mandated to procure food grains to create buffer stock on behalf of the government. It has both the people and infrastructure to swing into action to procure food grains, Oilseeds and pulses- main ingredients of the food basket that are primarily grown by small farmers  all over the country.

Second: the retail network under Public Distribution System (PDS). Linked with the FCI, it should provide small farmers direct access to millions of consumers in far away markets.

Third: A separate Ministry of Cooperation that can focus on creating an institutional structure that empowers the farmers through ownership of the processing and marketing infrastructure.

There already exists a model in form of ‘Dairy Cooperatives’, spearheaded by Amul that has been in operation for 76 years. Herein the entire value chain is owned and managed by the farmers themselves. The ministry of cooperation can suitably adopt the model of dairy cooperatives to ensure that the command of the institutions always remains in the hands of dedicated farmer leaders and does not get hijacked by self serving political interests.

How to capitalise on the three positives:

What the central government can do is to break up the FCI into 5 independent subsidiaries with a predetermined area of operation and for procurement. Each of these subsidiaries should have its storage, processing, packaging and marketing infrastructure. This access should be given either by transfer of infrastructure owned by the state or centrally owned infrastructure which can be upgraded in a short time. There should be a time bound blue print to convert these subsidiaries into “Joint Ventures” with the ‘Farmers’ Cooperative’ of the operational area and increase the share holding of the farmers to 49%, ideally within 5 years.

A multidisciplinary team constituted under each subsidiary should be trained to procure agricultural produce directly from farmer members at the MSP for fair average quality of produce with the provision of bonuses/ penalties as per prescribed standards. The primary mandate of this team should be to motivate the farmers to join the cooperative and educate them on how the system will operate. Farmers must be told at the outset that they, as part owners of the Joint venture, will receive at the end of the financial year a price difference/ bonus in proportion to the value of the produce they contribute.

A large share of the produce processed and packed in consumer packs by the joint venture should be marketed through the network of PDS outlets so that the consumers receive quality assured pure products at reasonable prices that are not subject to frequent price fluctuations.

That way, farmers will have the ownership of a value chain while a lot of under-utilised infrastructure in the public sector will be put to a useful purpose. The Prime Minister, however will be faced with only one question- how to identify and motivate young farmer leaders who are willing to put their own political ambitions behind in the larger interest of small underprivileged farmers and the Indian agriculture.


जिप्सीनी आँखों थी , अँधेरी रात के तारे

Photo: Paiting by Dr Rama Aneja

यह ब्लाग लिखना तो शुरू हुआ था एक कहानी “अँधेरी रात के तारे” के बारे में जो “जिप्सीनी आँखों थी” नामक पुस्तक से है।“जिप्सीनी आंखो थी“ पूरी पुस्तक यहां इंटरनेट आर्काइव से यहाँ पर उपलब्ध है । पर यहाँ मै “जिप्सीनी आँखों थी” से केवल एक कथा “अंधेरी रात के तारे” के बारे में लिख रहा हूँ ।

सार्थक संवाद” नामक वेब साइट पर मैंने यह कथा सबसे पहले पढ़ी । कैसे मैं इस अंतर्जाल की वेब साइट पर पहुँच गया, मुझे ठीक से याद नहीं। पर शायद मैं खोज रहा था एक भारतीय की जिसकी रग रग में भारतीयता परिलक्षित होती थी। गुरू जी रवींद्र शर्मा की। जिनसे मैं जीवन केवल एक बार मिला ।

पर लिखते समय याद आ गई दो व्यक्तियों से जिनकी सोच और काम दोनों से मै बहुत प्रभावित हुआ। दो व्यक्ति जिन की मुलाक़ातों ने अमिट छाप छोड़ी वह थे , बाबा दीपक सुचदे जिनके बारे में मैंने एक ब्लाग लिखा था। दूसरे थे गुरू जी रवींद्र शर्मा । विधि का विधान है अब दोनों नहीं रहे दोनों अंधेरी रात के तारे !

हैं नहीं, पर अब भी कहीं दूर से टिमटिमा रहे हैं । बुला रहे हैं मुझे । इस जीवन काल में तो नहीं पर शायद अगर फिर जन्म मिला तो शायद उनका साथ मिले ।

कैसे मिलना हुआ ? संयोग था डेवलपमेंट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट पटना का वार्षिक समारोह । इंस्टिट्यूट के तत्कालीन डायरेक्टर प्रोफ़ेसर के वी राजू के आमंत्रण पर मैं वहाँ गया और बहुत से विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी और अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले लोगो से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ।

उन दिनों की रह गईं उनकी यादों में दोनों की यादें प्रमुख हैं ।गुरू रवींद्र शर्मा जी ने भारतीय परंपरा और संस्कृति प्रेरित विकास की अवधारणा को विस्तार से समझाया था। मैंने आदिलाबाद जा कर उनके साथ कुछ समय बिताने का मन भी बनाया पर यह हो न सका । गुरू जी रवींद्र शर्मा के बारे में जब सोचता हूँ, उनकी एक बात अब भी मेरे कानों में गूंज उठती है । “मै सायकिल उठा कर निकल जाता था “देखने”, कुछ देखने नहीं । अगर हम कुछ देखने निकलेंगे तब हम वही देखेंगे जो देखने के लिये निकले थे और कुछ नहीं देख पायेंगें। अगर “केवल” देखने निकलेंगे तब हम बहुत कुछ देख सकेंगे।”

सार्थक संवाद वेब साइट पर ब्लाग लिखने वालों में से हैं श्री आशीष कुमार गुप्ता । वह इरमा (Institute of Rural Management Anand ) के छात्र रहे हैं। सार्थक संवाद वेब साइट पर आशीष जी का परिचय कुछ इस प्रकार से दिया गया है “ आशीष कुमार गुप्ता ने जबलपुर के निकट इंद्राना गांव में जीविका आश्रम और अध्ययन केंद्र की स्थापना की है। IRMA से अध्ययन करने के बाद, आशीष कुमार गुप्ता ने आदिलाबाद में श्री रवींद्र शर्मा जी के साथ वर्षों बिताए, जिन्हें प्यार से गुरुजी के रूप में जाना जाता था । आशीष कुमार गुप्ता कई सामाजिक कारणों से जुड़े हुए हैं, उनका मुख्य ध्यान गुरुजी के कार्यों को प्रकाशित करने पर है और उसी से प्रेरित हो कर , वह भारतीय समाज को अपनी छवि को सही करने के लिए पुन: उन्मुख करने पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं ।”

गुरू जी रवींद्र शर्मा जी के कुछ विडियो यहां पर उपलब्ध हैं ।

श्री आशीष गुप्ता द्वारा गुरू जी की परिचय
गुरूजी का संबोधन ओआरएफ फाउंडेशन के समारोह में

बाबा दीपक सुचदे ने न केवल कृषि की अनोखी परिभाषा “वे अक्सर कहते थे “ कृषि सूक्ष्मजीव से महाजीव ( मनुष्य) की यात्रा है। सूक्ष्मजीव ( किटाणु, परजीवी आदि) अपना जीवन दान करते हैं अन्य जीवों और मानव के लिये भोज्य पदार्थों की संरचना के लिये । सूक्ष्मजीवों की मोक्ष यात्रा का प्रारंभ इसी जीवन त्याग से होता है” । बाबा ने कृषि को एक आध्यात्मिक आयाम से देखने की दृष्टि ही नहीं दी पर इस अवधारणा को कार्यरूप में ज़मीनी स्तर पर भी सफलतापूर्वक कर भी दिखाया । मै कई बार देवास ज़िले के बजवाडा गाँव मे मे स्थित उनके कृषितीर्थ पर भी गया । पर उन्हें अपने वृक्षमंदिर पर बुलाने में असफल रहा । किन कारणों से ? इसका वर्णन मेरे ब्लाग बाबा दीपक सुचदे न रहे पर विस्तार से उपलब्ध है ।

बाबा दीपक सुचदे के कुछ विडियो

Baba Deepak Suchde on Natuco farming

Baba speaking in presence of Sadguru

सार्थक संवाद वेब साइट पर प्रकाशित यह कहानी “ अंधेरी रात के तारे” मुझे बहुत पसंद आई। आशा है स्नेही पाठकों को भी यह कथा पसंद आयेगी । पढ़ें सोचे समझें गिने धुनें !


किशनसिंह चावडा बीसवीं शताब्दी के गुजरात के ख्यातनाम लेखक रहे हैं, जिन्होंने कई सारे वृतांत लिखे हैं। इनमें से अधिकांश प्रसिद्ध गुजराती कवि श्री उमाशंकर जोशी जी की पत्रिका संस्कृति में १९४७ के कुछ समय बाद से “जिप्सीनी आंखोथी” (जिप्सी की आंखो से) शीर्षक से प्रकाशित होते रहे हैं। इन सभी लेखों का संकलन करके “अमासना तारा” (अमावस्या के तारे) नाम से एक गुजराती पुस्तिका प्रकाशित की गई थी, जिसका हिन्दी अनुवाद कृष्णगोपाल अग्रवालजी के द्वारा अंधेरी रात के तारे शीर्षक से किया गया और उसे सोमैया पब्लिकेशन लिमिटेड के द्वारा प्रकाशित किया गया था। प्रस्तुत लेख उसी पुस्तक से लिया गया है और ऐसी और भी रोचक एवं बोधक कथाएँ हम आपके समक्ष प्रस्तुत करते रहेंगे। इस घटना का कालखंड उन्नीसवीं शताब्दी का अंतभाग अथवा बीसवीं शताब्दी का प्रारंभ होगा।


पिताजी जब कभी बाहर जाते, तब माँ बहुत उदास हो जाती थी। इस वजह से ही या न जाने और किसी वजह से, पिताजी जब तक अनिवार्य कारण न हो, तब तक दूर की यात्रा क्वचित्‌ ही करते थे। एक दिन सूरत के गुरूद्वारे से तार आया। पिताजी को तुरंत सूरत आने की गुरू महाराज ने तार से सूचना दी थी। उन दिनों किसी के यहाँ तार आना बड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग माना जाता था। अकसर कोई बुरी खबर हो, तो ही किसी के यहाँ तार आता था। पूरे मुहल्ले में बात फैल गयी कि हमारे यहाँ तार आया है। धीरे-धीरे लोग पूछताछ को आने लगे। तार में कोई बुरा समाचार तो था नहीं। अतः चिंता का स्थान कुतूहल और उत्साह ने ले लिया।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ का जमाना। साधारण लोगों के लिए सूरत-अहमदाबाद जाने का प्रसंग भी दो-चार साल में एकाध बार ही आता था। और, बम्बई – कलकत्ता जाना तो सुदूर विदेशयात्रा के समान कठिन और विरल माना जाता था।

पिताजी के सफर की तैयारी होने लगी। माँ की सहायता के लिए बड़ी मौसी और मामी आ पहुंची। पार्वती बुआ एक पीतल के चमकदार डब्बे में चार मगस के लड्डू ले आयी। पिताजी के पाथेय का प्रश्न इससे आधा हल हो गया। बिस्तर के लिए मामा अपनी नयी दरी लेते आये थे। लल्लू काका धोबी चार दिन बाद मिलने वाले पिताजी के कपड़े उसी रोज इस्त्री करके दे गये। शाम को भजन हुआ। रात को भोजन के बाद पुरूषोत्तम काका ने लालटेन की रोशनी में पिताजी की हजामत बना दी। पिताजी मध्यरात्रि की लोकल से जाने वाले थे। इतनी रात गये सवारी मिलना मुश्किल होता था। अतः दस बजे ही घर से निकल जाने की बात तय हुई। साढ़े नौ बजे तांगा लाने के लिए मामा लहरीपुरा गये। हमारे परिचित मुस्लिम स्वजन मलंग काका का तांगा चौराहे पर ही खड़ा था। मामा के कहते ही वे आ गये। उन्होंने रात को ग्यारह बजे तक गपशप कर के पिताजी के बिछोह का विशाद कुछ हद तक हलका कर दिया। लेकिन तांगा जाते ही कठिनाई से रोके हुए माँ के आँसू बरस पड़े। मौसी, मामी और बुआ माँ को ढाढ़स बाँधती रही और आधी रात बीते घर गयी। हम भी लेट गये।

माँ जब भी मुझे अधिक लाड-प्यार करती, मैं समझ जाता कि वह अत्यधिक दुःखी और अस्वस्थ है। आज भी वैसा ही प्यार करने लगी। मेरा शरीर सहलाती जाती थी और हिचकियाँ लिये जाती थी। उसे सांत्वना देने के लिए मैं भी उसे सहलाने लगा। लेकिन इसका परिणाम उलटा हुआ। माँ रो पड़ी। मेरी उम्र उस समय कोई बारह वर्ष की रही होगी। माँ मुझे अत्यधिक प्रिय थी। पिताजी के प्रति आदर-भाव था, लेकिन उनसे कभी-कभी डर भी लगता था, जब कि माँ से तो निर्भयता का वरदान मिल चुका था। मैं माँ के पास ही लेट गया और उसके पल्‍ले से उसके आँसू पोंछने लगा, लेकिन जैसे-जैसे पोछता गया वैसे -वैसे अश्रुधारा अधिकाधिक बहने लगी। मेरा भी जी भर आया। उसके अविरत आँसू देख कर मेरी आखें भी छलक पडी। लेकिन मुझे रोते देख कर माँ के आँसू अनायास रूक गये। मुझे और पास खींच कर उसने आँचल से मेरी आँखें पोंछी। इस दरमियान वह एक शब्द भी नहीं बोली थी। मैं बोलने की हालत में था ही नहीं।

आखिर माँ ही बोली। उसकी आवाज रूलाई से नम हो रही थी। कहने लगी, “बैटा, मैं तुझे बहुत अच्छी लगती हूँ ना?” इसका जवाब क्या देता! आँसूभरी आंखों से एकटक उसे देखता रहा। आँखो का उत्तर पढ़ कर वह फिर बोली, “तेरे बापू मुझे उतने ही अच्छे लगते हैं। वे जब कभी बाहर जाते हैं, मैं विहव्ल हो जाती हूँ। इस बार तो मेरी बेचैनी और भी बढ़ गयी। गुरू महाराज ने तार भेजकर न जाने क्‍यों बुलाया है। … न मालूम रामजी की क्‍या मरजी है। … चल अब सो जा।” इस प्रकार बातें करते हुए हम एक-दूसरे का आश्वासन बन कर सो गये।

पाँचवे दिन शाम को पिताजी लौट आये। माँ तब तक उदास ही रही, परंतु पिताजी को देखते ही उसकी आँखों में जीवन उमड़ आया। गमगीनी पर आनंद की लहरें छा गयीं। मैं भी पुलकित हो उठा। वायुवेग से समाचार फैल गया। स्वजनों का आना शुरू हुआ। घर में जहाँ कुछ समय पहले शून्यता छायी थी, वहाँ जिंदगी की हिना महक उठी। सबको विदा कर के हमने एक साथ भोजन किया। मैं हमेशा पिताजी के पास ही, पर अलग बिस्तर पर सोता था। हमारे बिस्तर के सामने ही माँ सोती थी। रात को प्रार्थना कर के हम सो गये।

बहुत रात बीते हिचकियों की आवाज से मैं जाग गया। देखा, कि माँ और पिताजी आमने सामने बैठे हुए बातें कर रहे थे और माँ की हिचकी बंधी हुई थी। मैं धीरे से उठा और माँ की गोद में जा छिपा। पिताजी को इतना व्याकुल मैंने शायद ही कभी देखा था। माँ की गोद से उठ कर मैं उनकी गोद में जा बैठा। वे मेरे सिर पर हाथ फेरते रहे। उनके स्वर मैं अस्वस्थता थी। माँ को संबोधित कर के वे कहने लगे, “तुम हाँ कहो, तभी मैं सूरत की गद्दी का स्वीकार कर सकता हूँ। गुरू महाराज ने स्पष्ट कहा है, कि तुम्हारी सम्मति हो, तभी मेरा संन्यास सार्थक हो सकता है।”

“आपको गद्दी देने की गुरू महाराज की इच्छा है, इसकी शंका तो वे पिछली बार जब यहाँ आये थे, तभी मुझे हो गयी थी। नारायणदास ने मुझसे कहा, तो मैंने समझा कि मजाक कर रहे होंगे। इसीलिए मैंने आपसे स्पष्ट पूछा भी था। आपने उस समय तो ना कह दी थी, लेकिन आपके मन की कशमकश में उस समय भी भाँप गयी थी। फिर सूरत की गद्दी जयरामदास को देने की बात चली और मैंने मन को मना लिया। अब की बार तार आया, तब से तो मैं कुशंका से पागल हो रही हूँ….!!” माँ की हिचकियाँ चलती रहीं।

“लेकिन देखो न नर्मदा,” पिताजी की वाणी में व्याकुलता थी, “जयरामदास को गद्दी देने को अब गुरूजी की इच्छा नहीं है। उनका कहना है, कि हमारे कुल का त्याग उच्च कोटि का है। पिताजी के दान की शोभा बढ़ानी हो, मंदिर की प्रतिष्ठा संभालनी हो और निरांत संप्रदाय को जीवित रखना हो, तो मुझे गद्दी स्वीकार करनी ही चाहिए।” सहसा माँ की हिचकियाँ रूक गयी। आँसू आँखों में ही रूक गये। आवाज कुछ अजीब सी मालूम हुई। बोली, “देखिए, आपके आत्मकल्याण के मार्ग में आकर मैं अपने धर्म से विचलित होना नहीं चाहती, लेकिन यह हमारे लिए बड़े कलंक की बात होगी।”

“दीक्षा लेने में कलंक है, यह तुम से किसने कहा? मैं कुछ दुःख, निराशा या जिम्मेदारियों से भाग कर तो संन्यास ले नहीं रहा। संसार का सामना न कर सकने की कायरता के कारण संन्यास लिया जाए, तो उसे कलंक कहा जा सकता है। जब कि मैं तो सब प्रकार से सुखी जीव हूँ और फिर, मैं तो तुम्हारी सम्मति के बाद ही यह कदम उठाना चाहता हूँ। तुम्हारी रज़ामंदी न हो, तो मुझे गद्दी नहीं चाहिए।!” पिताजी की आवाज़ में कंपन था। वे अभी स्वस्थ नहीं हुए थे।

“मैं जिस कलंक की बात कह रही हूँ, उसका कारण बिलकुल अलग है,” माँ ने कहा। “मेरे कहने का मतलब यह है, कि लोग कहेंगे कि बाप-दादा की संपत्ति सीधी तरह से विरासत में नहीं मिली, तो साधु बन कर हथिया ली। पिता ने उदार मन से जो संपत्ति मठ के लिए दान कर दी थी, उसे बेटे ने महंत बन कर भोगा। हमारी तो संपत्ति भी गयी और इज्जत भी गयी। आपके संबंध में कोई इस प्रकार का संशय व्यक्त करे, तो मेरे लिए तो वह मर जाने जैसा होगा।”

पिताजी गंभीर हो गये। मेरे सिर पर उनका हाथ फिरता रहा। लालटेन की रोशनी उन्होंने कुछ तेज की। कमरे में प्रकाश छा गया। माँ की आंखे पिताजी की आंखों की गहराई में उतर कर कुछ खोज रही थी। वे अपने स्वाभाविक धीर-गंभीर स्वर में बोले, “तुम बिलकुल ठीक कह रही हो, नर्मदा। यह मुझे पहले ही सूझना चाहिए था। न जाने कैसे यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं आयी। मेरे मन में एक ही लगन थी कि गुरू महाराज की आज्ञा का पालन करना चाहिए। लेकिन अब तुम्हारी बात समझ में आती है। कल सुबह ही तार कर के गुरूजी के चरणों में अस्वीकृति भेज दूंगा।”

मेरी उपस्थिति से बेखबर होकर माँ ने पिताजी के पाँव छू लिये।


Sadhu to ramta bhala

Hemendra B Joshi
Hemendra B Joshi

Photo: Paiting by Dr Rama Aneja

I served an esteemed institution National Dairy Development Board, during its formative years for two decades. My association with NDDB means a lot to me professionally and psychologically. I contributed to the programmes and projects of the organisation to further its objectives to the best of my abilities and in the process I “grew up”!

I want to share one of the many lessons that I learnt while working with NDDB. A beautiful lesson ‘Sadhu to chalta bhala’!.

Abrupt transfers were like a hanging Damocles sword for NDDB professional staff who had to work in the field.

In many instances, before one settled down at one place, a transfer order would come! Like a sage of the good old days one would soon learn to develop an attitude of अनासक्ति or no worldly attachment to a “place” of posting.

In 1989 I was posted at Galbabhai Dairy Co-operative Training Center at Banas Dairy , Palanpur. Soon we learnt that in the neighbouring district Mehshana District Milk Producers Cooperative Union ( Dudhsagar Dairy) was looking for a Gujarati Speaking Officer well acquainted with Cooperative Development as there was a two months field training module to be delivered for trainees in this area.

साधु तो रमता भला, गंगा तो बहती भली

One fine morning Dr Punjarath phoned me up and talked about my placement on deputation at Dudhsagar Dairy Mehsana as he was a member of the Board of Dudhsagar Dairy as NDDB representative. He suggested that I meet Shri Motibhai Chaudhary, the then Chairman of Dudhsagar Dairy. Dr Punrath told me that he had recommended to the Mehsana Dairy that I be given the Manager’s post. This was very good opportunity and a change of 180 degrees, as I was looking after training in Artificial Insemination and Cooperative Development since joining NDDB in 1977!

But for me was fa very difficult decision to make. I had to take a call on the education of my children who were then in 7th and 9th standard respectively in a English Medium School at Palanpur.

But it was the need of the hour, so I agreed and met the Chairman of Dudhsagar Dairy, Motobhsi Chaudhry, along with Shri Parthibhai Bhatol and talked at length about my posting as referred by Dr Punjarath and decided to take up the new assignment at Mehsana.

I shifted my family to Dudhsagar Dairy for schooling etc. and frequently met with the MD and Chairman of Dudhsagar Dairy for finalisation of my posting while I continued to work at GDCTC, Palanpur as per the instructions received from Anand.

I did all this in consultation with Dr Punjarath whose support was rock solid.!

The Chairman, Dudhsagar Dairy, whom I had met before shifting my family to Mehsana, however, had a change of mind. He asked me to join as Deputy Manager. That was shocking, and naturally I was very upset with at this unexpected development! For the next three month I tried to persuade the Chairman, Shri Motibhai in consultation with Dr Punjarath. But Shri Motibhai was adamant and refused to budge and my future was in a limbo.

I was in a dilemma as to what to do next. By then it was the month of August. I wondered how to take my children back to Palanpur and get them admitted in a school. Mid season change of school from one district to another is a complex process.

I consulted Dr Punjarath and asked for his final advice !

How nicely he then supported me. I forgot the problems and all that I was facing. I do, however, still remember his consoling words; “Please do not worry, you are a sincere and honest officer with wonderful track record, I am the last person to force you to agree to the revised offer from Dudhsagar Dairy and join as Dy Manager. You may respectfully regret and continue to serve in your present position at Palanpur.”

It was still a grave situation for the schooling of my children, But I was very happy. How a senior boss from NDDB like Dr Punjarath valued his junior colleague. Such sensitivity and support to juniors gives them on the job inspiration and motivation !

Fortunately, both my kids got admission in a boarding school at Pillvai and I accepted the situation delightfully. Our family disintegrated as we had to live away from our kids. Fate takes such twists and turns. One has to learn and accept unpleasant situations as well.

More often than not things do turn out to be good.

“HE” gives us what is “Good” for us not necessarily what we “Like”.


डाक्टर कुरियन; एक अभिव्यक्ति

Photo: Painting by Dr Rama Aneja

मेरे जैसै अनेक लोग जो डा कुरियन के सान्निध्य मे आए, मेरी समझ के अनुसार, उनका संबन्ध “विक्रमादित्त्य” और “बैताल” की तरह का है।

हर बार उस बैताल के चरित्र के एक पहलू को किसी एक पीपल के पेड़ पर टांग कर आते हैं । वही बैताल एक बिल्कुल नये चरित्र में हमारे कन्धे पर बैठ कर नये सवाल सामने रख देता है। आज करीब पचास साल के बाद भी !

मै अपने को भाग्यशाली समझता हू कि इस व्यक्तित्व के कुछ पहलू को जो मै देख पाया और जो शायद कुछ के ही नसीब मे आया हो, हो सकता है नही भी आया हो। वह था उनका बाल सुलभ निर्दोष व्यवहार और बाल हठ।

हालांकि, उनका यह पहलू मेरे एन डी डी बी छोड़ने और अमूल ज्वायन करने के बाद की हैं कुछ यादें ।

१. फरबरी,१९७०, बरौनी मेरा पहला साक्षात्कार !

डा कुरियन और डा एस सी रे। बरौनी मे एक घास होती है।नोनी। पूरे जमीन पर फैल जाती है। पीले फूलों से लदी हुई।सारी धरती हल्दी से प्रकृति ने पुताई कर दी हो। डा कुरियन ने डा रे से पूछा “कान्ट वी हैव दिस ईन एन डी बी कैम्पस? नो डाक्टर यू कान्ट हैव एव्री थिंग एव्री वेयर। दोनों ने एक दूसरे को देखा निर्दोष मुस्कुराहट और चल पड़े ।


२. दिसम्बर १९७५, क्रिसमस का दिन

तब एन डी डी बी कैंपस मे शायद तीस या बत्तीस परिवार ही रह रहे होंगे। दो क्रिकेट टीमें बनी। कुरियन इलेवन और वरियावा इलेवन। हम सब खेतीवाड़ी ग्राउन्ड मे इकट्ठे हुये । दोनो नौन प्लेइंग कैप्टेन अपनी अपनी टीम के साथ। एकाएक डा कुरियन ने मुझसे पूछा। कैन आइ गो एन्ड बैट? “आइ वान्ट टू शो निर्मला दैट आई ऐम स्टिल यंग एन्ड कैन बैट। बट आई मस्ट टेक परमिसन आफ द कैप्टेन” ! और वह गए। इन फुल पैड अप। और पूरे सम्मान से खेला। बालसुलभ !


३. १४ जनवरी १९७५, उत्तरायण

एन डी डी बी कैंपस में रहने वाले लोग सामने के मैदान में पतंग उड़ाने मे लीन। सब बच्चे समेत अपनी अपनी पतंग उड़ाने में मस्त। यकायक डा कुरियन अपने परिबार के साथ शामिल। उनकी पतंग किसी ने काट दिया। दूसरी पतंग उपर। एक बच्चे के पास आए। उसका नाम पूछा। उसके बाप का नाम पूछा। अपना पतंग दिया और कहा ” इफ यू लूज़ दिस काइट, योर फादर विल लूज़ हिज़ जौब “बह बच्चा दौड़ता हुआ मेरे पास आया और पूछा “पापा ये कौन आदमी है? मै क्या समझाऊ और किसे समझाऊँ?

४. औपरेशन फ्लड टू का शुरुआती समय

एफ ए ओ एडवाइजर्स के लिये लक्जरी गाडियों में से एक आस्ट्रेलियन होल्डन। निहायत खूबसूरत। देखा। मुझसे कहा “कौल मोली। आइ वान्ट टू ड्राइव हर ऐज माई फर्सट कोपैसेन्जर” । मौली आई। “मौली, यू सिट बाई माई साईड। आस्क दिस फेलो टू सिट बिहाइन्ड। आई विल टेक यू राउन्ड द कैम्पस” । ड्राइविंग सीट पर मानो एक निर्दोष बच्चा ट्वाय कार पर खेल रहा हो। “मौली, यू सी ईट हैज़ पावर स्टीयरिंग। यू प्रेस दिस बटन ऐन्ड ऐन एन्टिना पौप्स आउट” । मौली चुपचाप सब सुनती रही। बस, हूं, यस जौली। कैम्पस का चक्कर लगाया और औफिस के सामने ला कर रोक दिया। शायद रजनी ड्राइवर खड़ा था। मैडम को घर छोड़ दो। और मुझसे , “ यू नो, दिस कार नीड्स वाईट पेट्रोल, ऐन्ड माई कार शुड नौट स्टौप ए सिन्गल डे। उस जमाने में आनंद में व्हाइट पेट्रोल? लेकिन व्हाइट पेट्रोल आया। गाड़ी कभी नही रुकी। कैसे हुआ, यह एक अलग कहानी।

५. निर्मला की शादी

कितने सारे लोग आमंत्रित थे। उनमे एक सैयद भाई भी थे, उनके पहले ड्राइवर। मुझे बुलाया ‘सी दैट ही इज ट्रीटेड नौ वे इन्फीरीयर टू एनी वन हीयर। फौर मी ही द वी वी आइ पी फौर द डे। सैयद मियां के लिए अलग टेबल लगाया, एटेन्ड किया और जब जाने लगे, उन्हें बुलाया “थैन्क यू सैयद भाई” ! सैयद भाई मुड़े बिल्कुल स्पीचलेस। बस आंखे नम थीं।

लेकिन इस विशाल व्यक्तित्व को करीब से पहचानने का मौक़ा मुझे एन डी डी बी छोड़ने और अमूल ज्वायन करने पर मिला, उनके साथ, उनके परिवार के साथ साक्षात, और उन सारे लोगों से आत्मीय बात कर के। उनमे आदरणीय त्रिभुवन काका, श्री रमन शंकर पटेल, श्री मनुभाई डाह्या भाई पटेल और श्री बाबूभाई गिरिधर भाई पटेल और श्री एच एम दलाया। सन १९८७ से २००० तक इनका सामीप्य मिला। घंटो साथ मे बैठता, सुनता, प्योर, औनेस्ट, प्रिस्टीन, नौस्टैल्जिक रिवर्स चरनी औन टाइम।

एक ऐसी ही बैठक में त्रिभुवन काका के साथ। “सींहा, कुरियन ने कोई औढखी सक्या नथी। एनी व्यक्तित्व एक नानो बालक जेवा। निष्कपट, निर्दोष, चंचल। कदी शान्त नही बेसी सके। लोको एने ज़िद्दी कहे छै। आ जिद्दी नथी, हठी छे। पण एनो हठ बालहठ। एक रमकड़ा मली जाए तो बस खुश खुश। जूना समय मां मारा पासे बेसता। खबर नहीं शूं शूं अफलातून बिचार। हूं एनो समझातो, कुरियन अमे महासमर मं छीए। मने वचन दे एवं चर्चा सामान्य रीते अणे सामान्य जग्या नहीं करवानी। अणे ए आजीबन निभाया।”
श्री रमनभाई शंकर भाई पटेल “सींहा, तू केनी बाबत जानवा ईच्छे छे, कुरियन बाबत ? अरे एनो बिचारो ना उंढापण, अमे नथी समझी शक्या तो तु तो एक नाना बालक जेवी छे। अगम्य, अथाह पण मापी न सकाए एवो सारगर्भित” ।
मनुभाई डाह्याभाई पटेल “सींहा अमे राजकारणीया छीए।अमारी कार्यशैली तमने खबर होए। पण कुरियन! आ बाबत मां एनी समझ अणे चपलता अमे नहीं पाड़ी शय्या”।
बाबूभाई गिरधरभाई पटेल कुरियन एनक्लेव और एक जमाने मे कंजरी कैटलफीड फैक्टरी पर आने वाले सामान पर टोल टैक्स पूरी तरह माफ करने वाला शख़्स , बस “एक बात, कुरियन नो प्रश्न छे न। पूछवानो नही, सोचबानो नहीं”

ऐसा व्यक्तित्व , बिरला!