Greetings on the occasion of Onam

My dear friend PT Jacob shared today this social media message of positivity and humanity. I reciprocate the feelings expressed and convey my greetings to all.



Some days ago I read a message from a friend on Onam.

I don’t know why that social media message posted on the occasion of Onam attracted my unusual attention . I have read it several times and each time I read it touches me deeply. And I then indulge in one of my favourite past times in old age- translate English to Hindi.I have taken some liberties in translating it in Hindi. I tried to keep intact the implied meaning of the original as far as possible. Errors if any are mine.


Another one from the past.

As we get closer to the holy and divine Onam festival, this was a great reminder. 

As we converse with HIM trying to come clean of all our negative emotions and guilt, HE smiles HIS most endearing smile and asks us: 

“When you were a child you did many things including running around the house in a semi clad or unclad manner. This gave your mother a lot of worry and stress. Do you think your mother is still upset fir what you did then? The same logic applies to your relationship with me. I will keep guiding you as your divine mother amd father. Karmic debts will need to be paid. I will wait because I know your evolution will happen in the course of time.

This is such a relief for us for we realise that none of our foolishness needs to be treated as fatal error. In turn we too must not treat anyone else’s behaviour towards us as unforgivable. As this thought emerges we experience a sense of “SUPREME FREEDOM”. Completely free from our past be it ours or be it it someone else’s. No grudges, no anger, no feelings of wrongdoing or being wronged. A lesson learned. Time to send blessings and prayers to all especially for the ones who suffer from grouses and grudges and are grumpy for reasons best known to them.

Let this Onam be spent joyfully with our egos crushed by HIS divine feet.


बीते दिनों की एक और बात । 

पवित्र त्यौहार ओणम आने वाला है और आ रही हैं  बीते दिनों की उनकी बताई कुछ और यादें !

वह” हमारी सभी नकारात्मक भावनाओं और अपराध-बोध से मुक्त होने के प्रयास में मददगार हैं।हम जब उनके संपर्क मे आते हैं तब वह अक्सर अपनी सबसे प्यारीमुस्कान भर हमसे पूछते हैं,जब तुम बच्चे थे तब तो तुम घर के चारों ओर अर्ध नग्न या बिना कपड़े के भागते थे तथा और भी बहुत से उटपटांग काम करते थे । इससेतुम्हारी माँ को बहुत चिंता और तनाव होता था ।

क्या तुम्हें लगता है क्या अब भी तुम्हारी माँ तुम्हारी उस समय की गई हरकतों से परेशान हैं?

मेरे साथ तुम्हारे रिश्ते पर भी यही तर्क लागू होता है। मैं तुम्हारे दिव्य माता और पिता के रूप में तुम्माहारा र्गदर्शन करता रहूँगा। कर्म ऋणों का भुगतान तब तक करनाहोगा जब तक तुम मुझे पूरी तरह से आत्मसमर्पण नहीं कर देते।

यह हमारे लिए इतनी राहत की बात है कि हमारी किसी भी मूर्खता को घातक त्रुटि के रूप में मानने की आवश्यकता नहीं है। बदले में हमें भी किसी दूसरे के व्यवहारको भी अक्षम्य नहीं मानना चाहिए। जैसे ही यह विचार उभरता है हमे एक अभूतपूर्व स्वतंत्रता की, सर्वोच्च स्वतंत्रता का भावना अनुभव होता हैं। अतीत से पूरी तरहमुक्ति चाहे वह हमारा हो या किसी और का।

न कोई द्वेष न क्रोध न ही गलत काम करने या गलत होने की कोई भावना।

एक सबक ।

ओणम यानि सभी को आशीर्वाद और प्रार्थना भेजने का समय, विशेष रूप से उन लोगों को जो शिकायत और द्वेष से पीड़ित हैं, क्रोधित है, कुछ कारणों से जो शायदही उन्हें मालूम हों ।

इस ओणम को हम उनके दिव्य चरणों द्वारा कुचले गए अहं के साथ आनंदपूर्वक व्यतीत करें।

Brihadiswara Temple

Dr. MPG Kurup
Dr. MPG Kurup

Former Executive Director National Dairy Development Board

Indian Art , History , Culture , Architecture and Vedic India

Art , Architecture and Culture

Thanjavur Brihadiswara Temple : (also called Peryaudayar Kovil

Located south of Kaveri , built by Chola King Rajaraja Chola in 1010 AD : however construction : additions , Alterations , and Modifications , went on in bits and pieces for centuries : largest temple in south India , built in 44 Ha of land .

The Temple architecture is complex , Dravidian style , rock cut , Chola Temple style .The temple construction is immersed in mystery , no one including Google or Wikipedia , provide answers.

The Temple tower (Raja Gopuram ) is 216 ft tall and has a huge granite block some 80 mt and 7.7 ft wide , at the very top. No one offers any explanation on how it reached the top.

Prathishta : Lord Shiva , but the Temple has shrines for many of the Gods in the Hindu Pantheon.

The temple and also the city of Thanjavur is famous for its Art and Culture : the classical Indian Dance form “Bharatha Natyam ” originated in Thanjavur !

So also the South Indian Classical Music , popularly known as ” Carnatic Music ” : origin attributed to Music Samrat Thyagaraja !

Source : Text and Pictures : Google / Wikipedia


अनुभूति – 5

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

पिछले दो पोस्ट बिल्कुल व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं जो मुझे अंदर से झकझोरती रही है, उसी परिभाषा के शोध की यह अगली कड़ी है।


मै हरिद्वार के जिस धर्मशाला में हूं, उसमे करीब तीन सौ आदमियों के रहने की व्यवस्था है।

पिछले साल का 20 मार्च का दिन।

हमारे साथ करीब दो सौ यात्री। और लाक डाउन डिक्लेयर हो गया। 22 मार्च से किसी का बाहर जाना मना। बच्चे दूध के लिए, बूढ़े दवा के लिए, सब परेशान। खाने की व्यवस्था, उनको मानसिक रूप से उलझाए रखना, सब नियंत्रित रूप से सम्हालना! एक एक्सट्रीम पैनिक। औल केयोस ।

कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। किसी तरह राजकीय सहायता से 27 मार्च को बसों की व्यवस्था हुई और यात्रियों को बैठाने लगा। लोगो के चेहरे के भाव, बस देखने लायक। एक दैविक अनुभव।

आखिरी बस ।चालीस व्यक्ति। सब को बैठा कर नीचे उतर रहा हूं ।एक बृद्ध महिला अपनी सीट से उठ कर आती हैं, पास आती हैं, पैर छूती हैं और शुद्ध गुजराती में भरे गले से कहती है, “तमे तो मारा माटे भगवान बनी ने आया “और आंखों मे आंसू।

अभी खतम नही हुआ, कि, एक छोटा बच्चा जो दूध के लिए रोता था, आया, पैर छूए और बोला “दादा, आवजो। और भाग कर अपनी सीट पर बैठ गया। मै बस रो रहा था। कैसे आंसू थे, आज तक नहीं समझ पाया।


दूसरी घटना। हमारे यहां एक बृद्ध महिला हमेशा आती है और एक निश्घित कमरे मे रहती हैं। नब्बे वर्ष की है। स्वाभिमानी। कपड़े की झोली बनाती है,जो मिलता है उसमे गुजारा करती है। एक दिन काउन्टर पर आई। विल्कुल बेबस। कहने लगी “लौक डाउन मे काम नहीं हुआ। तीन दिन रूकना है, एक पैसा नही है। अमावस्या नहाने आई थी। नही कर पाउगी। धर्मशाला कैन्टीन पर गया तो पता चला कल से दस ग्राम दूध लेती है कुछ महादेव पर चढ़ाती है, जो बचता है वही पी कर रही है।

इतने मे वे पास आ गयी और मेरी ओर निरीह भाव से देखते हुए बोली। तमे कशू करो न मारा माटे। आप मेरे लिए कुछ कीजिये। नही रोक सका अपने को। तीन दिनो का कमरे का किराया मैने देने का आश्वासन दिया। साथ में चाय पी।



मै कैन्टीन में बैठा चाय पी रहा हूँ ।बाहर एक बालक कुछ अजीब सी हरकतें कर रहा है। मै उससे मिलने को रोक नही सकता। जाता हूँ। उसके पिता वहीं मिलते हैं और बताते है वह एक मेनटली चैलेन्जड बालक है, जन्म से ही ।लेकिन आज कई नेशनल एवार्ड ले चुका है और अभी भी एक नेशनल इवेन्ट में भाग लेने जा रहा है। बात करने की इच्छा हुई । कुछ टूटी फूटी भाषा मे, कुछ इशारे से। पता नही क्यों पूछ लिया “कुछ खाओगे। उसने हां मे सर हिलाया। एक मिठाई खाई, हाथ मुह धोया और नाना, नाना कह कर चिपट गया। बड़ी मुश्किल से अपने पिता से छुड़ाने पर अलग हुआ।


अगर आप में से कोई इन तीनो परिस्थितियों मे, या किसी एक में भी सहभागी होते तो आप को कैसी अनुभूति होती?


परिभाषा की शोध की मेरी परिक्रमा सतत चल रही है। मदद चाहिए।


क्या हनुमान ने सूर्य को सचमुच लील लिया था ?

जुग सहस्र जोजन पर भानू
लील्यो ताहि मधुर फल जानू

तथाकथित “लिबरल” “सेक्यूलर” “आधुनिक” शिक्षा ने,भारत जैसे देश मे जिसका हज़ारों साल का इतिहास और परंपरा रही है, रैशनल थिंकिंग के नाम पर जुमलेबाजी और परंपरा का उपहास करना तो ख़ूब सिखाया पर कोई आलटर्नेटिव सोच देने मे असमर्थ रही है। फलस्वरूप शाब्दिक अर्थ तथा अपनी सीमित सोच और पुस्तकीय ज्ञान के तथा ”लिबरल” “सेक्यूलर” “आधुनिक” शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित “सुधी जन” किसी भी दूसरी तरह सोचने मे असमर्थ ही नही वरन सोचने का प्रयत्न भी नही करते।

अपने को लिबरल माने वाले वास्तव मे ख़ुद ही कंज़र्वेटिव ( रूढ़िवादी )हैं । यहाँ रॉबर्ट कॉन्क्वेस्ट की राजनीति के तीन नियमों ( https://www.isegoria.net/2008/07/robert-conquests-three-laws-of-politics/) का उल्लेख उचित रहेगा ।

1-हर कोई उस विषय मे में रूढ़िवादी है जो विषय वह जानता है।

2-कोई भी संगठन स्पष्ट रूप से दक्षिणपंथी नही है वह जल्द ही या बाद में वामपंथी बन जाता है।

3- किसी भी नौकरशाही संगठन के व्यवहार की व्याख्या करने का सबसे सरल तरीका यह माना जाता है कि वह अपने दुश्मनों के एक कैबेल ( चालबाज़ गुट) द्वारा नियंत्रित होता है।

वैसे इस बात पर भी विवाद है कि क्या वास्तव में राबर्ट जी ने ही इन नियमों का प्रतिपादन किया था 🤔

https://skeptics.stackexchange.com/questions/38217/did-robert-conquest-ever-state-his-three-laws-of-politics

….कोई प्राथमिक स्रोत नहीं मिल रहा है, सब कुछ स्वयं संदर्भित हो रहा है।

ख़ैर जो भी हो सो हो पर पहला नियम इन अपने को “लिबरल” मानने वालों पर वास्तव मे “रूढ़िवादियों पर पूरी तरह लागू होता है ।

भारतीय परंपरा मे ज्ञान सिर्फ़ किताबी ही नही वरन रूपक, अन्योक्ति, छद्म रूप से भी कहा, सुना और समझा जाता है ।गुरू बाहरी हो अथवा अपने अंदर बैठे गुरू का आह्वान कर हम समझने का प्रयास करते हैं । हिंदू परंपरा किताबी परंपरा नही है। हमारी परंपरा खुला आमंत्रण देती है अन्वेषण कर अपना अर्थ निकालने का ।

इसी लिये हम परंपरागत रूप से अरूढिवादी रहे हैं । आजकल की प्रजातांत्रिक राजनैतिक होड़ मे जो विकृतियाँ हो रही है यदि उनसे हम अपना ध्यान हटा कर देखे तो सही माने मे हिंदू या सनातन सोच ही लिबरल सोच है । तभी तो सभी प्रकार मे मत मतांतरों, दर्शनों को अपने मे समावेश कर यह परंपरा अब भी जीवित है । ऐसे परिवेश मे जब इस परंपरा को नासमझ, उपहास उड़ाने वाले रूढ़िवादी , ब्राह्मणवादी,स्त्रीविरोधी, प्रतिक्रियावादी और न जाने किन किन नामो से पुकारने लगे हैं। हताशा तो इस बात की है कि तथा कथित आधुनिक हिंदू धर्म परंपरा रक्षक भी ऐसा व्यवहार करते है जैसा किताबी धर्मों के कुछ बेवक़ूफ़ अनुयायी !

बताये कौन सा धर्म या परंपरा यह डंके की चोट पर यह कहती है

इदं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निम् यमं मातरिश्वानमाहु:।।

ऋग्वेद-1/164/46

अर्थात

एक ही सत् को सत् को जानने वाले ज्ञानी जन इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि , सुंदर पंख वाले गरुड, यम तथा मातरिश्वा के नाम से पुकारते हैं ।

क्या अन्य मतावलंबी ऐसा कहेंगे। उनका रास्ता उनका ही है या जो अन्य माने उनका । बाक़ी जायें भाड़ मे ।

यदि कोई हनुमान जी की सूर्य को निगलने की बात को पाखंड माने तो ठीक है । जिनकी श्रद्धा है हनुमान जी के प्रति वह तो मानेगा । अब वह या तो शाब्दिक अर्थ लेगा नही तो गहराई मे जायेगा । जो गहराई मे जायेगा वह उसका अर्थ तीसरे प्रकार से से लेगा । दोनो या तीनों ठीक हैं अपनी अपनी दृष्टि से ।

“इस संदर्भ में, सूर्य इस सापेक्ष विश्व-स्वर्ग में सर्वोच्च प्राप्ति का प्रतीक है। साधन दो है सकाम कर्म या प्रवृत्ति मार्ग (कर्म या कर्मों का फल भोगने का मार्ग) या निवृत्ति मार्ग या भीतर की ओर मुड़ने का मार्ग है।

जब आकाश में एक चमकदार फल होने का विश्वास करते हुए, एक बच्चे के रूप में, हनुमान जी सूर्य की ओर बढ़े और उसे निगल लिया, तो आकाश के स्वामी इंद्र ने उसे अपने वज्र ( प्रवृत्ति का बल) से संसार को घोर अंधकार से बचाने के लिए प्रहार किया। इससे हनुमान जी के अभिमान की प्रतीक ठुड्डी टूट गई ।हनुमान यानि जिसकी ठोड़ी टूटी हो !

साधक का ध्यान हनुमान का नाम ही -यानि वह जिनकी ठोड़ी टूटी हुई है – बरबस विनम्रता की ओर ले जाता है । विनम्रता ही भक्त की साधना का वह महान गुण है जो भक्त को मुक्ति के उसके लक्ष्य तक ले जाता है यानि निवृत्ति या अंतर्मुखी होने का मार्ग ।

-स्वामी ज्योतिर्मयानंद की टिप्पणी पर आधारित, “हनुमान चालीसा की गूढ़ व्याख्या”

In this context, the sun is the symbol of the highest attainment in this relative world-Swarga or heaven-the goal of sakamya karma or pravritti marga (the path of enjoying the fruits of one’s karma or actions). When, as a child, Hanuman bounded towards the sun and swallowed it, believing it to be a shining fruit in the sky, Indra, the lord of the heavens, struck him with his thunderbolt (the force of pravritti) to save the world from utter darkness. This broke the chin of Hanuman (symbolic of breaking his pride). Thus, the very name Hanuman (broken chin) beckons the mind of the aspirant to humility, a supreme devotional quality that leads the devotee to the highest goal-that is a desire to follow nivritti marga or the path of turning inward to seek liberation.


हनुमान चालीसा