दिव्य कृपा

<strong>रश्मि कांत नागर </strong>
रश्मि कांत नागर


यह कहानी जिसे मैं अपनी मां से बचपन मे सुना करता था आज भी याद है!

मैंने ये कहानी उनसे पहली बार उस समय सुनी थी, जब मैं कोई पाँच साल का था। उसके बाद ये सिलसिला कोई चार-पाँच वर्ष और चला होगा। पर इस कहानी के बारे में विशेषता ये है, की मैंने ये कहानी हर बार गहरी नींद में सुनी और आज ७० वर्षों बाद भी ठीक वैसे ही याद है, जैसे पूरे होशो-हवाश में अभी अभी सुनी हो। 

मेरी माँ ये कहानी, वर्ष में सिर्फ़ एक बार, महालक्ष्मी व्रत की रात को कहती थी। क्योंकि इस व्रत की पूजा मध्य रात्रि को होती थी, घर के सभी सदस्य गहरी नींद में होते थे। लिहाज़ा ये पूजा वो अकेले ही करती थी। इसका साथ सिर्फ़ में देता, माँ के आस पास गहरी कुंभकर्णी नींद में। मेरा इस रात माँ के पास सोने का एकमात्र कारण, एक विशेष गुजराती व्यंजन “दहितरा” था, जो कोई दस अन्य व्यंजनों के साथ, माँ भोग के लिये बनाती थी। माँ पूजा समाप्त होने पर, भोग की थाली वाला दहितरा, मुझे नींद से उठा कर खिलाती। जैसे ही दहितरा पेट में जाता, मैं वापस अपनी कुंभकर्णी नींद की भेंट चढ़ जाता। 

दरअसल इस कहानी को ‘व्रतकथा’ कहना अधिक उचित होगा। गुजराती भाषा में इस कथा को वह अपनी एक विशिष्ट शैली में कहा करती थी जिसमें कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग होता था जिन्हें सामान्य तौर पर प्रयोग में नहीं देखा-सुना जाता है, उदाहरण “शाप्टा-शोप्टे’, यानी चौपड़का खेल। 

मैं इस मूल गुजराती व्रतकथा को हिन्दी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। व्रतकथा है तो थोड़ी लम्बी अवश्य होगी। थोड़ा धीरज रख कर पढ़ें। 

हर कथा का एक मुख्य पात्र होता है और क्योंकि ये कथा व्रत-पूजा से सम्बंधित है, इसका मुख्य पात्र सिर्फ़ एक ब्राह्मण ही हो सकता है। और जब ब्राह्मण है, तो दरिद्र तो होगा ही। विवाहित भी होगा, और क्योंकि कथा उस समय की है जब परिवार सीमित नहीं हुआ करते थे, घर में कमाने वाला एक और खाने वाले अनेक। लिहाज़ा पति-पत्नी में रोज़ की नोंकझोंक होती और पत्नी का हर रात्रि कटाक्ष हमारे मुख्य पात्र को असहनीय दुःख में ढकेल देता। क्रोध से भरा दुःखी ब्राह्मण रोज़ सुबह, नहा-धो कर, ललाट पर तिलक लगा, भिक्षा के लिये पहले अपने मध्यम आबादी के गाँव में, कुछ गिने चुने यजमानों के घर चक्कर लगाता, फिर आस पास के दो एक गाँवों में भटकता और सायंकाल जब थकाहारा घर लौटता तो भिक्षा की झोली में अपर्याप्त सामग्री पा, होने वाले घमासान की आशंका से भयभीत घर में प्रवेश करता। अक्सर आधे पेट और कभी कभी तो भूखे पेट ही चिन्तामग्न सोने का नाटक करता। 

पर ये सब कितने दिन चलता। एक रात पत्नी ने ताना दिया, कहा, “कब तक आस पास के गाँवों में निरर्थक भटकते रहोगे? क्यों कुछ दूरी के गाँवों में नहीं जाते? हो सकता है कोई समृद्ध यजमान मिल जाये और हमारी दरिद्रता मिट जाये? कुछ प्रयास तो करो। विद्वान हो, क्यों निठल्ले से बने बैठे हो? 

ब्राह्मण कुछ बोला नहीं परन्तु पत्नी का ताना मन में चुभ गया। सुबह मुँह अँधेरे उठा, नहा-धो, ललाट पे कुमकुम-चन्दन का तिलक लगा, धोती दुशाला धारण कर झटपट तैयार हो, मुँह फुलाए घर से निकल पड़ा। पत्नी जागी हुई तो थी, पर नींद का बहाना कर लेटी हुई देख रही थी की पति का मुँह फूला हुआ है। 

मैं इस मूल गुजराती व्रतकथा को हिन्दी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। व्रतकथा है तो थोड़ी लम्बी अवश्य होगी। थोड़ा धीरज रख कर पढ़ें। 

ब्राह्मण ने राह बदली और निकल पड़ा गाँव की सीमा के बाहर। एक गाँव पार करता, दूसरे में कुछ विश्राम करता, अनमना घने वन को पार करता एक सुरम्य सरोवर के किनारे जा पहुँचा। सरोवर के किनारे एक सुन्दर स्वर्ण-रत्न जड़ित भवन को देखा। कोई द्वारपाल नहीं देखा सो सीधा भवन के बीचों बीच प्रांगण जा पहुँचा। 

वहाँ देखा कि प्रांगण के मध्य एक चबूतरे पर आसान जमाये नारायण और लक्ष्मी चौपड़ खेल रहे हैं। ब्राह्मण को देखते ही लक्ष्मीजी ने पूछा, “बताइये ब्राह्मण देवता, आज कौन विजयी होगा?” “आप माते”, ब्राह्मण ने उत्तर दिया। 

लक्ष्मीजी विजयी हुईं और उन्होंने पुरस्कार स्वरूप ब्राह्मण को अपने हाथ का स्वर्ण कंगन दे दिया। ब्राह्मण प्रसन्नमन लक्ष्मी और नारायण से विदा लेकर वापस घर की तरफ़ लौट चला। ‘अब मेरी दरिद्रता के दिन दूर हुए’, ऐसा सोच अपने भाग्य पर इतराता जा रहा था, तभी उसे एक विचार आया; “क्यों ना इस सरोवर में स्नान कर थोड़ी थकान मिटा लूँ?” अपना झोला- अँगोछा किनारे रखा और पानी में उतर गया। पर दृष्टि झोले और उसने रखे कंगन पर थी। अचानक ब्राह्मण की साँस थम गयी, कंगन झोले से फिसल सरोवर में पहुँच गया। ढूँढने के अथक निरर्थक प्रयास से क्षुब्ध ब्राह्मण ख़ाली हाथ घर लौट गया। सारी रात सो ना सका। पत्नी से आँख भी नहीं मिलाई।

अगले दिन फिर मुँह अँधेरे उठा, नहा-धो, कुमकुम-चन्दन का तिलक धारण कर तैयार हो, पत्नी की नज़र बचा पहले दिन की राह चल दिया। ‘इस बार पुरस्कार संभाल कर ले जाऊँगा’ इसी सोच में, एक से दूसरे गाँव पार करता, घने वन से गुजरता पता नहीं कब चौपड़ का खेल खेलते लक्ष्मी और नारायण के सम्मुख जा पहुँचा। कानों में “आज कौन विजयी होगा” की ध्वनि पड़ी, तो जैसे गहरी तन्द्रा से बाहर आया और अनायास बोल पड़ा, “लक्ष्मी जी”। और लक्ष्मी जी विजयी हुईं। प्रसन्न होकर इस बार लक्ष्मी जी ने अपने गले से रत्नजड़ित हार निकाला और ब्राह्मण के हाथों पर रख दिया।

लक्ष्मी-नारायण से श्रद्धापूर्वक विदा लेकर ब्राह्मण पुलकित मन से घर लौट चला। इस बार भी रास्ते में रुक कर सरोवर में स्नान करने उतरा पर अपने झोले को, जिसमें हार था, तालाब के किनारे से दूर एक पेड़ के नीचे रख दिया। अभी तालाब में उतरा ही था की हार थोड़ा सा झोले के बाहर सरक गया और तभी एक चील झपट्टा मार, हार को अपने पंजों में ले उड़ी और आँखों से ओझल हो गयी।

ये क्या हो गया? अचंभित ब्राह्मण की तो जैसे जान ही निकल गई। रुआँसा, मुँह लटकाए दुःखी ब्राह्मण वापस घर की राह चल पड़ा। घर पहुँचा पर पत्नी से आँखें चार करने का साहस ना करपाया। दुबारा ऐसी गलती नहीं करने का संकल्प कर ब्राह्मण लेट गया और जैसे तैसे आधी अधूरी नींद सो गया। 

अगली सुबह फिर जल्दी उठा, नित्य कर्म, स्नान, तिलक और वस्त्र धारण कर, अपना पोथी-झोला उठा घर से निकल पड़ा। एक गाँव छोड़ता, दूसरे में कुछ देर विश्राम करता, घने वन को पार करता, सीधा सुरम्य सरोवर किनारे स्थित स्वर्ण भवन के प्रांगण में जा पहुँचा। 

पिछले दिनों की तरह आज भी लक्ष्मी और नारायण चौपड़ के खेल में व्यस्त थे। ब्राह्मण को वहाँ देख, लक्ष्मी जी में पूछा, “बताइए ब्राह्मण देवता, आज कौन विजयी होगा?”

कुछ पल सोचने के बाद ब्राह्मण बोला, “आप माते”। और लक्ष्मी जी पुनः विजयी हुईं। प्रसन्न हो उन्होंने निकट रखा एक पिटारा खोला, दोनों हाथों में आभूषण भरे और ब्राह्मण की झोली भर दी। निकट बैठे नारायण ये दृष्य देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।

ब्राह्मण ने लक्ष्मी-नारायण से विदा ली और तेज कदमों से सीधा घर की और चल पड़ा। इस बार सरोवर में स्नान करने नहीं रुका। प्रफुल्ल मन से हाँफते हाँफते घर पहुँचा, पत्नी को पुकारा और आभूषणों से भरी झोली पत्नी को थमा दी।

पत्नी ने झोली खोली तो आग-बबूला हो गई। “तुम मेरे पति हो या दुश्मन। हमें मार डालने आये हो, या श्राप देने आये हो? धधकते अंगारे लाये हो? ऊपर से इतने खुश हो रहे हो?”

ब्राह्मण ने झोली में झांका तो, आभूषणों के स्थान पर धधकते अंगारे दिखे। आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। छूने को हाथ बढ़ाया तो जलते अंगारों की गर्मी से भयभीत हो हाथ खींच लिया। साँस जैसे रुक सी गई। सर पकड़ नीचे बैठ गया। क्रोधित पत्नी ने जलते अंगारे चूल्हे के हवाले कर दिये और बड़बड़ाती घर के अन्दर चली गई। 

तभी पड़ोसन आई और ब्राह्मणी को सम्बोधित कर बोली, “बहन, मुझे चूल्हा जलाने के लिए आग चाहिये। क्या आप के चूल्हे से मिलेगी?”

ब्राह्मणी बोली, “खुद चूल्हे में देख लो। अगर मिले तो ले लो”। पड़ोसन ने चूल्हे में देखा तो स्वर्ण-रत्नों वाले आभूषण। मन डोल गया उसका। तुरन्त सारे आभूषण साड़ी के पल्लू में छिपाये, ब्राह्मणी को धन्यवाद दे अपने घर लौट गई। 

अचंभित ब्राह्मण को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या और कैसे हो गया। लक्ष्मी जी ने तो आभूषण दिये थे, अंगारे कैसे हो गये? इसी सोच में थका हारा ब्राह्मण, भूखे पेट ही सो गया। रात भर करवटें बदलता रहा, सुबह मुँह अँधेरे उठा, नहा-धो, कुमकुम-चन्दन का तिलक लगा तैयार हुआ और पिछले दिनों की तरह, वापस लक्ष्मी नारायण के समक्ष जा पहुँचा। वे दोनों चौपड़ के खेल में मग्न थे। 

नारायण ने ब्राह्मण को देखा, मुस्कुराये और पूछा, “आज विजय किस की होगी?” “लक्ष्मी जी की”, ब्राह्मण ने उत्तर दिया। 

“अरे ब्राह्मण, तूने ये क्या बोल दिया? धन-धान्य तो लक्ष्मी के पास होता है। वो जब जब तुम्हारी भविष्यवाणी से विजयी हुई, उसने तुम्हें पुरस्कार में कुछ ना कुछ दिया। परन्तु मेरे पास तो तुम्हें देने के लिये कुछ भी नहीं है।“

इस बार विजयी लक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर, ब्राह्मण के हाथ भण्डारे की चाबियाँ थमा दीं और कहा, “जो चाहे, जितना चाहे ले जाओ”। लक्ष्मी जी की कृपा से गदगद ब्राह्मण भण्डारा खोल रत्न, आभूषण और अन्य द्रव्य की गाँठे बनाने व्यस्त हो गया। जब मन भर गया तो देखा कि उसने प्रचुर मात्रा में धन-धान्य एकत्रित कर लिया है, दौड़ कर भवन के बाहर गया तो वहाँ एक गाड़ीवान को खड़ा पाया। अपने घर तक सामान लेजाने के लिये भाड़ा तय किया, गाड़ी में माल लादा, लक्ष्मी जी को भण्डारे की चाबियाँ लौटाई और उनसे विदा ले कूद कर गाड़ी में बैठा।गाड़ीवान को तेज़ी से घर पहुँचाने का निर्देश देकर सुस्ताने लगा और गहरी नींद सो गया। 

गाड़ी जैसे ही जंगल के पार हुई, अचानक एक भीषण बवण्डर ने गाड़ी को मार्ग से भटका दिया। ब्राह्मण उछल कर गाड़ी से दूर जा गिरा, चारों तरफ़ सिर्फ़ घनी धूल, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। काफ़ी देर बाद जब बवण्डर थमा, तो ब्राह्मण उठा और गाड़ीवान को पुकारा पर कोई उत्तर नहीं मिला। इधर-उधर ढूँढा, पर गाड़ी और गाड़ीवान का नामोंनिशान नहीं था। ब्राह्मण ये सोच कर कि मुझे आसपास ना पाकर शायद गाड़ीवान मेरे घर की और चल पड़ा हो, वो तेज कदमों से, क़रीब क़रीब भागते भागते अपने घर की ओर चल पड़ा। 

हाँफते हाँफते गला सूख गया था। घर के बाहर पत्नी को देखते ही पूछा, क्या यहाँ कोई गाड़ीवान आया था? क्या कोई सामान उतार गया? 

पहली बार पत्नी क्रोधित नहीं हुई अपितु चिंतित हुई, पति को शान्त होने को कहा, घर के भीतर ले जाकर बिठाया, पानी पिलाया और प्यार से पूछा, “तुम रोज़ सवेरे तैयार होकर मुँह अँधेरे ही घर से, मुझे बिना कुछ बताये, मुँह फुला कर निकल जाते हो। मुझे ज्ञात है कि बहुत चिन्तित हो, पर तुम्हारी पत्नी हूँ, रोज़ कहाँ जाते हो, क्या करते हो, कुछ तो बताओ। 

रुआंसे गले से ब्राह्मण ने सारी बात पत्नी को विस्तार से बता दी। ब्राह्मणी बोली, “कोई बात नहीं, जो होना था सो हो गया। इस बार जाओ तो कहना, नारायण जी जीतेंगे”। “अब कुछ खाओ और सो जाओ”। 

अगले दिन सवेरे, अन्य दिनों की तरह ब्राह्मण नहा-धो, तिलक वस्त्र धारण कर चला और जा पहुँचा चौपड़ खेलते लक्ष्मी-नारायण के समक्ष। इस बार नारायण ने फिर पूछा, “बताइए ब्राह्मण देव, इस बार कौन विजयी होगा?”

“भगवन, आप”, ब्राह्मण ने पत्नी की बात मान उत्तर दिया। हालाँकि उसका मन लक्ष्मी जी को विजयी कहने को हो रहा था। 

नारायण विजयी हुए ज़ोर से खिलखिला कर हँसे और ब्राह्मण की ओर उन्मुख होकर बोले, “अरे ब्राह्मण, तूने ये क्या बोल दिया? धन-धान्य तो लक्ष्मी के पास होता है। वो जब जब तुम्हारी भविष्यवाणी से विजयी हुई, उसने तुम्हें पुरस्कार में कुछ ना कुछ दिया। परन्तु मेरे पास तो तुम्हें देने के लिये कुछ भी नहीं है। अगर कहते की लक्ष्मी विजयी होंगी, तो वे निश्चय ही विजयी होतीं और आज भी तुम्हें पुरस्कार मिलता। तुम्हें तो आज ख़ाली हाथ ही लौटना होगा। इस पर लक्ष्मी बोलीं, “नहीं, ब्राह्मण का अनुग्रह है जिसने तुम्हें विजय दिलाई। तुम्हें उसे कुछ ना कुछ देकर पुरस्कृत तो करना ही होगा”। 

लक्ष्मी की बात सुन नारायण उठे, पास के एक कक्ष के भीतर गये, ताम्बे का एक पुराना पात्र और एक पुरानी चादर लाये और ब्राह्मण को देते हुए बोले, “मेरे पास तो बस इतना ही है पुरस्कार में देने के लिये”। 

ब्राह्मण ने खिन्न मन से पुरस्कार स्वीकार किया, मन ही मन अपने भाग्य को कोसा और विदा लेने को हाथ जोड़े। तभी नारायण बोले, “इस ताम्बे के पात्र से रास्ते में जो पहली खाने की वस्तु मिले, ख़रीद लेना और घर ले जाना, रास्ते में फेंक मत देना”। 

“जैसी आपकी आज्ञा” कह कर ब्राह्मण ने विदा ली। दुःखी मन से घर जा रहा था, कि कानों ने आवाज़ पड़ी, “मछली लो, मछली लो, ताजी मछली लो”। 

अरे बाप रे, ये क्या, पहली खाने की वस्तु, वह भी मछली? नारायण का आदेश ना मानूँ तो देव अवज्ञा का पाप लगेगा, मानूँ तो पत्नी का क्रोध। क्या करूँ?’ बड़े असमंजस में पड़ गया। अंत में साहस जुटा कर मछली ख़रीद ली। मछली वाला बोला, “भाई आपका धन्यवाद। आज जाल में एक ही मछली आई थी, बहुत बड़ी है, और मुझे भय था कि इतनी बड़ी मछली ख़रीदेगा कौन। पर आपने मेरी चिन्ता दूर कर दी”। 

ब्राह्मण ने मछली को चादर में लपेटा और डरता डरता घर पहुँचा। उसके बच्चे घर के बाहर खेल रहे थे। पिता के काँधे पर कोई भारी सी पोटली देख ख़ुशी से चिल्लाए और बोले, “माँ, माँ, देखो। आज तो पिताजी कोई अच्छी सी खाने की सामग्री लाये हैं”। 

इस कथा का सार यह है कि ख़ुशी (लक्ष्मी) वहीं है जहाँ ईशकृपा (नारायण) हों।

ब्राह्मण ने डरते डरते पोटली पत्नी के हाथ थमाई, प्रसन्न मन से जैसे ही उसने पोटली खोली, उसकी आँखों से चिनगारियाँ बरसने लगीं। “तू पति है या शत्रु? भूल गया कि हम कौन हैं? घर में मछली ले आया? गाँव में किसी ने देख लिया होता तो गाँव ही छोड़ना पड़ता”। ब्राह्मणी ने तुरंत चादर सहित मछली को उठाया और आँगन के पीछे की दीवार के पार फेंकने हाथ ऊपर किये ही थे कि मछली का मुँह खुला और उसने कोई चीज़ आँगन में गिरी। 

“सोने का कंगन!”, चकित ब्राह्मणी बोल पड़ी। ब्राह्मण दौड़ा हुआ आया, कंगन को देखा और उसकी चीख निकल गयी, “अरे, ये तो वही कंगन है जो लक्ष्मीजी ने मुझे पुरस्कार में दिया था”। पति-पत्नी अवाक, एक दूसरे को देख, भगवान का धन्यवाद देने दोनों ने एक साथ हाथ जोड़ आकाश की ओर देखा की अचानक आँगन में फिर कुछ गिरा। देखा तो लक्ष्मीजी का हार और आकाश में उड़ती हुई चील। 

अभी मन सम्भाल ही नहीं पाये थे कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। देखा तो ग्लानि से भरी पड़ोसन; बोली, “बहन, उस दिन चूल्हे में आग लेने आई थी, वहाँ ये आभूषण मिले, मन डोल गया सो उठा ले गई। ये तो तुम्हारे हैं, मेरे किस काम के”, कह कर सारे आभूषण लौटा गई। 

पति-पत्नी अचम्भित, उनका मुँह खुला का खुला रह गया, शब्द नहीं निकल रहे थे। अचानक इतना सारा धन! ये तो एक स्वप्न सा लगने लगा, तभी दरवाज़े पर एक और दस्तक हुई। दरवाज़ा खोला तो सामने गाड़ीवान खड़ा था। हाथ जोड़ करके बोला, “आपका सामान लाने में जो विलम्ब हुआ, उसके लिये क्षमा चाहता हूँ। क्या सारा सामान यहीं दालान में रख दूँ”। 

देखते ही देखते सारा घर धन-धान्य से भर गया, ब्राह्मण की दरिद्रता का अंत हुआ। पति-पत्नी की अश्रुधारायें रुकने का नाम नहीं ले रही थी और ज़बान लक्ष्मी-नारायण का धन्यवाद करते। 

आख़िर कैसे ना होता? लक्ष्मी और नारायण एक दूसरे के पूरक हैं, और जहाँ नारायण नहीं, वहाँ लक्ष्मी अकेले निवास नहीं करती। वो ताम्र पात्र ब्राह्मण के घर नारायण के आगमन का सूचक था। वे आये और साथ ही ब्राह्मण से रूठ कर चली गई लक्ष्मी को साथ ले आये। 

इस कथा का सार यह है कि ख़ुशी (लक्ष्मी) वहीं है जहाँ ईशकृपा (नारायण) हों।

इति शुभम। 

Published by Vrikshamandir

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2 thoughts on “दिव्य कृपा

  1. इति श्री। आंतिम अध्याय समाप्त …….
    और फिर इस तरह ब्राह्मण परिवार बाकी जीवन लक्ष्मी-नारायण की कृपा से सुख शांति से रहे ।।

    Very nice narration. These stories have disappeared with time as the fasts and related rituals. Prasadam was the ONLY attractions for kids, but in the process lot may good things were imbibed.
    Gone are the days ….. won’t come back.

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