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डाक्टर कुरियन; एक अभिव्यक्ति

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

Photo: Painting by Dr Rama Aneja

मेरे जैसै अनेक लोग जो डा कुरियन के सान्निध्य मे आए, मेरी समझ के अनुसार, उनका संबन्ध “विक्रमादित्त्य” और “बैताल” की तरह का है।

हर बार उस बैताल के चरित्र के एक पहलू को किसी एक पीपल के पेड़ पर टांग कर आते हैं । वही बैताल एक बिल्कुल नये चरित्र में हमारे कन्धे पर बैठ कर नये सवाल सामने रख देता है। आज करीब पचास साल के बाद भी !

मै अपने को भाग्यशाली समझता हू कि इस व्यक्तित्व के कुछ पहलू को जो मै देख पाया और जो शायद कुछ के ही नसीब मे आया हो, हो सकता है नही भी आया हो। वह था उनका बाल सुलभ निर्दोष व्यवहार और बाल हठ।

हालांकि, उनका यह पहलू मेरे एन डी डी बी छोड़ने और अमूल ज्वायन करने के बाद की हैं कुछ यादें ।

१. फरबरी,१९७०, बरौनी मेरा पहला साक्षात्कार !

डा कुरियन और डा एस सी रे। बरौनी मे एक घास होती है।नोनी। पूरे जमीन पर फैल जाती है। पीले फूलों से लदी हुई।सारी धरती हल्दी से प्रकृति ने पुताई कर दी हो। डा कुरियन ने डा रे से पूछा “कान्ट वी हैव दिस ईन एन डी बी कैम्पस? नो डाक्टर यू कान्ट हैव एव्री थिंग एव्री वेयर। दोनों ने एक दूसरे को देखा निर्दोष मुस्कुराहट और चल पड़े ।


२. दिसम्बर १९७५, क्रिसमस का दिन

तब एन डी डी बी कैंपस मे शायद तीस या बत्तीस परिवार ही रह रहे होंगे। दो क्रिकेट टीमें बनी। कुरियन इलेवन और वरियावा इलेवन। हम सब खेतीवाड़ी ग्राउन्ड मे इकट्ठे हुये । दोनो नौन प्लेइंग कैप्टेन अपनी अपनी टीम के साथ। एकाएक डा कुरियन ने मुझसे पूछा। कैन आइ गो एन्ड बैट? “आइ वान्ट टू शो निर्मला दैट आई ऐम स्टिल यंग एन्ड कैन बैट। बट आई मस्ट टेक परमिसन आफ द कैप्टेन” ! और वह गए। इन फुल पैड अप। और पूरे सम्मान से खेला। बालसुलभ !


३. १४ जनवरी १९७५, उत्तरायण

एन डी डी बी कैंपस में रहने वाले लोग सामने के मैदान में पतंग उड़ाने मे लीन। सब बच्चे समेत अपनी अपनी पतंग उड़ाने में मस्त। यकायक डा कुरियन अपने परिबार के साथ शामिल। उनकी पतंग किसी ने काट दिया। दूसरी पतंग उपर। एक बच्चे के पास आए। उसका नाम पूछा। उसके बाप का नाम पूछा। अपना पतंग दिया और कहा ” इफ यू लूज़ दिस काइट, योर फादर विल लूज़ हिज़ जौब “बह बच्चा दौड़ता हुआ मेरे पास आया और पूछा “पापा ये कौन आदमी है? मै क्या समझाऊ और किसे समझाऊँ?

४. औपरेशन फ्लड टू का शुरुआती समय

एफ ए ओ एडवाइजर्स के लिये लक्जरी गाडियों में से एक आस्ट्रेलियन होल्डन। निहायत खूबसूरत। देखा। मुझसे कहा “कौल मोली। आइ वान्ट टू ड्राइव हर ऐज माई फर्सट कोपैसेन्जर” । मौली आई। “मौली, यू सिट बाई माई साईड। आस्क दिस फेलो टू सिट बिहाइन्ड। आई विल टेक यू राउन्ड द कैम्पस” । ड्राइविंग सीट पर मानो एक निर्दोष बच्चा ट्वाय कार पर खेल रहा हो। “मौली, यू सी ईट हैज़ पावर स्टीयरिंग। यू प्रेस दिस बटन ऐन्ड ऐन एन्टिना पौप्स आउट” । मौली चुपचाप सब सुनती रही। बस, हूं, यस जौली। कैम्पस का चक्कर लगाया और औफिस के सामने ला कर रोक दिया। शायद रजनी ड्राइवर खड़ा था। मैडम को घर छोड़ दो। और मुझसे , “ यू नो, दिस कार नीड्स वाईट पेट्रोल, ऐन्ड माई कार शुड नौट स्टौप ए सिन्गल डे। उस जमाने में आनंद में व्हाइट पेट्रोल? लेकिन व्हाइट पेट्रोल आया। गाड़ी कभी नही रुकी। कैसे हुआ, यह एक अलग कहानी।

५. निर्मला की शादी

कितने सारे लोग आमंत्रित थे। उनमे एक सैयद भाई भी थे, उनके पहले ड्राइवर। मुझे बुलाया ‘सी दैट ही इज ट्रीटेड नौ वे इन्फीरीयर टू एनी वन हीयर। फौर मी ही द वी वी आइ पी फौर द डे। सैयद मियां के लिए अलग टेबल लगाया, एटेन्ड किया और जब जाने लगे, उन्हें बुलाया “थैन्क यू सैयद भाई” ! सैयद भाई मुड़े बिल्कुल स्पीचलेस। बस आंखे नम थीं।

लेकिन इस विशाल व्यक्तित्व को करीब से पहचानने का मौक़ा मुझे एन डी डी बी छोड़ने और अमूल ज्वायन करने पर मिला, उनके साथ, उनके परिवार के साथ साक्षात, और उन सारे लोगों से आत्मीय बात कर के। उनमे आदरणीय त्रिभुवन काका, श्री रमन शंकर पटेल, श्री मनुभाई डाह्या भाई पटेल और श्री बाबूभाई गिरिधर भाई पटेल और श्री एच एम दलाया। सन १९८७ से २००० तक इनका सामीप्य मिला। घंटो साथ मे बैठता, सुनता, प्योर, औनेस्ट, प्रिस्टीन, नौस्टैल्जिक रिवर्स चरनी औन टाइम।

एक ऐसी ही बैठक में त्रिभुवन काका के साथ। “सींहा, कुरियन ने कोई औढखी सक्या नथी। एनी व्यक्तित्व एक नानो बालक जेवा। निष्कपट, निर्दोष, चंचल। कदी शान्त नही बेसी सके। लोको एने ज़िद्दी कहे छै। आ जिद्दी नथी, हठी छे। पण एनो हठ बालहठ। एक रमकड़ा मली जाए तो बस खुश खुश। जूना समय मां मारा पासे बेसता। खबर नहीं शूं शूं अफलातून बिचार। हूं एनो समझातो, कुरियन अमे महासमर मं छीए। मने वचन दे एवं चर्चा सामान्य रीते अणे सामान्य जग्या नहीं करवानी। अणे ए आजीबन निभाया।”
श्री रमनभाई शंकर भाई पटेल “सींहा, तू केनी बाबत जानवा ईच्छे छे, कुरियन बाबत ? अरे एनो बिचारो ना उंढापण, अमे नथी समझी शक्या तो तु तो एक नाना बालक जेवी छे। अगम्य, अथाह पण मापी न सकाए एवो सारगर्भित” ।
मनुभाई डाह्याभाई पटेल “सींहा अमे राजकारणीया छीए।अमारी कार्यशैली तमने खबर होए। पण कुरियन! आ बाबत मां एनी समझ अणे चपलता अमे नहीं पाड़ी शय्या”।
बाबूभाई गिरधरभाई पटेल कुरियन एनक्लेव और एक जमाने मे कंजरी कैटलफीड फैक्टरी पर आने वाले सामान पर टोल टैक्स पूरी तरह माफ करने वाला शख़्स , बस “एक बात, कुरियन नो प्रश्न छे न। पूछवानो नही, सोचबानो नहीं”

ऐसा व्यक्तित्व , बिरला!


By Vrikshamandir

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2 replies on “डाक्टर कुरियन; एक अभिव्यक्ति”

बहुत सुन्दर लेख डॉक्टर कुरियन के बहुयामी व्यक्तित्व के बारे में। मिथिलेश भई, अपनी लेखनी कमाल की है। संस्मरण सांझा करने के लिए धन्यवाद।

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