जगन्नाथ काका और “मैं”
गली के मोड़ पर चबूतरे पर जगन्नाथ काका पालथी मारे बैठे रहते हैं । बैठे हैं, और देख रहे हैं । मैं पूछता हूँ “काका, क्या कर रहे हैं ?” जवाब देते हैं, “बैठे हैं ।” सुबह पूछता हूँ, तो बैठे हैं । दोपहर को पूछता हूँ, तो बैठे हैं । शाम को पूछता हूँ,…
