पैसा जिसका, ख़बर उसकी
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यदि सरकारी दूरदर्शन, आकाशवाणी और सरकार के सूचना संबंधी प्रयासों को अलग कर दें, तो आज की भारतीय मीडिया को मोटे तौर पर तीन मुख्य धड़ों में बाँट कर देखा जा सकता है।
पहला धड़ा वामपंथी माना जाता है, जिसका प्रमुख उदाहरण द वायर जैसे संस्थान हैं। द वायर एक डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है जो मुख्य रूप से सरकार की नीतियों की आलोचना, अल्पसंख्यक अधिकार, सेकुलरिज़्म और सामाजिक न्याय पर ज़ोर देता है। स्क्रॉल, द कैरावन और कुछ हद तक द क्विंट भी इसी श्रेणी में गिने जाते हैं। ये ज़्यादातर अंग्रेज़ी डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं और इनका व्यावसायिक पैमाना छोटा है।
दूसरा धड़ा दक्षिणपंथी माना जाता है, जिसमें पाञ्चजन्य जैसे प्रकाशन आते हैं। पाञ्चजन्य 1948 से छप रही हिंदी साप्ताहिक पत्रिका है, जो आरएसएस से जुड़ी है और हिंदू राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित है; इसका अंग्रेज़ी समकक्ष ऑर्गनाइज़र है। आम धारणा के अनुसार ओपइंडिया, स्वराज्य, रिपब्लिक टीवी और सुदर्शन न्यूज़ जैसे मंच भी इसी ओर झुके हुए हैं।
तीसरा और सबसे बड़ा धड़ा वह है जो न तो स्पष्ट रूप से वामपंथी है और न ही दक्षिणपंथी, यानी दोनों तरफ़ की या बीच की मीडिया। इनमें से अधिकांश संस्थानों की मालिकी बड़े पूँजीपतियों के हाथों में है: टाइम्स ग्रुप (टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनॉमिक टाइम्स, टाइम्स नाउ), रिलायंस (नेटवर्क18 और जियोस्टार), अदाणी ग्रुप (एनडीटीवी), और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान, इंडिया टुडे जैसे बड़े घराने। बाज़ार, पहुँच और कमाई में यही धड़ा हावी है।
इन तीनों के अलावा दो और शक्तियाँ भी सक्रिय हैं: सामाजिक मीडिया और सरकार। सामाजिक मीडिया स्वयं कई धाराओं में बँटी हुई है, और सरकार अपने स्तर पर सूचना और प्रचार का काम करती रहती है।
वास्तविकता यह है कि बिना पैसे के मीडिया का खेल चल ही नहीं सकता। यह पैसा या तो सरकार से आता है, या राजनीतिक दलों से, या बड़े व्यावसायिक घरानों से। भारत का मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2025 में लगभग ₹2.78 लाख करोड़ का था, और विज्ञापन का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब डिजिटल पर चला गया है। शुद्ध वामपंथी या दक्षिणपंथी मीडिया का इसमें हिस्सा बहुत छोटा है; वे विचारों और प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण हैं, पैसे के लिए नहीं।
मेरी नज़र में इसी कारण “गोदी मीडिया” शब्द आज लगभग हर प्रकार की मीडिया पर लागू होता है, सिवाय उन संस्थाओं के जो किसी एक विचारधारा से सीधे जुड़ी हैं और खुले तौर पर उसकी वकालत करती हैं। बीच वाले संस्थानों के पास बिना किसी की गोद में बैठे अपना कारोबार ठीक से चलाने की क्षमता प्रायः नहीं होती। वे किसी न किसी के आश्रय में ही जीवित रह पाते हैं।
यह आदर्श स्थिति नहीं है। आदर्श तो यही होता कि मीडिया स्वतंत्र रूप से सवाल उठाए और पक्ष-विपक्ष दोनों की कमियों को उजागर करे। लेकिन व्यवहार में “आदर्श” का नाम लेना या दूसरों के काम पर सवाल उठाना आसान है; उसे सच में निभा पाना कठिन है। अधिकांश संस्थान अंततः किसी न किसी के हितों से बँध जाते हैं।
सामाजिक मीडिया की अलग दुनिया
सामाजिक मीडिया इस पूरे ढाँचे से अलग है। यहाँ कुछ लोग “फिरकीबाज़ी” करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। वे प्रभावित करने वाले (इन्फ्लुएंसर) बन जाते हैं और कई बार सेलिब्रिटी का दर्जा भी पा लेते हैं। कई जाने-माने पत्रकार, जो या तो नौकरी छोड़ चुके हैं या नौकरी से निकाले गए हैं, अब यूट्यूब और अन्य प्लेटफ़ॉर्मों पर वही काम करके पहले से कहीं अधिक पैसा कमा रहे हैं। वे समाचारों को अपने ढंग से घुमाकर, विवाद पैदा करके या भावनाओं को उभारकर दर्शकों को आकर्षित करते हैं और उससे आय प्राप्त करते हैं।
यह विभाजन मोटे तौर पर ही है। कई बड़े संस्थानों में अलग-अलग विभागों या समय के अनुसार झुकाव बदलता रहता है, और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों ने पुराने विभाजन को और जटिल बना दिया है।
आँकड़ों की सच्चाई
भारत में प्रिंट मीडिया की विविधता को समझने के लिए प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI) द्वारा जारी प्रेस इन इंडिया 2023-24 रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण स्रोत है। रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2024 तक देश में कुल 1,51,474 समाचार पत्र और पत्रिकाएँ पंजीकृत थीं। इनमें दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक तथा अन्य आवधिकता वाले प्रकाशन शामिल हैं।
इन पंजीकृत प्रकाशनों में से 36,358 प्रकाशनों ने वार्षिक विवरण दाखिल किया। इन्हीं विवरणों के आधार पर भाषावार स्व-घोषित प्रसार के आँकड़े उपलब्ध हैं। नीचे दिए गए चित्र में प्रमुख भाषाओं का स्व-घोषित प्रसार (प्रति प्रकाशन दिवस) दिखाया गया है:
पारंपरिक मीडिया के तीन मुख्य धड़े, सामाजिक मीडिया की अलग दुनिया और सरकार की अपनी सूचना मशीनरी, ये सब मिलकर आज की भारतीय मीडिया की तस्वीर बनाते हैं। और इस तस्वीर में पैसे का स्रोत ही अक्सर यह तय करता है कि कोई किसके साथ खड़ा है। पैसा जिसका, ख़बर उसकी।
यह ब्लॉग लिखकर पूरा ही किया था कि मुझे फ़ेसबुक की यह पोस्ट मिली, जिसमें युवाल नोआ हरारी (Yuval Noah Harari) सूचना और मीडिया के बारे में बात करते हैं। आशा है आपको पसंद आएगी। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है।
स्रोत (References)
- प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI): Press in India 2023-24
- EY India: India’s M&E sector grew 9% to INR 2.78 trillion in 2025 (FICCI-EY report)
- Storyboard18: India’s media and entertainment industry hits Rs 2.78 lakh crore
- Wikipedia: List of news media ownership in India
- Wikipedia: Panchjanya (magazine)
- Media Bias/Fact Check: The Wire (India)
- Exchange4media: Daily newspaper circulation, Jan–Jun 2025 (ABC)




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