मैंने “महादेव दा का राजनैतिक वध” अपने मित्र श्री मनीष भारतीय के फेसबुक पेज पर पढ़ा था। ऐसी घटनाएं सच जैसी लगती हैं, लेकिन जब तक खुद अनुभव न करें, तो कभी कभी अविश्वसनीय सी भी लगती हैं। मन में सवाल उठता है “क्या सच में ऐसा होता है?”
धन्यवाद मनीष का, जिन्हें यह कहानी लिखने का विचार आया। पढ़कर मैं खुद से बोला, “देखा, सच में ऐसा होता है।” मेरे साथ नहीं सही, लेकिन मनीष के लिए यह घटना एक स्वानुभूत सत्य है।
प्रस्तुत है एक सत्य कथा “महादेव दा का राजनैतिक वध” !
महादेव दा का राजनैतिक वध

मनीष भारतीय
इस कहानी को लिखने का ख़याल हाल में फाइल से निकली अमर उजाला अखबार की एक कटिंग से बना जिसमें मेरी व महादेव दा कि फोटो छपी थी।
मेरी महादेव (नाम बदला हुआ है) दा से पहली मुलाकात पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन, जिसे लेफ्ट की भाषा में पार्टी कांग्रेस कहते हैं , के भीड़ भाड़ भरे माहौल में हुए परिचय तक सीमित थी। मैं पार्टी का होल टाइमर (पूर्ण कालिक) सदस्य था और पार्टी का पब्लिकेशन डिपार्टमेंट संभालता था। वामदलों और भाजपा जैसे धुर दक्षिण पंथी राजनैतिक संगठनों में यह विभाग बहुत महत्वपूर्ण होता है। पार्टी के मुखपत्रों सहित सभी लिटरेचर यहीं तैयार होता है।
फुर्सत निकाल कर मैं लखनऊ अपने माता पिता के पास आया हुआ था, मुझे दिल्ली ऑफिस से आदेश मिला कि दिल्ली, पीलीभीत होते हुए वापस आ जाऊँ जहाँ पर प्रदेश यूनिट का किसान सम्मेलन है। कहा गया मैं उस सम्मेलन में शामिल होऊँ और वहाँ मुझे कॉमरेड महादेव से मुलाक़ात होगी। महादेव दा के पुत्र मेरे आसपास की आयु के होंगे लेकिन पार्टी संस्कृति में या तो कामरेड बोलना होता था या करीबी जान पहचान हो जाये तो दादा या दा। मैं लखनऊ से चलने वाली काठगोदाम एक्सप्रेस पकड़कर निर्धारित समय पर पीलीभीत पहुंचा। महादेव दा संसद के लगातार पांचवी बार सांसद चुने जा चुके थे उस समय उनका पांचवा टर्म चल रहा था, वे पश्चिम बंगाल के एक बहुत पिछड़े इलाके से जीतकर आते थे।
अपने गांव के वो पहले हाईस्कूल पास और पहले ग्रेजुएट थे। वे पार्टी के किसान संगठन के राष्ट्रीय महासचिव भी थे। वामपंथी दलों में महासचिव ही सर्वेसर्वा होता है। सांसद होने की वजह से पीलीभीत का डाकबंगला उन्हें मिल गया था। उसी के एक कमरे में उन्होंने मेरी व्यवस्था करवा कर रखी थी। मेरी खुशअक्ली थी कि मैंने प्लेटफॉर्म पर ही चाय पी ली थी वरना मीटिंग में चाय की भी व्यवस्था नहीं थी। मैंने वहीं से मीटिंग का एजेंडा उठाया और उसपर अपने सुझाव देकर अपने भाषण की औपचारिकता पूरी की। हमारे कंजूस आयोजक ने भोजन के नाम पर केवल तरबूज की व्यवस्था की थी।
महादेव दा को खेती किसानी पर मेरे ज्ञान से बहुत आश्चर्य हुआ और उन्हें लगा कि राजनैतिक बातों के अलावा ऐसी सभाओं में खेती किसानी की बातें भी होनी चाहिए। यह मेरा और उनका पहला लंबा संवाद था। उनका बरेली से चार बजे गुजरने वाली किसी ट्रेन से वापसी का रिजर्वेशन था। डाकबंगले से हम दोनों बहुत भूखे और पैदल निकले और स्टेशन के बाहर एक ढाबे पर अपनी भूख शांत की। पीलीभीत से एक पैसेंजर उसी समय निकलती थी जो चार बजे बरेली पहुंचा देगी ऐसा अनुमान था। हम जनरल बोगी में बैठ गये दो और कॉमरेड हम लोगों के साथ बरेली तक के लिए हो लिये। ट्रेन रूकती चलती आधा घंटे लेट हो गई। तब तक महादेव दा की रिजर्वेशन वाली ट्रेन निकल चुकी थी।
सांसदों को यह विशेषाधिकार होता है कि वो कहीं से भी कहीं के लिए ट्रेन में चढ़ सकते हैं और सीट उपलब्ध होने पर उन्हे एसी फर्स्ट क्लास या पत्नी के अलावा किसी साथी के साथ हैं तो एसी सेकेंड क्लास में सीट मिलती है पहले से रिजर्वेशन आवश्यक नहीं है। मैं प्लेटफॉर्म पर दोनों के बैठने के लिए जगह ढूंढ ही रहा था कि देखा महादेव दा नल के नीचे बने चबूतरे पर जो जमीन से मात्र तीन इंच ऊंची थी, अखबार बिछाकर बैठ चुके हैं। पांच बज रहे थे लेकिन जून की गर्मी भी कम नहीं थी और ढलते सूरज की सीधी किरणें प्लेटफॉर्म पर पड़ रहीं थीं। मैंने उनसे कहा कि दादा कोई पानी लेने आयेगा तो आप पर गंदी छींटे गिरेंगी, वहां से हट जाइये। पांच टर्म से सांसद महादेव दादा उठे और वहाँ से तीन फिट दूर अखबार बिछाकर लेट गये और मुझसे कहा अगली ट्रेन का पता करो। इंन्क्वायरी पर पता चला कि लखनऊ बरेली के बीच कोई ब्रेक डाउन हुआ है सभी ट्रेनें रास्ते में फंसी हैं। लगभग एक घंटे बाद बरेली के लोकल भाजपा विधायक अपने सरकारी गनर के साथ प्लेटफॉर्म पर पहुंचे। गनर ने उनके बैठने के लिए बेंच खाली कराई।
मैंने आदेशात्मक इशारे से गनर को पास बुलाया। मेरे बुलाने के तरीके से वो समझ गया कि कोई खास आदमी ही खाकी को ऐसे पास बुला सकता है। मैने गनर से दादा की तरफ इशारा कर के कहा ये अमुक जगह के सांसद हैं इनके लिए भी बेंच का इंतजाम कर दो। यूपी पुलिस के गनर सिपाही को इस अवस्था में जमीन पर अखबार बिछाकर लेटे सांसद को देख संदेह होता भांपकर मैं सीधे विधायक जी के पास गया और अपना व सांसद जी का परिचय दिया और ट्रेन निकल जाने के बारे में बताया। उन्होंने बहुत इज्जत से महादेव दा को अपने पास बुलाया, बेंच पर जगह दी और फिर बातचीत होने लगी जब तक हमें तीन घंटे बाद अगली ट्रेन नहीं मिल गई। तब तक विधायक जी की ट्रेन भी जा चुकी थी उन्हें उल्टी दिशा में लखनऊ जाना था। अंततोगत्वा, एक ट्रेन में एसी सेकेंड क्लास की दो बर्थ मिलीं और हम दिल्ली पहुँचे। मैं और महादेव दा पार्टी की हर दो माह पर होने वाली सैन्ट्रल कमेटी मीटिंग में मिलते तो बस हाल चाल हो जाता था।
किसान फ्रंट के राष्ट्रीय सम्मेलन का समय आया तो एक बुद्धिजीवी माने जाने वाले नेता को किसान सम्मेलन के ड्राफ्ट रिजोल्यूशन लिखने का दायित्व मिला। वे पार्टी ऑफिस आये और तीन दिन में केवल डेढ़ पेज ही लिख पाये। उनका कंटेंट देखकर सभी बड़े नेता मायूस हो गये, सम्मेलन होने में सात आठ दिन बचे थे। वामपंथियों को लगता है कि किसान और मजदूर की राजनीति तो वही करते हैं और उस पर वो बात भी न कर सकें? अंतत: पार्टी महासचिव ने मुझसे पूछा आप लिख देंगे? मैंने हामी भरी और तीन चार दिन में एक साठ पन्ने का ड्राफ्ट तैयार किया जिसमें वैश्वीकरण, खुली अर्थव्यवस्था में भारतीय कृषि और एम एस स्वामीनाथन रिपोर्ट में सरकार को दिये गए सुझावों के दुष्परिणामों, मौके और संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई थी। लेकिन यह चार दिन महादेव दा पर बहुत भारी थे कि एक नये लड़के को यह जिम्मेदारी दे दी गई है अब पता नहीं क्या होगा? वो पहले तीन दिन सुबह शाम ऑफिस के चक्कर काटते रहे और जब तीसरे दिन शाम को मैंने उन्हें ड्राफ्ट सुनाया तो वो बीच बीच में खुशी से उछलते रहे। चौथे दिन उनके कलकत्ता राजधानी पकड़ने से पहले मैंने उन्हें साठ साठ पन्नों के इंग्लिश और हिंदी में ड्राफ्ट के फाइनल प्रिंट आउट और पेन ड्राइव सौंप दी।
बाद में यही ड्राफ्ट पार्टी का मुख्य पॉलिसी डॉक्यूमेंट बना। चलते वक्त दादा ने वायदा किया कि स्टेज से तुम्हारा नाम लेकर शुक्रिया अदा करूंगा। लेकिन नेता की जात काम निकलने के बाद कहां याद करती है? न ही उन्होंने मेरा नाम वाम लिया। अचानक एक दिन पता चला महादेव दा की किसी तीस साल पुराने बलवा और जमींदार की बहू से सामुहिक बलात्कार के किसी मामले में जमानत कैंसिल हो गई है।
हुआ यूं था कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सरकार के दौर में 1967 में छात्रों का एक आंदोलन हुआ था जिसमें खेत मजदूर भी शामिल हो गये थे। इन लोगों ने कांग्रेस समर्थक जमींदारों के घरों में लूटपाट और आगजनी करके अपने उधारी के दस्तावेज नष्ट कर दिये थे, कुछ मामलों में जमींदार परिवारों की महिलाओं का शारीरिक उत्पीड़न व बलात्कार भी हुआ था कुछ मुकदमें फर्जी भी थे। उन्हीं सब मामलों में हाईकोर्ट का स्टे था जो बीस तीस साल निकलने के बाद वैकेट होकर फाइनल हियरिंग पर लगा था। मैंने केस देखा, महादेव दा के विरुद्ध केस बहुत कमजोर था। लेकिन चक्रव्यूह तो कहीं और रचा जा रहा था। पार्टी केन्द्र की यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी और संयुक्त वाम मोर्चा की घटक थी। वामपंथी अपनी स्वच्छ छवि के लिए बहुत सचेत रहते हैं।
अखबारों ने महादेव दा नाम बलात्कार कांड से जोड़ कर छापना शुरू कर दिया। एक दिन पार्टी महासचिव ने अपने चैंबर में मुझे बुलाकर कहा कि आज लेफ्ट फ्रंट की मीटिंग में बोला गया है कि महादेव को लोकसभा से रिज़ाइन करना होगा इसलिए मुझे महादेव को पार्टी से सस्पेंड करना पड़ रहा है और संसद से इस्तीफे के आदेश के कागज पर साइन करना पड़ रहा है। महादेव मेरा सबसे पुराना साथी है मुझे लग रहा है यह लैटर देकर मैं उसे फांसी की सजा दे रहा हूँ यह कहकर उन्होंने कागज पर साइन किये और पेन को दबाकर उसकी निब तोड़ दी जैसा कि जज मुल्जिम को फांसी की सजा लिखने के बाद करता है। मैं उनका चेहरा देख रहा था उनकी आंखों में नमी तो थी लेकिन आंसू नहीं। महादेव दा ने संसद से इस्तीफा दे दिया। जेल जाने से पहले महादेव दा ऑफिस मिलने आये। मैंने उनसे कहा दादा आपका केस मैंने देखा है बहुत कमजोर है जरूरत पड़ी तो मेरे सभी वकील दोस्त आपका मुकदमा लड़ने को तैयार हैं।
महादेव दा ने गले लगाकर शुक्रिया अदा किया और जेल में पढ़ने के लिए कुछ किताबें मांगी। मैंने अपने निजी संग्रह से जे. कृष्णमूर्ति की तीन किताबें उन्हें दे दीं। महादेव दा जेल चले गये पार्टी सामान्य गति से चलने लगी। कुछ दिन बाद पता चला कि संयुक्त वाम मोर्चा की मीटिंग में महादेव दा को फाइनल वर्डिक्ट आने तक इस्तीफा न देने को कहा गया था। तो महासचिव ने वह सब क्यों कहा? अब मेरे दिमाग के कीड़े कुलबुलाने लगे।
मैं ऐसी ही एक दिन फुर्सत में पार्टी के एक और सीनियर नेता के साथ बैठा था तो महादेव दा के केस की लेटेस्ट स्थिति की बात चलने लगी। बातों ही बातों में मुझसे उन्होंने कहा रायडू (पार्टी महासचिव का बदला हुआ निक नेम) ने अपने रास्ते का कांटा निकाल फेंका। मैंने पूछा वो कैसे? उन्होंने बताया डेड़ दो साल बाद रायडू का टर्म पूरा हो जायेगा, महादेव पार्टी महासचिव के लिए सबसे मजबूत दावेदार है इसलिए इसको तो रायडू ने रास्ते से हटाना ही था। तो वो निब तोड़ना? गमगीन चेहरा? वो हंसे और बोले सब नाटक था, तुम्हें गवाह बनाया गया था क्योंकि सब तेरी बात पर यकीन कर लेते हैं। दिन बीतते गये अब मेरा भी दिल दिमाग खुल चुका था मैं अपने आस पास चल रहे षडयंत्रों को पकड़कर उनसे खेलने लगा था।
महादेव दा का जेल से छूटने का समय निकट आ गया था और उनके निर्वाचन क्षेत्र में उपचुनाव भी घोषित हो गये थे। सभी को लग रहा था महादेव दा से जेल से ही पर्चा भरवा दिया जायेगा लेकिन उनके वध की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। मैंने कोलकता ऑफिस में एक युवा नेता से शर्त लगाई की आज महादेव दा के चुनाव क्षेत्र से अमुक आदमी पर्चा भर रहा है। वो मुतमईन था कि महादेव दा के आने पर या जेल से ही उनका पर्चा भरवाया जायेगा। क्योंकि आखिरी तारीख में अभी कफी समय था। मैं शर्त जीत गया। पर्चा किसी और ने भरा और महादेव दा? वे अगले ही दिन जेल से निकले लेकिन सब कुछ लुटाकर। शायद यह जमींदार की हाय थी। नहीं, पार्टी महासचिव का शिकार।
महादेव दा फिर पार्टी ऑफिस आये किताबें वापस करने और यह बताने कि अब पार्टी के किसान संगठन को मजबूत करेंगे और जेल में जो भी अंडरट्रायल है अब उनकी मदद के काम में लगेंगे हो सकता है तुम्हारी भी मदद की दरकार हो। दो एक साल बाद मेरा और उनका पटना रेलवे स्टेशन पर पांच छह सैकेंड के लिये आमना सामना हुआ, उनका चेहरा कफी बुझा हुआ लगा। हम गले मिले लेकिन हम दोनों ही अपनी अपनी पार्टियों के लोगों से घिरे हुए थे। एक दो साल बाद पता चला महादेव दा नहीं रहे।
