Categories
Audio Culture, Tradition, Human Development and Religion Poetry Story

ग़ज़ल

डाक्टर पी के श्रीवास्तव 

संप्रति बंगलूरू निवासी एनडीडीबी के भूतपूर्व कर्तव्यपालक डाक्टर प्रेम कुमार श्रीवास्तव, “पीके” की पहचान केवल एक तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारी की नहीं है; वह “डेयरी व्यवसाय गुरु” के रूप में भी जाने जाते हैं जो एक कुशल कंसलटेंट के रूप में अपने ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर, “पीके” ने अपने भीतर के कलाकार को भी जगाया है।शौकिया शायरी और व्यंग्य लेखन में उनकी रुचि ने उनकी कला रुचि को एक नए आयाम में प्रवेश कराया है। पेश है, पीके नई गजल जहाँ आशिक की बेचैनी के सबब का बयां किया गया है। आखिर पीके डर क्यों रहे हैं कि कहीं आशिक़ उल्फत के चक्कर में ऐसा फँसे कि वह ख़ुद ही कब्र पर लगाया जाने वाला शिलालेख बन जाय !


अपनी बेचैनी का सबब जानता हूँ मैं
उसने ही रुसवा किया मानता हूँ मैं
परेशां हूँ कि दिल का राज़ सुनते ही
ख़ामोशी भीग जायेगी जानता हूँ मैं

उसकी मौजूदगी ख़ला भर देती है
दर्दे -जिगर कुछ कम कर देती है
कोशिश है न डूबूं उसकी आँखों में
वो चश्मे-नम हमें मजबूर कर देती है

उसकी आँखों में शिफ़ाई खोजता हूँ मैं
भीगी आँख से अश्क पोंछता हूँ मैं
कहीं इसरार ना कर बैठूँ चंद साँसों की
डूबती साँसों में एक आस खोजता हूँ मैं

उसकी कशिश दिल से जाती नहीं है
कोई तदबीर भी नज़र आती नहीं है
बारहा रोकता रहा हूँ अपने दिल को
उसकी नक़्श भुलाई जाती नहीं है।

तमाम लोग सुर्ख़रु हुये हैं इबादत में
कई लोग फ़ना भी हुये हैं मुहब्बत में
हमने भी अर्ज़ी लगाई है बुत-परस्ती की
लौह-ए-मज़ार न बन जाऊं कहीं उलफ़त में





कठिन शब्द:

सबब= कारण

रुसवा=बदनामी, बेइज्जत, ज़लील, लांछित

ख़ला= चुभन, पीड़ा, दर्द

चश्में-ए-नम= आँसू भरी आँखेँ

शिफ़ाई= रोग से आराम, आरोग्य, उपचार

इसरार= मांग, आग्रह, हठ

कशिश= खिंचाव, आकर्षण

तदबीर=इंतिज़ाम, युक्ति, चारा, तरकीब, मंसूबा, उपाय

नक्श=तस्वीर, चित्र, छवि

सुर्ख़रु= तेजस्वी, कांतिवान, प्रसिद्ध, कामयाब

फ़ना= बर्बाद, समाप्त

बुत-परस्ती= मूर्ति पुजा

लौहे-ए-मज़ार= कब्र पे लगाया जाने वाला शिला-लेख

उलफ़त= प्यार, प्रेम



By Vrikshamandir

A novice blogger who likes to read and write and share

One reply on “ग़ज़ल”

Comments are welcome

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Discover more from Vrikshamandir

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading