हिंदू मंदिरों और घरों में देवताओं के चित्र क्यों हैं?

यजुर्वेद की एक रृिचा है ना तस्य प्रतिमा अस्ति” – अर्थात् “उसकी कोई छवि नहीं है फिर हमारे मंदिरों और घरों में देवताओं के चित्र और मूर्तियाँ क्यों हैं?

यह प्रश्न पूछा गया था Qura पर अंग्रेज़ी में। इस प्रश्न का जो उत्तर श्री विट्टल सेट्टी ने अंग्रेज़ी में लिखा है उसे पढ़ने के बाद मुझे लगा। कि उनके लेख को हिंदी पाठकों तक भी पहुँचाना चाहिये। मैंने विट्टल जी से संपर्क किया और उनकी अनुमति से उनके लिखे उत्तर का हिंदी में अनुवाद नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ । मूल अंग्रेज़ी उत्तर इस लिंक पर उपलब्ध है ।

Original answer on Qura by Shri Vittal Shetty

ठीक है … ठीक है आपने अपने प्रश्न मे चित्रों के साथ पूजा करने के औचित्य पर सवाल उठाते हुये एक यजुर्वेद से श्लोक उद्धृत किया हैं ।

तो यहाँ एक और श्लोक है, जो शायद आपको कुछ और ही संकेत दे सकता है;

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्

तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये l

यह मंत्र ईशोपनिषद से है। इसका अर्थ है;

स्वर्णपात्र से ढका है सत्य का मुख । 
अनावृत करो पूषन मुझ सत्यधर्मा के हेतु।

अथवा दूसरे शब्दों में हे सत्य, हे प्रभु ,हे जगतनियंता, हे ईश्वर तुम्हारी छवि तुम्हारी स्वयं की स्वर्णिम चकाचौंध के आवरण से ढकी हुई है । कृपया आवरण हटा कर अपने सत्यधर्मा भक्त को अपनी छवि दिखला दो।

देखिए मैंने आपको सिर्फ शास्त्रों में से एक श्लोक दिखाया है, जो ईश्वर के बारे में है।

आपके श्लोक के अनुसार ईश्वर का कोई रूप नहीं है, मैंने एक और श्लोक का उद्धरण दिया जो जिसके अनुसार ईश्वर का रूप है ।

क्या आप अब भ्रमित हो गये हैं? चलिये मैं आपको इसी ईशोपनिषद के एक और श्लोक उद्धरित कर और भ्रमित करता हूं।

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके.

तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:

गतिशील है यह और स्थिर भी दूर है और पास में भी
यही है इस सब के अन्दर और यही है इस सब के बाहर ।

दूसरे शब्दों में , वह चलता है, नहीं भी चलता है , वह बहुत दूर है पर वह बहुत ही निकट भी है, वह हर चीज़ के भीतर है और फिर भी वह हर चीज के बाहर है ।

अब हम इसमें से क्या समझ बनायें ? यह स्पष्ट है कि इस द्विचर (बायनरी) दुनिया में, कोई भी चीज सही और गलत दोनों नहीं हो सकती है। फिर भी, शास्त्रों में हम श्लोकों के इतने उदाहरण देखते हैं जो स्पष्ट रूप से एक दूसरे के विरोधाभासी हैं।

हम इन विरोधाभासों पर हम सांप्रदायिक दृष्टिकोणों से अथवा व्हाटएबाउटरी ( त्वरित शब्द चुनौती ) से वाद, विवाद तो कर सकते हैं, पर क्या वह लोग जो ऐसे वाद विवादों में पड़ते हैं वास्तव में सच्चाई जानने के इच्छुक होते हैं?

उनके पास आमतौर पर अपना खुद का एक एजेंडा होता है, और अपने एजेंडे का समर्थन करने के लिए, वे चुनिंदा चीजों को चुनते हैं और उन चीजों को छोड़ देते हैं जो उनकी योजनाओं में फिट नहीं होती हैं। “राम अबलो” पहले ही अपने अद्भुत उत्तर में इस बारे में बात कर चुके हैं

लेकिन जो लोग वास्तव में सत्य के खोजी हैं, वे ऐसे स्पष्ट विरोधाभासों से ऊपर उठ सकते हैं। वे दूरदर्शी संप्रदायवादी धारणाओं और क्षुद्रतावाद से ऊपर उठने वाले दूरदर्शी हैं। प्रकाशस्तंभ (बीकन) की तरह, वे बता सकते हैं कि ऐसे स्पष्ट से विरोधाभास किस तरह समझ में आ सकते हैं।

मैं आपसे स्वामी प्रभुपाद (इस्कॉन संस्थापक) द्वारा दी गई एक दृष्टांत व्याख्या साझा करना चाहूँगा ।

“खिड़कियां खोलें और सूरज को अंदर आने दें” – इस वाक्य में, सूरज किसके बारे में बताता है? यह सूर्य के प्रकाश को संदर्भित करता है, जो निराकार है, क्या यह नहीं है?

“नासा सूरज को पर एक जांच (Probe) भेज रहा है” – इस वाक्य में, सूरज आग की वास्तविक भौतिक गेंद को संदर्भित करता है, जिसका एक रूप है। क्या यह नहीं है?”

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि भौतिक सूर्य जिसे हम प्रतिदिन देखते हैं उसका अनुभव या वर्णन दो दृष्टिकोणों से किया जा सकता है। रूप और बिना रूप के। तो भगवान के लिये ऐसा क्यों नहीं हो सकता है?

जैसे भौतिक सूर्य का प्रकाश निराकार हैं, भगवान का रूप भी हो सकता है और हो सकता है और कि उनकी कुछ और विशेषताएं हो जो निराकार हों । क्यों नहीं?

वास्तव में, ईशोपनिषद का पहला मंत्र का जिसका उद्धरण मैंने दिया वह इस परिघटना ( फेनामेना) के बारे है। वैचारिक दृष्टि से कई दर्शन शास्त्रों (स्कूल आफ थाट) में ईश्वर को प्रकाश आदि के रूप में व्यक्त करते हैं लेकिन ईशोपनिषद के अनुसार ईश्वर अपनी ही चकाचौंध की चमक से आवृत्त है ।और भक्त विनम्रतापूर्वक प्रभु से प्रार्थना कर रहा है, कि वह उस आवरण को हटायें, अनावृत्त करे को दूर ताकि वह प्रभु का चेहरा देख सके।

जब शास्त्र कहते हैं कि भगवान का कोई रूप नहीं है, तो इसका अर्थ केवल यह इंगित करना है कि उनका रूप हमारे जैसा दुनियावी (मंडेन) रूप नहीं है। उनका रूप सर्व शक्तिमान है और वह हमारी सभी भौतिक समझ से परे है । इसलिए ईशोपनिषद के मंत्र में यह कहा गया वह एक ही समय में चलता है और नहीं चलता है।

कुछ ऐसी वैचारिक धाराओं को मानने वाले जो हठपूर्वक जिद करते हैं कि ईश्वर निराकार है, मेरे पास उनके लिए निम्न प्रश्न हैं:

1. क्या आप मानते हैं कि भगवान जो कुछ भी करते हैं उसे देखते हैं? यदि हां, तो आप स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी आँखें हैं, आप मानते हैं कि नहीं?

2. क्या आप मानते हैं कि आपका परमेश्वर आपकी प्रार्थना सुनता है? यदि हां, तो आप स्वीकार कर रहे हैं कि उसके पास कान हैं, है ना? हवा जैसी निराकार चीज़ सुन नहीं सकती है। सही कहा ?

3. क्या आप मानते हैं कि आपका भगवान दयालु है? तब फिर से आप स्वीकार कर रहे हैं कि उसके पास एक दिल है। फिर पानी जैसी निराकार चीज में दया के गुण नहीं हो सकते हैं?या हो सकते हैं?

4. क्या आप मानते हैं कि आपका ईश्वर सर्वज्ञ है? वह अतीत और भविष्य जानता है? तब आप स्वीकार कर रहे हैं कि उसके पास एक मस्तिष्क है, क्या आप नहीं मानते हैं? आखिर, कीचड़ जैसी निराकार चीज़ को ज्ञान संबंधित कोई विचार हो सकता है? या यह संभव है?

5. क्या आप मानते हैं कि आपका भगवान आपकी रक्षा कर सकता है? आपको बनाये रखता है । फिर उसके हाथ और पैर भी होंगे। उसका एक इरादा भी होगा आपकी रक्षा करने की, पोषण करने का। है। कभी किसी निर्जीव, निराकार चीज जैसे हवा के बारे में नहीं सुना कि वह किसी की रक्षा करती ह ?

6. बाइबल के पहली कुछ पंक्तियों में से एक है “और ईश्वर ने कहा, ” वहां प्रकाश होने दो ‘, और प्रकाश था।” तो अगर उसने कुछ कहा, तो निश्चित रूप से भगवान की एक जीभ होगी। है ना? हवा, कीचड़ कुछ भी बोल नहीं सकते ।

7. क्या आप अपने भगवान को झुक कर नमन करते हैं? तब आप स्वीकार कर रहे हैं कि उसके पास एक रूप है। आप केवल किसी “चीज” को नहीं, वरन “किसी” को नमन करते हैं।

8. क्या आप अपने को “अल्लाह का बंदा ” कहते हैं या “भगवान का सेवक” कहते हैं? तब आप स्पष्ट रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान एक व्यक्ति है। आप केवल एक जीवित व्यक्ति की सेवा कर सकते हैं, है ना? पानी जैसी निर्जीव निराकार चीज की सेवा करने का कोई मतलब नहीं है

9. क्या आप “खुदा का खौफ करो” शब्द का इस्तेमाल करते हैं? यदि हाँ, तो आप स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान की भावनाएँ हैं । है ना ? केवल रूप वाला व्यक्ति ही भावनाओं का प्रदर्शन कर सकता है, है ना? हवा जैसी चीज के के बारे में कभी नहीं सुना है कि वह जैसे “खौफ” (क्रोध) या “प्रेम” (प्रेम) प्रदर्शित करती हो।

10. क्या आप अपने ईश्वर को व्यक्तिगत सर्वनाम “वह (He)” कहते हैं? “वह सब देखता है”? बाइबिल में, भगवान को और भगवान के बारे में “ही” ( He) शब्द का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिये “भगवान ने प्रकाश को ‘दिन’ कहा, और अंधेरे को उन्होंने ‘रात’ कहा।” इसलिए यदि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है, तो ईश्वर को वह (He) कह कर क्यों संबोधित किया जाता है? ईश्वर के लिये इट’ ( It) शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया गया है? अंतत:, सभी निराकार चीजों के लिए, हम सर्वनाम “यह (It)” का प्रयोग करते हैं। क्या ऐसा नहीं हैं? जैसे कि, “हवा बहुत तेज थी, उसने (It ) छत को उड़ा दिया” न कि उसने (He) छत को उड़ा दिया”। ईश्वर को “वह” कहकर आप स्वीकार कर रहे हैं कि ईश्वर एक व्यक्ति है।

इसलिए यदि परमेश्वर देख सकता है, बात कर सकता है, सुन सकता है, जान सकता है, क्रोधित हो सकता है, दया दिखा सकता है तब वह वास्तव में निराकार कैसे हो सकता है? भगवान किसी व्यक्ति / या किसी व्यक्ति के सभी गुणों / पहलुओं (aspects) का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसलिये आप स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान का एक रूप है।

निष्कर्ष में कहना चाहूँगा कि हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण विद्वानों में से एक आदि शंकराचार्य थे । निश्चित रूप से वेदों के बारे में उनका ज्ञान हम में से किसी के यहाँ Quora से अधिक है। और आदि शंकराचार्य ने इतने सारे मंदिरों की स्थापना की और उनमें देवताओं को स्थापित किया। इनमें से सबसे प्रसिद्ध श्रृंगेरी शारदा पीठम है।

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आदि शंकर ने शारदा या सरस्वती के की मूर्ति यहां स्थापित की थी।

अनुमान करे श्रृंगेरी सारदा पीठ किस मत का प्रतिपादन ( Champion) करता है? वही यजुर्वेद का जहाँ से आपने उपरोक्त श्लोक उद्धृत किया है।

शंकराचार्य ने प्रसिद्ध “भजा गोविन्दम” (भगवान कृष्ण की आराधना की जिनके पास एक रूप और छवि है) की भी रचना की है।

हिंदू धर्म या सनातन धर्म समावेशी है और विभिन्न स्वभाव और स्थिति वाले लोगों के लिए भगवान की ओर ले जाने के लिये अलग अलग प्रावधान करता है। उसी तरह जैसे बच्चे छोटे छोटे पग डाल कर चलना और बड़े पग डालना सीख जाते हैं ।

हिंदू धर्म बताता है कि कैसे एक ही भगवान का रूप हो सकता है और निराकार विशेषताएं भी हो सकती हैं। इस प्रकार हिंदू धर्म साधक की मानसिकता के अनुसार विभिन्न तरीकों से भगवान की आराधना करने का अवसर देता है।

यदि आप निराकार तरीके से भगवान की पूजा करना चाहते हैं, तो आगे बढ़ें, लेकिन मुझे आशा है कि आप हमें इस बात से रोक सकते हैं कि हम भगवान की पूजा किस रूप में करते हैं।

फुटनोट

[1] Śrī Īśopaniṣad

[2] Shankaracharya – Wikipedia

[3] http://hindinest.com/dharma/003.html

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2 Comments

  1. मेरे पूज्य गुरुदेव, श्री पार्थसारथी राजगोपालाचारीजी ने ईश्वर को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “ईश्वर अस्तित्व का मूलभूत सिद्धांत है”। अर्थात् इस ब्रह्मांड की हर रचना में, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, ईश्वरीय अंश है। इसलिए सनातन धर्म सृष्टि के हर प्रकार / रचना में ईश्वर की अनुभूति करता है और उसे वंदनीय मानता है।

    चारीजी आगे कहते है कि ईश्वर अपने आप को असंख्य टुकड़ों में विभाजित करके भी, उसका हर टुकड़ा अपने आप में सम्पूर्ण है।
    मेरी समझ से, इस परिभाषा से, ईश्वर के साकार या निराकार होने का विवाद समाप्त हो जाता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम ईश्वर को किस प्रकार समझ कर संतुष्ट होते हैं और अपने आप को उस मूलभूत सिद्धांत से जोड़ पाते हैं।

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