
डॉक्टर प्रेम कुमार श्रीवास्तव, जिन्हें “पीके” के नाम से जाना जाता है,
एनडीडीबी के भूतपूर्व कर्तव्यपालक हैं। बैंगलोर में निवास कर रहे हैं।
उनकी पहचान केवल एक तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारी की नहीं है;
वह “डेयरी व्यवसाय गुरु” के रूप में भी जाने जाते हैं। वह एक
कुशल कंसलटेंट के रूप में अपने ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं।
उम्र के इस पड़ाव पर, “पीके” ने अपने भीतर के कलाकार को भी जगाया है।
शौकिया शायरी और व्यंग्य लेखन में उनकी रुचि ने उन्हें एक
नए आयाम में प्रवेश कराया है। पेश है श्रीवास्तव जी की बतकही से
“बाबू चाचा” पर एक लेख। बाबू चाचा थे या नहीं इस पर
विवाद हो सकता है। व्यंग तो व्यंग है और व्यंग ही रहेगा।
बाबू चाचा रहे हों या हो सकता है न भी रहे हो। क्या फ़र्क़ पड़ता है।
आजकल बिरयानी का प्रचलन बढ़ गया है। शहरों में बिरयानियाँ कई प्रकार की मिलने लगीं हैं। जितना बड़ा शहर उतनी प्रकार की बिरयानियाँ ; जैसे वेज बिरयानी, मशरूम बिरयानी, नॉन-वेज बिरयानी, चिकन बिरयानी, मटन बिरयानी, मिक्स बिरयानी, झींगा बिरयानी, अन्डा बिरयानी, हांडी बिरयानी, किलो बिरयानी, बिना प्याज-लहसुन की बिरयानी, मुग़लई बिरयानी, फलाने दुकान की बिरयानी, फलाने की मशहूर बिरयानी, आदि और जाने क्या क्या नाम की बिरयानियाँ। बहुत हैं, कितनो का नाम लें? परंतु दूर गाँव के बाबू चाचा को बिरयानी की विविधता से क्या लेना देना था भला । उन्हे तो बस ताज़े काले बकरे के अगले दस्त का गोश्त भर मिल जाए! फिर क्या? वो ऐसे मानसिक स्थिति में चले जाते जिसे हम आनंदातिरेक या आत्मविभोर से ऊपर कह सकते हैं । करीब करीब “निर्वाण” की उस स्थिति में, जहाँ पहुँचने के लिए ध्यानी कई वर्षों तक परिश्रम करते हैं, तब जाकर कहीं उस स्थिति को प्राप्त कर पाते हैं।
मैं यहाँ बिरयानी पर तो नहीं पर बाबू चाचा के स्वभाव की विविधता पर जरूर चर्चा करना चाहूँगा। बाबू चाचा कमाल के चाचा थे, गाँव के बहुत सारे चाचाओं में एक अलग प्रकार के चाचा थे । (“थे” इसलिए कि वो तमाम बकरों की कुर्बानियों के सबब बनने के बाद अब जन्नत-नशीन हो गए )। उनके पिता जी उन्हें बड़े प्यार से “बरखुरदार-ए-आज़म” के नाम से परिचय कराया करते थे। बल्कि सही तरह से बताऊँ तो “बरखुद्दार-ए-आज़म, नुरे-चश्म, राहत-जान, जायदादुल-हक़” कहने के बाद तब गहरी सांस लिया करते थे। सब लोग उन्हे बाबू चाचा कहते थे। ये उस समय की बात है जब जमींदारी समाप्त हो चुकी थी (करीब 1950-60) । ये लोग दियारा के एक इलाके, जहाँ अंग्रेज नील की खेती कराया करते थे और किसानों पर अनगिनत ज़ुल्म किया करते थे, जहाँ इन बाबू चाचा के प्रपितामह ने उन जालिम अंग्रेजों के पलायन के बाद उनकी नील कोठी खरीद ली थी और अपने जमींदारी के रोब को बाकायदा बनाए रखा था और वहाँ की रियाया (अधीन जनता) को इससे कोई परेशानी नहीं थी। क्यूंकि उन ग्रामवासियों के पूर्वजों से उन्हे ये “मजबूर-रियाया” का जीन ट्रांसफर हुआ था कि जमींदार जुल्म करता है, तुम्हें सहना ही है।
आप कहेंगे कि भारत में तो जमींदारी सन 1948 में ही खत्म कर दी गई थी, तो जान लीजिए कि बाबू चाचा के इलाके में जमींदारी समापन के 15-20 साल बाद भी जमींदारी की हनक बरकरार चल रही थी। रही होगी कहीं सरकार, परंतु बाबू चाचा के यहाँ उन्हीं लोगों की सरकार चलती थी। जिसे चाहा जो काम पकड़ा दिया, जिसे चाहा बुला लिया, हड़का लिया, मार पिटाई कर दी, जिसे चाहा जो सजा दी, चाहे जिसके यहाँ से बकरे मुर्गे मँगवा लिया, आदि। उनके यहाँ जीवित “पंचिन्ग बैग” की व्यवस्था भी थी। चौकिए नहीं, ये जापानी “पंचिन्ग बैग” नहीं होता था, बल्कि ये उसी गाँव का एक आदमी होता था जो हमेशा जमींदार और उसके लठैतों के साथ साथ रहा करता था । जब कभी भी जमींदार को किसी के ऊपर भी गुस्सा आता था, और वो उसपर अपना गुस्सा पूरी तरह से नहीं उतार पाता था, तो अपना गुस्सा इसी “आदमी” पर उतरता था। उस “आदमी” का काम था चुप चाप सुनना, या मार खा लेना और कुछ न बोलना। बाबू चाचा के यहाँ की भाषा में ये आदमी “लतमरुआ” कहलाता था। ये उस आदमी की एक प्रकार से नौकरी थी, जिसे वो बखूबी निभाता था, जिसके बदले उसे खेत मिला होता था जिसपर उसके घर वाले खेती कर के अपना जीवन यापन करते थे। खैर! तो हम बता रहे थे कि उस गाँव में जमींदार लोगों कि बात सभी मानने को तैयार थे, और बाबू चाचा के घर के लोग मनवाने के लिए। बाबू चाचा जवान थे, अच्छा पहनते ओढ़ते थे, पढ़ने लिखने का कोई ज्यादा शौक उनके खानदान में कभी नहीं रहा था। अपने गाँव-जवार के लिए वे लोग आज भी जमींदार थे और उन्हीं के परिवार से गाँव वालों का गुजर बसर चलता था।

बाबू चाचा की ग़ज़ब की शक्शियत थी। बाबू चाचा के स्वभाव में इतनी ज्यादा विविधताएं थीं कि उसकी चर्चा करना यहाँ आवश्यक है। बेपरवाह रहना, सूट-बूट पहनाना, हमेशा पार्टी के मूड में रहना, शराव, सिगरेट तो कोई खास बात नहीं, कि जिसे बताया जाए। उनके इस विविधता भरे स्वभाव के लिए शायद उनके माता-पिता जिम्मेदार थे, या उनके यहाँ की मान्यताएँ, या शायद चाचा के वो साथी, जो उनके पट्टीदार के बच्चे थे और पहले से ही बिगड़े थे, या शायद इन सभी के सहयोग से बाबू चाचा का स्वभाव इतना अति विशिष्ट बन पाया था । बाबू चाचा इन्हीं परिस्थितियों में पल-बढ़ कर बड़े हो गए थे। अब चाचा को इस बात में महारत हासिल था कि किसी से कैसे उधार लिया जाता है और उसे चुकाये बगैर कैसे शान से जिया जाता है । चाचा कोर्ट कचहरी से तालुक रखते थे और दिमाग गोश्त खाने की वजह से तेज और शातिर था। उधार मांगने वालों को टरकाना बाबू चाचा को बहुत अच्छे से आता था, ज्यादा समय चाचा अपना परिवार अपने साथ नहीं रखते थे। लोग उन लोगों के प्रतिष्ठा से डरते थे और जानते थे कि कोर्ट कचहरी तक जाने से कुछ भी हासिल न होगा। जब कभी बाबू चाचा के पिता जी को “इसकी” जानकारी मिलती, तो वो परेशान तो होते थे, परंतु चाचा की प्रखर बुद्धि पर उनको पूरा भरोसा था, आखिर जमींदार का बेटा है । गजब का भरोसा था उनके पिता को उनपर । बाबू चाचा “ऋणम कृत्वा घृतम पीवेत” में विश्वास रखते थे और इस फॉर्मूले को उन्होंने अपने जीवन में उतार भी लिया था।
पढ़ाई लिखाई से ज्यादा संबंध नहीं था बाबू चाचा का, वो कुछ ज्यादा पढे लिखे नहीं थे, परंतु बहुत चालक, चंचल, अच्छी स्मार्ट पर्सनलिटी के मालिक थे। जब वो बन ठन कर घर से बाहर निकलते तो उनके पितामह कहा करते थे “चले हैं डिप्टी साहब इजलास पर”। पर इस व्यंग का बाबू चाचा पर कोई असर नहीं होता था। वो अपनी मस्ती में रहा करते थे। बड़े हो जाने पर उन्होंने रईसों के हर शौक पाल लिया था, हाँ जब नवाबगीरी करनी थी तो देर क्यूँ, ऐसा मानना था चाचा का। शौक जैसे दारू, सिगरेट, गाने वलियों के यहाँ बैठक और जाने क्या क्या। मीट मछली झींगा चिड़िया कबूतर, बगैरी, तितर, पानी की चिड़िया, शौकिया खेले गए शिकार आदि के साथ तो उनका बचपन बीता ही था।

बाबू चाचा के यहाँ की परम्परायें इतनी बलवान थीं कि अच्छे-अच्छे घबरा जाएं। परम्पराएं जैसे; उनके यहाँ अनाज से अनाज खाने को बुरा मना जाता था, अनाज केवल मीट, मछली, झींगा आदिके साथ ही खाया जा सकता था । रोज़ नहाना, कपड़े बदलना, पढ़ना लिखना, पूजा करना आदि बुरा माना जाता था। उस जमाने (सन 1950-60) में कपड़ों की बहुतायत न थी, पर भोजन की विविधता को आप गिन नहीं सकेंगे। बाबू चाचा की माँ ने ये सभी परम्पराएं निभाईं और शान-ओ-शौकत से जल्द ही परलोग सिधार गईं। एक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उनके यहाँ बच्चे की शादी केवल जमींदारी के हनक के आधार पर समय से जल्दी कर दी जाती थी, भले लड़का कुछ कमाई कर रहा हो या नहीं, भले ही लड़की कुछ पढ़ी लिखी हो या न हो, मतलब शादी एक अदद लड़के और लड़की की ही होती थी, मेल मिलाप, शौक, जान पहचान या बच्चे बच्चियों के विचार या भावनाओं,आदि को कभी भी महत्व नहीं दिया जाता था उनके यहाँ, न ही किसी में इन मुद्दों को उठाने की हिम्मत ही थी । खानदान के नाम पर अनेक कुर्बानियाँ दे दी गईं, किसी की भी किसी से शादी करवा दी गई और अगले को साथ निभाने का जिम्मा सौंप दिया गया। क्यूँकि खाने पीने, पहनने ओढ़ने, सोने आदि की कमी तो थी नहीं, और ऐसा मानना था कि इससे बढ़कर भला और क्या चाहिए एक इंसान को उसके जीवन में। खाओ पीओ, बच्चे पैदा करो और फिर खाओ पीओ फिर बच्चे पैदा करो, यही तो किया था बाबू चाचा के पूर्वजों ने। पूर्वजों का आदर करते हुए बाबू चाचा ने भी कभी नहीं सोचा कि हम अपने इतने सारे बच्चों की पढ़ाई लिखाई, खान पान कहाँ से चलाएंगे? नहीं, कभी नहीं। वो बेपरवाह किस्म के एक शानदार व्यक्ति थे।
कुछ भी कहें, पर चाचा गजब के खाने के शौकीन थे, उनके खाने में बकरे का मीट एक अलग स्थान रखता था। चाचा बकरे का मीट पसंद ही नहीं करते थे बल्कि उसे चाहत की इंतेहाँ कहा जाय तो ज्यादा न होगा। वो बकरे के मीट के मुरीद थे। उनकी दिनचर्या मीट से शुरू और उसी से समाप्त होती थी। ऐसी चाहत, कि चाहे घर चलाने के लिए पैसे हों या नहीं, उधार ही क्यों न लेना पड़ जाए, उन्हें तो रोज़ बकरे का मीट चाहिए था और मीट भी विशेष प्रकार का, केवल काले बकरे का, वो भी अगला दस्त वो भी ताज़ा । चाचा खुद मीट खरीदने जाया करते थे। आप कहेंगे कि मीट खरीदने में क्या हुनर और बारीक़ी भला? नहीं साहब, मीट खरीदना तो बाबू चाचा को ही आता था। वो इस हुनर में माहिर थे, चल भी जाता था, उनका हुनर। बकौल बाबू चाचा, “पूरे 8-10 किलो के बकरे में केवल 1 या डेढ़ किलो मीट ही खाने के लायक होता है? पता नहीं बाकी गोश्त को लोग कैसे खरीदते हैं”? बाबू चाचा को अपने मीट खरीद में पेरेशानी तब आई जब वो एक टाउन में अपने परिवार को लेकर रहने लगे जहाँ एक से एक रईस लोग रहते थे, परंतु वहाँ भी ताजे बकरे के मीट के हिस्से को छाँट कर खरीदने में बाबू चाचा ने अपनी हनक बनाए रखा, क्यूंकि वो रोज़ के आसामी थे और कचहरी के पेशे से जुड़े थे, देखने में रोबदार लगते थे और इलाके के जमींदार परिवार से थे। इसी बिना पर लोग उन्हे पैसे उधार आसानी से दे दिया करते थे कि कभी काम पड़ा तो बाबू चाचा काम आएंगे और सूद समेत लौटा देंगे ।

बाबू चाचा की ओर से समाज को यही देन रहा कि उन्होंने ढेर सारे लोगों को बकरे का मीट खरीदना, खाना और उससे प्रेम करना सीखा दिया । वो गर्व से कहते थे कि हमने जाने कितनों को मीट प्रेमी बना दिया, अब देखो हमारे बेटों ने हमारी जगह ले ली है। बाबू चाचा तब भी कमाई किया करते थे, जब उनके बच्चे कमाने लगे थे, हालाँकि ये उनके यहाँ की परंपराओं में शामिल नहीं था, कि बच्चे के साथ साथ उनके वालिद भी कमाएं । धीरे धीरे वो दिन भी आया कि चाचा की कमाई कम होती चली गई, पर घर में मीट का रोज़ बनना बरकरार रहा, क्यूंकि उनका परिवार चाचा के पसंद की इज्जत करता था। चाचा अपनी शौक की दुनियाँ (दारू, सिगरेट और गोश्त) में हमेशा तल्लीन रहे। उनके जीवन का उद्येश्य ‘“मीट और उससे प्राप्त आनंदातिरेक में मस्त रहना ही था”। अब बाबू चाचा की उम्र करीब 70 की हो गई थी, अब वो मीट खरीदने नहीं जाया करते थे, अब मीट खरीद कर लाने का दायित्व उनके बच्चों पर आ गया था। शाम होते ही अपने बच्चों के हाथ में काले झोले (जिसमें मीट खरीद कर लाया जाता था), देखकर बाबू चाचा पुलकित हो उठते थे और उस मनःस्थिति में चले जाते जहाँ लोग अथक ध्यान करने के बाद भी नहीं पहुँच पाते। । उनके यहाँ किसी दिन किसी पर्व आदि पर मीट खाने की मनाही नहीं थी। मीट की खुशबू जब रसोई से आती तो वो एक शून्य में चले जाते थे। हालाँकि उनका “शून्य” स्वामी विवेकानंद के शिकागो वाले शून्य से परे था। बाबू चाचा रसोई से आ रहे मीट के महक के दायरे में ही रहते, ऐसा लगता कि वो निर्वाण की स्थिति में चले गए हों, बिना किसी तपस्या या ध्यान के, अपनी आत्मा के जनक के करीब, एक गहरे पूर्णानंद में।

बाबू चाचा अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते पर केवल मीट के मध्याम से । हाँ, उन्होंने कभी भी अपने स्वास्थ्य के लिए लैब-परीक्षण पर विश्वास नहीं किया। हमेशा बकरे के ताजे मीट पर विश्वास किया। उनका मानना था कि लाख दुखों की एक दवा है; बढ़िया काले बकरे का ताज़ा अगले दस्त का गोश्त, वो भी अच्छा भुना हुआ, बगैर पानी डाले बना हुआ । बच्चों को कुछ भी बीमारी होती तो कहते अरे बढियाँ गोश्त खाओ, दो दिन में अच्छे हो जाओगे, और गोश्त खा कर बच्चे लोग ठीक हो भी जाते थे । शायद बाबू चाचा सही कहते थे।
चाचा के ज्ञान की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती जब उनके यहाँ गोश्त की दावत होती थी। ऐसा लगता था कि चाचा गोश्त के महक से “बकरा-मय” हो गए हैं। बकरे के गोश्त पर इतने कशीदे पढ़ते कि सभी स्तब्ध रह जाते कि बाबू चाचा को इतना ज्ञान था! शायद बाबू चाचा को “सपने” भी काले बेकरों के ही आते रहे हों। बकरा और बाबू चाचा जब आमने सामने होते तो दोनों की आँखों में चमक होती थी, बकरा सोचता था कि अब मुझे बकरे के जीवन से छुटकारा मिल जाएगा और चाचा सोचते कि हमारा एक और दिन “बकरामय” हो जाएगा। बाबू चाचा को पता था कि न तो बकरे खत्म होने वाले हैं और न मैं। उन्होंने बहुत सोंच समझकर ये तीन शौक पाले थे, एक शराब, दूसरा सिगरेट और तीसरा बकरा, गाने वलियों के यहाँ जाना तो कबका छूट गया था। यदि कभी उनका डी. एन. ए. चेक किया गया होता, तो उसमें बकरे के डी. एन. ए. जरूर पाए जाते। कम से कम बकरे के “प्रोटीन“ तो अवश्य ही मिल जाते । शायद ये बकरे के गोश्त के “प्रोटीन” का ही कमाल रहा हो कि उनके यहाँ के लोग मीट खा कर रोग मुक्त हो जाया करते थे। यदि पूर्व जन्म में विश्वास किया जाता हो तो; ऐसा लगता था कि चाचा अगले जनम में बकरे के आस-पास के किसी जीव के परिवार में ही जन्म लेंगे। जो व्यक्ति पूरे जीवन अनगिनत बकरों को आत्मसात कर गया हो, भला वो कैसे किसी अन्य जीव के यहाँ जन्म ले सकता था?
कई बार लोगों ने दबी जुबान से बाबू चाचा को सुझाया कि मालिक आप बकरे पलवा लीजिए, जिससे कि आपको कभी इनकी जरूरत हो तो दिक्कत न हो, इसपर बाबू चाचा कहा करते कि वो भी दिन थे जब हमारे लिए तमाम रियाया के घरों में बकरे, कबूतर, मुर्गी, तीतर आदि पाले जाते थे। कारिंदे सब इंतजाम किया करते थे, अब जम्हूरियत का जमाना आ गया है भाई, तब जमींदारी थी । चाचा समझते थे की जब बाहरी माल से काम चल रहा है तो घर में माल पालने की क्यूँ सोचना। चाचा प्रेक्टिकल बात करते थे। जब मांगकर हेरा-फेरी करके ये तीनों शौक ठीक से चलते जा रहे हैं तो फिर चिंता की क्या बात है । हाँ बता दूँ की चाचा के किसी बच्चे ने उनके अन्य शौक नहीं पाले, बस बकरा घर से नहीं निकला । उनके यहाँ आज भी बाबू चाचा की याद में बकरे का गोश्त बनाया जाता है और चाचा को समर्पित करके खाया और दावतों में लोगों को खिलाया जाता है।

आखिर एक दिन चाचा के यहाँ से खबर आई की बाबू चाचा “बकरे को प्यारे हो गए”। घबराहट की बात ही थी, इतनी बड़ी शक्शीयत इस इलाके से चली जाए तो घबराहट तो होगी। उसदिन हुआ ये था कि शाम को चाचा के यहाँ बकरे का गोश्त आया था और चाची उसे धो धा रहीं थीं और बनाने की प्रक्रिया में तल्लीन थीं । चाचा ने उनसे कहा था कि आज ज़रा लजीज गोश्त बनाना, मैं बाहर से एक आदमी से मिलकर आता हूँ । बस क्या था चाची मीट बनाने में लग गईं, चाचा बाहर चले गए और यही गलती हो गई शायद, चाचा मीट बनते समय उसके इर्द गिर्द ही रहा करते थे, आज वो गोश्त की खुशबू से दूर चले गए थे। थोड़ी देर में ही किसी से बातें करते करते वहीं कुर्सी पर बैठे बैठे उन्हें थोड़ी परेशानी हुई और जबतक लोगों को समझ में आए बाबू चाचा “बकरे को प्यारे हो गए”। कोहराम मच गया घर में, मैयत का घेरा छा गया। जो भी उनके खैरख्वाह थे, जानकार यार दोस्त थे अड़ोसी पड़ोसी आदि आने लगे, क्या हुआ, क्या हुआ? चाचा को आनन फानन में अस्पताल ले जाया गया, पर डाक्टरों ने बताया कि चाचा तो “बकरे को प्यारे हो गए “ यानि अल्लाह को प्यारे हो गए।
जानकार लोग जो उनके मैयत पर आए, उन्होंने यही अनुमान लगाया कि चाचा को मीट की खुशबू से दूर नहीं जाना चाहिए था। शायद बच जाते! सबने बड़ी संजीदगी से परिवार जन को समझाया कि उनके आत्मा की मुक्ति तभी होगी जब आप लोग उनसे “गो” दान की जगह “बकरा दान” कराएंगे, ग्यारह लोगों को काले बकरे के मीट की दावत देंगे, शराब और सिगरेट पिलाएंगे। घर वाले भी मुतमइन थे कि चलो बाबू चाचा की आत्मा को इस बकरा भोज से शांति तो मिल जायगी । सबने एकमत से ये स्वीकार किया और फिर जब समय आया तब बाबू चाचा के भोज में काले बकरे के ताजे मीट की दावतें दीं गईं, काले बकरे सदके में दिए गए और तब कहीं जाकर सबने समझा कि अब बाबू चाचा के आत्मा को मुक्ति मिल गई होगी । परंतु उनका परिवार आज भी बाबू चाचा की कमी को भूला नहीं पाया है और उनके बकरे के मीट के प्रति लगाव के किस्से सुनाते नहीं थकता, ताजे काले बकरे के ताजे मीट का शौक पूरा परिवार आज भी पाले हुए है, चाचा के यहाँ उनकी पारिवारिक परंपरा आज भी बरकरार है।
