आँख मिचौली; कथा पुरानी, संदर्भ नया

<strong>रश्मिकांत नागर  </strong>
रश्मिकांत नागर

अपने छात्र जीवन की “एक” कारस्तानी का बयान कर रहे हैं।
यह कहानी नहीं, सत्य घटना है। 

आप में से बहुतों ने शायद यह कथा पहले भी सुनी या पढ़ी हो । मैंने इस कथा को एक नए संदर्भ में प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया है। अगर पसंद आये, तो आगे बढ़ाइयेगा अन्यथा आप ने तो पढ़ ही ली है!

चित्र godhdwallpapers.com के सौजन्य से

क्योंकि कथा युगों पुरानी है, स्वाभाविक है कि इसका प्रारम्भ वैकुंठ से हो। क्षीरसागर के मध्य, शेष शैय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु अपने चरणों के निकट बैठी अपनी भार्या देवी लक्ष्मी को सम्बोधित कर बोले, “देवी, हम दोनों सतयुग के प्रारम्भ से लेकर, अब कलियुग के इस चरण तक इसी तरह अकेले असीमित क्षीरसागर को कब तक निहारते रहेंगे? हमने तो कभी किसी बदलाव का अनुभव ही नहीं किया। क्यों ना कुछ नवीन किया जाये”। 

देवी लक्ष्मी ने कहा, “नाथ, मै समय समय पर भूलोक जाकर धनाढ़्य और ग़रीबों के बीच जाकर अपना मनोरंजन कर आती हूँ। बहुत समय बीत गया है आप भू लोक गये नहीं। अगर आप यहाँ अकेले बैठे बैठे उकता गए हैं, तो आप भी एक बार भूलोक विचरण कर आइये, मन बहल जायेगा”। 

पर में वहाँ करूँगा क्या”, भगवान पूछ बैठे। 

“तनिक अपनी निगाह अंतहीन सागर से हटा कर नीचे भूलोक की और कीजिये। सतयुग, त्रेता और द्वापर से हट कर ये कलियुग अनूठा है। देखिये मानव जाति ने कितनी प्रगति की है। आमोद- प्रमोद के नए संसाधन जुटाए हैं, नए खेलों का आविष्कार किया है, तीज-त्योहारों की धूम मची है। होली-दीवाली, बीहु-बैसाखी, उत्तरायण-पोंगल, ओणम- लोहरी, गरबा-नवरात्रि और ना जाने क्या क्या। जाइये कुछ मनोरंजन आप भी कर आइये।” देवी लक्ष्मी ने उत्तर दिया। 

“अच्छा सुझाव है तुम्हारा देवी। में शीघ्र भूलोक जाऊँगा, मानवों के साथ कुछ नये खेल, जो उन्ही ने बनाये हैं, खेलूँगा”। 

“कोई लाभ नहीं होगा मानव रचित खेलों में भाग लेकर। आप हर स्पर्धा में विजयी होंगे और पराजित मानव शीघ्र ही निरुत्साहित होकर खेल छोड़ आपको अकेला छोड देंगे। और आप निराश होकर वापस शेषशैया पर ……..”

“तुम्हारा आशय समझ गया देवी, परंतु ऐसा कौन सा खेल है जो पुराना होकर भी इस काल में लोकप्रिय हो”? भगवान ने पूछा। 

“आँख-मिचौली”! ये वो खेल है जो कभी पुराना नहीं होता। आपने तो ये खेल हर युग में खेला है। बस आपको तो भूलोक में जाकर, खेल प्रारंभ कर कहीं छुपना है। आपको ढूँढने का कार्य तो मानव करेंगे”। देवी लक्ष्मी के इस उत्तर के साथ, खेल चयन की प्रकिया पूर्ण हुई। 

“परन्तु भूलोक में मुझे छिपना कहाँ होगा? आधुनिक संसाधनों से युक्त ये चालाक मानव तो मुझे शीघ्र ही ढूँढ निकालेगा और मेरा सारा प्रयत्न विफल हो जायेगा”, भगवान ने संशय व्यक्त किया। 

“सारे उत्तर मुझ से ही चाहिए ? कभी कभी अपने नवग्रहों की सलाह भी ले लीजिये”, एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ लक्ष्मी ने वार्तालाप को नया मोड़ दे दिया। 

पर भगवान को निराशा ही हाथ लगी। नवग्रहों के सुझाव भी सामान्य ही निकले। आख़िर धरती पर गुफा-कन्दरा हो, पहाड़ की चोटी हो, सागर की गहराई हो या आसमान की ऊँचाई, कौन सी ऐसी जगह है, जहाँ लम्बे समय तक मानव धृष्टि से छिपा जा सकता है? 

“क्यों नहीं भूलोक पर जाकर किसी महात्मा से पूछ लेते। हो सकता है, आपकी समस्या का समाधान आपको वहीं मिले”। देवी ने सुझाया। 

जैसे ही भगवान भूलोक जाने निकले, देवी बोल उठीं, “अरे तनिक वेश-भूषा तो बदल लो। इस रूप में जाओगे तो प्रयोजन पहले ही निष्फल हो जायेगा”। 

भेष बदल कर भगवन भूलोक में एक ऐसी जगह पर उतरे जहां एक महात्मा दीर्घ समय से समाधिस्थ थे। महात्मा ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, उनके होंठों पर हल्की मुस्कुराहट आयी और अपने समक्ष खड़े एक सामान्य व्यक्ति को सम्बोधित कर बोले, “भगवान, भूलोक पर आपका ये अनायास पदार्पण? क्या प्रयोजन है आपका”? 

“भगवान? कौन भगवान? मैं तो एक पथिक हूँ भाई। थकान से मुक्ति पाने एक ऐसे विश्राम स्थल की खोज कर हूँ, जहाँ बिना किसी विघ्न लम्बे समय तक विश्राम कर सकूँ”। 

महात्मा मुस्कुराये और पूछ बैठे, “तो क्या आपने आँख- मिचौली खेलने का विचार त्याग दिया है”? 

भगवान मुस्कुरा कर बोले, “आपसे क्या छिपा है? अब आप ही बताइये छुपने की सर्वोत्तम जगह कौन सी है”? 

“मानव हृदय”। “आज का अज्ञान मानव आपको धरती के हर कोने में ढूँढेगा, हर तरह से आपको रिझाने का प्रयास करेगा, पूजा-अर्चना करेगा, भजन कीर्तन करेगा, व्रत-उपवास करेगा, परन्तु अपने हृदय में कभी झांकने का प्रयास नहीं करेगा। आप के इस कलियुग की यही सबसे बड़ी विडम्बना है”। 

“पर भगवान , इस खेल में आपको मानव की कुछ सहायता करनी पड़ेगी, वरना आप युगों तक ऐसे ही छिप कर बैठे रह जायेंगे”। मानव आपको अपने अन्तर में ढूँढने का प्रयास तभी करेगा जब उसे सही दिशा में इंगित करने वाला एक योग्य मार्गदर्शक मिले, और वो मार्गदर्शक भी आप ही को भेजना होगा”। 

तब से शुरू हुआ ये खेल अभी भी जारी है। ईश्वर समय समय पर योग्य मार्गदर्शक भी भेजता है, पर हम तो हम हैं- विकसित मानव, कहाँ फ़ुर्सत है हमें ईश्वर को खोजने की, अपने अन्तर में झाँकने की? अभी तो बाहरी चकाचौंध से आँखे हटने का नाम ही नहीं लेतीं। हाँ, हममें से कुछ ग़िने-चुने इस खेल का हिस्सा ज़रूर हैं, पर अधिकांश? या तो ईश्वर को बाहर खोजते हुए या फिर ईश्वर से दूर, बहुत दूर। 

और मानव हृदय में छिपे भगवान शायद ये सोच रहे है, “पता नहीं, वैकुंठ कब लौटना होगा”?