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वसंतराव: नाम और काम का अनोखा संगम

यह ब्लॉग वसंतराव कुलकर्णी की जीवन यात्रा का भावुक वर्णन है, जिनका नाम ‘वसंत’ उनके कार्य से मेल खाता था। वे जहां-जहां गए, हरियाली फैलाई—पेड़ लगाए, बगीचे संवारे। लेखक की उनसे पहली मुलाकात 1969 में मुंबई की आरे कॉलोनी में हुई, फिर 1972 में आनंद के एनडीडीबी में, 1984 में मुंबई के डेयरी बोर्ड कैंपस में, 1997 में जलगांव डेयरी में और अंतिम 2006 के बाद बोरीवली के ज्येष्ठ नागरिक संघ में। वसंतराव ने डेयरी संस्थानों को हरा-भरा बनाया, सेवानिवृत्ति के बाद एजेंसी चलाई और चुनौतियां स्वीकारीं। वे लेखक के जीवन में वृक्ष की छाया जैसे रहे—एक अनोखा संयोग और प्रेरणा।

डाक्टर मुकुंद नवरे


किसी का नाम और काम एक जैसा हो तथा वह अच्छा हो, तो उसकी प्रशंसा तो होनी ही चाहिए। लेकिन सभी व्यक्ति ऐसे होते हैं, यह कहा नहीं जा सकता। इसी कारण जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आता है, तो उसे भूलना संभव नहीं होता। एक ऐसे ही व्यक्ति से मेरा परिचय हुआ, जिनका नाम वसंत था, जिन्हें मैं आदर से वसंतराव कहूंगा, जो महाराष्ट्र की परंपरा है। वसंतराव की विशेषता यह रही कि जीवनभर वे जहां-जहां गए, उन्होंने अपने नाम की ऋतु वसंत के अनुसार हरियाली फैलाई, पेड़-पौधे लगाए, फूल खिलाए और उसी खुशी में अपना जीवन बिताया।

पहली मुलाकात: मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी, 1969

वसंतराव से मेरा पहला परिचय मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी में स्थित न्यूजीलैंड होस्टल में हुआ, जहां वे होस्टल वॉर्डन थे। सन 1969 का वह नवंबर महीना था। उन दिनों मैं भारतीय कृषि उद्योग प्रतिष्ठान ( BAIF) में ट्रेनी अफसर के नाते नियुक्त हुआ था और अन्य अफसरों के साथ रहते हुए आरे मिल्क कॉलोनी में हमारे प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई थी। उन दिनों आरे कॉलोनी की हरियाली, वहां का ऑब्जर्वेशन पोस्ट (ओपी) और वह न्यूजीलैंड होस्टल अपनी सुंदरता के लिए जाने जाते थे। यहां तक कि अनेक हिंदी फिल्मों की शूटिंग वहां हुआ करती थी, जब न्यूजीलैंड होस्टल किसी कॉलेज बिल्डिंग जैसा दिखाया जाता था और शशि कपूर जैसे कलाकार कॉलेज बॉय बनते थे।

इसी तरह आरे कॉलोनी में जब कभी महत्वपूर्ण व्यक्ति आते थे, तब न्यूजीलैंड होस्टल में उनका आना लगभग तय था और भोजन की व्यवस्था वहां होना स्वाभाविक था। इन सबकी जिम्मेदारी वसंतराव भली-भांति संभाल रहे थे। वैसे तो न्यूजीलैंड होस्टल में डेयरी डिप्लोमा करने वाले छात्र पढ़ते और रहते थे। वहां से थोड़ी दूरी पर पेड़ों में छिपी जगह पर एक स्टूडेंट डेयरी भी थी और इन दोनों के निर्माण में न्यूजीलैंड सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिली थी।

होस्टल की पूरी व्यवस्था और बाहर के बगीचे वसंतराव देखा करते थे। वहां अलग-अलग जाति के फूलों के पौधे तो थे ही, लेकिन डेयरी में मक्खन को पीला करने के लिए जिस एनाटो रंग का प्रयोग होता है, उसका पौधा और उस पर खिले फूल मैंने उस होस्टल के बगीचे में ही देखे, और कहीं नहीं। करीब एक महीना मैं उस होस्टल में रहा, जहां वसंतराव से परिचय हुआ और उनकी व्यवस्थाओं से। उस पद के लिए वे पूर्ण रूप से काबिल थे, इसमें कोई संदेह नहीं था।

दूसरी मुलाकात: आनंद में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, 1972

उसके बाद दो ही साल बीते होंगे, जब मैंने आनंद में स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड में अप्रेंटिस अफसर के नाते प्रवेश किया। सन 1972 का वह फरवरी महीना था, जब 16 अप्रेंटिस अफसर तथा अनेक अप्रेंटिस इंजीनियर भर्ती हुए थे और उनके लिए बने होस्टल के सारे कमरे भर चुके थे। इतने सारे अफसरों के वहां रहते हुए उस होस्टल की पूरी व्यवस्था देखना बड़ा काम था और एक डिप्टी इंजीनियर शेखर रॉय को वह जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

हमारे रहन-सहन और खान-पान की व्यवस्था ठीक चल रही थी, इसमें कोई संदेह नहीं। उसके अलावा शेखर रॉय बोहो क्लब का काम भी देखते थे। हम अप्रेंटिस अफसरों की ट्रेनिंग अमूल डेयरी में चल रही थी, जिसके तहत हमें अमूल से संलग्न प्राथमिक डेयरी सोसायटियों का काम प्रत्यक्ष रूप से करने के हेतु गांव में जाकर वहीं रहना आवश्यक भी कर दिया गया था। इस कारण हम कभी महीना भर बाहर भी रहा करते थे।

बहुत प्रयासों के बाद, स्वर्गीय डॉ. मित्तल, श्रीमती मित्तल और उस समय की नन्ही विनीता (अब प्रसिद्ध अंग्रेजी कवयित्री) की यह फोटो वृक्षमंदिर पर मिली। मनोज कुरुप और शायद डाक्टर कुरुप भी दिख रहे हैं। जी राजन द्वारा भेजी गई इस फोटो में कुलकर्णी साहब NDDB हॉस्टल की सीढ़ियों के पास खड़े दिख रहे हैं। यह फोटो वृक्षमंदिर के ब्लॉग ‘Blast from the Past’ पर उपलब्ध है, जो पुरानी यादें ताजा करती है।

इस तरह दो-तीन महीने बीते होंगे, जब एक दिन होस्टल में वापस आने पर मैंने वसंतराव को सामने देखा, तो मैं दंग रह गया। जिनको मैंने दो साल पहले मुंबई के न्यूजीलैंड होस्टल में देखा था, वे वसंतराव डेयरी बोर्ड की होस्टल में क्या कर रहे थे? उन्होंने भी मुझे एकदम से पहचाना और मुझे वहां देखकर वे भी चकित हुए। उसके बाद तो अनेक बातें स्पष्ट होती गईं। वसंतराव अपनी मुंबई की डेयरी डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की सरकारी नौकरी से प्रतिनियुक्ति यानी डेपुटेशन पर डेयरी बोर्ड में इस्टेट अफसर के पद पर नियुक्त हुए थे और इस्टेट के अलावा हमारे होस्टल की पूरी जिम्मेदारी उन पर सौंपी गई थी। अब डेयरी बोर्ड में उनकी पहचान व्ही. एस. कुलकर्णी नाम से थी।

इसके बाद उन्होंने होस्टल को ठीक से संभाला और हमें कोई शिकायत नहीं रही। लेकिन एक बात का जिक्र कर सकता हूं कि एक दिन कुछ अप्रेंटिस अफसरों ने मुझसे पूछा कि ‘सुबह जो नाश्ता हमें दिया जाता है, वह कुछ ठीक नहीं लगता, तो क्या कुलकर्णी न्यूजीलैंड होस्टल में ऐसा ही नाश्ता देते थे?’

उनकी तस्वीर देखकर मुझे एहसास हुआ कि वे कितने सरल स्वभाव के व्यक्ति थे! उन्होंने उस शाम की पार्टी के लिए कई तैयारियां की होंगी, लेकिन जब पार्टी चल रही थी तो वे दूर खड़े होकर देखते रहे। लगाव और अलगाव दोनों ही भाव स्पष्ट थे! मुझे लगता है कि वे कई वर्षों से कैंपस में अकेले रह रहे थे और उनका परिवार मुंबई में था।

डाक्टर मुकुंद नवरे

मैंने जवाब में कहा कि, ‘वहां पर सब ठीक था और यहां भी मुझे कोई समस्या नहीं है। वास्तव में हमें सोचना चाहिए कि हम लोग अलग-अलग राज्यों से आते हैं, तो हम सभी को ठीक लगे ऐसे व्यंजन बनाना भी तो कठिन है।’ उसके बाद कभी कोई ऐसी बात नहीं हुई और वसंतराव अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाते रहे। मुझे याद आता है कि उन दिनों दो या तीन बड़ी पार्टियां भी होस्टल में हुईं, जब डेयरी बोर्ड के सभी स्टाफ सदस्य परिवार के साथ शामिल हुए थे और खान-पान की पूरी व्यवस्था वसंतराव ने संभाली थी। खैर।

एनडीडीबी आनंद में योगदान और विस्तार

महीने निकल गए और हम लोग अप्रेंटिस से पूरी तरह अफसर बन गए। उसके साथ हम होस्टल से बाहर निकल गए। बाद में हम लोग अलग-अलग प्रोजेक्ट पर गए और हमने डेयरी बोर्ड के क्षेत्रीय काम को आगे बढ़ाया। फिर भी जब कभी मैं काम के लिए, जैसे कोई मीटिंग हो, आनंद आता था, तब वसंतराव मुझे बाहर कैंपस में कुछ न कुछ काम पर नजर रखते दिखते थे। हमेशा सफेद बुश शर्ट और आंखों पर धूप का चश्मा होता था। कैंपस भी उनकी निगरानी में हरा-भरा होता दिखाई देता था। कैंपस में नई बिल्डिंगें बनती गईं, आवास की व्यवस्था बनी, किसानों के लिए होस्टल तथा अभ्यागतों के लिए बहुमंजिला होस्टल बना, अतिथि गृह बने, इरमा का नया कैंपस बना और सबके आसपास नए बगीचे बनते गए, पौधे बड़े होकर वृक्ष बन गए। इन सबमें पर्यावरण की दृष्टि से वसंतराव का योगदान खूब रहा होगा, ये मेरी धारणा है, मेरा विश्वास है।

जी राजन द्वारा भेजा गया यह फ़ोटो १९७२ का है। लगभग उसी साल कुलकर्णी साहब एनडीडीबी में कार्यभार सँभाला होगा। तब और अब कितना बदलाव !

मैं अब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि डेयरी बोर्ड के संस्थापक चेयरमैन डॉ. कुरियन ने जब डेयरी बोर्ड की कल्पना की होगी, तब उनके मन में कैंपस का जो चित्र उभरा होगा, उसे पूर्ण रूप देने के लिए जिस तरह आर्किटेक्ट कानविंदे ने इमारतों का निर्माण किया; उसी प्रकार कैंपस को सौंदर्यपूर्ण बनाने के लिए किसी ने लैंडस्केप बनाया होगा। लेकिन उसे भी प्रत्यक्ष रूप में लाना और उसका रखरखाव करना कोई आसान बात नहीं थी।

इस काम के लिए डॉ. कुरियन ने बड़ी सोच-समझ से वसंतराव का चयन किया और वे उन्हें मुंबई से आनंद डेपुटेशन पर ले आए। यह डॉ. कुरियन की दूरदृष्टि का प्रतीक भी था। बाद में वसंतराव डेयरी बोर्ड की सेवा में शामिल हो गए। मेरी और एक धारणा यह भी है कि डेयरी बोर्ड ने आनंद के बाहर उन दिनों जितने नए डेयरी प्रोजेक्ट हाथ में लिए, उनके लिए टर्नकी एग्रीमेंट होता था, जिसके तहत डेयरी प्लांट के साथ पूरे परिसर में भूमि विकास करते बगीचा बनाने का काम भी होता था। और इस काम के लिए वसंतराव को पश्चिमी विभाग में बनी डेयरी प्रोजेक्ट पर जरूर भेजा गया होगा। इसमें डेयरी बोर्ड का मुंबई में बना विभागीय कार्यालय और कैंपस भी अवश्य रहा होगा।

तीसरी मुलाकात: मुंबई मे एनडीडीबी कैंपस, 1984

अब सन 1984 में आते हैं। उस समय मुंबई में डेयरी बोर्ड का कैंपस बन चुका था। उसके बगल में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर महानंद डेयरी थी, जिसका निर्माण डेयरी बोर्ड ने टर्नकी बेसिस पर किया था और उसका हस्तांतरण होने के बाद में महाराष्ट्र डेयरी फेडरेशन उसे चला रही थी। मेरी नियुक्ति उस फेडरेशन में सन 1986 के अप्रैल में हुई और मैंने अपना मैनेजर पद का कार्यभार संभाला। ऑपरेशन फ्लड योजना से संबंधित राज्य भर जितने भी कार्य थे, उनसे मेरा प्रत्यक्ष संबंध था।

इसी कारण से बगल में बसे डेयरी बोर्ड के कार्यालय में जाने की जैसे शुरुआत हुई, तो मैंने वहां बाहर बगीचे में वसंतराव को देखा। उनसे अलग जगह पर मिलने का यह तीसरा मौका था। बिलकुल उसी तरह वे बगीचे में काम पर निगरानी कर रहे थे, जैसा करते मैंने उन्हें सत्तर के दशक में देखा था। उनसे बात की, तब पता चला कि वे कुछ साल पहले डेयरी बोर्ड से निवृत्त हुए थे और उन्होंने बगीचों का मेंटेनेंस करने वाली एक एजेंसी खोली थी।

सालभर के ठेके पर वे कुछ कंपनियों को सेवा दे रहे थे। वे बोरीवली उपनगर में रहते थे और वहां से उनका कारोबार चल रहा था। इसके चलते उन्होंने दस-बारह लोगों को रोजगार उपलब्ध किया था। मैं देख रहा था कि डेयरी बोर्ड के कैंपस में उन्होंने बगीचा बड़ी अच्छी तरह से संभाला था, जो देखने लायक था। और सच कहें तो बगल में हमारी महानंद डेयरी का जो बगीचा था, वह उसके सामने कुछ भी नहीं था। क्योंकि हमारे यहां कुछ कामगार तो थे, लेकिन बगीचे पर माया करने वाले वसंतराव जो नहीं थे।

महानंद डेयरी में योगदान और सीख

यह बात मेरे मन में रही और करीब दो साल के बाद जब मौका आया, तब हमारे मैनेजिंग डायरेक्टर को यह समझाने में मैं कामयाब हुआ और हमने निर्णय लिया कि महानंद डेयरी के बगीचे का मेंटेनेंस हम वसंतराव कुलकर्णी को देंगे और क्या फर्क पड़ता है, यह सालभर में तो खुलकर सामने आएगा ही। जब वसंतराव से बात हुई, तब उन्होंने स्वीकार किया और उनके साथ हमने एग्रीमेंट कर डाला।

जैसे उन्होंने शुरुआत की, कुछ ही महीनों में हमारा बगीचा खिल उठा। पौधों पर चमक आई और खिलते फूलों की संख्या बढ़ती गई। दूसरे साल में सिलसिला जारी रहा और हमारा बगीचा भी इतना बढ़िया हुआ कि वहां भी किसी फिल्म की शूटिंग हो सके। वसंतराव ने काम खूब दिलचस्पी से किया और अपनी एक कल्पना प्रस्तुत करके हमारे प्रवेशद्वार के बराबर सामने दिखाई दे ऐसा हमारा बोधचिन्ह (Logo) लाल रंग की वनस्पति से विकसित किया, जो हरे रंग की लॉन पर उभरा हुआ था। बगीचे में रोज उनके कामगार काम करते थे और वसंतराव स्वयं सप्ताह में दो-तीन बार आते थे। जब कभी हमें वक्त मिलता था, तब वे मेरी केबिन में आते थे और मुझे उनसे काफी कुछ नई जानकारी मिलती थी।

एक बार मैंने उन्हें पूछा कि, ‘इमारत के भीतर मिट्टी के गमलों में कुछ पौधे बहुत बड़े दिखते हैं, उनके पत्ते भी मोटे होते हैं, तो इमारत में रहकर वे भला इतने बड़े कैसे बन पाते हैं?’

उन्होंने माना कि ये पौधे इमारत के भीतर साधारणतः इतने बड़े नहीं हो सकते। फिर उन्होंने तीन-चार कारण बताए, जिससे यह संभव होता है। वे बोले कि, पहली बात तो मिट्टी का जो गमला होता है, वह बहुत बड़ा होता है, जिसमें मिट्टी अधिक होती है। दूसरी बात ये कि बड़ा होने वाला पौधा हर दो या तीन महीनों बाद इमारत के बाहर धूप मिले, इस तरह अनेक दिनों तक रखना पड़ता है। इसका मतलब ये गमले भीतर-बाहर आते-जाते रहते हैं, जो आप लोगों को पता नहीं पड़ता।

तीसरी बात ये कि उन गमलों में जो मिट्टी होती है, वह दो सालों में एक बार पूरी बदल दी जाती है, जिससे उस पौधे के पोषण के लिए आवश्यक तत्व नए सिरे से मिलते हैं। और चौथी महत्वपूर्ण बात कि, मिट्टी बदलते समय उस पौधे की सभी जड़ों को अंत तक पानी से बहुत अच्छी तरह से धोया जाता है, जिससे उनकी सारी शाखाओं के अंत तक जमी मिट्टी पूरी धुल जाती है। ये सब कुछ होता है, तभी हमें ठीक नतीजा मिलता है। उनसे ये बातें सुनकर मैं दंग रह गया। मैं सोचता ही रहा कि आज तक इतनी सारी जगहों पर वसंतराव ने ऐसे कितने पौधे लाड़-प्यार से बड़े किए होंगे।

मुझे लगता है वसंतराव सन 1992 तक महानंद डेयरी को अपनी सेवा देते रहे। 1994 तक मैं अपने पद पर रहा।

चौथी मुलाकात: जलगांव दूध उत्पादक संघ, 1997

अब सन 1997 की बात करते हैं। तब एक अलग परिस्थिति में जलगांव दूध उत्पादक संघ में मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर मेरी नियुक्ति हुई थी। वैसे तो संघ और उसकी डेयरी को बनकर 25 साल बीत चुके थे। लेकिन कुछ गलत नीतियों के कारण संघ को आर्थिक नुकसान होकर संघ की डेयरी 1995 में बंद हो गई थी। ऐसी अवस्था में उसे पुनर्जीवित करने के लिए डेयरी बोर्ड को प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) बनाया गया था। इस काम के लिए डॉ. अब्राहम जोसेफ प्रशासक के नाते नियुक्त हुए थे और उसके एक साल बाद मैं वहां मैनेजिंग डायरेक्टर बना था।

उस समय पहले तो डेयरी को दुबारा शुरू किया गया और दूध संकलन बढ़ाने के प्रयत्न शुरू हुए। उसके बाद डेयरी में कुछ नए संयंत्र, पुराने प्लांट की दुरुस्ती आदि काम भी हाथ में लिए गए। इसके साथ डेयरी के प्रांगण में जो बगीचा था, उसमें आई भारी गिरावट को देखकर उसमें जान डालने की आवश्यकता महसूस हुई थी।

वह जादुई असर करने के लिए अर्थात् वसंतराव के नाम का विचार हुआ था। मेरी नियुक्ति हुई और कुछ ही दिनों बाद उनकी मेरी मुलाकात जलगांव में हुई। उस समय वसंतराव मुंबई से सलाहकार के तौर पर आकर बगीचे पर निगरानी रखते थे और कामगारों को उचित सूचनाएं देकर नतीजा हासिल करते थे। कितने सारे पुराने पौधे सूख गए थे या मर भी गए थे, उनकी जगह पर उसी जाति के नए पौधे लगाए गए। उसी के साथ डेयरी तथा हमारे शीतकरण केंद्रों के परिसरों में खाली जगह पर हमने सागवान के पौधे लगाए। इसके अलावा जलगांव शहर के सौंदर्यीकरण में हिस्सा लेते हुए हमने रास्तों के द्विभाजकों पर पौधे लगाकर उन्हें लोहे की जालियों में सुरक्षित किया और पानी तक देने की व्यवस्था की। इन सभी उपक्रमों में वसंतराव का मार्गदर्शन मिला था। उन दिनों जब भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हमारे यहां आते, तब उनके हाथों किसी रिक्त स्थल पर हम वृक्षारोपण जरूर करवाते थे।

अब सोचता हूं तो लगता है कि उस समय वसंतराव की आयु 67 साल की तो रही होगी, फिर भी वे अपने काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करते थे। एक बार मैंने जानना चाहा कि और कितनी जगह पर उनका काम चल रहा है, तो उन्होंने जवाब में कहा कि अब ज्यादा काम उनसे होता नहीं, लेकिन ठाणे में किसी कंपनी के बगीचे का काम उन्होंने हाथ में लिया है। वहां भी ऐसी चुनौती है कि कंपनी के चेयरमैन ने उन्हें कहा है कि कंपनी का बगीचा इस तरह फूलता रहे कि चेयरमैन केबिन के बाहर रखे हुए बड़े फ्लावर पॉट में रोजाना एक सौ ताजा गुलाब के फूल उन्हें रखने होंगे, जो उसी बगीचे में खिले हों। बस, उस एक शर्त पर उन्हें काम दिया गया था और उस चुनौती को पूरा करते समय जो भी सीमित आकार का बगीचा था, उसमें से वे हर महीने तीन हजार फूल निकाल रहे थे। यह सुनकर मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि ऐसी कोई शर्त भी हो सकती है और उसे पूरा करने वाला वसंतराव जैसा व्यक्ति भी होता है!

अंतिम मुलाकात: बोरीवली में ज्येष्ठ नागरिक संघ, 2006 के बाद

यह कहानी अब एक अलग मोड़ पर आती है। नई शताब्दी में 2006 के बाद मेरी कथाएं मासिक और वार्षिक अंकों में प्रकाशित होने की शुरुआत हुई थी। मुंबई में बोरीवली से प्रकाशित होने वाली “श्रीअक्षरधन” नामक पत्रिका द्वारा आयोजित कथास्पर्धा में मेरी कथाओं को दो बार पुरस्कार मिला था। इस कारण उस पत्रिका के संपादक डॉ. रामदास गुजराथी से मेरा परिचय हुआ था। वे एक निवृत्त प्राचार्य थे और मुंबई ग्राहक पंचायत के अध्यक्ष भी थे। उसके अलावा बोरीवली में उनके विभाग में बने ज्येष्ठ नागरिक संघ के वे अध्यक्ष भी थे। जब उन्होंने जाना कि दुग्ध विकास के क्षेत्र में मेरा काम रहा है, तब उन्होंने अपने ज्येष्ठ नागरिक संघ की मासिक सभा में आकर उनके सदस्यों को मेरे अनुभव कथन करने के लिए मुझे आमंत्रण दिया। अर्थात् मैंने उसे स्वीकार किया और उस नियोजित दिन पर शाम के वक्त मैं पहले डॉ. गुजराथी के घर पहुंचा और बाद में वे मुझे कार्यक्रम के स्थल पर ले गए।

जब हम वहां पहुंचे, तब मुझे आश्चर्य हुआ कि बाभई नाके के पास एक छोटे से बगीचे में उस ज्येष्ठ नागरिक संघ का अपना एक कमरे का कार्यालय था और साथ में लाइब्रेरी थी। हम उस कार्यालय में कुछ देर बैठे रहे। बाहर बगीचे में तो सौ लोग बैठ सकें, इस तरह की व्यवस्था थी और सफेद प्लास्टिक कुर्सियां भी लगी थीं। शाम का वक्त था, तो बगीचे का वातावरण बहुत ही सुंदर लग रहा था। जैसे नियोजित समय आया, वैसे हमने पाया कि एक-एक करके लोगों का आना शुरू हुआ और बाहर के लॉन पर सारी कुर्सियां भर गईं।

अब हम बाहर बगीचे में आए और हमारे लिए लगी कुर्सियों पर विराजमान हो गए। उसके बाद जैसे ही मैंने सामने बैठे हुए ज्येष्ठ नागरिकों पर नजर दौड़ाई, तब मेरे सामने पहली कतार में बैठे वसंतराव को मैंने देखा!!

मैं तो दंग रह गया! वसंतराव को तो मेरे वहां पर आने का पता था, लेकिन मेरे लिए उनका वहां होना बड़ा ही आश्चर्यजनक था। वसंतराव बोरीवली में रहते थे, यह बात तो कई साल पहले सुनी थी, लेकिन वे इस तरह मिलेंगे, यह सोचा नहीं था। अब तो शायद उनकी उम्र अस्सी साल से ज्यादा थी, फिर भी डेयरी क्षेत्र के मेरे अनुभव सुनने के लिए वे जरूर प्रयास करके आए थे। वैसे भारत में हुए दुग्ध विकास से वे भी परिचित थे और चाहते तो मेरे भाषण को दुर्लक्षित कर अपने घर में बैठे रहते। लेकिन नहीं, वे मेरा भाषण सुनने के लिए आए, यह सोचकर मैं थोड़ा भावुक हुआ। डॉ. गुजराथी शायद समझ गए कि मेरी और वसंतराव की पहचान पहले से रही होगी। उन्होंने भरी सभा को मेरा परिचय कराया और बाद में कहा कि मेरे भाषण में दुग्ध विकास के अलावा मैं डॉ. कुरियन के साथ जो अनुभव रहे हों, उन्हें बताऊं और ज्यादा कर अमूल आइसक्रीम पर बोलूं, जो सभी ज्येष्ठ नागरिकों को बहुत पसंद है।

फिर मैंने भाषण की शुरुआत की और पहले तो वसंतराव के नाम का उल्लेख किया। मैंने कहा कि पिछले चालीस वर्षों का मेरा सफर जिन्होंने अपनी आंखों से देखा है, वे वसंतराव, आपके एक सदस्य, आज यहां उपस्थित हैं, यह एक बड़े संयोग की बात है। उनके सामने पहले आरे कॉलोनी और बाद में आनंद में मेरा प्रशिक्षण हुआ और उसके बाद अनेक जगहों पर भिन्न संस्थाओं में हमने साथ में काम किया। इसलिए मेरे भाषण में जो कुछ कहा जाएगा, उसे प्रमाणित करने की जरूरत भी नहीं होगी, क्योंकि उन बातों के एक साक्षी वसंतराव यहां मौजूद हैं। बाद में जो भाषण हुआ, उसमें भारत की भूतपूर्व दूध समस्या, आरे कॉलोनी, डॉ. खुरोदी, अमूल डेयरी, त्रिभुवनदास पटेल, डॉ. कुरियन, ऑपरेशन फ्लड योजना, 1970 में रहा दूध उत्पादन और आज की उपलब्धि आदि सभी मुद्दे मैंने जुटाए और बोलता गया। उसके बाद सवाल-जवाब हुए।

वसंतराव मेरी सभी बातें सुनते रहे और कभी हंसकर तो कभी गर्दन हिलाकर सहमति दर्शाते गए। वह कार्यक्रम करीब दो घंटे चला और मेरे लिए अविस्मरणीय बन के रह गया। शायद किसी सार्वजनिक जगह पर किया वह मेरा आखिरी भाषण था। उसके बाद न तो कभी वसंतराव से दुबारा मिलने का मौका मिला। फिर भी सोचता हूं कि उनका और मेरा अजीब नाता रहा और मेरे जीवनकाल में वे किसी वृक्ष की तरह, अलग-अलग जगह मुझे छाया देते रहे।


By Vrikshamandir

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