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होते हुये भी न होना, विकास उर्फ़ विकसवा की व्यथा कथा

लेखक की ओर से: यह व्यथा-कथा पहले दो बार छप चुकी है—जनवरी 2020 में तथा जुलाई 2022 में। अब दोनों को मिला कर, और थोड़ा आगे बढ़ा कर, एक ही स्थान पर रख दिया है। पुरानी पोस्टों की जगह यही नया रूप रहेगा।

मानव सभ्यता के कुछ बुद्धिजीवी विशेषज्ञों का मानना है कि “विकास” का पृथ्वी पर अवतरण सर्वप्रथम जंबूद्वीप के भारत खंड में हुआ था।

चूँकि बुद्धिजीवी विशेषज्ञों का एक मत होना लगभग असंभव सा है, स्वाभाविक है कि बहुत से बुद्धिजीवी विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार, विकास सबसे पहले अफ़्रीकी भू-भाग में अवतरित हुआ और वहाँ से विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पहुँचा।

ख़ैर, जो हुआ होगा, सो हुआ होगा। हम तो न बुद्धिजीवी हैं, और न ही विशेषज्ञ। अत: बुद्धिजीवी कुकुरहाव में न पड़ कर, क़िस्सा कहानी और लोक संस्कृति की अलौकिक बकचोदी परंपरा में यह साधारण सा विमर्श “विकास” की जीवन यात्रा के बारे में लिखने की धृष्टता कर रहे हैं ।

आगे पढ़ना है तो पढ़ें अन्यथा अपना समय बर्बाद करने के लिये हमें विश्वास है कि आप के पास अन्य बहुत से साधन तो होंगे ही।

जीवन यात्रा की जगह जीवन यात्राओं कहना उचित ही रहेगा। आख़िर जन्म मरण के चक्र से अछूता कौन है। “विकास” कैसे बचता? विशेषत:, जब जंबूद्वीप के भारत खंड में जन्मे “विकास” के बारे में चर्चा हो रही हो।

जंबूद्वीप के भारत खंड में पुनर्जन्म होता था, होता है और होता रहेगा। अत: सिद्ध हुआ कि यदि जब भी “विकास” भारत में जन्म लेगा तो फिर पुनर्जन्म लेगा ही। वैसे यह भी हो सकता है कि पुनर्जन्म भारत में न हो कर चीन, अमरीका, या रवांडा में हो।

तो हुआ यूं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक बार फिर “विकास” माता लोकतंत्री के गर्भ से पुनर्जन्म ले जंबूद्वीप के भारत खंड में फिर प्रकट हुआ।

शैशव काल में गांधी बाबा के अनुयायी कांग्रेसियों ने “विकास” को पाल पोस कर बड़ा किया। वैसे गांधी बाबा कह गये थे कि स्वतंत्रता प्राप्ति बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिये था।

पर मजबूरी थी।

कुछ लोगों का मानना है कि चाहते हुये भी कांग्रेस अपने को भंग न कर सकी। आख़िर विकास की देखभाल के लिये कांग्रेस का बने रहना ज़रूरी था।

विकास पैदा हो गया था। बच्चा था। उसके लालन पालन के लिये अभिभावकों की आवश्यकता थी। ध्यान दें, अभिभावक नहीं अभिभावकों की ज़रूरत थी, क्योंकि विकास की जन्मते ही बहुआयामी (राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक आदि) दिशाओं में प्रगति होने लगती है।

“दुर्गावतार” इंदिरा जी का जमाना आया।

गरीबी हटाओ की पैजनियां बांध ठुमुक ठुमुक चलने लगा। छोटे छोटे कदम उठाने लगा। फिर इमरजेंसी आई विकास अचानक बचपन को दुलत्ती मार टिन टिना कर अंग्रेज़ी की रंगरेज़ी में ”टीन” (Teen) हो गया।

फिर एक दो साल जय प्रकाशियों ने अंत्योदय आदि का काढ़ा पिला देखभाल की बड़ी कोशिश की।

दवा ढूँढने में लगे भारतीय चिंतक अर्थशास्त्रियों ने केवल देश में ही नहीं वरन विदेशों में भी शोध किया। शिक्षक बने, सरकारों के, संयुक्त राष्ट्र संघ की संबद्ध संस्थानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सलाहकार बने। पर इस रोग की दवा भारत में पैदा हुये “विकास” को नहीं मिली।

विकास का “विकास” अवरुद्ध हो गया था। अर्थशास्त्री डागदरों ने बीमारी का नाम हिंदू रेट आफ ग्रोथ रखा। यह रोग भारत में ही पाया गया और दुनिया के किसी अन्य देश में अब तक नहीं पाया गया। कुछ मज़ाक़िया डागदरों के अनुसार चूँकि भारत में हिंदू लोग बहुसंख्यक हैं अतः हिंदू रेट आफ ग्रोथ को पनपने का मौक़ा यहीं मिला। टीन एजर “विकास” की प्रगति की दर अवरुद्ध हो गई। सालों तक इसका इलाज किया गया।

इस बीच गाय पट्टी और हिंदी हृदय भूखंड में विशेषत: और सारे भारत में भी मंडल कमंडल को ले अच्छी राजनीति चली ।

विकास का राजनीति से बजाब्ते खुद कुछ लेना देना नहीं था। पर राजनीतिज्ञों का विकास से बहुत कुछ लेना था। विकास से ही गरीबी हटती है । ग़रीबी हटाने का आश्वासन दे कर राजनीतिज्ञ पुश्त दर पुश्त भारत पर राज करते रहे। पर ग़रीबी हटने का नाम ही नहीं लेती थी। कुछ लोगों का कहना है कि ग़रीबी राजनीतिक मजबूरी है । ग़रीबी हटा विकास ला के वादों पर ही तो सत्ता में आया जा सकता है। ग़रीबी हटी तो फिर विकास आ जायेगा तब पढ़े-लिखे अनपढ़ नेता लोगों की ज़्यादा चलेगी नही॥

खैर ग़रीबी और की आर्थिक व्यवस्था देश दोनो अपनी अपनी धुन में चलते रहे । विकास किनारे खड़ा रहा कि गरीबी कुछ दूर हटे ताकि उसकी जगह वह ले सके । विकास इंतज़ार करता रहा। बहुत कम जगह मिली विकास को । भोजपुरी में कहें तो बड़ी साँसत से अड़से वाली हालत में विकास या विकसवा भारत में जिये जाया रहा था। अब भी वही हाल है।

पर पिछली शताब्दी के नौंवे दशक तक आते आते देश कंगाली के कगार पर पहुंचा गया । देश का सोना बैंक आफ इंगलैंड को गिरवी रखना पड़ गया। नरसिंह राव जी को तो मजबूरन भारतीय अर्थ व्यवस्था को “मुक्त” करना पड़ा। विकास को कुछ ऐसे ही अवसर की तलाश थी। वह लोगों में घुलमिल गया।विकास का मन लगा गया । जो लोग विकास के साथ जुड़े उनका भी विकास होने लगा। ।

जमाना था वैश्विक अर्थव्यवस्था का । विकास को मौक़ा था कहीं भी जा सकने का। बस एक समय आया जब विकास किसी की न सुनता था। एक दम बिगड़ैल। कभी इधर कभी उधर विकास यहां वहां आता रहा जाता रहा। कभी भी देश में जम कर न रहा।

शताब्दी बदली!

इक्कीसवीं सदी का पदार्पण हो गया। समय आख़िर समय होता है। विकास का विकास हो इसके लिये समय रूकने वाला थोड़े ही है।

पहले वाजपेयी जी फिर बाद में मनमोहन जी ने सोनिया जी के निर्देशानुसार “विकसवा” का जवानी में ख्याल रखा। 2014 तक “विकास” जवानी की दहलीज़ पर दस्तक मारने लग गया।

2014 में जंबूद्वीप के भारत खंड में भारी परिवर्तन आया। ऐसा परिवर्तन कि जनता जनार्दन का एक तबका मानने लगा कि वास्तविक स्वतंत्रता 1947 में नहीं पर 2014 में मिली।

मोदी जी आये तब तक विकास अधेड़ हो चुका था।

उसे भारत देश के “यथार्थ” को झेलने में अफनाहट और घबराहट होने लगी थी।

क्योंकि विकास को अचानक लगने लगा कि वह एक मानवी “सोच” या “सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति” नहीं वरन वह खुद ही “मनुष्य” है। मंझोली हैसियत का मनुष्य।

“विकास” को यह समझ आ गई कि उसका जन्म, शैशव, जवानी सब उसके जैसे मंझोली हैसियत के मनुष्यों के नाते हुआ। गांधी बाबा, नेहरू जी, इंदिरा जी, बीच वाले “आये गये” जी, वाजपेयी जी, मनमोहन जी आदि का कुछ विशेष योगदान रहा होगा तो रहा होगा।

मंझोली हैसियत के लोग जिन्हे रोब की भाषा अंग्रेज़ी में मिडिल क्लास कहा जाता है अज़ीब जीवट के लोग होते हैं। उनमे आकांक्षा तो बड़ा बनने की होती है और बड़ा बनने के चक्कर में जीवन भर मेहनत करते रहते हैं, पिसते रहते हैं।कुछ बन भी जाते हैं विकास की मदद से।

बहुत मुखर भी होते हैं मंझोली हैसियत वाले। बोलने की आज़ादी का जमाना था, है और रहेगा । सिर्फ़ इंदिरा जी वाली इमरजेंसी के दौरान नही था।

इसके बावजूद बहुत से मंझोली हैसियत वाले ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है वह इंदिरा जी वाली तो नहीं पर मोदी जी की नई अघोषित इमरजेंसी में जी रहे हैं। इस लिये वह बोलते तो बहुत हैं पर बार बार याद दिलाते हैं कि वह बोल नहीं पा रहे हैं।

जो हिंदुस्तानी न तो मंझोली हैसियत के है न बड़े वह भी खुश हैं। उनके पास खुश रहने के अलावा और कोई चारा ही क्या है। वे गरीब हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। रोकड़ा नहीं है या कम है तो उनके पास वोट तो है। नेता पचहत्तर साल से ग़रीबी हटा कर विकास को स्थापित करने के लिये अथक प्रयत्न कर रहे हैं । करते ही रहेंगे। और अब तो मुफ़्त अनाज और तमाम स्कीमों के तहत डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र से पैसे भी मिल जाते हैं।

शासक दल और विपक्ष धर्म और जाति की राजनीति खेल ने मे पूर्ववत व्यस्त हैं। विपक्ष पर शासक दल तथाकथित तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाता है तो विपक्ष उल्टे शासक दल पर तथाकथित अल्प संख्यकों की अनदेखी और प्रताड़ित करने का आरोप लगाता है। जाति वादी राजनीति चरम पर है।

हिंदुस्तानी “बड़ों” की हैसियत कुछ सालों में बहुत बड़ी हो गई। मंझोली हैसियत वाले कुछ बुद्धिजीवी उनपर टीका करते हैं। बड़े अपनी चाल चलते रहते हैं। कुछ बुद्धिजीवियों को अपने यहाँ नौकरी भी दे देते हैं। कुछ के एनजीओ को गुप्त दान भी। हिंदुस्तानी बड़े बुद्धिजीवियों से परेशान नहीं होते, उन्हे फ़ेस्टिवल आयोजन करने में भी सहायता करते रहते हैं।

विकास की सोच अब अपनी सोच है । विकास को समझ आ गया कि उसकी सारी ज़िंदगी में उसके जैसे मंझोली हैसियत के लोगों ने ही उसकी मदद की।पर बड़े लोग विकास का बड़ा फ़ायदा उठाने की नई नई तिकड़म बाज़ियों से बाज नहीं आते।

ऐसा कहा जाता है कि “रागदरबारी” में श्रीलाल शुक्ल लिखित “पलायन संगीत” पढ़ने के बाद बहुत विचार कर मंझोली हैसियत वाले बहुतों ने और अब तो बहुत से गरीब तबके के लोगों ने घर छोड़ने का मन बना लिया!और बाहर के देशों में काम करने बसने निकल पड़ें।

लोग पूछ रहे हैं देश का लाडला विकास आजकल कहाँ है?

विकास को लगा वह वास्तव में मंझोली हैसियत का मनुष्य है। अब वह भी उनकी तरह पलायन में है और इधर उधर भटक रहा है। अपने पूर्ववर्ती विकासों की तरह! वैसे कभी कभार जब फ़ुर्सत में होता है तब भारत भ्रमण पर भी आ जाता है और लोगों को एहसास दिला देता है कि उनका विकास हो रहा है। और जिन्हें ऐसा एहसास हो जाता है वह स्वयं विकास करने लगते हैं। है न ग़ज़ब की बात। उससे भी बड़ी ग़ज़ब की बात है कि विकास तो इधर उधर भटक रहा है पर उसी का रूप धरे विकसवा भारत भूमि पर विराजमान है।

पलायन संगीत का पूरा अंश राग दरबारी में है; यहाँ सिर्फ़ इतना कहना काफी है कि विकसवा को यहाँ छोड़ विकास मंझोली हैसियत के लोगों की तरह पलायन की राह पर निकल पड़ा है। पर आता जाता रहता है।


और अभी क्या हाल है

अब तो नया खेल शुरू हुआ है। कहीं से निकल आई है तिलचट्टा जनता पार्टी। नाम में जनता, चाल में तिलचट्टा। छिपे घुसे, फुसफुसाये, फिर अचानक निकल आये। कुछ लोगों का मानना है कि यह सब तिलचट्टे “आम आदमी“ की औलादें हैं।

विकसवा हैरान है। उसे लगने लगा कि उसका असल रूप यानि विकास बस जल्द ही आने वाला है । नया जन्म ले विकास आयेगा। बस फिर क्या है विकसवा और विकास दोनों मिल उन भारतीयों की काया पलट देंगे।

पर विकसवा को अब तक जो मिल रहा है वह है जुलूसों और आंदोलन के अलावा एक मंत्री का इस्तीफ़ा वह मंत्री जिसके लिये धर्म प्रधान था और वही उसका नाम था । कोई सुधार की बात न हुई न होने वाली है। सिस्टम ज्यों का त्यों बरक़रार । विकास की जगह विकसवा को मिल रहा है नाच गाने और भद्दी गालियों से भरी रीलें पुलिस से झड़पें और नारों का शोर। तिलचट्टे कहते हैं—ये सब विकास के लिये ही तो है। पुराने स्थापित दल असमंजस में हैं। आगे क्या करें उन्हे समझ नहीं आता, उन्होंने भी समानांतर आंदोलन चला रखा है। एक ओर तिलचट्टा, दूसरी ओर पुराने दल—दोनों इस्तीफों से विकास की बात कर रहे हैं। शासन पक्ष रणनीति बनाने में माहौल कैसे शांत हो इन सब के उपाय खोज रहा है।

विकसवा किनारे खड़ा
असली विकास की बाट जोह रहा है।

और सबसे मज़े में हैं रील्स वाले। रोज़ रील्स बनाते हैं, अमरीकी ऐप पर डालते हैं। ट्रंप जी का मेक अमेरिका ग्रेट अगेन—के लिये हम भारतीयों का भी थोड़ा योगदान। छोटा ही सही, पर भावना तो सही है न।

अमरीका विकसित होगा तो भारत भी विकसित हो ही जायेगा। विकसवा मुस्कुरा कर देख रहा है। है न ग़ज़ब की बात।

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