purple petaled flowers in mortar and pestle
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रजाई धारी सिंह “दिनभर”

<strong>ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं</strong>
ट्विटर पर अपने परिचय मे “बनारस के बाबा” लिखे हैं


“पेशे से रिसर्च मे एक मजदूर हूं।एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और दू गो IIT का तमगा लिये आवारा घूमता रहता हूं।यहा पर कहानियां सुनाता हूं कल्पनाओं मे घोल कर” ! यहां कविता लिखने का घनघोर प्रयत्न किये है।

Close-up, abstract view of architecture.
Photo of a painting by Dr (Mrs Rama Aneja)

वीर तुम अड़े रहो

वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
चाय का मजा रहे,
प्लेट पकौड़ी से सजा रहे
मुंह कभी रुके नहीं,
रजाई कभी उठे नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

मां की लताड़ हो
या बाप की दहाड़ हो
तुम निडर डटो वहीं,
रजाई से उठो नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

लोग भले गरजते रहे,
डंडे भी बरसते रहे
दीदी भी भड़क उठे,
चप्पल भी खड़क उठे
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

प्रात हो कि रात हो,
संग कोई न साथ हो
रजाई में घुसे रहो,
तुम वही डटे रहो
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो

कमरा ठंड से भरा,
कान गालीयों से भरे
यत्न कर निकाल लो,
ये समय तुम निकाल लो
ठंड है यह ठंड है,
ठंड बड़ी प्रचंड है
हवा भी चला रही,
धूप को डरा रही
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो।।