-
-
-
परिचय
कुछ शेर पहचान पर साभार रेख्ता से अपनी पहचान भीड़ में खो कर ख़ुद को कमरों में ढूँडते हैं लोग ~शीन साफ़ निज़ाम “इन्सान के इलावा दूसरे जानदारों में भी नाम रखने का रिवाज क्यों नहीं?” “दूसरे जानदारों को डर है कि नामों से पहचान में धोका हो जाता है।” “धोका हो जाता है?” “हाँ,…
-
-
ट्विटर, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से साभार
ठीक ही कहा है आजकल बुढ़ापा झेल रहे मानव को फ़ेसबुक और व्हाट्सएप भी बड़ा सहारा देते हैं । कुछ समय ट्विटर पर भी निकला जा सकता है। टीवी पर समाचार देखना बहुत कम हो गया क्योंकि समाचार नहीं एंकरों के सदविचार और दुर्विचार ही देखने को मिलते हैं । परिवार और मित्र कोई यहाँ…
-
-
समतामूलक समाज
समतामूलक (Equitable) समाज का अभिप्राय मेरी समझ से ऐसे आदर्श समाज से है जिसके मूल मे समता हो। दूसरे शब्दों मे ऐसा समाज जिसका अंतर्निहित मूल्य समता हो । समता (equity) और समानता (equality) को लेकर काफ़ी भ्रम है । किसी ने कहा है “Equality is impossible, Equity is possible”! मानव समाज मे सभी एक…
-
Moving finger writes; Why we write what we write?
The question is why we write what we write? Well, first of all one must know how to write only then one can think of writing what to write. Speaking comes easily, particularly , speaking for daily usage. Speaking to others known or unknown and in front of others is a different matter. Public speaking…
-
मानव संसाधन विकास
अगस्त 1999 में लिखी यह गद्य कविता खो गई थी । बरसों बाद मिली । इसे 2020 नवंबर में वृक्षमंदिर पर प्रकाशित किया गया था । “नीयत” और “नियति“ की कश्मकश की धुँध मे जब ज़िंदगी को कुछ सूझता नहीं, समझ में नहीं आता तब चल पड़ती है ज़िंदगी , “नियति” द्वारा “नियत” किये गये…
