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वृक्षमंदिर हिंदी मे Reminiscences

संगीत ऐसा भी है, जो मिट्टी गाए

अक्तूबर२०२२ के बाद डाक्टर मुकुंद नवरे से मई २०२३ मे पुनः संपर्क स्थापित हुआ। उनके जन्मदिन पर फ़ोन पर बातचीत भी हुई।

मेरी उम्र के लोगों की बातों मे सलाम दुआ, एक दूसरे के स्वास्थ्य आदि की बातों के बाद ज़्यादा समय बीते दिनों की बातें करने में बीतता है। जो बीत गया उसे बयान करने में ऐसा लगता है जैसे हम उन क्षणों को फिर जी रहे हैं।

बातो ही बातों में उन्होंने भारत में अपने घर में पड़ी पुरानी चीजों की देखभाल और सफ़ाई के दौरान पुरानी संदूक से मिली अपने पिता जी की पुरानी डायरी की बात बताई। उसी डायरी में श्री आसाराम वर्मा की हस्तलिपि में लिखी निम्नलिखित कविता “संगीत ऐसा भी जो मिट्टी गाये” के बारे में बात हुई जो उन्होंने मुझे फ़ोन पर पढ़ कर सुनाई।

मुझे सुन कर आनंद आया। खेती और संगीत के शाब्दिक समन्वय का यह प्रयोग मन को भा गया। सुनते समय लगा जैसे सात आठ साल का “मैं”, अपने गाँव पर अपने खेतों के बीच की मेड़ों पर चल रहा हूँ । बरसात हो कर बादल छट रहे हैं और बादलों के सफ़ेद और कजरारे बच्चे सूरज से आँख मिचौली खेल रहे हैं। कुछ बालियाँ निकल चुकी हैं और बहुत सी निकलने के लिये मचल रही हैं। धान की सुगंधित मंद पवन सारे वातावरण में फैल रही हैं।

मेरे पूछने पर अपने पिता जी और श्री आसाराम वर्मा के बारे में डाक्टर नवरे ने बताया और बाद में व्हाट्सएप पर लिख कर भी भेजा, जिसके आधार पर यह भूमिका नीचे लिख रहा हूँ ।

डाक्टर मुकुंद नवरे के पिता श्री लक्ष्मण नवरे ( १९२०-२००२), सन १९४० से १९५५ तक सातारा नगर परिषद की पाठशाला मे शिक्षक थे। बाद मे उन्होने साहित्य सुधाकर, साहित्य रत्न परीक्षाऐं उत्तीर्ण की और हिंदी प्रचारक बने। सातारा मे उन्होंने राष्ट्रभाषा विद्यालय भी चलाया था। १९५६ में नागपुर स्थित शासकीय पटवर्धन विद्यालय में हिंदी शिक्षक पद पर नियुक्त होकर भी वे हिंदी प्रचारक बने रहे। १९६३ मे हिंदी विषय में एम ए करने के बाद वे कालेज में प्रोफेसर बने।


श्री लक्ष्मण नवरे का वर्धा स्थित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में काम के लिये अक्सर आना जाना होता था । वहां श्री आसाराम वर्मा भी हिंदी प्रचारक के नाते आया करते थे। इसी कारण दोनो मे मैत्री बनी। दोनों साहित्य प्रेमी थे और कविताएं करते थे।


डाक्टर मुकुंद नवरे के पिता जी की मराठी और हिंदी में कविताएँ लिखते थे। पुरानी संदूक में मिली नोटबुक में श्री लक्ष्मण नवरे ने अपने मित्र श्री आसाराम वर्मा को कभी कविता लिखने का आग्रह किया होगा जिसके फलस्वरुप आसाराम जी की दो कविताएं डाक्टर नवरे को मिली
नोटबुक में मौजुद है।


१९७६ में जब डाक्टर मुकुंद नवरे जलगाँव मे डेयरी बोर्ड की टीम के लीडर थे तब अपने पिता जी के साथ भुसावल जाकर श्री आसाराम वर्मा से मिले भी थे ।

संगीत ऐसा भी है, जो मिट्टी गाए

संगीत ऐसा भी है जो मिट्टी गाए

संगत के लिये, हज़ार हज़ार तारों का, सुनहरा तानपूरा सूरज छेड़े
तो कभी
लाख लाख,छलकते हुए मृदंगों को
बादल खन खनाये,
और फिर मिट्टी के सुनहरे कंठों से
धानों का ध्रुपद,
तिल के तराने,
अरहर की आसावरी,
ज्वार की जयजयवंती,
मटर का मालकोस,
गेहूं की भैरवी फूटे,
गहगहाए
लहलहाए
संगीत ऐसा भी है जो माटी गाए

धरती एक प्रौढ़ा नायिका

धरती एक प्रौढ़ा नायिका

बावरे ! परदेसी सैंया साँवरे जाओ जी जाओ अब तो अपने गाँव रे !

चौमासा कब का बीत गया, मैं भरी भरी, तू रीत गया, जाओ जी जाओ अब तो अपने गाँव रे !

पिया, भुजाओं में इतना कसो नहीं, अंगना में मेरे बसो नहीं, मैं अब केवल प्रिया नहीं, मां भी हूँ , जानो

हाथ जोड़ती हूँ जाओ !

देखो पलने में मक्का मचल रहा है, क ख ग लिखना सीख गई मूँगफली, बस्ता लिये कपासी खड़ी, मदरसे जाने को

पहन लिया अरहर ने, घेरदार घाघरा घूमर नृत्य मचाने कोजुआर हो गई हमारे कंधों तक ऊँची,व्याह के योग्

पहनने लगी नौगजी लुगडा नागपुर, धान सुनहला जामा पहन, बन गया कब का दूल्हा

अब तुम ही सोचो, ये सब देखेंगे रंग रलियां हमारी

वह देखो कोई देख रहा है,

शायद, अलसी कलसी लिये खड़ी है,नन्हे गेहूं की उँगली पकड़े

अब तो छोड़ो छोड़ो सैंया ! मैं पड़ूँ तुम्हारे पाँव रे!

परदेसी सैंया, साँवरे ! जाओ जी जाओ अब तो अपने गाँव रे !

रूठो नहीं सजनआठ मास के बाद, अजी फिर से अइयो, और सागरमल की बड़ी हाट से सजन,गोल गोल गीले घुंघरून की, छुम छुम पैंजनिया लइयो

तेरी मेरी तो जनम जनम की भाँवरें !

 

By Vrikshamandir

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