Raag Darbari 2021

My Twitter handle goes by the name Vaidyaji (वैद्यजी).

Actually, Vaidyaji is the name of the main character in Raag Darbari a satirical Hindi novel by Shri Lal Shukla. I am not alone in operating under the name of a character from Raag Darbari. There are many Twitteratis like me who have handles using the names of characters of Raag Darbari. Since the story of Raag Darbari is about Shivpalganj, most of the characters call themselves Ganjha.

No one knows if it is because of “ganj” as in Shivpalganj or because of freely available bhang and ganja in the area in and around Shivpalganj. Anyway to be called a Ganjha is considered as a badge of honour.

Shrilal Shukla defines the word “Ganjha” in his inimitable style.

“कोई किसी गँजहा से दो रुपये तो क्या, दो कौड़ी भी ऐंठ ले तो जानें।’’ ‘गँजहा’ शब्द रंगनाथ के लिए नया नहीं था। यह एक तकनीकी शब्द था जिसे शिवपालगंजके रहनेवाले अपने लिए सम्मानसूचक पद की तरह इस्तेमाल करते थे। आसपास के गाँवों में भी बहुत–से शान्ति के पुजारी मौक़ा पड़ने पर धीरे–से कहते थे, ‘‘तुमइसके मुँह न लगो। तुम जानते नहीं हो, यह साला गँजहा है।’’

We have Twitter handles that go by the name of Rangnath, Badri Pahlwan, Ruppan, Chhote Lal, Principle Saheb, Langad, Jagnath, Thakur Doorbeen Singh, Ramadheen Bheekham Khedvi, Daroga ji and Vaidyaji’s man Friday Saneechar are all to be found on Twitter.

There is one Twitter handle that goes by the name Raag Darbari too.

Actually the suggestion to have my Twitter name as Vaidyaji came from another character from Raag Darbari, Ramadheen Bhikhamlhedvi who is opposed to Vaidya ji.

We have lot of fun commenting on the current state of affairs both in political circles and the society at large from our perspective,very often, quoting verbatim or in a somewhat modified form how that character would have perceived the current events.

Raag Darbari was published in 1968, the year I started my regular full time job at NDDB. Raag Darbari got Sahitya Academy Award in 1969. I first bought a copy of this satirical novel some time in 1973 or 1974. After that I have purchased many copies some lost, others taken by friends who decided to keep it for good or misplaced it. I have a copy of this book in Gurgaon, at Vrikshamandir in my village and also here in Toronto. I also have it on Kindle.

I had English translation of the book by Gillian Wright but did not like it much as the subtle humour of narratives in original local colloquial Hindi has not come out right from.

For the benefit of readers who may not have read the book and not aware of plot of the book please click on the Wikipedia page of Raag Darbari and Indiannovelscollective.com

This NDTV video gives a glimpse of one of the issues touched upon in the narrative of Raag Darbari; Education. Ravish ji being Ravish and a reputed and committed TV anchor too has taken a pot shot on education by bringing out the current state of affairs in a college where Rajnath Singh ji was once a teacher.

Be that as it may, this is what Raag Darbari has to say on state of education in India written in 1968 and that holds true today as well.

वर्तमान शिक्षा–पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।

Raag Darbari brings out failing values in post independence Indian society, the helplessness of the intellectuals (no they will not admit it) in understanding the complexities of Indian society.


Raag Darbari is a classic (in Hindi कालजयी) written some 42 years ago, is relevant in current times as well.

I was moved to write this blog because of an incident that took place yesterday in Baghpat, Uttar Pradesh and which went viral on social media. 

After a log time I had such a hearty laugh. Even now while typing these lines I am laughing out loud.

https://twitter.com/anjiotrip/status/1363829579601747968?s=21

There are other videos too with music of 70’s. and 90’s played during fight scenes of Bollywood films. The readers comments were as funny as the video clips.

The following video is a statement by the police on the actual incident. The incident took place in Bagapat.


Watching these videos and reading the comments reminded me of scenes from Raag Darbari. Only the locale and time has changed. Raag Darbari was written in 1960’s and the story was about a village Shivpalganj. Current episode is from Baghapat.

I would be sharing below screen shots of comments given by some Twitter handles.

But before that a tweet which looks back at yesterday’s event.


Now that the police has acted, social media has made the news viral but will there be justice which deters people from engaging in such behaviour? And what is justice? 

 For those who indulged in the street fight it was an existential fight. For media both main stream and social media it was an occasion to get TRP and eyeballs. For casual watchers like me  it was fun and mirth at the cost of others. For the intellectuals who comment on every thing , since it was neither a  Hindu vs Muslim or Savarna versus Dalit fight it did not matter. 

 

“रंगनाथ ने कहा, क्यों ? गाँव–पंचायत तो है। उसने कहा कि हाँ, पंचायत तो है, पर वह सिर्फ़ जुर्माना करती है। ज़मींदार था तो जूता लगाता था : उसने समझाया कि हिन्दुस्तान साला भेड़ियाधँसान मुल्क है। बिना जूते के काम नहीं चलता। ज़मींदारी टूट गई है, जूता चलना बन्द हो गया है, तो देखो, सरकार को खुद जूतमपैज़ार करना पड़ता है। रोज़ कहीं–न–कहीं लाठी या गोली चलवानी पड़ती है। कोई करे भी तो क्या करे ? ये लात के देवता हैं; बातों से नहीं मानते। सरकार को भी अब ज़मींदारी तोड़ने पर मालूम हो गया है कि यहाँ असली चीज़ कोई है तो जूता। रंगनाथ ने कहा कि यह भी कोई बात हुई, जूते के सहारे लोगों को कब तक तमीज़ सिखायी जाएगी। उस आदमी ने कहा कि जूता तो चलते ही रहना चाहिए, जब तक बदमाश की खोपड़ी पर एक भी बाल रहे, जूते का चलना बन्द नहीं होना चाहिए।”
 ~ राग दरबारी 

Before I end here are some quotes from Raag Darbari on the legal system in our country.

 

“तो रंगनाथ बाबू, इसको कहते हैं कौड़िल्ला–छाप इन्साफ़। दिहातियों को ऐसा ही समझा जाता है। ओछी नस्ल के आदमी। उन्हें और क्या चाहिए ? चले जाओ पंचायत अदालत में और कौड़िल्ला–छाप इन्साफ़ लेकर लौट आओ। ‘‘और जो बड़े आदमी हैं। रईस–वईस, हाकिम–हुक्काम, ऊँची नस्ल के लोग, उनके लिए कीमती इन्साफ़ चाहिए ? घास खोदनेवाले सरपंच नहीं, मोटा चश्मा लगानेवाले, अंग्रेज़ों जैसी अंग्रेज़ी बोलनेवाले जज।

तो बड़े आदमियों के लिए ज़िलों की बड़ी–बड़ी अदालतें हैं। जैसी चाहें, वैसी अदालत मौजूद है। ‘‘उनसे भी बड़े लोगों के लिए बड़े–बड़े हाईकोर्ट हैं। सबसे ऊँची नस्लवालों के लिए सुप्रीम कोर्ट। किसी ने आँख तरेरकर देख लिया तो उसी बात पर सीधे दिल्ली जाकर एक रिट ठोंक दी। ‘‘कौड़िल्ला–छापवाला, ओछी नस्ल का आदमी, वहाँ एक बार फँस जाय तो समझ लो, बैठकर उठ न पाएगा। दाने–दाने को मोहताज हो जाएगा। ‘‘हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट की शौकीनी सबके बूते की बात है ? एक–एक वकील करने में सौ–सौ रण्डी पालने का ख़र्च है। ‘‘तभी तो दिहातियों के लिए कौड़िल्ला–छाप इन्साफ़ का इन्तज़ाम हुआ है। न हर्रा लगे न फिटकरी, रंग चढ़ा भरपूर। एक खुराक ले लो, बुखार उतर जाएगा। अपने देश का कानून बहुत पक्का है, जैसा आदमी वैसी अदालत।’’ वे अचानक अवधी पर उतरे और बोले, ‘‘जइस पसु, तइस बँधना।’’

 


 

 

2 thoughts on “Raag Darbari 2021

  1. शैल बाबू,
    आप को याद हो तो हमने आपके ” वैद्य जी ” को पहचान लिया था ।। Twitter के सभी characters ऐसा लगता है जैसे एक दुसरे को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं और वहीं शिवपाल गंज में ही रहते हैं ।।
    बहुत पहले हमने भी राग दरबारी पढने की कोशिश की थी पर अपने ऊपर से चली गई …. बहुत गूढ़ है ।।
    नमस्कार ।

    • तुम मँझोली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फँस गए हो। तुम्हारे चारों ओर कीचड़–ही–कीचड़ है। कीचड़ की चापलूसी मत करो। इस मुग़ालते में न रहो कि कीचड़ से कमल पैदा होता है। कीचड़ में कीचड़ ही पनपता है। वही फैलता है, वही उछलता है। कीचड़ से बचो। यह जगह छोड़ो। यहाँ से पलायन करो। वहाँ, जहाँ की रंगीन तसवीरें तुमने ‘लुक’ और ‘लाइफ़’ में खोजकर देखी हैं; जहाँ के फूलों के मुकुट, गिटार और लड़कियाँ तुम्हारी आत्मा को हमेशा नये अन्वेषणों के लिए ललकारती हैं; जहाँ की हवा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, जहाँ रविशंकर–छाप संगीत और महर्षि-योगी-छाप अध्यात्म की चिरन्तन स्वप्निलता है…। जाकर कहीं छिप जाओ। यहाँ से पलायन करो। यह जगह छोड़ो। नौजवान डॉक्टरों की तरह, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के लिए हुड़कनेवाले मनीषियों की तरह, जिनका चौबीस घण्टे यही रोना है कि वहाँ सबने मिलकर उन्हें सुखी नहीं बनाया, पलायन करो। यहाँ के झंझटों में मत फँसो। अगर तुम्हारी किस्मत ही फूटी हो, और तुम्हें यहीं रहना पड़े तो अलग से अपनी एक हवाई दुनिया बना लो। उस दुनिया में रहो जिसमें बहुत–से बुद्धिजीवी आँख मूँदकर पड़े हैं। होटलों और क्लबों में। शराबखानों और कहवाघरों में, चण्डीगढ़–भोपाल–बंगलौर के नवनिर्मित भवनों में, पहाड़ी आरामगाहों में, जहाँ कभी न खत्म होनेवाले सेमिनार चल रहे हैं। विदेशी मदद से बने हुए नये–नये शोध–संस्थानों में, जिनमें भारतीय प्रतिभा का निर्माण हो रहा है। चुरुट के धुएँ, चमकीली जैकेटवाली किताब और ग़लत, किन्तु अनिवार्य अंग्रेज़ी की धुन्धवाले विश्वविद्यालयों में। वहीं कहीं जाकर जम जाओ, फिर वहीं जमे रहो। यह न कर सको तो अतीत में जाकर छिप जाओ। कणाद, पतंजलि, गौतम में, अजन्ता, एलोरा, ऐलिफ़ेंटा में, कोणार्क और खजुराहो में, शाल–भजिका–सुर–सुन्दरी–अलसकन्या के स्तनों में, जप-तप-मन्त्र में, सन्त-समागम-ज्योतिष-सामुद्रिक में–जहाँ भी जगह मिले, जाकर छिप रहो। भागो, भागो, भागो। यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा है।- राग दरबारी का पलायन संगीत

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