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वृक्षमंदिर हिंदी मे Culture, Tradition, Human Development and Religion Reminiscences

जगन्नाथ काका और “मैं”

मेरी परसाई जी से कभी मुलाक़ात न हुई। वह अब न रहे। मैं रह गया। अगर समय से मुलाक़ात हो गई होती परसाई जी अपनी “ निठ्ठले की डायरी” मे जगन्नाथ काका की जगह हो सकता है मेरा नाम लिख देते। क्योंकि मै भी अब जगन्नाथ काका जैसा बन गया हूँ। यदि जीवित रहा तो […]