हम विकास चाहते हैं? एक संवाद

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रश्मिकांत नागर का पहला हिंदी लेख । वृक्षमंदिर के लिये विशेष !

जब स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और स्वच्छंद व्यवहार को भी मानवाधिकार मानने का चलन एक तरह से फ़ैशन बन चुका हो, जब राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर सिर्फ़ बे सिर पैर के बेतुके आरोप प्रत्यारोप लगाने को ही राजनीति मान बैठे हों, तब क्या किसी तरह का सार्थक विमर्श हो सकता है ?

पर नागर ने कोशिश की विकास पर विमर्श की।

वही “विकास” जो हम विशेषत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से करने में लगे हैं । पर विकसवा है कि आते आते आ तो जाता है पर रुकता नहीं। सनीचर लगा है जो उसके पैरों में । भाग जाता है । फिर नया भाग्य विधाता अवतरित होता है । उसी विकास की दुहाई दे कर जो पहले कई भाग्यविधाता लाने का आश्वासन देते रहे हैं। पर विकास ऐसा ढीठ कि आ कर रुकता ही नहीं ।

नागर के पुराने परिचित से हुये संवाद से एक प्रश्न तो उठता ही है हम में से कितने हैं जो दिल से विकास चाहते हैं ?

जी हाँ, हम विकास चाहते है, पर सिर्फ़ दिमाग़ से, दिल से नहीं। 

कल अचानक एक पुराने परिचित से मुलाक़ात हुई, वर्षों बाद। पुराने दिन याद किए जब हम आपस में बात कम और विवाद अधिक किया करते थे। आज फिर मौक़ा मिला, तो शुरू हो गये। विषय था विकास। जी हाँ, ज्वलंत विषय पर बहस में ही तो असली मज़ा है। मेरे इन परिचित को सबसे अधिक आनंद मिलता है विरोध करने में। वे विकास के इन दिनों प्रचलित तरीक़ों और योजनाओं के घोर विरोधी निकले। एक विषय विशेष पर हम लग गये जिस पर आजकल हर कोई विरोध कर रहा है।


मैंने चुटकी ली, “ अगर हम सही में दिल से विकास चाहते हैं तो हमें अपनी सोच सकारात्मक रखनी होगी”। “नहीं, हम जन्मजात विरोधी हैं और विरोध करते रहेंगे, क्योंकि विरोध करना हमारा संवैधानिक अधिकार है और भला हम अपने इस अधिकार का उपयोग क्यों न करें”? मेरी बात को हल्के में लेते हुए उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा।
“पर कुछ देश का ख़याल कीजिये जनाब। सिर्फ़ विरोध करने के लिए विरोध ठीक नहीं। इससे जनता में भ्रांतियाँ फैलती हैं”, मैंने कहा।


“अरे कौन सा देश? कौन सी भ्रांतियाँ? देश जाए भाड़ में। हमें तो बस इतना याद है कि संविधान ने हमें अधिकार दिए है।हम विरोध करके हमारे संवैधानिक अधिकार का उपयोग कर रहे है बस”।“पर संविधान ने साथ में ज़िम्मेदारियाँ भी तो दी हैं”। उन्हें भी तो निभाना चाहिये”।मैंने दलील पेश की।


“नहीं साहब, हम ज़िम्मेदारियाँ निभाने की ज़हमत क्यों उठायें? उसके किए तो देशप्रेमी होना पड़ता है। इसके लिए हमें हमारी आदतें बदलनी पड़ेंगी, और ७० सालों की बिगड़ी आदतों को अब हम क्यों बदले? अब तो यह हमारे चरित्र का अभिन्न अंग बन गई हैं। क्या सरकारों ने हमें पिछले ७० सालों में हर ग़लत काम कर साफ़गोई से निकलने में प्रशिक्षित नहीं किया है क्या”? वे बोले।


“क्या आपका इशारा क़ानून का पालन न करने वालों पर कोई ठोस कार्यवाही न करने, सब्सिडी देकर लोगों को कामचोर बनाने, शिक्षा के स्तर को लगातार गिरने देने जैसी मूलभूत विषयों पर तो नहीं है”? मैंने बात आगे बढ़ाई।

“है तो । पर इससे क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है? अब तो हमें क़ानून तोड़ने की और हर बात का विरोध करने की, चाहे वह कितनी भी न्यायसंगत क्यों न हो, आदत सी हो गई हे, या यह कहिये नशा सा हो गया है। इन बातों ने हमारे दिल को संवेदनहीन बना दिया है। फिर भी, अगर आप कहते हैं तो कोशिश करेंगे परंतु, हमें यह चीज़ें न करने को कभी मत कहना मसलन- धरनेबाज़ी।

हमें तो बस मौक़ा मिलना चाहिये। जहाँ भी लगता है की शोर-शराबा मचाया जा सकता है, लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ की जा सकती है, हम मैदान में कूद पड़ते हैं। हम ये तो क़तई बंद नहीं करेंगे।

यातायात के नियम पालना जैसे- अपनी लेन में रहना, ग़लत दिशा से वाहन लेकर नहीं आना, दुपहिया वाहन पर दो से अधिक लोगों का सवार न होना, हेलमेट अवश्य पहन कर दुपहिया वाहन चलना, कार में सीट बेल्ट बाँधना, ग़लत दिशा से ओवर् टेक न करना, ज़ेब्रा लाइन के पीछे वाहन रोकना, दाएँ-बायें मुड़ने का सिग्नल देना आदि।

“पर आप यह नियम क्यों नहीं पालेंगे? यह तो बड़े साधारण से, यातायात के व्यावहारिक नियम है”? “ इनके पालन में आपकी ख़ुद की भी तो सुरक्षा है?” मैंने तर्क दिया।

“बड़े भोले हो यार”, वे बोले। “अगर ऐसा ही होता, तो क्या राज्य सरकारें केंद्र के बनाए यातायात क़ानून की धज्जियाँ उड़ातीं? नियमों में ढील देती? अजी साहब, राज्य सरकारें ख़ुद नहीं चाहतीं की यातायात के नियमों का पालन हो। हम तो बस वही कर रहे हैं, जो राज्यों की सरकारें चाहती हैं। वे वोट बैंक टूटने का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहतीं और हम तो वोट बैंक हैं। सोने के अंडे देने वाली मुर्ग़ी को भला कौन हलाल करता है? मेरी मानिये, पुलिस वालों को भी, मुझे ऐसा लगता है कोई निर्देश मिला हुआ है कि वे हम जैसे नियम तोड़ने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही न करें। देखिये कैसे चौराहों पर गुट बना कर खड़े होते हैं और गप-शप करते रहतेहै”।


मैं निरुत्तर। फिर भी बात आगे बढ़ाई। “चलिए कम से कम शहर की सफ़ाई में तो…….”


“तो क्या? अरे जनाब, कभी स्कूटर चलाते चलाते कचरे की पोटली फेंक कर देखिए, क्या मज़ा आता है जब थैली फट जाती है और सारा कचरा इधर उधर बिखर जाता है”।


“पर इस तरह गंदगी फैलाना अच्छी बात तो नहीं”।


“साहब, अगर हम गंदगी नहीं फैलाएँगे तो म्यूनिसिपैलिटी के सफ़ाई कर्मचारी क्या करेंगे? जब उनके पास काम नहीं होगा तो क्या उनकी नौकरी नहीं चली जाएगी? आजकी बेरोज़गारी के दौर में ग़रीब लोगों की नौकरी बचाये रखना कितना ज़रूरी है? क्या ये हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है? हम जैसे लोग ही तो रोज़गार बढ़ाने में मदद करते हैं”।


“लेकिन म्यूनिसिपैलिटी ने जगह जगह पर कचरे के बिन लगाये है, आप कम से कम उनका उपयोग कर सकते हैं”।


“जनाब, क्या आपने इन बिनो की डिज़ाइन पर ग़ौर किया है? गाय, कुत्ता, गधा, कोई भी इसमें से मुँह मार कर कुछ भी निकाल लेता है। इसीलिए तो हम उनके लिए पहले से ही सब कुछ सड़क पर ही बिछा देते है। बेचारे जानवरों को मेहनत ना करनी पड़े। फिर बिन में तो हर तरह का कचरा होता है। माना कि गीले और सूखे कचरे के लिए अलग अलग छोटे बिन लगाये हैं, पर बड़े बिन में तो सब एक साथ ही मिला दिया जाता है। और जब सड़क पर पहले से ही कचरा फैला हुआ हो तो चलते स्कूटर से दूर से पोटली फैंकने में ही भलाई है”।
मैं फिर निरुत्तर।


“आप आजकल करते क्या है”, मैंने पूछ ही लिया।


“आप कहीं इनकम टैक्स विभाग से तो नहीं”? उत्तर प्रश्न के रूप में मिला।

“अरे नहीं, में तो रिटायर्ड हूँ, शिक्षक था”। मैंने सफ़ाई दी।


“तब ठीक है, वरना पता नहीं कब पकड़े जाए, बेरोज़गारी भत्ता मिलना बंद हो जाए और टैक्स भरने की नौबत आ जाए। स्वरोज़गारी होने का यही फ़ायदा है। सरकार से कहो बेरोज़गार हूँ, ख़ुद का छोटा- मोटा व्यापार करते रहो और बेरोज़गारी भत्ता भी वसूलो। इसे कहते हैं पाँचो उँगलियाँ घी में और सर कढ़ाई में”।


“पर देश”? मैंने फिर प्रश्न किया।


“यार, तुम रिटायर्ड लोगों की यही समस्या है। राम का नाम लो भाई, क्यों फजूल सा सिरदर्द मोल लेते रहते हो। जब तक हम जैसे लोग मौजूद हैं, समस्याएँ ऐसे ही जीवंत रखी जाएँगी। आख़िर हमारी वजह से ही तो छूटभैये नेताओं और मीडिया की दुकान चलती है। उन्हें भी तो हम ही काम में लगाये रखते है। क्या चाहते हो, वे बेरोज़गार हो जायँ?


में तीसरी बार निरुत्तर। उन्होंने मेरा परेशान चेहरा देखा, मुस्कुराए, स्कूटर स्टार्ट किया और देखते ही देखते ओझल हो गए।


राजीव गांधी ने सही कहा था, “ मेरा भारत महान”।

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Vrikshamandir

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