शायर पीके की कुछ ग़ज़लें

डॉक्टर प्रेम कुमार श्रीवास्तव, जिन्हें “पीके” के नाम से जाना जाता है,
एनडीडीबी के भूतपूर्व कर्तव्यपालक हैं। बैंगलोर में निवास कर रहे हैं।
उनकी पहचान केवल एक तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारी की नहीं है;
वह “डेयरी व्यवसाय गुरु” के रूप में भी जाने जाते हैं। वह एक
कुशल कंसलटेंट के रूप में अपने ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं।

उम्र के इस पड़ाव पर, “पीके” ने अपने भीतर के कलाकार को भी जगाया है।
शौकिया शायरी और व्यंग्य लेखन में उनकी रुचि ने उन्हें एक
नए आयाम में प्रवेश कराया है।

पेश हैं “शायर पीके” के कहे कुछ शेर !

रहता था मुझमें ऐसे भुलाया न जा सका
रूठा वो हमसे ऐसे मनाया न जा सका, आसमां साफ था रहगुज़र* था पुरसुकूं*
ये धुआँ कहाँ से आया हटाया न जा सका




साग़र! नहीं साक़ी! नहीं मय! भी नहीं है
होश में नहीं या दिखता नहीं मुझे
सरगोशी! सुनाई देती है साक़ी की ओर से
मयखाने में हूँ या कहीं और पता नहीं मुझे
आई जो बरसात मौसम बदलने लगे
दबाते थे जो पाँव सर कुचलने लगे
जमात+ में दुश्मन भी थे और दोस्त भी
हवा क्या बदली चेहरे बदलने लगे
शाम ढल रही है शजर# भी उदास है
कोई नहीं है मुझमें न कोई पास है
शायद इक रंगीन सुबह मेरे पास हो
कोई हमसफ़र# मिले यही आस है
दर्द बांटता हूँ बढ़ता जाता है
ख़ुशी बांटूँ तो घटती जाती है
इख़्तियार
@ है तेरा उल्टा कर दे
ज़िंदगी खत्म हुयी जाती है

कठिन शब्द

* रहगुज़र= रास्ता; पुरसुकूँ=इत्मीनान, शांतिपूर्ण, सारे झंझटों से अलग

# शजर= वृक्ष, पेड़;  हमसफ़र= जो राह में साथ रहे

! साग़र= शराब का प्याला; साक़ी=पिलाने वाला; मय= शराब; सरगोशी= धीमी आवाज़, फुसफुसाहट, कानाफूसी

@ इख्तियार = वश, अधिकार

+ जमात = झुंड, समुदाय


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