अनुभूति- 3


भला हो इक्कीसवीं सदी का । डाकिया आया, तार वाला आया या पड़ोस में या खुद के घर पर फ़ोन आया वाला जमाना लद गया । अब तो यार, दोस्त, परिवार के लोगों से फ़ोन,इमेल, व्हाटसएप आदि से हम चाहे कहाँ भी हो गाहे-बगाहे ज़रूरत, बे ज़रूरत संपर्क बना रहता है।
भाई “एम के” और मेरे साथ भी ऐसा ही है । जब मैं सन् २००० में आणंद छोड़ गुड़गाँव का रहेवासी बना “एम के” आणंद में ही थे। फ़ोन पर संपर्क हो जाता था। कोरोना काल २०२० में एक फ़ोन वार्ता से पता चला कि वह अब हरिद्वार में गंगा तट पर निवास करते हैं। मै केनेडा आ गया था। मैंने एक दिन “एम के” की हिंदी में लिखी एक पोस्ट “लिंक्डइन” पर पढ़ी ।मन को छू गई। पढ़ तो मैं रहा था पर लगता था जैसे उनका लिखा मुझसे बतिया रहा हो।वहीं से शुरू हुई बतकही के फलस्वरूप और उनकी सहमति से इस लेख शृंखला का प्रकाशन संभव हो सका है।

आपने लाख दक्षिण के मंदिर और उत्तर की देव प्रतिमाएं देख डाली हो; हज़ार महलों, मकबरों, मीनारों और अजायबघरों के चक्कर काटे हों, या मुंबई की चौपाटी; दिल्ली के चाँदनी चौक या आगरे के ताजमहल को देखा हो; लेकिन अगर आपने एक बार भी दफ्तर की दुनिया की सैर नहीं की तो समझिये कि आपका…
गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर परिसर में हर वर्ष नागपंचमी के शुभ अवसर पर कुश्ती का आयोजन परंपरागत रूप से किया जाता है। समय के साथ, मिट्टी के अखाड़े की जगह अब गद्दे ने ले ली है, और पहलवानों को अखाड़े पर घुमा-घुमाकर जोड़ मिलाकर कुश्ती दंगल की जगह प्रतियोगिता का आयोजन किया जाने लगा है।…
घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे,समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे।*अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम,एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे। मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके,हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के।और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम,अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके। प्रकृति और पाखंड के ये…
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