जब कभी हम दो तथाकथित परिचित बड़े दिनो के अंतराल पर मिलते है और दूसरे “तथाकथित” परिचितों की चर्चा होती है तब प्रायः हम यही कहते हैं कि हम फलां, फलां को पहचानते हैं ।
बड़ी विचित्र बात है।
ज़रा शान्त भाव से सोचिए।
हम अपने आप को सही तरीके से नही पहचान पाए है और दूसरों को पहचानने का दावा करने लगते है ।
विवेकानन्द की एक घटना याद आती है।
तब वे नरेन्द्र थे।
रामकृष्ण परमहंह के द्वार पर गये, दरवाजा खटखटाया। अन्दर से आवाज आई “कौन”? ” नरेन्द्र ने जवाब दिया था “ताई तो आमी जानते चाई “
वही तो मै जानना चाहता हूँ ।
रामकृष्ण ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया।
और नरेन्द्र ने जिस दिन अपने को जान लिया, विवेकान्द बन गये।
और हम अपने से लेकर पराए सब को पहचानने का दावा करते हैं ।