दाना या भूसा ?

<strong>रश्मिकांत नागर  </strong>
रश्मिकांत नागर

अपने छात्र जीवन की “एक” कारस्तानी का बयान कर रहे हैं।
यह कहानी नहीं, सत्य घटना है। 

मैं कृषि स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। बीएससी ( कृषि) का दूसरा वर्ष था और समेस्टेर सिस्टम लागू होने से पहले, वार्षिक परीक्षा वाले सिस्टम का आख़िरी वर्ष। हमारे सभी शिक्षक दिल से चाहते थे की हम सब मन लगा कर पढ़ाईं करें और अच्छे अंकों से परीक्षा पास करें। 

मेरी कक्षा में हम ४० छात्र थे। २-३ को छोड़ बाक़ी सभी, वर्ष के आख़िरी महीने में पढ़ते कम पर चिन्ता ज़्यादा करते की पास कैसे होंगे। सारा साल तो मटरगस्ती और शैतानी में निकाल जाता। हम में से कुछ ज़्यादा ही मुँहफट और नालायक क़िस्म के थे। न आज का डर, ना कल की फ़िकर। मेरी गिनती भी इस श्रेणी में होती थी। 

हमारे अधिकतर शिक्षक गम्भीर क़िस्म के थे । और हमसे ज़्यादा हमारे भविष्य की फ़िक्र उन्हें होती थी। वह सभी अपनी पूरी कोशिश करते की विषय को किसी तरह रसप्रद बनाया जाय, पर कृषि ज़ैसे रूखे विषय में कौन कितना मसाला डाल सकता है। कक्षा में हमारे चेहरे देख ऐसा लगता था, जैसे किसी ने हमें संजय लीला भंसाली की ‘राम-लीला’ दिखाने का न्योता देकर हिमांशु राय की ‘देवदास’ गले मढ़ दी हो और वो भी थियेटर के दरवाज़े पर बाहर से ताला लगा कर। 

उन्हीं गम्भीर शिक्षकों में से एक थे खत्री साहब। शान्त स्वभाव के गुजराती और अपने ज़िम्मेदारी के प्रति अत्यंत सजग़। गुजराती थे लिहाज़ा हिन्दी शब्दों के उच्चारण में थोड़ा गुजराती तड़का स्वतः ही लग जाता। 

मसलन, गेहूँ ‘घउँ’; दाना ‘दाणा’ और भूसा ‘भूँसा’। उनके इस उच्चारण को सुन हम हिन्दी भाषी मन ही मन मुस्कुराते और मज़े लेते। खत्री साहब हमारी इस हरकत से वाक़िफ़ थे पर हमें कभी डाँटते-फटकारते नहीं थे, खुद भी बस मुस्कुरा देते। 

वार्षिक परीक्षा निकट आ रही थी, और हम सब, जैसे के तैसे। मन में कोई हलचल, उथल-पुथल नहीं। सारे के सारे क्लास में मुँह लटका कर ऐसे बैठते जैसे किसी शोकसभा में आये हों। 

एक दिन खत्री साहब से हमारे लटके हुए मुँह नहीं देखे गये। वे दुःखी हो गए और हमारा मनोबल बढ़ाने के लिये उन्होंने बात कुछ इस तरह शुरू की, “देखो, तुम सब ऐग्रिकल्चर के स्टूडेंट हो और अपन एग्रोनामी की क्लास में पढ़ रहे हैं। तुम सब जानते हो की जब घउँ का पाक काटते हे, तो फिर दाणा और भूँसा अलग अलग करते हे। बाज़ार में दोनो वस्तु अलग-अलग बेचें तो ज़्यादा भाव किसका? दाणा का होता हे ने। बरोबर हे ने?”

”एकदम सही सर”, सारी क्लास ने एक स्वर में उत्तर दिया। हमारे सामूहिक उत्तर से प्रसन्न और उत्साहित होकर उन्होंने अगला प्रश्न किया, “अब बताओ, तुम्हें भूँसा बनने का हे की दाणा?

”सारी क्लास चुप, कोई एक मिनट के लिये सन्नाटा छा गया। उन्होंने जैसे हमारे ज़मीर को झंझोड दिया हो। उनके प्रश्न का उत्तर देने एक भी हाथ नहीं उठा।

 मैं उस दिन अपनी सामान्य- सबसे पीछे वाली पंक्ति छोड़ सबसे आगे वाली पंक्ति में दरवाज़े के पास बैठा था। मुझे शरारत सूझी और चुप्पी तोड़ने के लिये मैंने हाथ उठाया। 

“हाँ, बोलो नागर, दाणा बनना हे ना”, उन्होंने खुश होकर पूछा।

 “नहीं सर, भूसा बनना है”। खत्री साहब अवाक रह गये। 

उन्हें ख़ास कर मुझ से ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी क्योंकि वे मेरे पिताजी के अच्छे परिचितों में से थे, नागर साहब के लड़के से ऐसा उत्तर! 

फिर पूछा, “अच्छा बताओ भूँसा क्यों बनना हे?”

मेरा प्रत्युत्तर था, “सर, जब परीक्षा की हवा आयेगी, तो भूसा हल्का होने से उड़ के अगली क्लास में जायेगा, दाना भारी होने से इसी क्लास में रह जाएगा”। सारी क्लास ठहाकों से गूंज उठी। खत्री साहब थोड़ा मेरे नज़दीक आए, मुस्कुराए और मेरे कानों में एक शब्द गूंजा

नालायक

कुछ इधर की कुछ उधर की कुछ फिरकी

यह लेख अपने आप मे एक लेख नही वरन एक पत्र से निकली सूझ का नतीजा है । पत्र तो लिखा गया। जिसको भेजना था उन्हे भेज भी दिया गया । पर मन मे यह विचार उठा क्यो न उस पत्र को एक लेख मे परिवर्तित किया जाय। जिन आदरणीय महाशय को वह पत्र लिखा गया था, उनका छद्म नाम “बिहार के लाला” रखा गया है।


प्रिय भाइयों और बहनों, या बतर्ज अटल जी, देवियों और सज्जनों,

जंबूद्वीप के भारत खंड के गुर्जर प्रदेश वासी “बिहार के लाला” को “गोरखपुर के बाबू” का पाताल लोक के केनेडा नामचीन देश के टोरोंटो शहर से सादर नमस्कार और परिवार के अन्य लोगों को यथोचित प्रणाम आशीर्वाद पहुँचे ।

बिहार के लाला का विशेष उल्लेख इस सार्वजनिक पत्र में इसलिये ज़रूरी लगा क्योंकि उन्होंने बहुत दिनों बाद हमें एक पत्र लिखा और उस पत्र के साथ भेजी एक बैठक का वृत्तांत।

बैठक का वृतांत पढ़ भविष्य के प्रति आशा की मात्रा में भरपूर इज़ाफ़ा हुआ। एक तरह से कहें तो मन गद गद हुआ।

बचपन और जवानी में भी हमारे पिता जी (बाबूजी) “मनमोदक” खिलाया करते थे ।फ़ीलिंग कुछ वैसी ही हुई।

बाबूजी के मन मोदक हम सब बच्चे बड़े मन से सुनते थे। भाग भी लेते थे, बढ़ चढ़ कर। मन के मोदक उदर पूर्ति हेतु थोड़े ही होते थे। मन मोदक तो होते थे केवल मन को बहलाने का साधन। कल्पना, भविष्य, कुतूहल, क्या यह भी हो सकता है के बारे में ? मन बहल जाता था। बिहार के लाला ने घोषणा कर दी है कि आगामी २१/२२ जनवरी २०२३ को नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के अभूतपूर्व पर अब केवल भूतपूर्व कर्मचारियों का तीसरा आनंददायी स्नेहमिलन आणंद में होने की संभावना है। 

अन्य मित्रों को जिन्हें यह पत्र जा रहा है स्नेहवंदन और शुभकामनाएँ ।

अपरंच समाचार यह है कि काली माता की कृपा और आप सब की शुभेच्छा से हम सब यहाँ राज़ी ख़ुशी है। आप और आप सब के प्रियजनों के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिये हम परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं । 

इधर कुछ दिनों से हमारे स्वास्थ्य में भी काफ़ी सुधार हुआ है।दवा दारू चलती रहेगी। 

ज़िंदगी में, किसने, कब तक, दिया है साथ । जब तक चली चले तब तक चले चलो। 

 “थोड़ा कहना बहुत समझना” आप सब तो बहुत समझदार हो । और जैसी कहावत है समझदार को इशारा काफ़ी है । 

तो आप सब बात समझ ही गये होंगे। 

मैं पहले से काफ़ी ठीक हूँ पर दवाई और अस्पताल का चक्कर बहुत दिन चलेगा । दिसंबर में भारत लौट सकूँगा यही इच्छा है । शेष प्रभु कृपा रही तो २१ /२२ जनवरी २०२३ वाले आयोजन में भाग भी ले सकूँगा। 

बिहार के लाला ने जाने या अनजाने में हाल ही में संपन्न हुई  बैठक के कार्यवृत्त साझा करते समय जो  अंग्रेज़ी की रंगरेज़ी की है और उसके बाद जो अशुद्धि/ त्रुटि सुधार के लिये बैठक में भागीदारों के पत्रों के आदान-प्रदान से एक बात तो स्पष्ट है कि आप सब में आपसी समझ और मिल जुल कर काम करने की वही ललक है जो जवानी में थी। 

विदेशी भाषा अंग्रेजी की हत्या का जो  प्रयास बिहार के लाला ने किया उसके लिये वह प्रशंसा के पात्र हैं। 

बैठक के कार्यवृत्त को मैंने पढ़ा, गुना- धुना, समय लगा पर समझ में आ ही गया। 

मै जुलाई 2020 में भारत से केनेडा आया। और अब तक (अप्रैल 2022 ) तक यहीं पर हूँ। भारत से भागे भारतीय के रूप में मेरा यह जंबूद्वीप भारत खंड से सबसे लंबा प्रवास है।

जनवरी 2021 में व्हाटसएप पर मिले इस विडियो क्लिप को देख बहुत अच्छा लगा था। पर तब पता नहीं था कि कोविड जी और अन्य बहुत सी कठिनाइयों की बदौलत हम यहीं पर अटके रहेंगे। खैर बड़े बूढ़े ( वैसे मैं अब कौन सा जवान हूँ ) कह गये हैं;

“हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरिनाम, जाही विधि राखे राम, वाही विधि राहिये” !


खैर जो है सो है । कर ही क्या कर सकते हैं? बता सकते हैं तो बताइये ? आपने पूछा समय कैसे बिताते हो? धीरज रखिये, पढ़ते रहिये । पता चल जायेगा।

पर जैसे अक्सर पहले “समय बिताने के लिये करना है कुछ काम शुरू करें अंत्याक्षरी ले कर हरि का नाम” के बाद “सामूहिक” खेला होता था, आज कल लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल फ़ोन वाले जमाने में “एकल” खेला का काफ़ी चलन हो गया है। बस अंतर्जाल और कनेक्टिविटी और डेटा चाहिये। आप अपने में मस्त परिवार का हर सदस्य अपने आप में मस्त।

नीचे कुछ चुनिंदा विडियो , उडियो के लिंक दे मारे हैं। आप भी आनंद ले। सिर्फ़ उंगली दबाने का ही कष्ट करना पड़ेगा । पर वस्ताद आप सब लोग इस डिपार्टमेंट में तो पुराने उस्ताद रहे हो। तो एंज्याय करो। समय काटो। वैसे समय तो कटता रहता है बिन काटे भी। कह दी न ऊँची बात ।

पत्रोत्तर की आकांक्षा में,

आप सब का,

भवदीय,

शैलेंद्र 

बिहार के लाला के लिये विशेष

पर जैसे अक्सर पहले “समय बिताने के लिये करना है कुछ काम शुरू करें अंत्याक्षरी ले कर हरि का नाम” के बाद “सामूहिक” खेला होता था, आज कल लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल फ़ोन वाले जमाने में “एकल” खेला का काफ़ी चलन हो गया है। बस अंतर्जाल और कनेक्टिविटी और डेटा चाहिये। आप अपने में मस्त परिवार का हर सदस्य अपने आप में मस्त।

मनके मंगे हिते …

श्री गोपालदास नीरज की गणना हिंदी सबसे प्रसिद्ध और प्रशंसित कवियों होती है। आप जैसे बहुत से लोगों की तरह नीरज मेरे भी बहुत प्रिय कवि हैं।

मेरे गाँव के एक किसान की व्यथा कथा। बिजई बाबा अब न रहे। ओम शांति 🙏🏼

मुझको कैसे मिले फ़ुरसत !

सन् दो हज़ार बीस में मैं क्यूबा गया था। जी हाँ अकेले । छुट्टी मनाने। बच्चों ने भेज दिया था। उसी समय का यह विडियो क्लिप है। हवाना की बस यात्रा के दौरान रास्ते में गाइड एलेक्स नाचते हुये । हम देख रहे थे।

सिर्फ हेडलाइन के मोदी योगी कहीं नहीं हैं इन कवि की रचना में 😁🙏🏼

“हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरिनाम, जाही विधि राखे राम, वाही विधि राहिये” !

सन २०२१ के अक्तूबर माह मे लिया गया यह विडियो ओटावा से आधे घंटे की ड्राइव पर बने पार्क ओमेगा का है । लगभग ९०० हेक्टर के मे स्थित इस वन्य क्षेत्र मे जैसे भेडिया, बाइसन, हिरण, कैरिबू, एल्क आदि समीप से देखे जा सकते हैं।

यह विडियो बिहार के नालंदा जिले के गांव कलियाचक के स्कूल लिया गया था सन २०१७ मे। डाक्टर प्रसाद तिगालापल्ली का है । डाक्टर साहब, मुंबई स्थित सुप्रसिद्ध शिक्षण संस्थान NITIE मे बिजनेस मैनेजमेंट पढाते हैं । पर दिलो दिमाग से कायल हैं है गांधी जी के मंत्र नई तालीम के । गांव के स्कूल मे डाक्टर साहब बच्चो को साधारण खिलौने से गणित सिखा कर एक बच्ची को पुरस्कृत कर रहे हैं । इनके साथ मेरी बातचीत का एक ब्लाग वृक्षमंदिर पर उपलब्ध है।



कहानी पुरानी लकड़हारे की, संदर्भ नया रश्मिकांत नागर द्वारा !


लकड़हारा

लकड़हारे की यह पुरानी कहानी तो आपने अवश्य सुनी या पढ़ी होगी। जंगल में गहरी नदी किनारे लकड़ी काटते समय हाथ से फिसल कर उसकी कुल्हाड़ी नदी में जा गिरी। जीवन यापन का एकमात्र साधन खोने से दुःखी लकड़हारा गहन चिंता में डूब कर जब रोने लगा तब उसके सामने जलदेवी प्रकट हुई, उसे पहले सोने, फिर चाँदी की कुल्हाड़ियों का प्रलोभन दिया और अंत में, लकड़हारे की ईमानदारी से प्रसन्न होकर, उसकी लोहे की कुल्हाड़ी के साथ सोने चाँदी की कुल्हाड़ियों का पुरस्कार देकर उसे हमेशा के लिए दरिद्रता से बाहर निकाल दिया। लकड़हारे ने अपना शेष सम्पन्न जीवन, सपरिवार संतोष से जिया। 

पर हमारी इस कथा का नायक उस युग का नहीं है भले ही पेशे से वह भी लकड़हारा हो। दरअसल उसने ऊपर की कहानी पढ़ कर ही अपने नए पेशे का चुनाव किया। एक कुल्हाड़ी ख़रीदी और निकल पड़ा जंगल की राह। रास्ते में कुछ परिचित मिले पर उनसे नज़र बचाता हमारा नायक, फटे-पुराने कपड़े -ज़ूते धारण कर, अपने अभियान के सफल होने की कामना लिये , तीर की तरह नदी की ओर बढ़ा जा रहा था। बार बार मन में एक ही प्रबल इच्छा, “काश मेरी कुल्हाड़ी भी नदी में गिर जाये”। 

नदी किनारे पहुँचते ही वह उतावला हो गया और कुल्हाड़ी पहुँचा दी सीधी नदी के तल में। तुरन्त बैठ गया नदी के किनारे और रो रो कर, आँखे बंद कर अपना दुखड़ा गाने लगा, “हाय, मैं मर गया, बर्बाद हो गया। मेरी जीविका का एकमात्र साधन, मेरी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। अब मेरा परिवार क्या खाएगा, भूखा मर जायेगा, मेरे मासूम बच्चों को……….” और रोने का नाटक करते, बीच बीच में कनखियों से देख लेता कि ‘जलदेवी’ प्रकट हुई या नहीं। 

शाम होने आई, परन्तु जलदेवी ने दर्शन नहीं दिये। आख़िर थक-हार कर घड़ियाली आँसुओं का स्थान असली आँसुओं ने ले लिया। कुछ अँधेरा सा होने लगा। जैसे ही व्यथित मन से वो घर लौटने को हुआ, कानों में एक आवाज़ सुनाई दी, “क्या हुआ? तुम्हें तुम्हारी कुल्हाड़ी नहीं चाहिये?” 

हमारे नायक लकड़हारे की साँस जैसे रूक सी गई। उसे अपने कानों पर विश्वास ना हुआ। वह स्तब्ध, ठिठक कर जैसे मूर्ति बन गया हो, उसी स्थान पर ठहर गया। पीछे मुड़ कर देखने का साहस भी नहीं हो रहा था तभी वही आवाज़ पुनः कानों में गूँजी, “नहीं चाहिये कुल्हाड़ी?”

इस बार साहस किया, मुड़ के पीछे देखा और जलदेवी को अपने समक्ष पाया। 

जलदेवी ने पूछा, “कैसी थी कुल्हाड़ी तुम्हारी?” लकड़हारे ने सोचा अगर सच कहा तो सोने चाँदी की कुल्हाड़ियाँ नहीं मिलेगी, अतः इशारों से बताया की उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा, वो तो ये भी भूल गया कि खुद कौन है। 

जलदेवी बोली, “कोई बात नहीं। घबराहट में अक्सर याददाश्त खो जाती है। में तुम्हारी कुल्हाड़ी लाती हूँ।” 

हमारे नायक को तुरन्त पुरानी कहानी याद आ गयी। जलदेवी पहले सोने की कुल्हाड़ी लाई। मन तो बहुत ललचाया, पर लकड़हारे ने कह दिया की ये कुल्हाड़ी मेरी नहीं है। जब जलदेवी चाँदी की कुल्हाड़ी लाई, तब भी मन मार कर लकड़हारे ने कहा, “ये कुल्हाड़ी भी मेरी नहीं है।”

जलदेवी अब उसकी असली कुल्हाड़ी ले आई और उसे दे दी। “अब ठीक है ना, अब घर जाओ। दोबारा इसे मत खोना।” ये कह कर जैसे ही वो जल में प्रवेश करने लगी, लकड़हारा दहाड़ मार कर रो पड़ा। जलदेवी को दया आ गयी, बोली, “तनिक रुको”; फिर पानी में डुबकी लगा एक पल में सोने चाँदी की कुल्हाड़ियाँ ले आई और लकड़हारे को देते हुए बोली, “आगे से कभी झूठ मत बोलना और ना ही लालच करना। अगर करोगे तो इन सोने चाँदी की कुल्हाड़ियों से हाथ धो बैठोगे”। साथ ही एक पोटली रुपयों से भरी भी दी। जलदेवी को उनके निर्देशों का पालन करने का वचन दे कर लकड़हारा लगभग दौड़ता हुआ अपने घर पहूँच गया। सोने-चाँदी की कुल्हाड़ियाँ ऊपर ताक पर छुपा दीं, परन्तु रोज़ रात एक बार सोने से पहले देख लेता था कि कुल्हाड़ियाँ सलामत हैं। पोटली से ज़रूरत पड़ने पर कुछ रुपये निकाल घर खर्च चला लेता था। सामान्य रूप से काम पर जाता पर मुश्किल से दो-चार टहनियाँ एकत्र कर लौट आता। काम कम, नाटक अधिक।

“अब तो मैं मालामाल हो गया हूँ, मुझे काम पर जाने की क्या आवश्यकता है”, ऐसा सोच कर उसने काम-धाम से निवृत्ति ले ली। अलबत्ता रोज़ सोने से पहले सोने-चाँदी की कुल्हाड़ियों को अवश्य निहार लेता और प्रसन्न मन से निश्चिंत होकर सो जाता। 

जब कुछ माह ऐसे ही गुजर गए। पोटली में रखे रुपए भी क़रीब क़रीब समाप्त होने को आए, तो सोचा क्यों ना चाँदी की कुल्हाड़ी बेच कर गुज़र करूँ। पत्नी की नज़र बचा कर धीरे से कुल्हाड़ी निकाली और एक चादर में लपेट कर बेचने निकल पड़ा। 

अभी घर से निकला ही था की पड़ोसी ने पूछ लिया, “क्या लकड़ी काटने जंगल जा रहे हो?”। लकड़हारा बोला, “हाँ”, और जैसे ही वो दो कदम आगे बढ़ा, पड़ोसी ने पूछा, “आज कुल्हाड़ी चादर में क्यों ले जा रहे हो? कोई खास बात है क्या?” “कुल्हाड़ी नहीं, छाता है”। ग़भराहट में लकड़हारा बोल पड़ा। “छाता? चादर में लपेट कर?” पड़ोसी अचरज की मुद्रा बना आगे बढ़ गया।

तभी लकड़हारे को लगा की उसके हाथ में चादर में लिपटी कुल्हाड़ी का वज़न कम हो गया है। वो घबरा कर घर के अंदर भागा, आनन-फ़ानन में चादर खोली और जो देखा, आह जैसे उसकी जान ही निकल गयी- कुल्हाड़ी का आकार घट कर आधा रह गया था। उसने जलदेवी से लाख मिन्नत की कि वो पड़ोसी को तुरन्त जाकर सच बताएगा, पर कुल्हाड़ी आधी की आधी ही रही। 

उसने छोटी हो गई कुल्हाड़ी को एक थैले में रखा और फ़ौरन उस बूढ़े सुनार की दूक़ान पर पहुँचा, जिसने एक बार ज़रूरत पड़ने पर उसकी निस्संकोच सहायता की थी। बूढ़ा सुनार, जिसे सारा गाँव आदर से बाबा बुलाता था, अपनी ईमानदारी और सबकी सहायता करने, विशेषकर ग़रीबों की सहायता के लिए जाना जाता था। उसने जब चाँदी की कुल्हाड़ी देखी तो पूछ बैठा, “कहीं कोई गड़ा धन मिल गया है क्या?”। घबराये हुए लकड़हारे ने सारा सच तुरन्त उगल दिया। उसे डर लगा कि चाँदी की कुल्हाड़ी अब आधे से आधी ना हो जाए।

बूढ़ा सुनार बोला, “तो जलदेवी ने तुम्हें पहले ही आगाह किया था की झूठ मत बोलना और लालच भी मत करना। पर तुम तो दोनों पाप कर बैठे। पड़ोसी से झूठ बोला और सारा धन अपने लिये रख लिया। गाँव के दूसरे ग़रीबों के बारे में कुछ नहीं सोचा?”

अब लकड़हारे की आँखे खुल गयीं, उसे अपने ओछेपन का अहसास हुआ, शर्मिंदगी हुई और उसने तुरंत प्रायश्चित करने का मन बनाया। बूढ़े सुनार की सहायता से एक सभा बुला कर सारे गाँव को एकत्रित किया। सारी घटना विस्तार से सच सच सुनाई। सारे गाँव से माफ़ी माँगी, बचे हुए धन की पोटली और सोने की कुल्हाड़ी सभा में लाकर बूढ़े सुनार को सौंप दी। 

अचानक चाँदी की कुल्हाड़ी भी अपने मूलरूप में आ गई। चंद महीनों में सारा धन बाबा की अगुआई में सारे गाँव की भलाई की योजनाओं में लगा दिया। गाँव वालों ने लकड़हारे को मुखिया बना कर सारी योजनाओं को कार्यान्वित करने की ज़िम्मेदारी दे दी जिसे उसने बड़ी ईमानदारी से निभाया। 

अब लकड़हारा वापस नियमित रूप से काम पर भी जाता था और मुखिया की ज़िम्मेदारी भी निभाता था। उसे ज्ञात हो गया था की आवश्यकता से अधिक संचित धन एक अच्छे भले आदमी को अकर्मण्य बना कर हमेशा के लिये बर्बाद कर सकता है।

पुरानी कहानी सुनने के लिये इस लिंक पर उंगली दबायें लकड़हारा !


बुरा न मानो होली आई और चली गई

<strong>ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं</strong><br>
ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं

पेशे से रिसर्च मे एक मजदूर हूं।एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और दू गो IIT का तमगा लिये आवारा घूमता रहता हूं।यहां पर कहानियां सुनाता हूं कल्पनाओं मे घोल कर” ! पर आज यहां कहानी नही वरन वास्तविक अनुभव लिख मारे हैं।

अरे भाई माफ़ करो हम से पोस्ट करने में देर हो गई ! बनारस के बाबा , घोर कलजुग के जवान आदमी, अरे वही जो ट्विटर पर ट्विटियाते हैं उनसे ही मैने यह लेख बहुत पहले मंगवाया था । पर अस्वस्थ होने के नाते मुझसे वृक्षमंदिर पर इस लेख को चेंप देने में देर हो गई।

वैसे आजकल फ़र्ज़ी पेट पालने के चक्कर में बहुत पढ लिख कर बनारस के बाबा रिसर्च में मज़दूरी करते हैं। धुर सहराती हो गये हैं पर गाँव,गाड़ा, गवईं की बीते दिनों की गम्मज नहीं भूले हैं। अपने गाँव की होली याद कर रहे हैं। आप में से बहुत से लोगों को इसमें से कुछ स्वानुभूत सा लगेगा । भारत से भागे भारतीय होते हुये भी मुझे अपने गाँव की होली की याद आ गई। वह यादें जो सत्तर साल से भी ज़्यादा पुरानी है । पर आज भी लगती है जैसे कल की हों। जिनके साथ वह पल बीते उनमें से बहुत से तो साथ छोड़ कर चले गये जो हैं वह भी बिन बताये चले जा रहे हैं। क्या करें जब आये हैं तो जाना ही पड़ेगा। यही नियति है।

जब तक जीवन है तब तक, दीपावली है, दशहरा है, एकादशी है, होली है, ….उत्सव हैं । जीवन जीना ही उत्सव है ।


ईया (दादी मां) सबको उबटन लगाती थी। और इस उबटन की तैयारी गुझिया की तरह ही होती थी। माई, गोयठे (उपले) के चूल्हे पर दो दिन पहले कड़ाही में खड़ा सरसों भूनती थी और अगले दिन सिलबट्टे पर पीसती थीं, और अगजा के दिन सबको वो उबटन लगाती थी, एकदम रगड़ रगड़ कर और उसके बाद होती थी , मालिश एक दम शुद्ध कड़ुआ तेल की कच्ची घांटी का तेल गाँव के कोल्हू से पेरा कर आया हुआ॥

और यकीन मानिए हम जैसे कलुए भी उस दिन गोरे दिखते थे 🤣🤣।जिसे आप आज के समय में removal of dead skin cells कहते हैं, तब उसको शरीर का मैल कहा जाता था 🤣🤣 और जो शरीर का मैल छूटता था उसको झिल्ली।इसका एक valid point हमारे बाऊजी ने, बताया था तब, जब हम धोती पहने उबटन लगवाते थे।। बोले थे की “बेटा लोग सर्दियों में लोग पहले ऐसे वैसे नहा लेते थे, गर्म पानी नहीं मिलता था ना इतना” खैर बात जो भी हो, ये तो है की साधारण लोग अभी भी सर्दियों में बस नहा लेते हैं‌।और जब सर्दियों से गर्मियां आती थी तो उस मैल को उबटन से मल मल कर छुड़ाया जाता था।और उस मैल को “झिल्ली” बोलकर अगजा में जला देते थें ॥

खैर हमको बचपन में बाउजी के इस बात से कोई लेना देना नहीं था, हमको तो बस अगजा के लिए किसी की खेत पलानी (झोंपड़ी) और किसी के घर से दस बोरा गोयठा चुराने से होता था 🤣🤣।और तो और एक गांव का अगजा एक ही जगह जलता था और भले आप लाख बवाल करें अगजा जलाने के लिए गांव के पुरोहित और मूर्धन्य मान्यवर लोगों की उपस्थिति जरूरी मानी जाती थी, और बड़े बुजुर्ग अगजा की लपट देख अगले साल की मौसम की भविष्यवाणी करते थे।।सनद रहे अगजा तब तक नहीं मान्य माना जाता था जबतक गांव के सारे टोलों से कुछ चुरा कर लड़के ना ले आएं भले वो एक ही उपला क्यों ना हो लेकिन यही सत्य था तब ।। और हमारे समय में पलानी सबसे बड़े जमींदार के खेत से उठाई जाती थी और इसमें उनकी शान होती थी, और उठाने वालों को पुरस्कार भी मिलता था आशिर्वाद के रूप में॥

खैर ये मान्यताएं अब दम तोड़ रही हैं, और शायद विलुप्त हो जाएं और हो भी क्यों नहीं, आखिर हम जैसे पलानी चोर जो कभी अपने खेत की पलानी चुराने के लिए आशीर्वाद पाते थे,आज फर्जी के पेट पालने के चक्कर में, होलिका दहन के नाम पर रंग बरसे जैसे गानों पर भंडैंती देखते हैं।आज के जमाने में हमारे गांव में भी चार पांच कालोनी बन गयी हैं जहां कभी पूरे गांवका एक अगजा जलता था वहां आज चार पांच अगजा जलता है।और हमारे जमाने के होली गाने वाले एक भी नहीं रह गये हैं॥

बस मेरी बिताई और गाई होली अब शायद मेरे गांव में भी नहीं बसती।बस बसती तो एक आवाज जो मेरे दादाजी ने सिखाई थी,कहा था,” बेटा, जिस घर में भउजाई (भाभी) समझ कर दिन में रंग खेलना उसी घर में, सांझ को भउजाई के पैरों पर अबीर रख कर जरूर आशीर्वाद लेना,तरक्की करोगे”॥

खैर हमारी कहानी अनवरत चलती रहेगी शायद, लेकिन आप होली की हुल्लड़ जरूर करिएगा लेकिन शालीनता के साथ, और हां आप आशिर्वाद लेना ना भूलना॥

होली की हुल्लड़ शुभकामनाएं आप सभी को ।आप हमेशा मस्त रहें, व्यस्त रहें, मोटाइल रहें, निरोग रहें यही कामना रहेगी बाबा विश्वनाथ से 🙏🏻🙏🏻॥



रजाई धारी सिंह “दिनभर”

<strong>ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं</strong>
ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं


पेशे से रिसर्च मे एक मजदूर हूं।एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और दू गो IIT का तमगा लिये आवारा घूमता रहता हूं।यहा पर कहानियां सुनाता हूं कल्पनाओं मे घोल कर” ! यहां कविता लिखने का घनघोर प्रयत्न किये है।

Close-up, abstract view of architecture.
Photo of a painting by Dr (Mrs Rama Aneja)

वीर तुम अड़े रहो

वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
चाय का मजा रहे,
प्लेट पकौड़ी से सजा रहे
मुंह कभी रुके नहीं,
रजाई कभी उठे नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

मां की लताड़ हो
या बाप की दहाड़ हो
तुम निडर डटो वहीं,
रजाई से उठो नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

लोग भले गरजते रहे,
डंडे भी बरसते रहे
दीदी भी भड़क उठे,
चप्पल भी खड़क उठे
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

प्रात हो कि रात हो,
संग कोई न साथ हो
रजाई में घुसे रहो,
तुम वही डटे रहो
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

कमरा ठंड से भरा,
कान गालीयों से भरे
यत्न कर निकाल लो,
ये समय तुम निकाल लो
ठंड है यह ठंड है,
ठंड बड़ी प्रचंड है
हवा भी चला रही,
धूप को डरा रही
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो।।

अपूर्व सुंदरी

<strong>बनारस के बाबा, ट्विटरगंज से </strong>
बनारस के बाबा, ट्विटरगंज से


वैसे सुनने मे आता है कि यह कहानी सच्ची है !

ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं, “पेशे से रिसर्च मे एक मजदूर हूं।एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और दू गो IIT का तमगा लिये आवारा घूमता रहता हूं।यहा पर कहानियां सुनाता हूं कल्पनाओं मे घोल कर” !



एगो कहानी सुनाते हैं, बात तब की है जब हम ओरिजनल काशी वासी थे। एक इंटरव्यू देने गये थे दिल्ली CSIR में, Senior Research Fellow का ।

ससुरा बोर्डे में मार कर दिए, वो इसलिए कि एगो वैज्ञानिक महोदय जो इंटरव्यू ले रहे थे उन्होंने ये कह दिया की लेड को प्लंबम नहीं कहते हैं ।

अब हम अंइंठा गये वहीं पर की कहते ही हैं। ससुरा हमारा इंटरव्यू तुरंते खत्म हो गया और हम वापस चले आए। डिपार्टमेंट से तीन लोग गये थे , हमारा रूममेट, हमारा रिसर्चमेट और हम। जब रिजल्ट आया तो उन दोनों का सलेक्शन हो गया पर हमारा नहीं हुआ था ।

बस हम तीर की तरह निकले कमरे से और जाकर चेतसिंह घाट पर बैठ गये।

मुंह फुलाए नाक से हवा छोड़ते जब चार पांच पुरवा चाय पी चुके बैठे गरियाते हुए तो एक अपूर्व , हजारों में एक सुंदरी लाखों में एक पोज देते आ गयी, एकदम सजी धजी, साथ में प्रोफेशनल फोटोग्राफर लिए ।

उन लोगों वहीं फोटो शूट करना था चेतसिंह घाट पर और हम बैठे थे महल के दरवाजे पर ।
अब वो अपूर्व सुंदरी आईं और अंग्रेजी में बोलीं की हटो यहां से ।

हम तो उस समय बाबा से लड़ने को तैयार थे उनका क्या सुनते , हम बोलें में “ना हटब , अब बोलअ”

बिचारी सुंदरी हैरान परेशान चिल्ला के हमारी शिकायत कर दी फोटोग्राफर से जो नाव पर सवार सवा हाथ का कैमरा लिए इंतजार कर रहे थे । एगो चिल्लाते हुए आया तो चायवा वाला पूछा हमसे , “का कहत हवन स भाय” तो हम बोले की “कहत हौ की हमके पनिया में फेंक दिहें ”

तो चायवा वाला बोला “त सारे के एहर का आवे के जरूरत हौ,कूद जाईत सार नइया से गंगा जी में “

अब भाई साहब जो बवाल मचा उधर, उन्होंने पुलिस को फोन कर दिया और हमने हास्टल में । जो लिहो लिहो हुआ था उस दिन कि सब लाठी खा लिए, फोटोग्राफर का कैमरा भी टूट गया और अपूर्व सुंदरी भी चार लाठी खाकर नाव में बैठ गयी ।‌‌

अगले दिन सब बीएचयू भी आए थे फोटो शूट करने, हास्टल वालों ने पहचान लिया जो सब भउजी, भउजी कह के हूट किए की सिक्योरिटी सुपरवाइजर तिवारी जी को आना पड़ा ।

बाद में हमको बुलाया गया तब तक ना सलेक्शन होनें का गुस्सा उतर गया था, लड़कों को चाय समोसा खिलाना पड़ा तब जाकर उधर शांति हुई ।‌

और सब जाते जाते भी अपूर्व सुंदरी को भउजी का तमगा देकर चले गए !


क ख ग घ

क से कबूतर, क से कमल, क से किताब

बात उस जमाने की है जब मुझे केवल बोलना आता था । पढ़ना लिखना नहीं। ज़ाहिर है उम्र तब बहुत कम थी । अब यह सब बताने की क्या ज़रूरत ? जीवन के संध्याकाल में जब अक्सर यादें भी याद आ कर भूलने लगती हों तब यादों को याद कर उन्हें बताने की प्रक्रिया मे वह और उभर कर आती है।मैं उन्हें लिपिबद्ध भी कर पाता हूँ ।औरों के लिये नहीं तो अपने लिये ही सही ! जो है सो है!

शायद पाँच या छ साल का था। स्कूल नहीं था गाँव में। तहसील से कुछ सरकारी अधिकारी आये, स्कूल खोलना था। बाबू देव नारायण सिंह ( बुढवा बाबा, मेरे प्रपितामह) ने उन्हें सलाह दी कि स्कूल सड़क से लगी हमारे खलिहान के पास की ज़मीन जहां अखाड़ा हुआ करता था और अब भी है, उसके दक्षिण पश्चिम कोने पर स्थित मिठाउआ आम के नीचे से शुरू हो । बस शुरू हो गया इस्कूल और शुरू हो गई मेरी पढ़ाई ।

शिक्षा पहली से पाँचवीं तक वहीं बेसिक प्राइमरी पाठशाला चतुर बंदुआरी में हुई। केवल एक साल जब मैं तीसरी में था बाबूजी अपने पास ले गये देवरिया । बाबूजी तब देवरिया में ज़िला कृषि अधिकारी के पद पर तैनात थे। तब वहाँ मारवाडी स्कूल गरुडपार मे मेरी पढ़ाई हुई । देवरिया में ही मुझे सिर पर से बंदर ने काटा था । से भूकंप का अनुभव भी वहीं पहली बार हुआ

क ख ग घ … वर्णमाला मैंने अपने गाँव में मिठउआ आम के पेड़ के नीचे ज़मीन पर बैठ कर सीखी। लकड़ी की काली पट्टी पर जिसे दिये की कालिख लगा माई, अम्मा, मझिलकी मम्मू की शीशे की चूड़ी से रगड़ कर चमकाया जाता था। नरकंडे की क़लम से खडिया को पानी में घोल कर बनी स्याही से लिखा जाता था। नरकंडा और खडिया गाँव में उपलब्ध थे।एक घर बढ़ई भी गाँव में थे ।अब भी हैं।

जब मेरी पहली मुलाक़ात से हुई तब जाकर पता चला कि क से कबूतर और क से कमल और भी बहुत से शब्द है । वैसे जब मैने लिखना पढ़ना सीखा तब तक मैंने कबूतर या कमल नहीं देखा । किताब थी या नहीं ठीक से शायद नहीं। थी तो कैसी थी वह भी याद नहीं । शायद उसी किताब में कबूतर और कमल का फ़ोटो देखा हो। से पंडुख या पंडुखी तो बहुत थी गाँव पर । पर कबूतर से ठीक से पहचान शहर आ कर ही हुई। बरसात के बाद उनवल से बांसगांव वाली कच्ची सड़क के दोनों ओर के कुछ गढ्ढों में पानी भरा रहता था। कमलिनी के फूल पहली बार मैंने शायद उसी में देखे होंगे।

मौलवी सुभान अल्लाह और बाबू सुरसती सिंह पढ़ाते थे । बाद में हंसराज मास्टर साहब आने लगे । मौलवी साहब की चेक की क़मीज़ सफ़ेद धोती, काली पनही, पहनते थे । छाता हमेशा साथ रहता था। जब किसी को दंड देना होता वह छतरी बड़े काम में आती थी। कुंडी गले में लगा कर खींच कर उलटी तरफ़ से दो चार बार पिछाडा पीट दिया जाता था । पर मुझे कभी मार नहीं पड़ी। आख़िर हमारे पेड़ के नीचे स्कूल शुरू हुआ था ।

बहुत कुछ याद नहीं है पर मिठउआ पेड़ के आम की सुगंध और मिठास भरा ललाई लिये गूदा अभी भी नहीं भूला है ।

कुछ किताबें थी घर पर। रामचरित मानस, कल्याण के बहुत से अंक, श्रीमद् भगवद्गीता, गोरखपुर की क्षत्रिय जातियों का इतिहास आदि आदि। गीता पर पढ़ना विष्णु राव पराड़कर द्वारा शुरू किये गये दैनिक “आज” से ही शुरू हुआ होगा। दिल्ली के टेंट वाले स्कूल में जब मै छठवीं में पढ़ रहा था, मेरे बाबूजी ने नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक “ ज्ञान सरोवर” जिसका मूल्य एक रुपया था जन्मदिन पर भेंट की थी। दिल्ली की बात है । और यह तब की बात है जब हमारे यहाँ जन्मदिन शहरों में ही मनाया जाता था, मेरे गाँव जैसे गाँवों में तो क़तई नहीं। म

से काका भी होता है ।पर काका नाम ज्ञान सिंह था । काका के बारे में ज्ञ शीर्षक के अंतर्गत लिखा जायेगा।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ख से ख़रबूज़ा, ख से ख़रगोश , ख से ख़लील

ख़रबूज़ा तो नहीं पर “फूट” जिसकी रिश्तेदारी ककड़ी परिवार में रही होगी देखा था । पांडे लोगों के घर के पीछे ऊत्तर की ओर वाले खेत में मकई बोई जाती थी । मचान भी होती थी चिरई उड़ाने के लिये । बड़ा अच्छा लगता था मचान पर बैठ चारों ओर देखने पर । ऐसा लगता था जैसे मै सारी दुनिया देख रहा हूँ।

ख़रबूज़ा बहुत बाद में जब भइया (मेरे पितामह ) भटौली बाज़ार से आया तो देखा और फूट की याद आ गई।

फूट नाम शायद इसलिये पड़ा होगा कि बड़ा हो कर फूट जाता था।

ख से खस्सी भी होता है। खस्सी का मांस जिसे कलिया या गोश्त या बाद में मीट भी कहने लगे भटौली बाज़ार से लाया जाता था।

भटौली बाज़ार से ख़रीद कर लाया कलिया या खस्सी का गोश्त ही शायद मुझे पहले पहले खिलाया गया होगा । वैसे गाँव में ख से ख़लील मियाँ के यहाँ भी कभी कभी बाबू लोग खस्सी कटवाते थे । मनौती माने गये बकरे की बलि की प्रथा आज भी है । यह घर के बाहर दुआरे पर एक किनारे में किया जाता था।

ख से ख़रगोश जब १९६८ मे आणंद में नौकरी शुरू की । १९७० मे जब एनडीडीबी कैंपस बना हमने से कुछ लोग रहेवासी बने तब एक आइएएस अफसर डेपुटेशन पर आये ।सहकर्तव्यपालक बने, मित्रता हुई जो अब भी बरकरार है। हम दोनों की तब शादी नहीं हुई थी। वह तब तीन बेडरूम वाले बंगले में रहते थे । मै बाइस कमरों वाले हास्टल का नया नया वार्डन बनाया गया एक सोने का कमरा, बैठकी और स्नानागार एवं शौचस्थान मेरे हिस्से आये। मेरे मित्र के पास दुनाली बंदूक़ थी । काली रंग की फ़ियेट कार और आलिवर नाम का छोटा सा कुत्ता भी था।

एनडीडीबी कैंपस से के पास ही आणंद वेटेरिनेरी कालेज कैंपस है । तब वेटरिनरी कालेज कैंपस का बहुत सा हिस्सा ख़ाली झाडीझंखाड से जिनमे बहुत से ख़रगोश रहते थे । शाम ढले सियारों की हुआं हुआं शुरू हो जाती थी । एक दिन हमारे मित्र को शिकार करने का मन किया । रात को गाड़ी ले कर वेटरिनरी कैंपस में बंदूक़ और अपने छुटकू से कुक्कुर आलिवर सहित निकल पड़े वेटरिनरी कालेज कैंपस में। हेड लाइट आन थी । कई ख़रगोश गाड़ी की आवाज़ सुन झाड़ियों से बाहर निकल आये । बंदूक़ चली। कुछ धराशायी हुए। उठा कर एनडीडीबी हास्टल लाये गये और वहाँ साफ़ सफ़ाई काट कटाई बाद मसाला वसाला डाल ख़रगोश के गोश्त का कलिया बना । ज़्यादा तो याद नहीं पर खाने वालों को कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया ।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ग से गाँव, ग से गाय, ग से गाभिन

मेरे गाँव का नाम चतुर बंदुआरी है। पर गाँव में रहने वालों में जैसा हर जगह होता है कुछ लोग अवश्य चतुर रहे होंगे और चतुराई के लिये प्रसिद्ध भी।फिर चतुर बंदुआरी नाम कैसे पड़ा ? बताया गया इसका कारण है कि तहसील मे एक और गाँव का नाम बंदुआरी है ।मेरे वाली बंदुआरी के किसी चतुर का उठना बैठना हाकिम हुक्काम से रहा होगा और उसी ने “चतुर” बंदुआरी के आगे डलवा दिया होगा। और हमारा गाँव चतुर बंदुआरी कहा जाने लगा। दूसरी बंदुआरी बंदुआरी खुर्द के नाम से जानी जाती है।

बंदुआरी यानि वन की दुआरी । यानि वन का द्वार । वन बहुत पहले रहा होगा। हमारे बचपन में तो नहीं । वन तो नहीं पर बाग ज़रूर थे जिन्हें हम बारी कहते थे।

छोटकी बारी, बडकी बारी हमारी थी । मैना की बारी और सकुंता की बारी हमारे पट्टीदारी के परमहंस बाबा की थी ।पुन्नर बाबा के परिवार की बारी रेहारे के आगे थी खाल में जहां बाढ़ का पानी आता था। अब बारी भी न रही । कुछ पेड़ ज़रूर है । कुछ नये पेड़ और बाग लगाने का प्रयास भी हुआ है । चतुर बंदुआरी वृक्षमंदिर भी उन्नीस सौ नब्बे के दशक में शुरू किया गया ।

मेरे बचपन में घर पर तीन जोड़ी बैल हल चलाने गाड़ी ढोने के लिये थे । गाय की जगह भैंस का दूध ज़्यादा पसंद किया जाता था । दो भैंसों की याद आती है करिअई और भुइरी। करिअई बहुत दूध देने वाली थी। बाद में पता चला मुर्हा नस्ल की थी। गाभिन थी। प्रसव के दौरान बच्चा मर गया था। जिस रात वह प्रसव पीड़ा में थी उस दिन शाम से ही मुन्ना बाबू (मुझसे पाँच साल बडे चाचा) गमगीन थे । रात में जब करिअई भैंस के बच्चे के बारे में दुखद समाचार मिला मुन्ना बाबू भोंकरिया कर बहुत देर रोये। मै भी उनकी देखा देखी रोने लगा। बचपन में मैं मुन्ना बाबू की पूँछ कहा जाता था। हरदम उनके साथ घूमने खेलने के लिये तत्पर ।

बहुत दिनों बाद जब मैं शहर में पढ़ने के लिये भेजा गया तब रविवार को गाँव आने पर गाय बंधी थी। हरियाणवी थी ।बहुत मान से रखा जाता था।

हमारे समय मे गीताप्रेस नामक सांड हुआ करता था। गायों को गाभिन करने का ज़िम्मा उसी पर था।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

घ से घर, घ से घरौंदा

चतुर बंदुआरी का हमारा घर दो खंड का था मतलब दो आँगन वाला था अब भी है। लगभग पौन एकड़ से थोड़ी कम ज़मीन पर बना यह घर पर पूरब की ओर एक पीपल का विशालकाय वृक्ष था । साथ मे लगा एक तेली परिवार का घर था । बाबा लोगों ने उन्हें अपनी ज़मीन माली लोगों के घर के पास दे कर बदले में उनकी ज़मीन ले ली थी । इस तरह पिपरे तर के बाबू लोगों के घर का क्षेत्रफल और बढ़ गया ।घर के बाहर पीपल का एक विशाल पेड़ था। हमारा परिवार पिपरेतर के बाबू लोगों के नाम से जाना जाता था।

अब वह घर बस यादों का घर बन कर रह गया हैं । कुँआ था । अब भी है। पर कुयें का पानी ही पिया जाता। वह नल यानी चाँपा कल जब बड़े आँगन में लगा तब शायद मेरी उम्र बीस एक साल रही होगी यानी पचास साल पहले । अब भी चलता है। पहले पाइप कुढ़ें से पानी खींचता था। अब पता नहीं शायद बाद में। पाइप ज़मीन में गाड़ा गया हो । दरवाज़े पर के कुयें पर गागर भर पानी सिर पर डाल कर नहाने में बड़ा मज़ा आता था। पानी निकालने के लिये बिदेसी अथवा अन्य लोग तैनात रहते थे। साबुन का इस्तेमाल भी वही पर पहली बार किया गया होगा।

सरसों के तेल का दिया या ढेबरी , लालटेन, लैंप रोशनी के यही साधन थे।

अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

अपने


अपने होते कौन है ? कहा जायेगा वह जो हमें अपनायें और जिन्हे हम अपनायें वह हैं अपने।

अपनाना क्या है ? हम उन्हीं को अपनाते हैं जिनसे संबंध बन जाये और बने रहें । चाहे घर परिवार के सदस्य, मित्र, अकिंचन अहेतुक जीवन यात्रा में मिल कर साथ चलने फिर भले ही बिछड़ जाने वाले ।

संबंध क्या है ?

वर्षों पहले कुछ स्वलिखित पंक्तियाँ याद आ गईं।

brown brick wall

संबंध

संबंध एक सामाजिक बंधन
संबंध एक नियम का वर्तन
    संबंध एक सांसारिक पहचान

   घडियाली आँसू झूठी मुस्कान, क्या है सच क्या है झूठ

क्या है सुख क्या है दुख
 क्या है लोभ क्या है त्याग
माया क्रंदन मिथ्या बंधन

       जीवन नित्य स्वयं का वंदन , बँधे स्वयं जो वह है बंधन

समय बदलते हो परिवर्तन,  ऐसा बंधन कैसा बंधन

जब “अपने” अपने साथ होते है तब हमे उन्हें उतना याद करने की फ़ुरसत भी नही रहती जितना उनके चले जाने के बाद !

हमारे “अपने” भी तो चले जाते हैं एक एक कर । जो चले गये उन्हीं के जैसा एक दिन मेरा भी आयेगा । 

रह जायेंगे हैं यह पेड़, पशु, पक्षी, अन्य जीव जन्तु और उनके वंशज। पर वह भी तो अमर नही हैं !

और इमारतें, घर पगडंडियाँ , सड़कें …इनका क्या होगा । कौन जाने शायद यह बन जायेंगे खंडहर ।या शायद इनमे से कुछ रह जाये हमारी कई पुश्तों तक ! 

पर जब अपने चले जाते हैं तब उनके “चले” जाने के बाद और विशेषकर जब खुद की उम्र ढलान पर आ चुकी हो तब उन अपनों की याद आती ही रहती है !

यादें उनसे हुई बातचीत, की बतकही की !

आख़िर बतकही के भी तो कई रंगरूप हैं।बतकही क़िस्सो में होती है, क़िस्सों मे होती हैं बातें, और बातों में होती है; बकैती, बतफरोशी, बतफरेबी, बतकुच्चन, बड़बोली, बतबुज्झी…

क्या यह पेड़, पशु, पक्षी, अन्य जीव जन्तु और इमारतें, घर पगडंडियाँ , सड़कें ..भी हमारी बातें सुनते हैं ? हम जो करते हैं , क्या वह उसे देखते हैं? इन मानवी जीवन के मूक दर्शकों के अंतस में कौन जाने हमारे किन क़िस्सों की विरासत पड़ी रहती होगी । काश यह मूक दर्शक बोल पाते । भविष्य में सिर्फ सुनी सुनाई नहीं वरन इन तटस्थ मूक दर्शकों की बातें भी जान पाई पातीं !

इस माह अंतर्जाल की आभासी दुनिया का वृक्षमंदिर दो साल का हो गया। इन कोरोना काल कवलित चौबीस महीनों में मैं भारत में केवल पाँच महीने रह पाया । वास्तविक वृक्षमंदिर पर गये तीस माह से ऊपर हो गये ।

वास्तविक वृक्षमंदिर भी तो केवल फ़ोटो और विडियो में ही देख पाता हूँ ।

पिछले तीस महीने दो किताबों के लेखक, प्रकाशकों की सहायता, वृक्षमंदिर.काम पर काम, पठन पाठन, घर के काम, ज़ूम पर झूम झूम बात कर दिन गुजरे हैं। आसपास की कुछ जगहों की यात्राओं पर भी गया।

बचपन में गाँव में जब था तब सब कुछ बहुत बड़ा लगता था। गांव के तालाब, हमारे खेत खलिहान, दो खंड वाला पिपरेतर के बाबू लोगों का मकान सब बहुत बडे लगते थे। तब मैं चार पाँच साल का था । गाँव के सीवान के भीतर ही सब कुछ था। बाहर की दुनिया देखी ही न थी ।

अब मैं पचहत्तर साल का हो गया । दुनिया देखी पर पूरी नहीं । पूरी दुनिया कोई नहीं देख सकता । फिर एक दिन मेरा गाँव मुझे दुनिया की बनिस्बत बहुत छोटा लगने लगा। शायद मेरा क़द बढ़ गया।

पर जब अंतर्मन में अपने बचपन और अब के क़द की पैमाइश की तो पाया कि ऐसा लगा कि शायद मैं छोटा हो गया हूँ ।

बचपन में मिली प्रेम वात्सल्य की ऊर्जा भरी उष्मा जो जवानी और अधेडपने के वर्षों में भी मेरी आँखों में मेरा क़द बढ़ाये रखती थी अब बस याद बन कर रह गई है, और मेरा क़द छोटा हो गया है।

आज जब अपने अंदर के अपने से बात हुई तो अंदर से उसने हंस कर कहा “न तुम बड़े हुये न छोटे। जो तब थे वह ही अब भी हो। बस अब तुम्हें अपनी औक़ात का अहसास हो गया है ।

डाक्टर प्रदीप खांडवाला अपनी कविता A matter of height में शायद यही कुछ कहना चाहते होंगें।

ऊंचाई का माजरा

अजीब बात है दूकान बंद कर मर जाना,
वर्षों से चल रही दुकान पर लगा ताला।

पर  यह ही तो हुआ मेरे एक दोस्त को,
वह अतीत की दुकान को बंद करते हुए मर गया! 

वह बदकिस्मत था। 

लेकिन जब हम अतीत के दरवाज़े बंद करते हैं, तब ही तो खुलते हैं दरवाज़े भविष्य के। एक नये जीवन के लिए? 

मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ । समय - समय पर मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया है - रिश्ते, यादें, जीने का तरीका, स्थान। 

हर मौके पर मुझे हर बार लगा कि मैं बड़ा हो गया हूं ।

पर क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ? 

मुझे याद है कैसे मैं दर्द से लड़खड़ा गया था, 
जब आसन्न मृत्यु मंडरा रही थी ले जाने मेरी मां को,
और जब मै अपने लोगों को छोड़ विदेश जा रहा था,
और जब मैंने अपना पेशा बदल दिया था,
और जब मैंने एक प्यार को छोड़ दिया। 

मैं और अधिक चाहता था,अतीत ने हमेशा कम और 
कम की ही पेशकश की। 

पर जब मैंने हाल ही मे अपनी ऊंचाई मापी, 
बरसों बाद अतीत के पन्नों से भरे अपने जीवनवृतांत से,
ऐसा क्यों लगा, 
कि मैं छोटा हो गया हूँ?

अजब ग़ज़ब दुनिया आफिस और आफिस के बाबुओं की

Aameen Khan Rahut
Aameen Khan Rahut


आपने लाख दक्षिण के मंदिर और उत्तर की देव प्रतिमाएं देख डाली हो; हज़ार महलों, मकबरों, मीनारों और अजायबघरों के चक्कर काटे हों, या मुंबई की चौपाटी; दिल्ली के चाँदनी चौक या आगरे के ताजमहल को देखा हो; लेकिन अगर आपने एक बार भी दफ्तर की दुनिया की सैर नहीं की तो समझिये कि आपका “दुनिया देखना” बेकार ही गया ।

हिन्दुस्तान को देखना; समझना है तो नाहक पुस्तकों मे आप क्यों सर खपाते हैं । जाइए, दफ्तर की दुनिया मे, जहाँ दस बीस नही सैकड़ों, हज़ारो आदमी एक जैसा काम करते है; एक जैसे उठते बैठते है, स्तर के अनुसार लगभग एक सा वेतन पाते है; एक से क्वार्टरों मे रहते है; मगर क्या मजाल है की वे किसी एक बात पर एकमत हो सकें । कहीं भी उनमे एकता हो !

सब एक दूसरे से निराले और अजीब।

कोई हाथी जैसा भारी भरकम, तो कोई जैसे रेगिस्तान का ऊंट। कोई घोड़े जैसा चपल तो कोई टट्टू जैसा अड़ियल। कोई भेड़िए जैसा खूंखार तो कोई कुत्ते जैसा पालतू। कोई बैल की तरह जुताई करनेवाला तो कोई बिल्ली जैसा मलाई साफ करनेवाला।कोई चपरासी की खाल मे शेर, तो कोई अफसर की खाल मैं गधा ।कोई चुप, तो कोई वाचाल । कहने का तात्पर्य यह कि विधाता ने अपनी फ़ैक्टरी मे आदमजात के भाँति भाँति के माडल तैयार किए है सब के सब नमूने दफ्तर नामक अजायबघर मे आपको मिल जायेंगे ।


दफ़्तरी लोग बहुत सी बातों मे एक दूसरे से अलग अलग है पर बाते उन सब में भी सामान्य है — जैसे सब हेड क्लार्क्स से डरते है; ऑफिसर्स से कांपते है और खुशामद करने मे 5000 के चपरासी से लेकर 25000 तक के सेक्रेटरी तक समान रूप से लगे रहते है।

यह ठीक है की वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उनकी पैंट खिसकने लगती है। मगर दफ्तर मे उनकी कुर्सी के सामने, काम कराने के लिये खड़े होकर देखिए – छोटे से छोटा क्लर्क भी आपके होश ढीले न कर दे तो नाम नही । और क्यों न कर दे? आप अपने हक़ की लड़ाई में चाहे कितनी ही सभाएँ करवा डालिये ; प्रस्ताव पास कराइए; जूलूस निकालिए; सरकार पर ज़ोर डालिए, पर वे जानते है की राजतंत्र की चाभी आज मंत्रियों के हाथों मे नहीं; उनकी कलम की नोक मे है।

यह बात दीगर है कि घर मे बीबी के मारे उनका रहना दूभर हो रहा है; मगर यह उनकी घरेलू बाते है; इनमे दखल देने का हमे कोई अधिकार नहीं है । बाहर अगर पैंट कसे; इस्त्री न की हो; शेव ना बनी हो; जूते चमकते ना हो तो आप शिकायत कर सकते है। शनिवार को अगर सिनेमा न देखा जाए, रविवार का शाम का भोजन बाहर न करे या 15 तारीख से पहले तनख्वाह समाप्त न हो जाए, तब आप चाहे तो यह सोच सकते है की बाबू अपनी धर्म से डिग गया.

दुनिया मे बार बार युद्ध होते है और उन्हे रोकने के लिए करोड़ो डालर खर्च किए जाते है. दुनिया को सहनशीलता और शांति का पाठ किसी बड़े नेता के व्याख्यान से नही; बल्कि दफ़्तर के वातावरण से लेना चाहिए. यहाँ पर गांधी और लेनिन के शिष्य एक ही कमरे मैं आठ आठ घंटे तक रहते है । मगर उनमे कभी हाथापाई की नौबत नही आती। इसका यह अर्थ नहीं की वे चुप रहते हो या बहस नही करते हो, अथवा हर किसी की बात को मानने को तैयार हो जाता हो, वह सिर्फ बहस के लिए बहस करते है। बहस इसलिए करते है की बहस करना फैशन और बड़प्पन की निशानी हैं।

आपने पत्थर तो ज़रूर देखा होगा । खुरदुरा सा…..बस दफ़्तर के बाबू को आप वैसा ही समझिए । वैसा ही पत्थर ! संसार में कुछ भी होता रहे उसके कानों पर जू नही रेंगती । वह भला, उसका काम भला और उसकी कुर्सी रूपी सिंहासन भली।

घड़ी ने उठाया उठा; बीबी ने दिया सो खा लिया; काम मिला सो कर दिया; ना मिला तो बैठा रहा; डांट लगा दी; कांपने लगा; निकाल दिया तो रो पड़ा; साहब की सीधी नज़र हुई तो फूल गया और बीबी या किसी और लड़की ने हंस के देख लिया तो गा उठा……..



अँखियाँ मिलाके, जिया भरमा के चले नही जाना …… ………………………….. आमीन

जीवन क्षणभंगुर पर अंतहीन ! 

आज प्रात: भ्रमण पर पत्थरों के बीच यह पौधा दिखाई दिया । फ़ोटो लेने का मन कर गया । पतझड़ में पत्तियाँ लाल हो गई हैं । कुछ दिन बाद गिर जायेगी । फिर बर्फ़ में दब कर वसंत आने पर हरी पत्तियाँ आयेंगी ।

परिवर्तन और संघर्ष जिजीविषा ..जीवन क्षणभंगुर पर अंतहीन !

कुछ और छाया चित्र

कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग १ और २

रश्मि कांत नागर
रश्मि कांत नागर

कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग -१

सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ी नाट्यकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था की, “हर बुद्धिमान महिला को जितनी जल्दी हो सके शादी कर लेनी चाहिये और हर एक बुद्धिमान पुरुष को शादी में जितनी देर हो सके उतनी देर करनी चाहिये”।

हमारा मित्र उनके इस कथन से बहुत प्रभावित था। मुझे नहीं पता की जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने स्वयं अपने इस कथन का खुद कितना अनुसरण किया या नहीं, परंतु हमारा मित्र, मुझे ऐसा लगा जैसे वह ठीक ऐन मौक़े पर अपने आप को बुद्धिमान साबित करना चाह रहा था। हम ऐन.डी.डी. बी. के कैम्पस में रहते थे और दिल्ली के लिये रवाना होने से पहले, भाई साहब हॉस्टल के सामने सड़क पर अपना सूटकेस रख कर, अपनी खोपड़ी खुजलाते इस दुविधा से निपटने का निष्फल प्रयास कर रहे थे। ये घटना जून १९७१ की है। तब हम सब जवान थे ।

हम में से कुछ तब और अब

हम उनकी ये दुविधा समझ रहे थे। हमें मालूम था की उनकी सगाई छोटी उम्र में ही हो गयी थी और अगर गाँव में रहते तो शायद न सिर्फ़ उनका बालविवाह हो चुका होता, पर वह अधिक नहीं तो कम से कम २-३ बच्चों की पिता भी बन चुके होते। मुझे पूरी तरह से ज्ञात नहीं, मेरा अनुमान है कि वे अपनी मंगेतर से प्रेमपत्रों के माध्यम से जुड़े रहे होंगे। एक तरफ़ शादी का लड्डू खाने को आतुर मन और दूसरी और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का प्रभाव। बलिहारी उन प्रेमपत्रों की।

हम ठहरे उनके शुभचिंतक मित्र।समझाया, “भाई, जल्दी कर वरना गाड़ी छूट जाएगी और सिर्फ़ शादी के लड्डू के सपने मिलेंगे”। यह समझिए धक्का मारना पड़ा महाशय को आनन्द रेलवे स्टेशन पहुँचाने में। अगर दोपहर दो बजे की बड़ोदा लोकल छूट जाती तो बड़ोदा से दिल्ली जाने वाली राजधानी छूट जाती, समय पर नहीं पहुँचते और मुहूर्त निकल जाता। सोचिए, सही निर्णय दिलवाने में हम मित्रों की कितनी अहम भूमिका रही होगी, क्योंकि ७० के दशक में आवागमन की सुविधाएँ सीमित थीं।

अपने इस निकटतम मित्र की शादी को लेकर हम सभी उत्साहित थे। कैम्पस में रहने वाले कोई बीस एक नौजवान कुँवारों बे बीच, यह पहला शेरदिल था  जो अपनी आज़ादी की क़ुर्बानी देने जा रहा था। याद रहे बचपन में हुई सगाई और बाथरूम में पढ़े गये प्रेमपत्र। उनकी भी तो अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 

शाम क़रीब पाँच बजे हम में से एक बोला, “अरे यार, ये तो वाक़ई शादी करने चला गया। इसके बिना अपन तीनों शाम को बोर हो जायेंगे। दूसरा बोला, “हमारा तो ठीक है, पर उसकी ‘लोटिया भागोल’ वाली प्रेमिका का क्या होगा? जब उसे पता चलेगा तो वह लड़की तो अपने बाल नोच लेगी, सर फोड़ लेगी, रो रो कर बुरा हाल हो जायेगा बेचारी का। हो सकता है आत्महत्या भी कर ले”।

“यह तो बड़ी गंभीर स्थिति हो गयी”, तीसरा बोला और उसने सुझाव दिया की हम तीनों, लोटिया भागोल वाली हमारे मित्र की प्रेमिका से मिल कर उसे समझायें ताकि वो कोई भी आत्मघाती कदम ना उठाये।

हमने ऐसा ही किया। हमारे मित्र की प्रेमिका- कपिला बेन से मिले, उन्हें समझाया। पहले तो उन्होंने बहुत आँसू बहाए, पर इस बात पर मान गयी कि वह कोई भी ग़लत कदम नहीं उठाएँगी। ठुकरायी हुई प्रेमिका कुछ भी कर सकती है, यह बात हम तीनों को परेशान कर रही थी।

कपिला बेन ने सिर्फ़ एक काम किया। अपने दुःखी मन के सारे भाव एक पोस्ट कार्ड पर उँड़ेले, और तुरंत उसे रेलवे स्टेशन जाकर RMO के हवाले कर दिया। पत्र लिखते समय कपिला बेन के आंसू बड़ी मुश्किल से रूके होंगे, फिर भी तो- तीन तो चिठ्ठी पर टपक ही गये। कपिला बेन क्योंकि “लोटिया भागोल” से थीं, उनका हिन्दी ज्ञान सीमित था, लिहाज़ा खुला पत्र यानी पोस्ट कार्ड में उन्होने हिं -गुजराती मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया।

हमारे मित्र का भाग्य बहुत अच्छा था। पोस्ट कार्ड दिल्ली पहुँचा। पोस्टमैन की दस्तक पर उस दिन सौभाग्य वश कपिला बेन का पत्र सीधे उन्ही के हाथ लगा।

मित्र ने पत्र पढ़ा तो चेहरे का रंग उड़ गया। तुरंत घर के पास वाले तारघर पहुँचे और हमें तार किया, “किसी कपिला बेन का पत्र है, माजरा क्या है? तुरंत छान-बीन करो और मुझे बताओ। भाग्य ये पत्र मेरे पिताजी के हाथ नहीं लगा वरना अनर्थ हो जाता”।

क्योंकि हम तीनों कपिला बेन पहले मिल चुके थे, हमने तुरन्त जवाबी तार किया, “सब कुछ नियंत्रण में है”। तार मिलते ही हमारे मित्र की जान में जान आयी, विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हुआ और कोई एक सप्ताह बाद वो नयी नवेली दुल्हन के साथ सकुशल आनन्द आ पहुँचे ।

आप सोच रहे होंगे के हमारा ये मित्र कौन था। ये कोई और नहीं,इसी वृक्षमन्दिर के प्रणेता श्री शैलेंद्र कुमार थे। कपिला बेन हम तीन मित्रों- बेहला, गोरे और मेरी कल्पना का नतीजा थीं, और मेरी टूटी-फूटी गुजराती ने प्रेमपत्र को साकार रूप दे दिया। पत्र पर गिरे आँसू भी नक़ली थे- आख़िर पानी की दो बूँदे गिरा कर कार्ड हिलाया और हो गया काम!

आख़िर अच्छे मित्र ऐसे नाज़ुक मौक़े सम्भालने के लिए ही तो जाने जाते हैं! 

कथा, एक मित्र के ब्याह की और हमारे बापू की भाग -२

मित्र के ब्याह की कथा आगे बढ़ायें, इसके पहले हमारे “बापू” से परिचय करवाना अत्यंत आवश्यक है। 

बापू, हमारे सम्माननीय बापू, कौन थे और उनका नामकरण कैसे हुआ यह अपने आप में ही एक कहानी है। पहले इसे पढ़िये। इस सारी कहानी में “बापू” की असली पहचान आपसे छिपायी जायेगी क्योंकि मैं अपने ख़िलाफ़ मानहानि का कोई मुक़द्दमा नहीं चाहता।

ऐन.डी.डी.बी कार्यालय ने जब कैम्पस से काम करना प्रारंभ किया, तब नए इंजिनीयर्स की भर्ती हुई। बापू इनमे से एक थे। ओहदे में तो हमारे बराबर ही थे, परंतु उम्र में शायद हमसे ४-५ वर्ष बड़े रहे होंगे। ऑफ़िस के बाद जब हम लोग खेल कूद और हंसी मज़ाक़ में लगे थे, बापू अपनी गम्भीर मुद्रा में, हाथ में ब्रीफ़केस लिये हमें भी अपनी तरह गंभीर बर्ताव करने की सलाह देते। “तुम अफ़सर हो, कुछ बड़ों की तरह, अफ़सरों की तरह व्यवहार करो। यह क्या सारे समय बच्चों की तरफ़ कूद-फाँद करते रहते हो”। 

बापू का यह रोज़ का प्रवचन हो गया था। हद तो जब गयी, जब बापू अपना ब्रीफ़केस लेकर छुट्टी के दिन भी दफ़्तर आने लगे और अपना रटा रटाया प्रवचन हम पर बरसाने लगे।

गोरे से ये बर्दाश्त नहीं हुआ। वैसे बापू ने गोरे को कभी भी प्रवचन झाड़ने की कोशिश नहीं की क्योंकि गोरे बापू से काफ़ी सिनीयर थे, गोरे को बापू के प्रवचन मुझ पर झाड़ना नहीं भाया। गोरे ने कहा, “नागर, इस बापू का कुछ इलाज़ करना पड़ेगा”। 

क्या करें, “बापू” के नाम मशहूर कर दें”, मैंने पूछा। 

“यही सही होगा”, गोरे ने सहमति जताई। 

“पर पहले उसे बताना होगा ना कि हमने उसे “बापू” के नाम सम्बोधित करना तय किया है, और ये करेंगे कैसे”, गोरे ने प्रश्न किया। 

आख़िर, “बिल्ली के गले में घंटी बांधने का ज़िम्मा मैंने उठाया”। गोरे और मैं बापू से मिले। 

मैंने बापू क़ो असली नाम से सम्बोधित करते हुए वार्तालाप शुरू किया, “आपका कहना सच है। ये बचकाना बर्ताव अब हमें बंद करना चाहिये। हम आपकी सीख का सम्मान करते हैं और अब से आपको एक सम्मानजनक तरीक़े से बुलाना चाहते है। अपर आपको आपत्ति ना हो तो हम आपको “बापू” के नाम से बुलाना चाहते हैं। ये सम्बोधन सिर्फ़ महात्मा गाँधी के लिये प्रयोग किया जाता है, क्योंकि सारा देश उनसे बहुत प्यार करता है, उनका बहुत सम्मान करता है और हम भी आपका बहुत सम्मान करते हैं”।

वह तुरंत मान गये। आख़िर सम्मानजनक सम्बोधन किसे नहीं भाता? 

अगले २४ घण्टों में वह सारे कैम्पस में “बापू” के नाम से मशहूर हो गये। 

अब लौटते हैं, हमारे मित्र की शादी पर। शादी सम्पन्न हुई और मित्र पत्नी सहित आनंद लौटने वाले थे। दिल्ली से बेहला को तार कर खबर भेजी की ‘फ़लाँ फ़लाँ ट्रेन से बड़ोदा पहुँच रहे हैं, स्टेशन पर मिलो’। रिक्वेस्ट नहीं आदेश था। 

मैं और बेहला, बेहला की मोटरसाइकल से बड़ोदा पहुँचे। स्टेशन पर एक नयी फ़ीयट टैक्सी तय की इस शर्त के साथ कि ‘अगर हमारे साहब आये, तो ही हम टैक्सी का उपयोग करेंगे। अगर नहीं आए तो हम कोई पैसे नहीं देंगे’। टैक्सीवाला मान गया। 

हमें नहीं पता कि हमारा मित्र किस डिब्बे में सफ़र कर रहा है और ट्रेन सिर्फ़ पाँच मिनट ही रुकने वाली थी। तो हमने तय किया की हम प्लेटफ़ार्म में उस जगह खड़े होंगे जहां बीच का डिब्बा आता है। फिर एक एंजिन के तरफ़ के डिब्बों की तरफ़ जायेगा और दूसरा विपरीत दिशा में। 

हमने सारी ट्रेन छान मारी। ट्रेन के छूटने की सीटी भी बज गयी, पर हमारा दोस्त नदारद। हम लौटने ही वाले थे की बेहला की नज़र दुल्हन के भेष में प्लेटफ़ार्म पर अकेली खड़ी एक लड़की पर पड़ी। 

“नागर, कहीं ये तो किरन नहीं है? अगर है तो शैलू कहाँ है? मैंने कहा, “चल पूछ लेते है कि आप शैलेंद्र की बीबी हो क्या”। पर बेहला ने पास जाकर निहायत शरीफाना अन्दाज़ में पूछा, ‘क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’

“हाँ”, उत्तर मिला।

“शैलेंद्र कहाँ है?”, मैंने पूछा।

“आगे, इंजिन के पास ब्रेक वान से बक्सा लेने गये हैं”, किरन बोली। 

मैं इंजिन की तरफ़ बढ़ा ही था कि कुली के सर पर एक भारी- भरकम बक्से के साथ शैलेंद्र को आते देखा। 

आम दिनों जैसा पहनावा हमारे मित्र का और साथ सजी-संवरी दुल्हन। लगता ही नहीं था कि भाई नयी नयी शादी करके आया है। 

कोई दो महीने बाद, एक दिन किरन ने हमें ये बताया कि वह बड़ोदा स्टेशन पर बेहला और मुझे देख कर डर गयी थी। वो सोच रही थी की ये दो गुंडे जैसे लड़के क्यों मुझे घूर रहे हैं। उसकी जान में जान आयी जब बेहला ने पूछा, “क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’ बेचारी क्या करती, उन दिनों फ़ोटो आईडेनटीटी का प्रचलन जो नहीं था। उसे तो सिर्फ़ हमारे नाम मालूम थे। 

हाँ, उसदिन हमें पता चला की हमारी शक्लों- सूरत किसी भले शरीफ़ आदमी जैसी नहीं, गुंडो जैसी है। पर क्या करते, ऊपर वाले ने जैसी सूरत दी है, उसी से गुज़ारा सारी ज़िन्दगी करना पड़ेगा! 

ख़ैर, टैक्सी में सामान रखा, किरन और शैलेंद्र पिछली सीट पर बैठे और मैंने टैक्सी वाले से गाड़ी रवाना करने को कहा। 

टैक्सी वाले ने प्रश्न किया, “पर आपके साहब कहाँ हैं, वो नहीं आये क्या”? 

हमने शैलेंद्र की और इशारा किया तो टैक्सी वाले ने ऐसा मुँह बनाया जैसे हमने इसके साथ कोई मज़ाक़ किया है। बेचारे का मुँह देखने लायक़ था। 

अब लौटते हैं, बापू पर। 

शैलेंद्र की टैक्सी के कैम्पस के पहुँचेने के ठीक दो घंटे बाद हमारे प्रिय बापू को आनंद से दिल्ली प्रस्थान करना था। ये मात्र संयोग था की शैलेंद्र का दुल्हन के साथ आनंद पहुँचना और बापू का तबादले पर जाना एक ही दिन था। शैलेंद्र D12 और में D11 में रहते थे। मैंने बापू को हमारी बिल्डिंग के नीचे खड़े देखा। वे बड़े बैचैन लग रहे थे। 

मैंने पूछा, “बापू, कोई ख़ास बात है क्या?”

“दुल्हन का मुँह देखना है”, बापू बोले।

मैंने कहा, “ऊपर आ जाओ”, और शैलेंद्र को बताया की बापू किरन को देखने ऊपर आ रहे हैं। कमरे में गोरे, बेहला और नन्दी नैथानी और अन्य नौजवान कुवांरे भी मौजूद थे । चाय पकौड़ी का दौर चल रहा था ।

बापू आए और जैसे ही एक ख़ाली कुर्सी पर बैठे, शैलेंद्र ने किरन को आवाज़ दी, “किरन, तनिक इधर आओ, ये हमारे बापू हैं, इनका पैर छू लो”। 

किरन को मालूम नहीं था की माजरा क्या है। उसने लम्बा घूँघट निकाला, बाहर के कमरे में आई और जैसे ही वो बापू के पैर छूने नीचे झुकी, बापू झट से खड़े हुए और फ़ौरन भाग खड़े हुए। 

हम सब की हंसी छूट गयी, पर किरन सकपका गई और शैलेंद्र से पूछा, “ये बापू कहाँ चले गए? चाय के लिए भी नहीं रुके”। 

हम क्या बताते। बापू ऐसे भागे की सीधे दिल्ली जाकर ही साँस ली। 

कोई दो महीनों बाद मेरा दिल्ली जाना हुआ। बापू मिले तो बहुत उखड़े उखड़े थे। मैंने पूछा, क्या बात है? ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हो?”

“तू शाला बहुत बदमाश है। शैलेंद्र की दुल्हन का मुँह भी नहीं देखने दिया। और साला मेरा पैर छूने क्यों बोला?” बापू ग़ुस्से में बोले। 

“अरे तो इसने इतना दुःखी होने की क्या बात है? अगली बार आनन्द आओ तो मुँह भी देख लेना और मुँह दिखाई भी दे देना”, मैंने कहा। 

“धत बदमाश कहीं का”, बापू की मुझे ये आख़िरी गाली थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने ऐन.डी.डी.बी. की नौकरी छोड़ दी और किसी इंजिनीयरिंग कॉलेज में पढ़ाने चले गये। शायद उन्हें वहाँ अधिक आज्ञाकारी शिष्य मिले होंगे। 

बापू को उनका नया काम अवश्य ही अधिक भाया होगा क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार, वे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद से सेवानिवृत हुए। 

शादी की शैलेंद्र ने, दुल्हन का मुँह नहीं देखने दिया उसने और बापू से डाँट पड़ी मुझे। कैसी विडम्बना, हाय रे कलियुग।


जिंदगी का समंदर

काल था, है, और  रहेगा

वर्तमान को भूत बना भविष्य निगल जाता  है काल

जीवन के जीवन की शक्ति है काल

अज्ञात होता है  जीव का काल जीवन का जीवन,  जीव की ज़िंदगी से करता है खिलवाड़ 

लहरें  उठती हैं ज़िंदगी के समंदर  में अकारणअनजानेअनायास

कुछ उछलतीउफनतीइठलातीबलखाती कुछ दुबलीपतलीमरियल सी सुस्त 

हो जाती है सब ख़त्म, नियति जो है इनकी j

पर ख़त्म हुई लहरें भी बनी रहती हैं समंदर का हिस्सा , बन कर शायद कोई और लहर

क्या कोई फ़र्क़ पड़ता है समंदर को 

लहर तो होती है समंदर की 

पर लहर का समंदर नहीं होता


समुंदर की लहरें

या

लहरों का समुंदर