अनुभव चाहिये?
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रश्मि कांत नागर की कलम से, एक संस्मरण
अच्छा, अनुभव चाहिये?
विद्यार्थी जीवन में कुछ अटपटी हरकतें करने को मन किसका नहीं करता? आपका भी किया होगा। मेरा भी किया।
ये घटना 1963 की है। मेरा बीएससी एग्रीकल्चर का पहला साल। सिमेस्टर सिस्टम शुरू ही हुआ था। एक सिमेस्टर में हर विषय के तीन यूनिट टेस्ट, एक मिड-सिमेस्टर और एक फाइनल सिमेस्टर एग्जाम। हर यूनिट टेस्ट दस नंबर का होता था। तो अगर एक यूनिट टेस्ट कुछ इधर-उधर भी हो जाएँ, तो भी पास होने की संभावना बनी रहती थी।
हम तीन दोस्त थे। हम तीनों अभी भी इस दुनिया में हैं, सो नाम नहीं लूँगा। क्योंकि मेरा नाम ‘र’ से शुरू होता है, और ये सरगम का दूसरा स्वर है, मैं बाक़ी दोनों मित्रों को भी एक-एक स्वर दे देता हूँ: ‘म’ और ‘प’।
‘म’ और ‘प’ दोनों एक ही पब्लिक स्कूल में साथ पढ़े थे। दोनों खिलाड़ी थे। ‘म’ सारे खेल खेलता था। ‘प’ की रुचि सिर्फ़ क्रिकेट और संगीत में थी। मैं सरकारी स्कूल में पढ़ा था और मुझे साइकिल चलाना ज़्यादा पसंद था। मैं एक दिन में औसतन क़रीब पच्चीस किलोमीटर साइकिल चलाता था। कॉलेज के पहले दो साल, प्री यूनिवर्सिटी और प्री प्रोफेशनल में, हम अलग-अलग सेक्शन में थे, पर बीएससी के प्रथम वर्ष में साथ हो गये। जल्दी ही हममें तगड़ी दोस्ती हो गई।

जूती से चिपकी पर्ची, और हँसी रोकते दो दोस्त। (चित्र: Grok Bot)
एक दिन एक ऐसे ही यूनिट टेस्ट में हमने अपने एक क्लासफेलो ‘डी’ को नक़ल करते देख लिया। शान्त स्वभाव का, गंभीर पढ़ाकू की छवि वाला ये लड़का नक़ल भी करता है? हमारे लिए ये आश्चर्यजनक बात थी। अब हमें समझ आया कि इसे अक्सर ए ग्रेड क्यों मिलता है जबकि हम बी ग्रेड पर ही अटक जाते हैं।
हम तीनों ने मंत्रणा की। दिल तो नहीं मान रहा था, फिर भी ‘अनुभव’ प्राप्त करने के लिए एक बार नक़ल करने का प्रयास करने का निर्णय लिया।
पर नक़ल करेंगे किस विषय में? ऐसा विषय चुनना था जिसमें पकड़े जाने पर भी गंभीर परिणाम भुगतने की संभावना कम हो।
विषय चुना, डेरी साइंस। इस विषय के प्रोफेसर भार्गव साहब सख़्त ज़रूर थे, पर रहमदिल भी थे। हमें पता था कि पकड़े जाने पर टेस्ट में जीरो मिलेगा, पर सारे सिमेस्टर के लिये क्लास के बाहर नहीं किए जाएँगे।
नक़ल करने का निर्णय हो गया और विषय का चुनाव भी। अब प्रश्न था कि नक़ल करेंगे कैसे? हम तीनों ‘डी’ की तरह अलग-अलग पर्चियाँ तो नहीं बना सकते थे। सो तय किया कि ‘म’, जिसकी लेखनी अच्छी थी, पर्ची बनाएगा। ‘म’ वैसे भी छोटी-छोटी डायरियों में नोट्स बनाता था जो हर समय उसकी जेब में रहती थीं। वो खेल-कूद के बीच के समय अपने नोट्स पढ़ लिया करता था। इसलिए पर्ची बनाने का जिम्मा उसे मिला।
‘प’ बायें हाथ से लिखता था और पढ़ने का चश्मा भी पहनता था, सो वह टेस्ट के दिन ‘म’ की दाहिनी ओर बैठा। मैं बाईं ओर, क्योंकि मुझे दूर से भी छोटे अक्षर पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। तय हुआ कि ‘म’ पर्ची को अपनी जूती में छिपायेगा, धीरे से आगे खिसकायेगा, अपना पैर बाहर निकालेगा और पहले ख़ुद नक़ल शुरू करेगा। मैं और ‘प’ उसकी कॉपी देख कर नक़ल करेंगे।
पर दुर्घटना हो गई।
टेस्ट शुरू हुआ। परन्तु ‘म’ को पर्ची ना मिले। हमने पूछा कि पर्ची कहाँ है, तो बोला, जूती के तले चिपक गई है, खिसक नहीं रही। और जब तक ‘म’ नक़ल ना करे हम भी नहीं कर सकते थे।
‘म’ जितनी ज़्यादा कोशिश करता, पर्ची उतनी ही तेज चिपक जाती। आख़िर बेचारी जूती में ही फट गई, दम तोड़ दिया बेचारी ने।
और हम तीनों की हंसी फूट पड़ी।
हमें हँसता देख भार्गव साहब आये। पूछा, “इतनी हँसी क्यों आ रही है?”
हमने कहा, “सर, एक्सपेरिमेंट फेल हो गया।”
“कौन सा एक्सपेरिमेंट? ज़रा मेरे कमरे में आ कर बताओ। पहले अपने टेस्ट पेपर मुझे दो।”
भार्गव साहब ने हमारे ख़ाली पेपर देखे, ग़ुस्से में हमारी ओर देखा और पूछा, “ये क्या है? कुछ लिखा क्यों नहीं?”
“सर, नक़ल नहीं कर पाये,” हम तीनों एक साथ बोले।
“नक़ल? तुम तीनों को नक़ल करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? तुम तो पढ़ने में अच्छे हो!”
“सर, एक अनुभव करना चाहते थे।”
“अच्छा, तो ये बात है। ठीक है। इस टेस्ट में तो जीरो है ही, अगली कोशिश करना। सीधा एफ़ ग्रेड मिलेगा और सिमेस्टर रिपीट करने का अनुभव भी। चाहिए अनुभव?”
“नहीं सर।”
हम तीनों मुँह लटका कर उनके कमरे के बाहर आये। इतना अनुभव काफ़ी था। एक बार जो भूत उतरा, दूसरी बार हिम्मत नहीं हुई।
कहानी: रश्मि कांत नागर। चित्र और अंग्रेज़ी अनुवाद: Grok Bot।
