भैंस कि गाय कि भैंस ?




यह घटना इसी वर्ष के सितंबर महीने की है।
घर में एक युवक मेहमान दो दिनों के लिए आया था। उसका नाम अजय है। वह कई वर्षों बाद हमारे यहां आया था, विषयों पर गपशप चल रही थी और फिर चूँकि मै डेयरीवाला हूँ , उसने आखिरकार मुझसे दूध का विषय छेड़ ही दिया।
“काका, भैंस का दूध अच्छा होता है या गाय का?” उसने मुझसे बिल्कुल बुनियादी सवाल पूछा।
यह सवाल किसी अमेरिकी युवक को इस वर्ष में क्यों परेशान कर रहा है, इससे मेरी उसके वैचारिक भ्रम की धारणा और मजबूत हो गई।
“अरे, दोनों ही दूध अच्छे हैं, लेकिन तू यह सवाल क्यों पूछ रहा है..?”
मैंने कहा, “हमारे भारतवर्ष में भैंस पालन की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और दुनिया की उत्कृष्ट भैंसोंकी की नस्लें भारत में हैं। देश के दूध उत्पादन में उनका हिस्सा आधा है और कुल उत्पादन बढ़ते हुए भी वह हिस्सा लगातार टिका हुआ है, यह तो मैं खुद साठ वर्षों से देख रहा हूं। इसका मतलब है कि इस दूध को लोग पसंद करते आए है। और गाय का दूध उत्पादन बढ़ा है, वह आज के समय की बात है और वह भी लोगों को पसंद आ रहा है।” मैंने कहा।
हमारे यहां कुल दूध उत्पादन कितना होता है, उसमें भैंस का दूध कितना है, इसके बारे में लोगों को वास्तविक स्थिति का ज्ञान नहीं होता है । ऐसा मेरा अनुभव है। अत: अजय अपवाद कैसे हो सकता है ?
मैंने उसे बताया कि भारत में गाय की कई नस्लें होने के बावजूद खेती के लिए बैल मिलें, यह विचार पहले और बाद में दूध, ऐसा विचार किया जाता था। इसकी तुलना में भारत की नदियों के क्षेत्रों में भैंस की नस्लें विकसित करते हुए एक ओर चावल की खेती के लिए नर भैंसे और दूसरी ओर मादा से दूध, ऐसी दोनों जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे पूर्वजों ने विचार किया ऐसी मेरी सोच है। और बुनियादी फर्क यह है कि भैंस के लिए भक्ति भाव नहीं रखा गया, इसलिए यह चित्र दिख रहा है। आज की तारीख में भैंस दूध उत्पादन में प्रमुख मूल्यवान भूमिका निभाने वाली जानवर तो है ही, लेकिन उसके अलावा मांस उत्पादन और मांस निर्यात के मामले में भी भैंस का योगदान जबरदस्त है।
“लेकिन शायद पक्षपात करके हम गाय का विचार अधिक करते हैं और भैंस तो हमारी गिनती में आती ही नहीं ..एक समाज के नाते तो इस रूप में हमने भैंस को हल्के में लिया हुआ है, ऐसा मुझे लगता है,” मैंने कहा।
कौन सी गाय देशी, विदेशी या क्रास ब्रीड ?

“लेकिन काका, अच्छा दूध देने वाली गायें भी तो होती हैं।
“ हैं न, जैसे गीर, थारपारकर..” अजय ने कहा। उससे थारपारकर का नाम सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ।
“तुझे थारपारकर का नाम कहां से पता चला?” मैंने पूछा।
“मेरा एक दोस्त है, उसकी अपनी डेयरी है.. मैं कुछ महीने पहले भारत गया था तब उसके यहां मैंने थारपारकर गायें देखीं।” अजय ने कहा।
मुझे आश्चर्य हुआ। क्योंकि थारपारकर गाय दो उद्देश्यों के लिए जानी जाती है, खेती के लिए बैल और दूध उत्पादन के लिए। ऐसा देखा जाए तो भारत में गायों की प्रमुख तीस से अधिक नस्लें हैं। लेकिन सिर्फ दूध उत्पादन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो गीर, साहिवाल, लाल सिंधी जैसी कुछ नस्लों की ही गिनती की जाती है।
विभाजन के बाद भारत के वह हिस्से जहां साहिवाल और लाल सिंधी नस्ल की गायें ज्यादा पाई जाती थी पाकिस्तान के हिस्से में चले गये। इसलिए गीर और उसके बाद थारपारकर यही दो नस्लें हमारे यहां दूध के लिए जानी गई तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह तो ठीक है।
“उनकी थारपारकर गायें कैसी हैं?” मेरे मुंह से सवाल निकला। “डेयरी कहां है?” मैंने पूछा।
“इंदापूर के पास में ही मेन रोड पर है..” अजय ने कहा।
यह सुनकर मुझे और आश्चर्य हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में क्रॉसब्रीड गायें अधिक होने का मुझे पता था। इतना ही नहीं, वहां लिक्विड नाइट्रोजन का कंटेनर मोटरसाइकिल से बांधकर किसानों के दरवाजे पर जाकर गाय भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान कराने वाले बहुत से पशुपालन पर्यवेक्षक हैं यह मुझे पता था। वे जर्सी और होल्स्टीन सांडों के वीर्य का उपयोग करते थे। लेकिन यह बीस-पच्चीस वर्ष पहले की बात थी।
अब वहां स्थिति इतनी क्यों बदल गई होगी, ऐसा विचार मेरे मन में आया।
“वहां सिर्फ थारपारकर गायें थीं?” मैंने उत्सुकता से पूछा।
“नहीं काका। थारपारकर गायें तीन थीं। बाकी सत्रह अठारह भैंसे थी।” उसने कहा।
अब मेरे दिमाग में प्रकाश पड़ा। भैंस के दूध की मांग होने के कारण वहां भैंसें थीं, यह समझ आ गया। लेकिन अधिक दूध दे सकने वाली क्रॉसब्रीड गायों के बजाय देसी गायें क्यों होंगी, ऐसा सवाल उठा।
“उस दूध की आपूर्ति कहां की जाती है?” मैंने पूछा।
इस पर अजय ने एक प्रसिद्ध डेयरी का नाम बताया। इसका मतलब वह प्रसिद्ध डेयरी और इंदापूर के उस फार्म के बीच एक विशिष्ट दूध आपूर्ति के लिए अनुबंध हुआ होगा, ऐसा लगा। और अजय के अगले सवाल से वह तुरंत स्पष्ट हो गया।
कैसा दूध आर्गेनिक कि आख़िर कौन सा

“काका, वे ऑर्गेनिक दूध के बारे में बात कर रहे थे। आप का आर्गेनिक दूध के बारे में क्या कहना है?” अजय ने पूछा।
“अरे, ऑर्गेनिक दूध का उत्पादन करना भारत में जितनी लगता है उतना आसान नहीं है। इसके लिए पहले कुछ साल केवल ऑर्गेनिक खेती ही करनी चाहिए। यानी रासायनिक खादें का इस्तेमाल बिलकुल नही करना चाहिए, कीटनाशक भी इस्तेमाल नही कर सकते हैं। ऐसे खेतों में जो चारा उगाया गया, वही जानवरों को देना चाहिए। साथ ही पशु आहार, आदि जो भी दिया जाय, वह भी ऑर्गेनिक खेती से ही आना चाहिए। मुख्य बात यह है कि इसकी गारंटी कौन देगा.. सामान्य किसान को तो कई चीजें बाहर से ही खरीदनी पड़ती हैं। उसके अलावा कई और बातों का पालन करना पड़ता है।” मैंने कहा।
अब अजय को इस विषय का गुंफन समझ आ गया। फिर उसने विषय बदल दिया।
“काका, वह दूध ‘ए टू’ टाइप का था, ऐसा पता चला। वह अधिक अच्छा होता है न?” उसने पूछा।
अब तक के सवालों में यह सब से गंभीर सवाल था था, ऐसा कहा जाए तो चलेगा। क्योंकि “ए टू मिल्क” शब्दावली का चलन पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से ही हुआ है। इसके पहले हमें इसके बारे में पता नहीं था।
नए सहस्राब्दी में डीएनए जांच का काम अधिक मात्रा में होने लगा और एक-एक करके हमें नई बातें पता चलने लगीं। उनमें भारत की देसी गाय (बॉस इंडिकस) और विदेशी गाय (बॉस टॉरस) के डीएनए की तुलना करते हुए यह फर्क पाया गया कि भारत की देसी गाय में A2A2 जीन होने के कारण उनके दूध में A2 बीटा केसीन प्रोटीन बनता है और वह विदेशी गाय के दूध में स्थित A1 बीटा केसीन की तुलना में अलग तरीके से पचता है, ऐसा पता चला। A1 प्रकार के दूध का सेवन और हृदयरोग के बीच संबंध हो सकता है, ऐसा मत भी व्यक्त हुआ।
तब से A2 प्रोटीन अधिक गुणकारी है, ऐसा दावा किया जाने लगा। जब हमारे यहां यह पता चला कि देसी गाय इतनी गुणवान हैं, इसका और जोरदार प्रचार होने लगा। इतने पर ही न रुककर विदेशी नस्ल की गायों का दूध सेवन करने से लोगों को बीमारी होती है, यह भी फैलाया गया।
लेकिन अभी तक प्रमाण के साथ यह बात दुनिया में कहीं सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए जानबूझकर आंखें मूंदकर “ए टू” दूध अच्छा है, ऐसा दावा करते हुए व्यापारी कंपनियों ने खूब लाभ कमाना शुरू किया है, यह मैंने अजय को समझा दिया और चर्चा समाप्त हो गई।
क्रास ब्रीड गायें क्यों ; अंतर्कथा



मुझे याद है कि जब देसी और विदेशी गायों में ऊपर जैसा फर्क पाया गया, तब से हमारे यहां स्वदेशी का आग्रह रखने वालों को एक शानदार अवसर मिला और एक ओर देसी गायों का गुणगान तो दूसरी ओर विदेशी और क्रॉसब्रीड गायों को कम आंकना शुरू हो गया। सोशल मिडिया पर इस विषय मे लेख घूमने लगे और उन्हें बार-बार पढ़कर लोगों को यह बात सत्य लगने लगी।
चार-पांच वर्ष पहले एक बार तो मेरी निकट संबंधी बहन ने फोन करके अजीब सा सवाल पूछा। उसे पता था कि मैंने उरली कांचन में काम किया और वहां से क्रॉसब्रीड गायों का प्रजनन शुरू हुआ था, यह भी उसे मालूम था।
“अरे, तू कहता था न वह होलस्टीन या क्या…..” वह बोली, “वह गाय नहीं बल्कि एक अलग जानवर है.. क्या यह सच है?” उसने पूछा।
यह सुनकर मैं तो उछल पड़ा।
“अरे, ऐसा होता तो क्रॉसब्रीडिंग कैसे होती..” मैंने कहा।
“दुनिया भर की गायों की सभी नस्लों में संकरण हो सकता है, इसका मतलब उनका वंश एक ही है। भैंस और गाय अलग वंश हैं इसलिए उनका आपस में संकरण नहीं हो सकता। बकरी और भेड़ का भी संकरण नहीं होता।” मैंने कहा।
फिर उसने “देसी और विदेशी गायों के दूध में अच्छा दूध कौन सा है” यह भी हमेशा का सवाल किया। दोनों दूध अच्छे हैं, ऐसा मैंने उत्तर दिया।
फिर उसने हमेशा जैसा देसी गायों संबंधी एक सवाल पूछा।
“ए मुझे बता, ब्राजील में उन्होंने अपनी देसी गीर गायें ली हैं और वहां दूध उत्पादन बहुत बढ़ गया है, ऐसा कहते हैं। फिर हम अपनी देसी गीर गायों को छोड़कर उन होलस्टीन और जर्सी गायों के पीछे क्यों पड़ते हैं..?” उसने पूछा।
यह सवाल कई लोगों को तर्कसंगत लगेगा। लेकिन ब्राजील में गीर गायों का प्रवेश क्यों और कैसे हुआ, यह एक अलग कहानी है और वह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है, इसमें शक नहीं है।
ब्राज़ील ने भारत से गीर और नेल्लोर नस्ल की गायें आयात की । उनके दो अलग उद्देश्य थे। दूध के लिए गीर और मांस के लिए नेल्लोर । वास्तव में इन दोनों नस्लों में उष्ण जलवायु में टिके रहना रखना और टिक और टिक जनित रोगों का सामना कर सकना, ये गुण होने के कारण उनका ब्राज़ील में काफ़ी संख्या में आयात हुआ ।
हमारे यहां गाय उपयोगी पशु है, यह वीर सावरकर कहते थे उस काल में और उसके बाद भी जब ब्राजील में ये नस्लें आयात की गईं और अब कई दशक हो गए हैं और संकरण / चयन करके व्यवस्थित प्रजनन करने से उनके यहां एक नई नस्ल विकसित हो गई ।
मुख्य बात यह है कि ब्राज़ील ने भारत की गीर नस्ल और ब्राज़ील में पहले से मौजूद स्थानीय होलस्टीन, इन दोनों नस्लों का संकरण करके उन्होंने “गिरलैंडो” यह नई नस्ल तैयार की है और वे गायें लाखों की संख्या में अब तक तैयार की जा रही हैं।
इसका मतलब उन्होंने गीर नस्ल का कुशलता से उपयोग करके मूल होलस्टीन नस्ल के गुणों का पूरा फायदा उठाया है। ऐसा होना सिर्फ गीर नस्ल का ही प्रभाव नहीं है।
मैंने यह बहन को समझा दिया और हमारी चर्चा समाप्त हो गई।
गिरलैंडो जैसी गाय हमारे भारत में क्यों नहीं?

हम ब्राजील की वर्तमान स्थिति देखें तो वहां गिरलैंडो नस्ल की गाय दस महीनों में मिलाकर औसतन ३६०० लीटर दूध देती है और कुछ गायें प्रतिदिन तीस-चालीस लीटर दूध देती हैं।
बिल्कुल कल की बात करें तो अगस्त २५ में वहां “इवा एवरॉस” नाम की गिरलैंडो नस्ल की गाय ने लगातार तीन दिनों में ३४३ लीटर और उनमें से एक दिन में १४२ लीटर दूध देकर विश्व रिकॉर्ड दर्ज किया है!! उस में यह दूध के गुण निश्चित रूप से होलस्टीन और गीर दोनों नस्लों के हैं, इसमें कोई दो मत नहीं होने चाहिए।
ब्राजील की एक और प्रमुख बात यह है कि ब्राजील में गोमांस का उत्पादन जबरदस्त मात्रा में होता है और उसमें अन्य नस्लों के साथ नेल्लोर नस्ल का हिस्सा जितना है, वैसा ही हिस्सा गिरलैंडो नस्ल के जानवरों का भी है। इसका कारण है कि दूध के लिए जानवरों का पालन किया हो फिर भी कुछ समय बाद उम्र या अन्य कारणों से जब जानवर को समूह से निकालना पड़ता है, तब प्राप्त स्थिति के अनुसार उसे मांस के लिए बेचकर किसानों को दोहरा फायदा होता है और इसमें कुछ गलत नहीं माना जाता।
दुनिया भर के किसान यह करते हैं। उन्होंने दूध के लिए गायों का समूह रखा हो, फिर भी सालाना तीस-चालीस प्रतिशत आय उन्हें जानवरों की बिक्री से मिलती है। यह एक प्रमुख बिंदु है और इसको ध्यान में लेना ही चाहिए। कुल मिलाकर हमारे यहां से गीर नस्ल की गायें आयात करते हुए ब्राजील का दृष्टिकोण वैज्ञानिक था और आज भी है। इसकी तुलना में हमारे यहां देसी गाय को राज्यमाता-गोमाता कहकर दर्जा दिया जाता है, यह २०२५ की बात है।
हम समग्र रूप से विचार करें तो प्रजनन के लिए संकरण चयन पद्धति अपरिहार्य है, यह एक सत्य है। वह हमने भैंसों के बारे में अपनाई इसलिए हमारे यहां उत्कृष्ट नस्ल की भैंसें तैयार हो गईं। आज भी भैंस को आसानी से समूह से निकाल सकते हैं। लेकिन गायों के मामले में यह सिद्धांत दूर रखने से गड़बड़ी हुई है और आखिरकार कम उत्पादन देने वाली गायोंकी संख्या बढती गईं और किसानों का अर्थशास्त्र ढह गया।
इसके उपाय के रूप में देसी गायों में अच्छे गुण अंतर्भूत करने की जरूरत पैदा हुई और ऐसे प्रयास हमें स्वतंत्रता मिलने से पहले बैंगलोर में इम्पीरियल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने शुरू किए। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी बैंगलोर में इंडो-डेनिश प्रोजेक्ट हाथ में लेकर गायों में क्रॉसब्रीडिंग जारी रही।
केरल राज्य में ६० वर्ष पहले इंडो-स्विस प्रोजेक्ट स्थापित हुआ और स्थानीय गायों पर ब्राउन स्विस नस्ल का संकर करके उन्होंने ‘सुनंदिनी’ इस नई नस्ल की लाखों गायें पैदा कर दी ।महाराष्ट्र में मणिभाई देसाई ने ५५ वर्ष पहले आधारभूत कार्य किया, उस से क्या क्रांति हुई, वह हमने देखा है और उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारे किसानों ने अनुभव किया है।
क्रास ब्रीड गायें क्यो ?

१९८४ में हुए एक सर्वेक्षण में पहली बार क्रॉसब्रीड गायों के फायदे रेखांकित हुए कि इन गायों में खाए चारे का रूपांतरण दूध में करने की क्षमता अधिक है और इससे दूध उत्पादन पर और ग्रामीण विकास पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। साथ ही इन क्रॉसब्रीड गायों में गर्भधारण का प्रतिशत अधिक है, वे अधिक दिनों तक दूध देती हैं और उनका सूखा काल भी कम होता है। इन आर्थिक कारणों से देश भर के किसान क्रॉसब्रीड गायों को प्राथमिकता देने लगे, इसमें आश्चर्य नहीं है।
हम अब निकट काल की जानकारी लें तो २०२४ में भारत में कुल ३० करोड़ ७४ लाख दुधारू पशु थे। उनमें १० करोड़ ९८ लाख यानी ३३ प्रतिशत भैंसें थीं, गायों की संख्या १९ करोड़ ३४ लाख थी और उसमें क्रॉसब्रीड गायों की संख्या ५ से ६ करोड़ थी। लेकिन दूध उत्पादन में भैंसों का हिस्सा ४९ प्रतिशत, क्रॉसब्रीड गायों का ३२ प्रतिशत तो देसी गायों का हिस्सा २० प्रतिशत इतना था। इसका मतलब क्रॉसब्रीड गायें दूध उत्पादन में बाजी मार रही हैं, यह साफ है। सबको समझ आने वाली भाषा में कहें तो हमारे यहां देसी गाय का औसत दैनिक दूध उत्पादन ३.७३ लीटर होता है तो क्रॉसब्रीड गाय ७.८ लीटर दूध देती है।
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार दूध में भैंस और गायों का संयुक्त विचार किया जाए तो भारत में दुधारू जानवर सालाना औसत २०८० लीटर दूध देते हैं जबकि अमेरिका और इजरायल में यह औसत उत्पादन आठ से दस हजार लीटर होता है। हमने २०४७ तक यह उत्पादन ५२०० लीटर करने का लक्ष्य रखा है और इसे पूरा करने के लिए कृत्रिम गर्भाधान आदि उपायों का प्रभावी इस्तेमाल करना पड़ेगा साथ ही इसके लिए सिद्ध साढों ( प्रूवेन बुल) का उपयोग करना पड़ेगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे यहां क्रॉसब्रीड गायों का मूल्य किसान वर्ग भली भांति समझ गया है और हर किसान सयाना हो गया है। इसलिए देसी या बगैर जाति की गाय सालाना इतने रुपये का गोबर देती है या इतने रुपये का गोमूत्र देती है, वगैरह हिसाब उसे बताने की जरूरत नहीं। देसी गायों की नस्लें टिकाने के लिए शोध और विकास का कार्यक्रम सरकार और कृषि विश्वविद्यालयों को जरूर हाथ में लेना चाहिए। लेकिन इसके लिए सामान्य किसानों को दोष न दिया जाए।
अध्याय समाप्त
जाते-जाते एक और बताने लायक बात यह है कि हमारे यहां गोवंश हत्या निषेध का कानून लाकर सरकार ने किसानों के जानवर बिक्री के स्वतंत्रता पर बंधन ला दिए हैं। इससे स्थानीय स्तर पर किसानों को कई कठिनाइयां आ रही हैं और जानवर की खरीद-बिक्री पर संदेह करके उन्हें भयानक परेशानी होती है। वास्तव में कौन सा जानवर पालें, कौन सा रखें और कौन सा बेचें, यह अधिकार किसानों को होना चाहिए क्योंकि उन जानवरों की देखभाल का खर्च किसान करता है और होने वाला नुकसान भी उसी को होता है, अन्य लोगों को उसके साथ कोई लेना-देना नहीं होता। यह जानकर भी लोग अपनी भूमिका नहीं बदलते इसका मुझे आश्चर्य लगता है। इसलिए यहां से आगे के हमारी नीतियां कितनी विज्ञाननिष्ठ और वास्तविकता पर आधारित रहेंगी, उस पर आगे का दुग्ध विकास निर्भर होगा, इतना ही आज कहा जा सकता है। वर्ष २०२५।

One reply on “डाक्टर मुकुंद नवरे के मूल मराठी लेख का हिंदी अनुवाद “आजकल की बातें””
That was a good informative article for a common man like me, though having worked in the NDDB for over three decades, it was easy to understand. Remembered Dr. Kurup and his Indo- Swiss team at Mattupetty where they did an awesome job in the field. Thanks for sharing this information. 🙏