वृक्षमंदिर हिंदी में: कथा, कविता, वार्ता और संवाद
यह आभासी वृक्षमंदिर का हिंदी घर है। यहाँ संस्मरण हैं, कविताएँ हैं, बातचीत और विमर्श हैं — कुछ अपने लिखे, कुछ उन “अपनों” के लिखे जो जीवन की राहों पर में मिले फिर जुड़ गए , नीचे अब तक की कुछ, सभी नही , हिंदी रचनाओं के लिंक हैं। पहले उन्हे देखिए; फिर, यदि जी चाहे, इस हिंदी घर का एक संक्षिप्त सा परिचय भी पढ़िए।
कुछ हिंदी रचनाएँ
. क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ … वर्णमाला अभी अधूरी है काम प्रगति पर है !
. घर रहेंगे हम ही उनमें न रह पायेंगे
• जिजीविषा
• जिजीविषा और आकांक्षा की बैसाखी पर चलती यह ज़िंदगी
• दुआ
• राम सेतु
. वसंतराव: नाम और काम का अनोखा संगम
. सूनी राहें और अन्य कवितायें (अनुवाद)
. ग़ुस्ताख़ विष्मयबोधक चिन्ह (अनुवाद)
• मानू अमरोहवी और बंदुआरी के बाबू साहब की हालिया खत-ओ-किताबत
. अखाड़ा से व्यायामशाला तक का सफ़र
• मनुबंश और शैलेंद्र के पत्राचार से बनी कहानी
• विभीषण
• आस्था भेद और व्यावहारिक जीवन दृष्टि; एक संवाद
• दीपक सुचदे जी (बाबा) अब न रहे
. गोरखनाथ मंदिर परिसर मे नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन
पूरी सूची श्रेणी में भी देखी जा सकती है: वृक्षमंदिर हिंदी में
• कोरोना टाइम्स
• शब्दों का घालमेल और उसकी परिणति
• हिंदू घरों और मंदिरों में देवी देवताओं के चित्र और मूर्तियाँ क्यों हैं
• अम्मा की निमोना बनाने की विधि
मैंने लिखना बहुत देर से शुरू किया। कभी-कभी गद्य लिखता, कभी-कभार अतुकांत पद्य। लिख लेता, फिर अक्सर फाड़ कर फेंक देता। नब्बे के दशक के कुछ पन्ने बाद में मिले। आज उन्हें पढ़ता हूँ तो कुछ अंतर्मन को छू जाते हैं, कुछ नीरस और उबाऊ लगते हैं। पर स्वरचित हैं, इसलिये सम्मान के हकदार भी हैं। उन्हीं पन्नों को, और संध्याकाल के इस फुरसत भरे — कभी स्वस्थ, कभी अस्वस्थ — जीवन में जो लिख पाता हूँ, यहाँ संकलित करना पूर्णतः स्वांतः सुखाय प्रयास है।
जैसे-जैसे वृक्षमंदिर के दिन चढ़े, यह मंच केवल मेरे संस्मरणों और कविताओं तक न रहा। बहुत से “अपने” मिलते गए, जुड़ते गए। दिसंबर 2019 में डॉ. कुरुप और मेरे अंग्रेज़ी लेखों से यह सिलसिला शुरू हुआ। आगे चल कर हिंदी में भी लिखा जाने लगा। शुरू में नागर और मनुबंश दोनों ने साथ दिया। अंग्रेज़ी में रंगरेज़ी तो की ही; नागर ने हिंदी में भी रंग जमाया। दोनों को स्नेहपूर्ण धन्यवाद।
मनुबंश का साथ मई 2021 में छूटा, जब कोरोना काल में वह अंतिम यात्रा पर चले गए। नागर और मुझसे वह उम्र में छोटे थे। विधि का विधान। उनकी कमी खलती है। नागर से मिलता रहता हूँ। कोरोना काल में साथ छोड़ने वालों में मनुबंश के वृक्षमंदिर के लिये लिखे लेख उनकी याद दिलाते रहेंगे।
“अपने” होते कौन हैं? वही, जो हमें अपनाएँ और जिन्हें हम अपनाएँ। अपनाते उन्हीं को हैं जिनसे संबंध बन जाए और बना रहे — घर-परिवार, मित्र, अकिंचन साथी; जीवन-यात्रा में मिल कर साथ रहने वाले, फिर भले ही बिछड़ जाने वाले।
जब “अपने” साथ होते हैं तब उन्हें उतना याद करने की फुरसत नहीं रहती, जितनी उनके चले जाने के बाद। हमारे “अपने” भी एक-एक कर चले जाते हैं। जो चले गए, उन्हीं के जैसा एक दिन मेरा भी आएगा। कुछ समय के लिये रह जायेंगे पेड़, पशु, पक्षी, अन्य जीव-जंतु, इमारतें, घर, पगडंडियाँ, सड़कें — जो समय बीतने पर बन जायेंगे खंडहर। इनमें से कुछ कई पुश्तों तक रह जायेंगे हैं। फिर वह भी चले जाते हैं।
जब पुराना जाएगा तभी तो नया आएगा।
वर्षों पहले लिखी कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं।

वृक्षमंदिर पर लिखने वालों में लगभग सभी शौकिया लेखक हैं। विगत जीवन में लगभग सबने अपने पेशे से जुड़े विषयों पर बहुत कुछ लिखा है। यहाँ के लेख भिन्न हैं। पाठक को ये बतकही जैसे भी लग सकते हैं। बतकही के भी कई रंग-रूप हैं। किस्सों में बातें होती हैं; बातों में बकैती, बतफरोशी, बतफरेबी, बतकुच्चन, बड़बोली, बतबुज्झी। इनमें से कुछ की झलक यहाँ मिलेगी। फिर भी अधिकांश लेख संस्मरणात्मक हैं।एक और बात यहाँ जो लिखा गया है वह स्वांतःसुखाय ही है। फिर यदि औरों को अच्छा लगे तो फिर बात ही क्या । ग़ज़ब !
यह मंच बातचीत, विचार, विमर्श, व्यंग्य के लिये है — कुछ सामयिक, कुछ बीती और आपबीती घटनाओं पर। कुछ मेरा स्वरचित; बहुत कुछ मित्रों द्वारा लिखा — अंग्रेज़ी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में।
डॉ. एच. बी. जोशी ने गुजराती में भी लिखा है। डॉ. नवरे ने एक मराठी लेख भेजा है; उसका अंग्रेज़ी अनुवाद शीघ्र प्रकाशित करूँगा। विनीता — हमारे सहकर्मी डॉ. सत्य प्रकाश मित्तल की पुत्री — अंग्रेज़ी काव्य लिखने वाले भारतीयों में जाना-माना नाम हैं। उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद वृक्षमंदिर पर है। जाने-माने प्रबंधन गुरु और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व निदेशक डॉ. प्रदीप खांडवाला की एक अंग्रेज़ी कविता का हिंदी अनुवाद भी यहाँ प्रकाशित हुआ है।
श्रव्य (आडियो) हिंदी मे भरपूर योगदान के लिये डाक्टर एस सी मल्होत्रा का आभार ।
अंग्रेज़ी में लिखने वाले मित्रों की सूची लंबी है। कुछ नाम जो इस समय याद आ रहे हैं: अजय गुप्ता, अमीन खान राहुत, अरुण वायंगनकर, अरूप मित्रा, एम. एम. पटेल, ओ. पी. टंडन, कैप्टन जनमेजय वैष्णव, जी. कृष्णन, जी. राजन, डॉ. डी. चट्टोपाध्याय, डॉ. ई. माधवन, डॉ. एच. बी. जोशी, डॉ. एस. सी. मल्होत्रा, डॉ. कुरुप, डी. वी. घानेकर, डॉ. दिनेश शाह, डॉ. भीम शंकर मनुबंश, डॉ. मुकुंद नवरे, डॉ. वी. पी. सिंह, दुष्यंत मिश्र, नक्षत्री, रश्मि कांत नागर, नागेंद्र प्रसाद दोनाकोंडा, नीला गुप्ता, प्रकाश (पी. टी. जैकब), मधुसूदन मानवी, शुभ्रा राय, शेखर राय, अरविंद गुप्ता, आर. गणेश, शांता शीला नायर, लालतेंदु कर , चिंरंजीव कोहली, हेमंत वोरा, — और एक मित्र जिन्होंने नाम जाहिर न कर अनाम रह कर लिखा। हर एक को हृदय से धन्यवाद। जैसे-जैसे और नाम याद आएंगे, जोड़ता जाऊँगा।
आशा है आगे चल कर और मित्र हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में वृक्षमंदिर के लिये लिखेंगे। यदि कोई संस्मरण, कविता, अनुवाद या संवाद भेजना चाहें तो लिखिए। अच्छा लगे तो प्रतिक्रिया दीजिए — पोस्ट के नीचे टिप्पणी में,अथवा sk@vrikshamandir.com पर ईमेल से। आपकी प्रतिक्रिया, आलोचना, सराहना — सबका स्वागत है।
वृक्षमंदिर एक स्थान है
वृक्षमंदिर एक स्थान है — कथाओं का, संवाद का, और साझा स्मृतियों का।
यह केवल संस्मरण नहीं है। यह उन अनुभवों, घटनाओं और सीखों का संग्रह है जो जीवन को आकार देते हैं — अपने और उन लोगों के जिन्हें हमने रास्ते में पाया।
चलें, मिलकर कुछ लिखें।
विमर्श करें।
अपनी रचनाएँ भेजें।
आपकी कहानी, कविता, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, विचार या कोई छोटी सी घटना — जो भी आपके भीतर बसी है — यहाँ स्वागत है। भाषा हिंदी हो, अंग्रेज़ी हो, या दोनों का मिश्रण या कोई क्षेत्रीय भाषा लंबी रचना हो या कुछ पंक्तियाँ। पूरा नहीं होना ज़रूरी नहीं; अधूरी बात भी एक बीज हो सकती है।
वृक्षमंदिर का अर्थ पेड़ों का मंदिर है। यहाँ हर योगदान एक नया पौधा है। कुछ छाया देंगे, कुछ फल, कुछ केवल मौन में खड़े रहेंगे। सबका स्थान है।
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आएँ। लिखें। बात करें।
वृक्षमंदिर सबका है।
