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जगन्नाथ काका और “मैं”



गली के मोड़ पर चबूतरे पर जगन्नाथ काका पालथी मारे बैठे रहते हैं । बैठे हैं, और देख रहे हैं ।

मैं पूछता हूँ “काका, क्या कर रहे हैं ?”

जवाब देते हैं, “बैठे हैं ।”

सुबह पूछता हूँ, तो बैठे हैं ।

दोपहर को पूछता हूँ, तो बैठे हैं ।

शाम को पूछता हूँ, तो बैठे हैं । “

और काका, क्या हाल हैं ?”

“कुछ नहीं, बैठे हैं ।”

आज मैंने सवाल बदला— “कहिए काका, बैठे हैं क्या ?”

वे बोले, “भैया और क्या करें ?”

मैं क्या बताता कि और क्या करें । मैंने कहा, “आप ही सोचिए कि क्या करें ।”

उन्होंने जवाब दिया, “सब सोच लिया । कुछ करो, तो आधे अच्छे काम होते हैं और आधे बुरे । कुछ नहीं करने से कोई बुरा काम नहीं होता । बुरा करने से यही अच्छा है कि बैठे-बैठे अच्छा सोचा करो ।”

~~~~ हरिशंकरपरसाईलिखित “निठल्लेकीडायरी “ से साभार


मेरी परसाई जी से कभी मुलाक़ात न हुई। वह अब न रहे। मैं रह गया। अगर समय से मुलाक़ात हो गई होती परसाई जी अपनी “ निठ्ठले की डायरी” मे जगन्नाथ काका की जगह हो सकता है मेरा नाम लिख देते। क्योंकि मै भी अब जगन्नाथ काका जैसा बन गया हूँ। यदि जीवित रहा तो अपने जीवन के नब्बेवें दशक में प्रवेश कर चुका हूँ और अब तो अक्सर बैठे बैठे केवल अच्छा ही सोचता हूँ।

“अति” वरिष्ठ नागरिकों यानि बुढ्ढों की सोच करने और निर्णय करने के तरीक़े कई प्रकार के होते है। विषय के अनुसार वह कभी बड़े दृढ़निश्चयी लगते हैं तो कभी ढुल-मुल।

माना कि , जब तक सोच रहा हूँ तब तक मैं हूँ। पर जब सोता हूँ , सपने देंखता हूँ तब क्या मैं नहीं और कोई होता है ? फिर ध्यान में जब कुछ क्षणों की की को ही सही जो विचार शून्यता की अवस्था कभी आ जाती है तब में कौन होता है। मैं या कोई और? मज़ा तो तब आने लगता है जब सोचता हूँ कि मैं हूँ कौन ?

मैं हूँ या नहीं हूँ सुनने में तो आसान है पर सोचो तो बड़ा विकट प्रश्न है । इस मामले में मै कुछ निर्णय नहीं कर पाता हूँ अत: ढुल-मुल ही कहाँ जाऊँगा।

क्योंकि मैं हूँ या नहीं से पहले सवाल उठता है “मैं कौन हूँ”।

“मैं कौन हूँ” सोचते सोचते विचार आया कि जीवन में बहुत सी चीज़ें जो मैंने सोची थी कर नहीं पाया ।ग्लानि भाव बेतहाशा बढ़ने लगा। ध्यान बंटा कर तुरंत अच्छा सोचने लगा। “मैं कौन हूँ” सोचने के लिये अच्छा विषय लगा । फिर बैठे बैठे यही सोचने लगा।

कहीं से मन के कानों में एक आवाज़ गूंजी “तू कौन है बे?” मैं भौंचक्का हो गया, अपने को सँभाल कर जबाब दिया “मै आदमी हूँ “

“वह तो देख रहा हूँ । पर आदमी तो अरबों है इस दुनिया में। तू कौन है ?”

“मैं फलाने हूँ”

“वह तो तेरा नाम है रे चपडगंजू”

“ढेकाने और ढिकानी का बेटा हूँ”

“बेटा है अच्छी बात है। पर दुनिया तो भरी पड़ी है , बेटा बेटियों से। तू कौन है ?”

स्वंय से स्वयं की यह बातचीत काफ़ी देर चली पर अंतहीन रही। अपमानित हो कर भी उसी अंदाज मे उत्तर न देने पर मुझे आश्चर्य हुआ।

क्या हो गया है ? अपुन के जीवन का संध्याकाल है। जीवन मरण की आँख मिचौली खेलते यम के दूत भी कहीं दूर क्षितिज पर ध्वजा लिये कभी कभार दृष्टिगोचर हो जाते हैं। फिर न जाने कहाँ ग़ायब हो जाते हैं।

शायद अपुन को अपुन के जीवन की अनित्यता का आत्मबोध होने लगा है।क्या यही कारण है मुझसे से केवल मेरा अपना बड़प्पन ही उत्तर दिलवा रहा था?

इसी उहापोह में अचानक परसाई जी की निठल्ले की डायरी के जगन्नाथ काका की याद आ गई। मुझे लगा मै भी जगन्नाथ काका की तरह अच्छा सोच रहा हूँ। मुझे अपने पर गर्व होने लगा । आख़िर बदतमीज़ी से बतिआने वाले को मैंने बहुत संयम तरीक़े से जबाब देता रहा। वह मुझे उकसाता रहा पर मुझे ग़ुस्सा आया ही नही। गर्व होने लगा अपुन को अपुन पर ।

पर गर्व होना भी तो कोई अच्छी बात नही ।इसलिये किसी तरह गर्व के उस भाव को रोक मै यह सोचने लग गया कि और कौन सी और अच्छी बात है जो मै सोचूँ ।

फिर गांव पर बचपन में सुनी पर अब तक न भूली दो चार लाइनें याद आ गईं। “चार गो चोर चौबिस गो हमनी के, मरलें चोर भगलीं हमनी के” !

बस फिर क्या था गर्व काफूर हुआ । हमें लगने लगा कुछ समय का हमारी गर्व जनित आत्ममुग्धता नाजायज थी । वास्तव में उस बदतमीज़ से हुई अंतहीन बातचीत में कोई निष्कर्ष न निकल पा रहा था इस लिये हम पतली गली से खिसक लिये थे। अपने से कोई झूठ बोलना बड़ा कठिन काम है।

अच्छी बात की तलाश यहीं रुक गई। “मैं कौन हूँ” का जवाब उस दिन नहीं निकला। काका अपने चबूतरे पर बैठे रहे। मैं भी बैठ गया।

इसके बाद जो चार पुराने वाक्य याद आए, वे इस बात से अलग हैं। उन्हें अलग लिख रहा हूँ।