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Theme 2
अपनी क्षमताओं में निपुणता प्राप्त करना
Text and Meaning shloka 1-6







Theme 2 Shloka 1


सेंटरिग (केंद्रीकरण)
कैसा लग रहा है ? एक्सरसाइज़ करने में आनंद आया न । अब हम सेंटरिग यानि अपने केंद्र से जुड़ने के लिये एक क्रिया करेंगे फिर एक सामूहिक प्रार्थना और फिर एक कहानी और श्लोकों का पाठ और अर्थ जिससे हमें गीता में अर्जुन को श्री कृष्ण द्वारा दिये उँपदेशों के माध्यम से अपनी क्षमताओं में निपुणता कैसे पायें इस विषय पर सीखने को मिलेगा।
आराम से बैठें, धीरे से और कोमलता से अपनी आँखें बंद करें । अपने हृदय में स्वयं को केंद्रित करें।
सुबह के ध्यान की स्थिति को पुनः स्मरण करने का प्रयास करें ।आइये हम सभी एक-दूसरे से और अपने महान दिव्य मालिक से जुड़ाव महसूस करें।
हम मालिक के उस भविष्य के समाज के स्वप्न की कल्पना करें जहाँ नैतिक मूल्य स्थापित हो चुके हैं ।
यह एक ऐसा समाज है जहाँ वरिष्ठजन गीता के आध्यात्मिक ज्ञान को बच्चों और आने वाली पीढ़ियों तक स्वाभाविक रूप से पहुँचा रहे हैं।गीता की शिक्षाओं को आत्मसात करने वाले बच्चे, वरिष्ठजनों के प्रति प्रेम और सम्मान से भर जाते हैं और एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीते हैं।
गुरुदेव का विजडम ब्रिज गीतोपदेश के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक बना रहा है। आइए हम सभी मालिक के इस विज़न को पूरा करने के इन्सट्रूमेन्ट(साधन )बनने का संकल्प लें।
धीरे से अपनी आँखें खोलें
प्रार्थना
ॐ सह नाववतु । सह नाौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शांति शांति शांति: ।
ईश्वर हमारी रक्षा करें, हमारा पोषण करे। हम दोनों पूर्ण शक्ति के साथ काम करें। हम दोनों तेजस्वी दिव्य ज्ञान प्राप्त करें । हम दोनों में कभी द्वेष न हो । ॐ शांति शांति शांति: ।
सर्वत्र शांति रहे ।
आज की सीख: शरीर और आत्मा का रहस्य
हमने आज क्या समझा?
श्रीकृष्ण ने शरीर को ‘क्षेत्र’ कहा है। यह पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), दस इंद्रियां – पांच ज्ञानेंद्रियां जैसे कान, आंखें, नाक, जिह्वा और त्वचा ; पांच कर्मेंद्रियां जैसे हाथ (पाणि), पैर (पाद), वाणी (मुँह), गुदा (पायु), और जननांग (उपस्थ/लिंग), पांच इंद्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध), अहंकार (मैं-ममत्व का भाव), बुद्धि (विचार करने की शक्ति) और मूल प्रकृति (अव्यक्त या अदृश्य ऊर्जा , आत्मा) साथ ही, मन और – ये सब शरीर (क्षेत्र) के मुख्य भाग हैं।इसके अलावा हममे भावना (इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, जागरूकता, धैर्य), भी होता है। है। लेकिन आत्मा (क्षेत्रज्ञ) अलग बैठकर सब देखती है। यह हमें सीमाओं से ऊपर उठाकर सच्ची सफलता देती है।
मुख्य सीख: सोचना, करना या महसूस करना—ये क्षमताएं शरीर-मन से आती हैं। लेकिन बिना लगाव के इन्हें काबू करने से हम निपुण बनते हैं।
कैसे इस्तेमाल करें?
1. फोकस बढ़ाएं: मन भटके तो इसे शरीर का अस्थायी गुण समझें। उदाहरण: पढ़ाई में फोन बंद रखें, जैसे खिलाड़ी शोर नजरअंदाज कर मैच जीतता है।
2. बेहतर फैसले लें: इच्छा-घृणा से ऊपर उठें। उदाहरण: परीक्षा में दोस्तों से जलन न करें या डर से चोरी न करें—शांत रहें, जैसे शतरंज खिलाड़ी हार-जीत भूलकर चाल चलता है।
3. धैर्य बनाएं: दर्द-सुख को अस्थायी जानें। उदाहरण: जिम में थकान सहें सोचकर “यह टिकेगा नहीं”, जैसे पर्वतारोही तूफान पार कर चोटी चढ़ता है।
इन तत्वों पर सोचने और सही इस्तेमाल से हम अपनी ताकत जानते हैं और उसे निखारते हैं।अपनी क्षमताओं में निपुणता पाते हैं।
भगवद्गीता अध्याय 13 के श्लोक 5 और 6 का सरल हिंदी में अर्थ
भगवद्गीता का 13वां अध्याय “क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग” है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के बारे में बताते हैं। श्लोक 5 और 6 में शरीर के विभिन्न अंगों और गुणों का वर्णन है, जो हमें समझाता है कि हमारा शरीर और मन कैसे बने हैं। यह ज्ञान हमें अपनी सीमाओं को समझने और आत्मा को ऊपर उठाने में मदद करता है।
श्लोक 5:
संस्कृत:
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
सरल हिंदी अर्थ:
पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार (मैं-ममत्व का भाव), बुद्धि (विचार करने की शक्ति) और मूल प्रकृति (अव्यक्त या अदृश्य ऊर्जा)। साथ ही दस इंद्रियां – पांच ज्ञानेंद्रियां जैसे कान, आंखें, नाक, जिह्वा और त्वचा ; पांच कर्मेंद्रियां जैसे हाथ (पाणि), पैर (पाद), वाणी (मुँह), गुदा (पायु), और जननांग (उपस्थ/लिंग) , एक मन और पांच इंद्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) – ये सब शरीर (क्षेत्र) के मुख्य भाग हैं। कुल चौबीस ।
यह श्लोक बताता है कि हमारा शरीर प्रकृति के तत्वों, मन और इंद्रियों से बना है, जो सब बाहरी दुनिया से जुड़े हैं।
श्लोक 6:
संस्कृत:
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥
सरल हिंदी अर्थ:
इच्छा (कामना), द्वेष (घृणा), सुख (खुशी), दुःख (पीड़ा), शरीर का संयोग (सबका मेल), चेतना (जागरूकता) और धृति (धैर्य या स्थिरता) – इन्हें संक्षेप में विकारों (गुणों या परिवर्तनों) सहित क्षेत्र (शरीर) कहा गया है।
यह श्लोक शरीर के भावनात्मक और मानसिक गुणों को जोड़ता है, जो बदलते रहते हैं और हमें बांधे रखते हैं। कुल मिलाकर, ये श्लोक बताते हैं कि शरीर एक खेत की तरह है, जिसमें ये बीज (तत्व) बोए जाते हैं, लेकिन सच्चा जानकार (आत्मा) इनसे अलग है।
इस शिक्षा को अपनी क्षमताओं को निपुण बनाने में कैसे उपयोग करें? (उदाहरण सहित)
ये श्लोक हमें सिखाते हैं कि हमारी क्षमताएं (जैसे सोचने, करने या महसूस करने की शक्ति) शरीर और मन के इन तत्वों पर निर्भर हैं, लेकिन आत्मा इनसे ऊपर है। अगर हम इन तत्वों को समझ लें, तो हम इन्हें नियंत्रित करके अपनी स्किल्स को मजबूत बना सकते हैं। मतलब, बिना आसक्ति के काम करें, तो क्षमताएं तेज होती हैं। यहां कुछ सरल उदाहरण हैं:
1. इंद्रियों और मन को नियंत्रित करके फोकस बढ़ाएं:
श्लोक 5 में इंद्रियों और मन का जिक्र है। अगर आप विद्यार्थी हैं और पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकता है (जैसे फोन की वजह से), तो समझें कि ये इंद्रियां “क्षेत्र” का हिस्सा हैं। रोज कुछ ऐसा करें, जहां आप इंद्रियों को शांत रखें। उदाहरण के लिये परीक्षा की तैयारी में, फोन को दूर रखकर सिर्फ किताब पर ,पढ़ने पर, फोकस करें। इससे एकाग्रता की क्षमता बढ़ेगी। पढ़ाई के विषय मे निपुणता प्राप्त होगी और परीक्षा में सफलता, वैसे ही जैसे कोई खिलाड़ी ट्रेनिंग में distractions ( ध्यान का भटकाव) हटाकर, निपुण हो खेल में जीत हासिल करता है।
2. इच्छा-द्वेष को संतुलित करके निर्णय लेने की स्किल सुधारें:
श्लोक 6 में इच्छा और द्वेष बताए गए हैं, जो हमें गलत रास्ते पर ले जाते हैं। अगर आप परीक्षा में केवल पास होने के बारे में ही सोचते हैं पढ़ाई में ध्यान न दे कर केवल इच्छा से सफल होना चाहते हैं और असफलता से हार मान लेते हैं और जो सहपाठी अपनी मेहनत से पास हो जाता है उससे द्वेष करते हैं , तो इसे समझें कि ये शरीर के विकार हैं। निर्णय लेने की क्षमता को मज़बूत करने के लिये इच्छा और द्वेष दोनों विकारों से ऊपर उठना होगा। वैसे ही जैसे कोई निपुण शतरंज का खिलाड़ी भावनाओं को स्थिर कर चाल चलता है।
3. सुख-दुःख को पार करके सहनशक्ति बढ़ाएं:
सुख-दुःख शरीर के गुण हैं। अगर आप कसरत या कोई नई स्किल सीखते समय थकान या ऊब से रुक जाते हैं, तो याद रखें कि धृति (धैर्य) भी क्षेत्र का हिस्सा है, लेकिन आत्मा इससे परे है। उदाहरण: कसरत करने जाते समय, “यह दुःख अस्थायी है, मैं इसे पार कर सकता हूं” ऐसा सोचें। इससे आपकी शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति निपुण बनेगी, वैसे ही जैसे कोई माउंटेनियर चोटी पर पहुंचने के लिए दर्द सहता है।
इस तरह, ये श्लोक हमें “देखने वाले” (आत्मा) बनने की प्रेरणा देते हैं, जिससे हम अपनी क्षमताओं को बिना बंधन के निखार सकें। रोज इनका चिंतन करें, तो जीवन में संतुलन आएगा।







