जिजीविषा

झील ओटेंरियो के तट से

ठंड के मौसम की बर्फ़ीली हवायें, झील के किनारे पतझड़ मे ठूँठ रंग बिरंगे सूखे नंगे पेड़

दूर क्षितिज तक फैले आसमान मे खेलते बादलों के ढेर से बच्चे,

कब बड़े होंगे बरसेंगे ये बादलों के बच्चे ,

ज़मीन मे मिल कर मिट्टी बन जाने के इंतज़ार मे पत्ते आयेगा कब मौसम

पल्लवित होंगी कब यह सूखी टहनियाँ,

चले गये पत्ते, दे कर सुखद अनुभूतियाँ बढ़ाने धरती की की उर्वरा शक्ति

ज़मीन मे मिल मिट्टी बनना ही तो है नियति हम सबकी

सीख ली है हमने भी समय के साथ रूप बदलना

रेत पर पड़े पद चिन्हों को मिटा देती हैं हवायें, बादल की बूँदें,

पर लगता है ……समय ….मौसम के फेर मे

हो चाहे बदला मौसम कितना ही बदला, न छोड़ी है हमने ज़िद जीने की

समय बदलता है पर जिजीविषा नहीं

समय बदलेगा, मौसम बदलेगा,

हो सकता है हम रहें या न रहें,

पर रहेगी ज़िन्दगी

और ज़िन्दगी की कहानी !

शैलेन्द्र


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