जीवन क्षणभंगुर पर अंतहीन ! 

आज प्रात: भ्रमण पर पत्थरों के बीच यह पौधा दिखाई दिया । फ़ोटो लेने का मन कर गया । पतझड़ में पत्तियाँ लाल हो गई हैं । कुछ दिन बाद गिर जायेगी । फिर बर्फ़ में दब कर वसंत आने पर हरी पत्तियाँ आयेंगी ।

परिवर्तन और संघर्ष जिजीविषा ..जीवन क्षणभंगुर पर अंतहीन !

कुछ और छाया चित्र

कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग १ और २

रश्मि कांत नागर
रश्मि कांत नागर

कथा, एक मित्र के ब्याह की भाग -१

सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ी नाट्यकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था की, “हर बुद्धिमान महिला को जितनी जल्दी हो सके शादी कर लेनी चाहिये और हर एक बुद्धिमान पुरुष को शादी में जितनी देर हो सके उतनी देर करनी चाहिये”।

हमारा मित्र उनके इस कथन से बहुत प्रभावित था। मुझे नहीं पता की जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने स्वयं अपने इस कथन का खुद कितना अनुसरण किया या नहीं, परंतु हमारा मित्र, मुझे ऐसा लगा जैसे वह ठीक ऐन मौक़े पर अपने आप को बुद्धिमान साबित करना चाह रहा था। हम ऐन.डी.डी. बी. के कैम्पस में रहते थे और दिल्ली के लिये रवाना होने से पहले, भाई साहब हॉस्टल के सामने सड़क पर अपना सूटकेस रख कर, अपनी खोपड़ी खुजलाते इस दुविधा से निपटने का निष्फल प्रयास कर रहे थे। ये घटना जून १९७१ की है। तब हम सब जवान थे ।

हम में से कुछ तब और अब

हम उनकी ये दुविधा समझ रहे थे। हमें मालूम था की उनकी सगाई छोटी उम्र में ही हो गयी थी और अगर गाँव में रहते तो शायद न सिर्फ़ उनका बालविवाह हो चुका होता, पर वह अधिक नहीं तो कम से कम २-३ बच्चों की पिता भी बन चुके होते। मुझे पूरी तरह से ज्ञात नहीं, मेरा अनुमान है कि वे अपनी मंगेतर से प्रेमपत्रों के माध्यम से जुड़े रहे होंगे। एक तरफ़ शादी का लड्डू खाने को आतुर मन और दूसरी और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का प्रभाव। बलिहारी उन प्रेमपत्रों की।

हम ठहरे उनके शुभचिंतक मित्र।समझाया, “भाई, जल्दी कर वरना गाड़ी छूट जाएगी और सिर्फ़ शादी के लड्डू के सपने मिलेंगे”। यह समझिए धक्का मारना पड़ा महाशय को आनन्द रेलवे स्टेशन पहुँचाने में। अगर दोपहर दो बजे की बड़ोदा लोकल छूट जाती तो बड़ोदा से दिल्ली जाने वाली राजधानी छूट जाती, समय पर नहीं पहुँचते और मुहूर्त निकल जाता। सोचिए, सही निर्णय दिलवाने में हम मित्रों की कितनी अहम भूमिका रही होगी, क्योंकि ७० के दशक में आवागमन की सुविधाएँ सीमित थीं।

अपने इस निकटतम मित्र की शादी को लेकर हम सभी उत्साहित थे। कैम्पस में रहने वाले कोई बीस एक नौजवान कुँवारों बे बीच, यह पहला शेरदिल था  जो अपनी आज़ादी की क़ुर्बानी देने जा रहा था। याद रहे बचपन में हुई सगाई और बाथरूम में पढ़े गये प्रेमपत्र। उनकी भी तो अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 

शाम क़रीब पाँच बजे हम में से एक बोला, “अरे यार, ये तो वाक़ई शादी करने चला गया। इसके बिना अपन तीनों शाम को बोर हो जायेंगे। दूसरा बोला, “हमारा तो ठीक है, पर उसकी ‘लोटिया भागोल’ वाली प्रेमिका का क्या होगा? जब उसे पता चलेगा तो वह लड़की तो अपने बाल नोच लेगी, सर फोड़ लेगी, रो रो कर बुरा हाल हो जायेगा बेचारी का। हो सकता है आत्महत्या भी कर ले”।

“यह तो बड़ी गंभीर स्थिति हो गयी”, तीसरा बोला और उसने सुझाव दिया की हम तीनों, लोटिया भागोल वाली हमारे मित्र की प्रेमिका से मिल कर उसे समझायें ताकि वो कोई भी आत्मघाती कदम ना उठाये।

हमने ऐसा ही किया। हमारे मित्र की प्रेमिका- कपिला बेन से मिले, उन्हें समझाया। पहले तो उन्होंने बहुत आँसू बहाए, पर इस बात पर मान गयी कि वह कोई भी ग़लत कदम नहीं उठाएँगी। ठुकरायी हुई प्रेमिका कुछ भी कर सकती है, यह बात हम तीनों को परेशान कर रही थी।

कपिला बेन ने सिर्फ़ एक काम किया। अपने दुःखी मन के सारे भाव एक पोस्ट कार्ड पर उँड़ेले, और तुरंत उसे रेलवे स्टेशन जाकर RMO के हवाले कर दिया। पत्र लिखते समय कपिला बेन के आंसू बड़ी मुश्किल से रूके होंगे, फिर भी तो- तीन तो चिठ्ठी पर टपक ही गये। कपिला बेन क्योंकि “लोटिया भागोल” से थीं, उनका हिन्दी ज्ञान सीमित था, लिहाज़ा खुला पत्र यानी पोस्ट कार्ड में उन्होने हिं -गुजराती मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया।

हमारे मित्र का भाग्य बहुत अच्छा था। पोस्ट कार्ड दिल्ली पहुँचा। पोस्टमैन की दस्तक पर उस दिन सौभाग्य वश कपिला बेन का पत्र सीधे उन्ही के हाथ लगा।

मित्र ने पत्र पढ़ा तो चेहरे का रंग उड़ गया। तुरंत घर के पास वाले तारघर पहुँचे और हमें तार किया, “किसी कपिला बेन का पत्र है, माजरा क्या है? तुरंत छान-बीन करो और मुझे बताओ। भाग्य ये पत्र मेरे पिताजी के हाथ नहीं लगा वरना अनर्थ हो जाता”।

क्योंकि हम तीनों कपिला बेन पहले मिल चुके थे, हमने तुरन्त जवाबी तार किया, “सब कुछ नियंत्रण में है”। तार मिलते ही हमारे मित्र की जान में जान आयी, विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हुआ और कोई एक सप्ताह बाद वो नयी नवेली दुल्हन के साथ सकुशल आनन्द आ पहुँचे ।

आप सोच रहे होंगे के हमारा ये मित्र कौन था। ये कोई और नहीं,इसी वृक्षमन्दिर के प्रणेता श्री शैलेंद्र कुमार थे। कपिला बेन हम तीन मित्रों- बेहला, गोरे और मेरी कल्पना का नतीजा थीं, और मेरी टूटी-फूटी गुजराती ने प्रेमपत्र को साकार रूप दे दिया। पत्र पर गिरे आँसू भी नक़ली थे- आख़िर पानी की दो बूँदे गिरा कर कार्ड हिलाया और हो गया काम!

आख़िर अच्छे मित्र ऐसे नाज़ुक मौक़े सम्भालने के लिए ही तो जाने जाते हैं! 

कथा, एक मित्र के ब्याह की और हमारे बापू की भाग -२

मित्र के ब्याह की कथा आगे बढ़ायें, इसके पहले हमारे “बापू” से परिचय करवाना अत्यंत आवश्यक है। 

बापू, हमारे सम्माननीय बापू, कौन थे और उनका नामकरण कैसे हुआ यह अपने आप में ही एक कहानी है। पहले इसे पढ़िये। इस सारी कहानी में “बापू” की असली पहचान आपसे छिपायी जायेगी क्योंकि मैं अपने ख़िलाफ़ मानहानि का कोई मुक़द्दमा नहीं चाहता।

ऐन.डी.डी.बी कार्यालय ने जब कैम्पस से काम करना प्रारंभ किया, तब नए इंजिनीयर्स की भर्ती हुई। बापू इनमे से एक थे। ओहदे में तो हमारे बराबर ही थे, परंतु उम्र में शायद हमसे ४-५ वर्ष बड़े रहे होंगे। ऑफ़िस के बाद जब हम लोग खेल कूद और हंसी मज़ाक़ में लगे थे, बापू अपनी गम्भीर मुद्रा में, हाथ में ब्रीफ़केस लिये हमें भी अपनी तरह गंभीर बर्ताव करने की सलाह देते। “तुम अफ़सर हो, कुछ बड़ों की तरह, अफ़सरों की तरह व्यवहार करो। यह क्या सारे समय बच्चों की तरफ़ कूद-फाँद करते रहते हो”। 

बापू का यह रोज़ का प्रवचन हो गया था। हद तो जब गयी, जब बापू अपना ब्रीफ़केस लेकर छुट्टी के दिन भी दफ़्तर आने लगे और अपना रटा रटाया प्रवचन हम पर बरसाने लगे।

गोरे से ये बर्दाश्त नहीं हुआ। वैसे बापू ने गोरे को कभी भी प्रवचन झाड़ने की कोशिश नहीं की क्योंकि गोरे बापू से काफ़ी सिनीयर थे, गोरे को बापू के प्रवचन मुझ पर झाड़ना नहीं भाया। गोरे ने कहा, “नागर, इस बापू का कुछ इलाज़ करना पड़ेगा”। 

क्या करें, “बापू” के नाम मशहूर कर दें”, मैंने पूछा। 

“यही सही होगा”, गोरे ने सहमति जताई। 

“पर पहले उसे बताना होगा ना कि हमने उसे “बापू” के नाम सम्बोधित करना तय किया है, और ये करेंगे कैसे”, गोरे ने प्रश्न किया। 

आख़िर, “बिल्ली के गले में घंटी बांधने का ज़िम्मा मैंने उठाया”। गोरे और मैं बापू से मिले। 

मैंने बापू क़ो असली नाम से सम्बोधित करते हुए वार्तालाप शुरू किया, “आपका कहना सच है। ये बचकाना बर्ताव अब हमें बंद करना चाहिये। हम आपकी सीख का सम्मान करते हैं और अब से आपको एक सम्मानजनक तरीक़े से बुलाना चाहते है। अपर आपको आपत्ति ना हो तो हम आपको “बापू” के नाम से बुलाना चाहते हैं। ये सम्बोधन सिर्फ़ महात्मा गाँधी के लिये प्रयोग किया जाता है, क्योंकि सारा देश उनसे बहुत प्यार करता है, उनका बहुत सम्मान करता है और हम भी आपका बहुत सम्मान करते हैं”।

वह तुरंत मान गये। आख़िर सम्मानजनक सम्बोधन किसे नहीं भाता? 

अगले २४ घण्टों में वह सारे कैम्पस में “बापू” के नाम से मशहूर हो गये। 

अब लौटते हैं, हमारे मित्र की शादी पर। शादी सम्पन्न हुई और मित्र पत्नी सहित आनंद लौटने वाले थे। दिल्ली से बेहला को तार कर खबर भेजी की ‘फ़लाँ फ़लाँ ट्रेन से बड़ोदा पहुँच रहे हैं, स्टेशन पर मिलो’। रिक्वेस्ट नहीं आदेश था। 

मैं और बेहला, बेहला की मोटरसाइकल से बड़ोदा पहुँचे। स्टेशन पर एक नयी फ़ीयट टैक्सी तय की इस शर्त के साथ कि ‘अगर हमारे साहब आये, तो ही हम टैक्सी का उपयोग करेंगे। अगर नहीं आए तो हम कोई पैसे नहीं देंगे’। टैक्सीवाला मान गया। 

हमें नहीं पता कि हमारा मित्र किस डिब्बे में सफ़र कर रहा है और ट्रेन सिर्फ़ पाँच मिनट ही रुकने वाली थी। तो हमने तय किया की हम प्लेटफ़ार्म में उस जगह खड़े होंगे जहां बीच का डिब्बा आता है। फिर एक एंजिन के तरफ़ के डिब्बों की तरफ़ जायेगा और दूसरा विपरीत दिशा में। 

हमने सारी ट्रेन छान मारी। ट्रेन के छूटने की सीटी भी बज गयी, पर हमारा दोस्त नदारद। हम लौटने ही वाले थे की बेहला की नज़र दुल्हन के भेष में प्लेटफ़ार्म पर अकेली खड़ी एक लड़की पर पड़ी। 

“नागर, कहीं ये तो किरन नहीं है? अगर है तो शैलू कहाँ है? मैंने कहा, “चल पूछ लेते है कि आप शैलेंद्र की बीबी हो क्या”। पर बेहला ने पास जाकर निहायत शरीफाना अन्दाज़ में पूछा, ‘क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’

“हाँ”, उत्तर मिला।

“शैलेंद्र कहाँ है?”, मैंने पूछा।

“आगे, इंजिन के पास ब्रेक वान से बक्सा लेने गये हैं”, किरन बोली। 

मैं इंजिन की तरफ़ बढ़ा ही था कि कुली के सर पर एक भारी- भरकम बक्से के साथ शैलेंद्र को आते देखा। 

आम दिनों जैसा पहनावा हमारे मित्र का और साथ सजी-संवरी दुल्हन। लगता ही नहीं था कि भाई नयी नयी शादी करके आया है। 

कोई दो महीने बाद, एक दिन किरन ने हमें ये बताया कि वह बड़ोदा स्टेशन पर बेहला और मुझे देख कर डर गयी थी। वो सोच रही थी की ये दो गुंडे जैसे लड़के क्यों मुझे घूर रहे हैं। उसकी जान में जान आयी जब बेहला ने पूछा, “क्या आप शैलेंद्र के साथ हैं?’ बेचारी क्या करती, उन दिनों फ़ोटो आईडेनटीटी का प्रचलन जो नहीं था। उसे तो सिर्फ़ हमारे नाम मालूम थे। 

हाँ, उसदिन हमें पता चला की हमारी शक्लों- सूरत किसी भले शरीफ़ आदमी जैसी नहीं, गुंडो जैसी है। पर क्या करते, ऊपर वाले ने जैसी सूरत दी है, उसी से गुज़ारा सारी ज़िन्दगी करना पड़ेगा! 

ख़ैर, टैक्सी में सामान रखा, किरन और शैलेंद्र पिछली सीट पर बैठे और मैंने टैक्सी वाले से गाड़ी रवाना करने को कहा। 

टैक्सी वाले ने प्रश्न किया, “पर आपके साहब कहाँ हैं, वो नहीं आये क्या”? 

हमने शैलेंद्र की और इशारा किया तो टैक्सी वाले ने ऐसा मुँह बनाया जैसे हमने इसके साथ कोई मज़ाक़ किया है। बेचारे का मुँह देखने लायक़ था। 

अब लौटते हैं, बापू पर। 

शैलेंद्र की टैक्सी के कैम्पस के पहुँचेने के ठीक दो घंटे बाद हमारे प्रिय बापू को आनंद से दिल्ली प्रस्थान करना था। ये मात्र संयोग था की शैलेंद्र का दुल्हन के साथ आनंद पहुँचना और बापू का तबादले पर जाना एक ही दिन था। शैलेंद्र D12 और में D11 में रहते थे। मैंने बापू को हमारी बिल्डिंग के नीचे खड़े देखा। वे बड़े बैचैन लग रहे थे। 

मैंने पूछा, “बापू, कोई ख़ास बात है क्या?”

“दुल्हन का मुँह देखना है”, बापू बोले।

मैंने कहा, “ऊपर आ जाओ”, और शैलेंद्र को बताया की बापू किरन को देखने ऊपर आ रहे हैं। कमरे में गोरे, बेहला और नन्दी नैथानी और अन्य नौजवान कुवांरे भी मौजूद थे । चाय पकौड़ी का दौर चल रहा था ।

बापू आए और जैसे ही एक ख़ाली कुर्सी पर बैठे, शैलेंद्र ने किरन को आवाज़ दी, “किरन, तनिक इधर आओ, ये हमारे बापू हैं, इनका पैर छू लो”। 

किरन को मालूम नहीं था की माजरा क्या है। उसने लम्बा घूँघट निकाला, बाहर के कमरे में आई और जैसे ही वो बापू के पैर छूने नीचे झुकी, बापू झट से खड़े हुए और फ़ौरन भाग खड़े हुए। 

हम सब की हंसी छूट गयी, पर किरन सकपका गई और शैलेंद्र से पूछा, “ये बापू कहाँ चले गए? चाय के लिए भी नहीं रुके”। 

हम क्या बताते। बापू ऐसे भागे की सीधे दिल्ली जाकर ही साँस ली। 

कोई दो महीनों बाद मेरा दिल्ली जाना हुआ। बापू मिले तो बहुत उखड़े उखड़े थे। मैंने पूछा, क्या बात है? ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हो?”

“तू शाला बहुत बदमाश है। शैलेंद्र की दुल्हन का मुँह भी नहीं देखने दिया। और साला मेरा पैर छूने क्यों बोला?” बापू ग़ुस्से में बोले। 

“अरे तो इसने इतना दुःखी होने की क्या बात है? अगली बार आनन्द आओ तो मुँह भी देख लेना और मुँह दिखाई भी दे देना”, मैंने कहा। 

“धत बदमाश कहीं का”, बापू की मुझे ये आख़िरी गाली थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने ऐन.डी.डी.बी. की नौकरी छोड़ दी और किसी इंजिनीयरिंग कॉलेज में पढ़ाने चले गये। शायद उन्हें वहाँ अधिक आज्ञाकारी शिष्य मिले होंगे। 

बापू को उनका नया काम अवश्य ही अधिक भाया होगा क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार, वे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद से सेवानिवृत हुए। 

शादी की शैलेंद्र ने, दुल्हन का मुँह नहीं देखने दिया उसने और बापू से डाँट पड़ी मुझे। कैसी विडम्बना, हाय रे कलियुग।


जिंदगी का समंदर

काल था, है, और  रहेगा

वर्तमान को भूत बना भविष्य निगल जाता  है काल

जीवन के जीवन की शक्ति है काल

अज्ञात होता है  जीव का काल जीवन का जीवन,  जीव की ज़िंदगी से करता है खिलवाड़ 

लहरें  उठती हैं ज़िंदगी के समंदर  में अकारणअनजानेअनायास

कुछ उछलतीउफनतीइठलातीबलखाती कुछ दुबलीपतलीमरियल सी सुस्त 

हो जाती है सब ख़त्म, नियति जो है इनकी j

पर ख़त्म हुई लहरें भी बनी रहती हैं समंदर का हिस्सा , बन कर शायद कोई और लहर

क्या कोई फ़र्क़ पड़ता है समंदर को 

लहर तो होती है समंदर की 

पर लहर का समंदर नहीं होता


समुंदर की लहरें

या

लहरों का समुंदर

अनुभूति – 5

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

पिछले दो पोस्ट बिल्कुल व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं जो मुझे अंदर से झकझोरती रही है, उसी परिभाषा के शोध की यह अगली कड़ी है।


मै हरिद्वार के जिस धर्मशाला में हूं, उसमे करीब तीन सौ आदमियों के रहने की व्यवस्था है।

पिछले साल का 20 मार्च का दिन।

हमारे साथ करीब दो सौ यात्री। और लाक डाउन डिक्लेयर हो गया। 22 मार्च से किसी का बाहर जाना मना। बच्चे दूध के लिए, बूढ़े दवा के लिए, सब परेशान। खाने की व्यवस्था, उनको मानसिक रूप से उलझाए रखना, सब नियंत्रित रूप से सम्हालना! एक एक्सट्रीम पैनिक। औल केयोस ।

कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। किसी तरह राजकीय सहायता से 27 मार्च को बसों की व्यवस्था हुई और यात्रियों को बैठाने लगा। लोगो के चेहरे के भाव, बस देखने लायक। एक दैविक अनुभव।

आखिरी बस ।चालीस व्यक्ति। सब को बैठा कर नीचे उतर रहा हूं ।एक बृद्ध महिला अपनी सीट से उठ कर आती हैं, पास आती हैं, पैर छूती हैं और शुद्ध गुजराती में भरे गले से कहती है, “तमे तो मारा माटे भगवान बनी ने आया “और आंखों मे आंसू।

अभी खतम नही हुआ, कि, एक छोटा बच्चा जो दूध के लिए रोता था, आया, पैर छूए और बोला “दादा, आवजो। और भाग कर अपनी सीट पर बैठ गया। मै बस रो रहा था। कैसे आंसू थे, आज तक नहीं समझ पाया।


दूसरी घटना। हमारे यहां एक बृद्ध महिला हमेशा आती है और एक निश्घित कमरे मे रहती हैं। नब्बे वर्ष की है। स्वाभिमानी। कपड़े की झोली बनाती है,जो मिलता है उसमे गुजारा करती है। एक दिन काउन्टर पर आई। विल्कुल बेबस। कहने लगी “लौक डाउन मे काम नहीं हुआ। तीन दिन रूकना है, एक पैसा नही है। अमावस्या नहाने आई थी। नही कर पाउगी। धर्मशाला कैन्टीन पर गया तो पता चला कल से दस ग्राम दूध लेती है कुछ महादेव पर चढ़ाती है, जो बचता है वही पी कर रही है।

इतने मे वे पास आ गयी और मेरी ओर निरीह भाव से देखते हुए बोली। तमे कशू करो न मारा माटे। आप मेरे लिए कुछ कीजिये। नही रोक सका अपने को। तीन दिनो का कमरे का किराया मैने देने का आश्वासन दिया। साथ में चाय पी।



मै कैन्टीन में बैठा चाय पी रहा हूँ ।बाहर एक बालक कुछ अजीब सी हरकतें कर रहा है। मै उससे मिलने को रोक नही सकता। जाता हूँ। उसके पिता वहीं मिलते हैं और बताते है वह एक मेनटली चैलेन्जड बालक है, जन्म से ही ।लेकिन आज कई नेशनल एवार्ड ले चुका है और अभी भी एक नेशनल इवेन्ट में भाग लेने जा रहा है। बात करने की इच्छा हुई । कुछ टूटी फूटी भाषा मे, कुछ इशारे से। पता नही क्यों पूछ लिया “कुछ खाओगे। उसने हां मे सर हिलाया। एक मिठाई खाई, हाथ मुह धोया और नाना, नाना कह कर चिपट गया। बड़ी मुश्किल से अपने पिता से छुड़ाने पर अलग हुआ।


अगर आप में से कोई इन तीनो परिस्थितियों मे, या किसी एक में भी सहभागी होते तो आप को कैसी अनुभूति होती?


परिभाषा की शोध की मेरी परिक्रमा सतत चल रही है। मदद चाहिए।


अनुभूति-2

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

हमारे अंदर की हाइवे

और स्मार्ट सिटी

कभी आप को एक वीराने, बिल्कुल सुनसान इलाके से बिल्कुल अकेले गुज़रने का मौका मिला है?

 मिला होगा। सब के साथ होता है। 

कैसा अनुभव हुआ होगा। कोई आस पास नहीं। चारो ओर बस अंधेरा और खामोशी। 

एक हल्की सी आवाज भी डरा देती होगी। जिस किसी भगवान या देवता या मसीहा को आप मानते  होंगे और उनके जितने नाम आपको याद होंगे, सब अपने आप बाहर आने लगते हैं। 

आप पीछे भी नही जा सकते कारण वहां भी वही हालत है। अच्छे बुरे काम, अच्छे बुरे आदमी, सब बाइस्कोप की तरह आने जाने लगते हैं। लेकिन छुटकारा नही मिलता। छोटी सी छोटी सी चीज़ भी पीछा नही छोड़ती।

मै किसी पब्लिक रोड या स्मार्ट सीटी की बात नही कर रहा हूं। अपने द्वारा ही बनाए गए अन्दर की स्मार्ट सीटी और हाइवेज की बात है। कभी अन्दर की सैर कीजिये। 

भीड़ की चिल्ल पों मे खामोशी खोजना कितना कचोटता है।

 एक चुभन और टीस के साथ उन्माद और आनन्द का काकटेल। नशा,बेहोशी,थकान, हैंगओवर  और फिर नींद।

कितनी रंगीन और मज़ेदार होती है ज़िन्दगी ।


अनुभूति- 3

मिथिलेश कुमार सिन्हा
मिथिलेश कुमार सिन्हा

भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।  

भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।


ख़ुशी क्या होती है ?

उम्र की  इतनी लम्बी चौड़ी चादर पर जब ज़िन्दगी करवट लेती है, तो हर गलियारे, नुक्कड़, हाइवे, ब्रौडवे, क्रौसरोड पर गुजारे या रुके हुये पल, चेहरे, यादे, और पता नही क्या क्या हरकतें अंगड़ाइयां लेने लगती हैं।

कुछ मचलती है, कुछ इठलाती है, कुछ नोक झोंक करती है, कुछ मुंह चिढ़ाती है, कुछ बस कुरेद कर चली जाती हैं। 


कितना सीखा, कितना किसी ने सिखाया, यह गणित समझ में ही नहीं आया।

मेरे जैसे शायद और भी होंगे, नही जानता।

इन सभी उपलब्थियों के वावज़ूद कुछ सवाल अभी भी मुंह बाए सामने खड़े रहते है। कुछ उत्तर नही मिल पाया।

पता नही मिलेगा भी या नहीं।

एक बेचैनी और एक सुकून का कौकटेल लिए अपने को टटोलता हूँ। 

आज, न जाने क्यों, ऐसा लगा कि अपनों के बीच इस सवाल को रखूं।

शायद कोइ मरहम मिले। 


सवाल है, खुशी की परिभाषा क्या होती है ?

क्या संतो, आम आदमी, सीरियल क्राइम कमीटर, सबों की परिभाषा एक होती है या हो सकती है? 

बैक टू स्कव्यार वन की परिस्थिति में हूं!


ट्विटर, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से साभार


ठीक ही कहा है आजकल बुढ़ापा झेल रहे मानव को फ़ेसबुक और व्हाट्सएप भी बड़ा सहारा देते हैं । कुछ समय ट्विटर पर भी निकला जा सकता है। टीवी पर समाचार देखना बहुत कम हो गया क्योंकि समाचार नहीं एंकरों के सदविचार और दुर्विचार ही देखने को मिलते हैं ।

परिवार और मित्र कोई यहाँ कोई वहाँ । यहाँ हो कर भी मिलना मुश्किल है । बहुत कुछ डिजिटल हो रहा है।ज़ाहिर है ऐसे में ट्विटर, फ़ेसबुक और व्हाटसएप का ही सहारा है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों अपने ही देश सरकार को आँख दिखा सकती हैं। ट्रंप साहब का ट्विटर अकाउंट आख़िर ट्विटर के मालिक जैक जी की तथाकथित समाजवादी विचारधारा के चलते जीवन पर्यंत तक के लिये हटा दिया गया । भला हो इन कंपनियों का । हमारे भारत और दुनिया के बहुतायत देशों में जनता जनार्दन को बतकही करने की सुविधा प्रदान कर रखी है। मुफ़्त में नहीं आख़िर पैसा तो कमाना ही है और पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ न सरके तो आर्थिक प्रक्रिया ठंढे बस्ते में चली जायेगी और विकास की आँख मिचौली भी बंद हो जायेगी। बड़ी बातें तो बहुत सी हैं पर बड़ी बड़ी बातों में बड़ी बात यह है कि भारत का कम्युनिस्ट, समाजवादी, कम्युनेलिस्ट , दंक्षिण पंथी, वाम पंथी, निठ्ठले , संभ्रांत, धनी, धन पिपासु, गाँव गवईं के आम जन… सबको समान रूप से उपलब्ध है। जेब में पैसा होना चाहिये। किसी जनसेवक राजनीतिक पार्टी के ट्रोल बन पैसा कमा सकना , देश के विकास में भागीदार होना साथ में मनोरंजन करना सब संभव है।

बुढ़ापे में बाल बच्चों के अलावा अब तो फ़ेसबुक और व्हाट्सएप भी बड़ा सहारा देते हैं।

आनंद लें मेरे द्वार संकलित कुछ पुराने और नये व्हाटसऐपी, ट्विटिराती और फेसबुकिया संवादों का । अच्छा टैम पास है। आपको कहीं से कुछ अच्छा लगता पोस्ट मिले तो मुझसे शेयर करें sk@vrikshamandir.com पर । अगले अंक में उसे सम्मिलित करूँगा और आप के नाम सहित छाप कर धन्यवाद 🙏🏼 भी दूँगा।





संध्याकाल जीवन का

जीते है मरने के लिये

हर क्षण होते व्यतीत

वर्तमान में धुन भविष्य की

गुनगुनाते पूर्वराग*

होते वर्तमान में अतीत

हुआ वह जिसे चाहा

हुआ वह भी जो न चाहा

मानते है अब होना था जो

आशा और आकांक्षाओं के फेर में

वह ही तो हुआ

*पूर्वराग =Nostalgia



Moving finger writes; Why we write what we write?

The question is why we write what we write?

Well, first of all one must know how to write only then one can think of writing what to write.

Speaking comes easily, particularly , speaking for daily usage. Speaking to others known or unknown and in front of others is a different matter. Public speaking requires different kind of skills and confidence so as to face audiences without stage fright.

Writing even after one becomes proficient is altogether different ball game. Writing is done for self and for others. Writing for self may be just a todo list or entries in a diary or letters and now a days emails to communicate with others.

Writing for others could be for a number of reasons, filling forms to open a bank account, booking a ticket, answering question papers to pass examination, a research paper or a thesis to get a PhD .. the list goes on. Then there are professional writers who write for others and the challenge that they face is that what they write, must resonates not with their own thinking that but with that of those for whom they write. Then there are

Tulsi Das ji who wrote Ramcharimans some five hundred years ago has clearly stated that his writing is स्वांत:सुखाय in stanza 7 of Bal Kand.

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वांत:सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबंधमतिमंजुलमातनोति॥ 7॥

अनेक पुराण, वेद और शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध रघुनाथ की कथा को तुलसीदास अपने अंत:करण के सुख के लिए अत्यंत मनोहर भाषा रचना में निबद्ध करता है॥ 7॥

Consistent with many Puranas, Vedas and Shastras, which are mentioned in the Ramayana and also available elsewhere, the story of Raghunath is composed by Tulsidas in the most delightful language for the pleasure of his conscience.

However, as is well known reading and recital of Ramcharitamanas has given peace, solace and a sense of purpose to live to millions of Hindus the world over.

Let’s assume that one day my blog, vrikshamandir.com turns out to be highly appreciated and liked by all who read it. How would it then compare with Ramcharimans.

Attempting such a comparison is foolhardy. Both can’t be compared with each other. Tulsidas ji was inspired and guided by a “Higher” purpose which a mortal like me has not yet found to follow consistently even after living for three quarters of a century on this planet. That made his writing of Ramacharitmanas and other creations so precious and timeless.

In order to start this blog, which was in my mind for several years, it was the mantra of Tulsidas ji that inspired me to take the first step and begin writing after years of hesitation.