कोरोना टाइम्स

स्वागत है आप सब सुधी और बेसुध जनों ! वैसे बेसुध होना थोड़ा मुश्किल है कोरोना टाइम्स मे। शराबी बंदी जहां नहीं थी कोरोना के आगमन बाद गृहबंदी मे वहाँ भी हो गई है । कोरोना टाइम्स के इस प्रथम संस्करण के प्रकाशित होने के “अवसर” पर एक बार फिर आप सब का स्वागत है।

“शुभ अवसर” लिखा गया था पर मुख्य संपादक महोदय की कातिल कलम ने “शुभ” काट दिया । अशुभ लिखने की उनकी और हम में से किसी की भी हिम्मत न थी। तो बेचारा “अवसर” बिन विशेषण रह गया ।

पाजिटिव थिंकिंग, पाजिटिव मनोविज्ञान युग में “अशुभ” लिखना घोर “अशुभ “ है।

ख़ैर जो हुआ सो हुआ । मुद्दे की बात यह है कि कोरोना टाइम्स का पहला अंक आज जैसे तैसे प्रकाशित हो आप सब के नयनों सम्मुख प्रस्तुत है ।अभिनंदन ! धन्यवाद आपका आपने इस लेख को पढ़ने के लिये हमारी बेवसाइट की सब सही लिंक्स को उँगली करी । हम हर संभव प्रयत्न करते रहेंगे कि आगे भी यह प्रकाशित होता रहे। और आप को उँगली करने के और शुभ अवसर मिलें।

जो हुआ सो हुआ, पर आगे जो होगा आप सब के सहयोग से ही संभव होगा।

आप ग़लत न समझें हम पढ़ने के लिये कोई पैसा नहीं माँग रहे हैं।

बस बड़ी छोटी सी आशा है कि आप पढ़ें।

पर आप पढ़ेंगे क्यों ?

हम जानते हैं यह रोब की भाषा अंग्रेज़ी की रंगरेज़ी में बड़ा जेनुइन सा प्रश्न है ।

हमारे जैसा हर नव-उद्यमी कोई धंधा शुरू करने के पहले यही सोचता है। हमारा मार्केट क्या है। हम मार्केट ढूँढते हैं बाज़ार नहीं। बाज़ार से बाज़ारूपने की झलक आती है । हर नव उद्यमी भविष्य में चल कर धन पिपासु हो या न हो शुरू तो मार्केट की समझ बना कर ही करता है। क्योंकि वह जो बनाता है , करता है उसकी उसे बहुत कम ज़रूरत होती है। कोरोना टाइम्स के संचालक मंडल के सभी सदस्यों की सोच इस भेड़ चाल से एक दम अलग है। हम जो कर रहे हैं यानि कोरोना टाइम्स का संपादन और प्रकाशन अपने सिर्फ़ लिये कर रहे हैं ।यदि आप जुड़ते हैं हमारे इस प्रयास से तब हम आप सबका हृदय से स्वागत करते हैं ।

कोरोना टाइम्स के प्रकाशन से जुड़े बहुत से प्रश्नों पर हमारी संपादकीय टीम और मालिकाना टीम के बीच गंभीर चर्चाओं के बहुत से दौर चले ।

कोरोना टाइम्स मे सोशल डिसटेंसिंग का पालन करते हुये सारा काम आन लाइन ही होता है । बड़ी बहसबाजी हुई, ज़ूम पर लोग झूम झूम कर बोले। व्हाटसएप, गूगल हैंगआउट, स्काइप, वेबेक्स और इनकी तरह के अन्य एप्स को परखा गया । आख़िर में निर्णय यही हुआ कि हम केवल ज़ूम और व्हाटसएप का ही इस्तेमाल करेंगे।दोनों सस्ते है और हमारे पास न पैसा है नहीं कोई सीक्रेट ।

ज़ूम पर कर लें चीनी भाई हमारी झूम कर जासूसी पर उन्हें यहाँ कोई काम लायक़ सूचना नहीं मिलेगी ।

सूचना के नाम पर यहां ज्यादातर गुड़ और गोबर ही मिलेगा ।

क्या यह लेख आप अब भी पढ़ रहे है ? यदि हां तब हम बताना चाहेंगे कि बिना पैसे लिये कोरोना टाइम्स का यह प्रयास कैसे सस्टेन होगा । जानने के लिये यहाँ पर उँगली करें

हम कोरोना टाइम्स के पहले अंक में तीन प्रविष्टियां सम्मिलित कर रहे हैं । दो हिंदी और एक अंग्रेज़ी में । जी अंग्रेज़ी में । हम दिखाना चाहते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर हम रोब की भाषा में लिख सकते है।

तीनों प्रविष्टियां एक तरह से चोरी के माल है । हिन्दी वाली प्रविष्टियां चालू व्हाटसएपी साहित्य की समालोचना से संबंधित है। कविता को कवि की अंतर्दृष्टि से देख पाना , मूल भावों को जिनसे कवि हृदय द्रवित हो पद्य रचना पथ पर चला होगा, यह समझ बिरले विद्वान समालोचकों में ही पाई जाती है।

हिंदी प्रविष्टियों मे हमारे साहित्यिक समालोचक श्री आनंदवर्धन दो पंक्तियों की दो कविताओं पर अपनी सारगर्भित टीका से आपका ज्ञानवर्धन और मनोरंजन साथ साथ करा रहे हैं । पहली कविता का शीर्षक है रसमलाई उनकी स्वरचित है । और दूसरी का जैक और जिल जो उनके प्रिय शिष्य श्री जैक द्वारा लिखी गई है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है दोनों व्हाटसएप से उठाई गई हैं ।

श्री आनंदवर्धन मे यह समझ कविता पढ़ने के पहले से ही विद्यमान रहती है , पढ़ते समय भी और पढ़ने के बाद भी ।ऐसी सूझ बूझ के धनी हैं हमारे समालोचक !

रसमलाई

भूतपूर्व शिक्षिका आसा और उनकी “नीलम” जैसी बहन नीलम, दोनों कोरोना समय गृहबंद रहते हुये भी विविध भाँति के व्यंजनों से अपनी क्षुधा और चटोरपने की तृप्ति के लिये प्रसिद्ध हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने कई बार रसमलाई बना कर खुद खाई । हर बार केवल फ़ोटो भेजी आनंदवर्धन जी को ।

हार कर उत्तर में आनंदवर्धन जी ने यह कवित्त भेजा


नीलम आसा मिलि के बनावे रोज रसमलाई
रोज देखावे खाली पीली करे हमरी चिढ़ाई

आनंदवर्धन जी ने कई बार माँग की कुछ रख देना कोरोना गृहबंदी से मुक्ति उपरांत सब मिल बाँट कर, रस ले ले कर रसमलाई खायेंगे ।पर उन दोनों ने ऐसा कुछ भी न किया ।

ऊपर से आनंदवर्धन जी के इन दो पंक्तियों के गूढ़ काव्य पर तिरस्कार का व्हाटसएपी अंगूठा दिखा दिया । पहले तो रसमलाई बाँट कर खाने से मना किया फिर कविता को तिरस्कारी अंगुष्ठ दिखा दिया।अब इस संदर्भ में अंगूठा दिखाने वाली आसा ही पाठक हुई न? सही पकड़े हैं न? आप भी तो पाठक है अब तक पढ़ रहे हैं ! कहीं अंगूठा दिखाने का मन तो नहीं बन रहा आपका ? नहीं न ?

तो चलिये पढ़ते हैं आनंदवर्धन जी की समालोचना अंगूठा तिरस्कृत होने पर

इतना पढ़ने पढ़ाने के बाद भी आया को कविता और कवित्व की शूझ बढ़ाने के लिये बहुत कोचिस की ज़रूरत है
ख़ाली तुकबंदी ही नहीं भावों से ओतप्रोत बंदिश है यह दो पंक्तियाँ !

ईर्ष्या रस,चटोरा पन का भाव और इच्छित ध्येय ( रसमलाई खाना) के प्रति लगन और निष्ठा का अनुपम चित्रण है ।कवि चिंघ्घाड रहा है और बहरी बन आसा सुन नही रही है।हद है!

तो सुधी पाठक जो अब तक हमें सह रहे हैं आगे पढ़ें दूसरी कविता और उस पर आनंदवर्धन जी की समालोचना ।

जैक एंड जिल

जैक एंड जिल कवित्त के लेखक हैं श्री जैक है जो पेशे से बहुत कुछ है, डालर कमाते हैं पर भारत में बैठ कर।दुनिया भर घूमते हैं पर आजकल गृहबंद हैं ।

हो सकता है राजीव शुक्ल की कविता से उन्हें प्रेरणा मिली हो । पर ऐसा लगता भी नहीं है । ख़ैर ..

जैक एंड जिल वेंट अप द हिल, प्यार भी हो जायेगा ज़रा कोने में मिल ।

आनंदवर्धन जी ने समालोचना में जो लिखा सो लिखा पर कवित्त रचयिता जैक के हृदय में छुपे मृदु भावों और चंटपना को उजागर करते एक सुंदर सारगर्भित पंक्ति भी लिख डाली । लीजिये पढ़िये ।


कवि जैक छुप कर जिल से कोने में मिलना चाहता है । बहुत रोमांटिक हो गया है ।

कवि जैकवा आलसी भी है वह पहाड़ पर चढ़ना नहीं चाहता भले ही जिल उसके साथ हो ।

इससे प्रतीत होता है कि कवि जैक परसाद का जिल से प्रेम अब तक एक तरफ़ा ही है।
आख़िर
“प्यार तो बहाना है जैकवा को और भी बहुत कुछ पाना है “

अब क्या पाना है जैक, जिल और आप साहसी पाठक जो अब तक कोरोना टाइम्स से पिंड नहीं छुड़ा पाये हैं और पढ़ रहे हैं वह सब या राम जी ही जाने ।

यदि आप ने इसे पूरा पढ़ा है तो यहाँ उँगली करें । हो सकता है आप किसी उपहार के पात्र बन जायें ।

अब रोब की भाषा अंग्रेज़ी में कुछ

A dear friend of our literary critic Mr. Anandwardhan from a beautiful island nation, shared with him a what’s app message attaching a nine page pdf text titled; The Basic laws of human stupidity.

The whatsapp messages exchanged between the two friends are full of meaning and contain gems of wisdom. Reproduced without edits are the messages they exchanged without seeking permission from Whatsapp University where both now work holding positions of self appointed Professor Emeritus.

Thank you 🙏
For sharing the stupid basic laws of the stupid
I wouldn’t say by the Stupid

Yes oh my learned and wise one.

I know what you mean and have replaced words with antonyms ( after consulting a dictionary)

learned=ignorant
wise=stupid

Never would do that to my AI friend.

Oh ok I know what AI is
when we met in Colombo I told you about AI= artificial insemination and you liked it remember even now! World has moved on the Internet of things uses AI= Artificial Intelligence

Be natural. Then there would be no need for AI that you are so very well experienced in.


Good advice 🙏 Thanks
You win this round but let’s remember every dog has his day !

Am not one.

What 😀

Won’t answer questions that incriminate me.


😂😂😂😂🙏
You are too much
I give up go have a nice lunch and rest

I am also going to have lunch

And that led our editorial team not to only gossip and do some work. The editorial team found out as to why Anandwardhan’s friend was not answering the question. Because an answer would have incriminated him as being a Professor Emeritus at Whatsapp University he had come to know of the fifth amendment to the American Constitution

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Vrikshamandir

A novice blogger who likes to read and write and share