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वृक्षमंदिर हिंदी मे Culture, Tradition, Human Development and Religion

पंडित जी ने कहा क ख ग घ ङ के बाद च  छ  ज  झ  ञ लिखो

च से चना, च से चम्मच

चना हमारे खेत में बुढवा बाबा के जमाने में बोया जाता था। वैसे तो उनके जमाने मे गंजी ( शकरकंदी), मकई और अन्य बहुत तरह की फसलें बोई जाती थीं। गेहूं, धान, सरसों, मटर, तिल, तीसी, आदि के अलावा कोदो, मडुवा आदि की फसल भी होती थी । बुढवा बाबा ( मेरे प्रपितामह, बाबू देवनारायण सिंह) ख़ालिस किसान थे । कर्मठ , मेहनती और परिवार के लिये समर्पित तो थे ही पर गाँव में उनका बड़ा मान सम्मान था।

बुढवा बाबा पढ़े लिखे न थे । पर मेरे पिता जी (बाबू जी) यानि अपने नाती की पढ़ाई की बात जब उठी तब बुढवा बाबा ने पूरा समर्थन दिया। भइया ( मेरे पितामह) की एक न चली और बाबूजी बीएस सी एजी करने बलवंत राजपूत कालेज आगरा जा सके।आगरा से ही बाबूजी ने एम एस सी एजी एग्रीकलचरल इकानामिक्स विषय से की। 

कहा जाता है बाबूजी आसपास के गाँवों में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दसवीं पास किया। बाद में चल कर तो घर में सभी पढ़े। बहुत ज़्यादा नहीं पर कम भी नहीं। लड़कियाँ भी पढ़ी। बदलाव आया और मेरे बचपन के गाँव वाले घर को और घर के लोगों को तब्दील कर गया । जीता जागता घर कहानी बन कर रह गया। वैसे भी हमारे तब के “पिपरेतर के बाबू” लोगों के घर को याद कर बताने वाले इक्का दुक्का लोग ही बचे है।

च से चम्मच होता है। पर खाने वाली चम्मच से मेरा सामना तो शायद दिल्ली मे, जब मै छठे दर्जे में पढ़ने के लिये “गवर्नमेंट एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल, ईस्ट पटेल नगर मे आ कर हुआ ।

गाँव पर तो कड़ाही, तवा, कड़छी, कलछुल, चिमटा, थरिया, गिलासि , कटोरा , कटोरी, कटोरा, परात, गगरा, सुराही, टोंइआं आदि से ही परिचय था। कुछ चिनिया बर्तन, कप, प्लेट, शीशे के गिलास आदि गाँव पर थे पर ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होते थे। चम्मच नहीं होता था। या था भी तो मुझे याद नही।

बड़े हुये तो हमे पता चला खाने वाली चम्मच के अलावा और भी आदमजाद चम्मच भी होते हैं। इन्हें चमचा, चाटुकार, चापलूस, खुशामदी, पिठ्ठू, जीहुजुरिया आदि भी कहा जाता है। अनादर करना हो तो परजीवी, मुफ्तखोर,मक्खन बाज आदि भी कहा जाता है।

गाँव का स्कूल मिठउआ पेड़ के नीचे था। दिल्ली का स्कूल ईस्ट पटेल नगर में घरों के बीच पार्क के लिये छोड़ी ज़मीन पर लगे टेंटों में था। दिल्ली से गोरखपुर १९५८ में आया तो सेंट ऐंड्र्यूज हायर सेकेंडरी स्कूल की कक्षायें सन १८५७ से पहले बनी बैरकों के कमरों में लगती थी। बैरक अंग्रेज सैनिकों के रहने के लिये बनाई गई थीं। ।

क ख ग घ अंगिआं, पंडित जी के टूटि, गइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

छ से छिम्मी, छ से छटाँक 

गाँव पर बचपन में मटर बोई जाती थी पर जब तक बड़े न हुये मटर को छिम्मी नाम से ही पहचानते रहे। गाँव से बाहर निकलते ही जो खेत हैं उन्हें गोयंणेपर कहा जाता था। गोयंणेपर के खेतों में ख़रीफ़ में मुख्यतः धान ही बोया जाता था। रबी की फसल गेहूं, सरसों, मटर की फसल ही ज़्यादातर बोई जाती थी। उन दिनों हमारे चार बैल थे। दो दुधारू भैंसे 

सड़क के उस पार जो खेत थे उन्हें डाडेंपर कहा जाता था। जहां तक मुझे याद आता है डाँडेपर के खेत ख़रीफ़ मे पलिहर ( ख़ाली ) छोड़ दिये जाते थे। गोयणेंपर के खेत भी पलिहर छोड़े जाते थे। सन पचास और साठ के दशक में खाद मुख्यत: आर्गेनिक ही होती थी।

मै हूँ तो मेरा मन भी है। आपका भी है। सबका मन होता है। भले ही किसी ने मन कभी देखा न हो। पर होता ज़रूर है और मौक़ा मिलते ही आदमी मनमर्ज़ी करने से बाज नहीं आता। 

बदलाव आया और मेरे बचपन के गाँव वाले घर को और घर के लोगों को तब्दील कर गया

पर एक दूसरे तरह का मन भी होता था। सोलह छटाँक से बनता था एक सेर और चालीस सेर से एक मन । छटाँक , सेर और मन किसी चीज़ के भार मापने के काम आते थे। इसी तरह पाई और मनही आयतन का माप थे। हमारे गाँव पर बचपन मे पांई और मनही का चलन था।। बीस पाई की एक मनही। अब तो किलो , क्विंटल और टन का जमाना है। चार छटाँक का पाव, आठ छटाँक का अद्धा होता था। बचपन मे पहाड़ा तो रटना ही पड़ता था, अद्धा, पौव्वा, सवाईआ आदि भी रटना पड़ता था। बचपन मे जब पहुना ( मेहमान) लोग आते थे तब बाबा हमसे पहाड़ा पढने के लिये कहते थे।आगे चल कर बच्चों को प्रताड़ित करने के लिये उनसे मेहमानों के लिये अंग्रेज़ी राइम्स सुनाने का चलन हुआ। अब तो बच्चे बड़े चालाक हो गये हैं। अक्सर बिना कहे ही मेहमान से बातचीत करने लगते हैं। हमारे जमाने में हम शुरू मे ज़्यादातर मेहमानों से दूर ही रहना चाहते थे।

    अंगिआं, पंडित जी के टूटिगइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ज से जहाज़ 

जहाज़ हवा में उड़ते हैं और पानी पर भी चलते हैं।मैंने ज़मीन पर हवाई जहाज़ जुलाई 1957 मे बाबूजी को छोड़ने , रोब की भाषा अंग्रेज़ी ( जो मैंने बहुत बाद में सीखी) मे कहें तो “सी आफ” करने ईस्ट पटेल नगर से टांगें में बैठ कर पालम हवाई अड्डे पर छोड़ने गये थे तब देखा था। उसके बाद तो उड़ते हवाई जहाज़ ही देखे थे।१९६९ तक हवाई यात्रा कभी न की थी । पानी वाले जहाज़ में यात्रा २०२४ मे की । वैसे उन्नीस सौ साठ के दशक मे गाँव से गोरखपुर जाते समय बरसात के महीने में जब पीपे का पुल नहीं होता था राप्ती नदी पार करने के लिये नाव का सहारा लेना होता था। कई बार तो माई ( मेरी दादी ) बैलगाड़ी पर राशन और लकड़ी लदवा कर गोरखपुर आ जाती थी । बैलगाड़ी बैलों सहित और बस भी यात्रियों सहित नाव से ही नदी पार करती थी।

मेरी पहली हवाई यात्रा १९६९ में हुई।एनडीडीबी में काम करता था। दिल्ली का दौरा था। मैं जब दिल्ली जाता अम्मा बाबूजी के पास रहता था। पंद्रह रुपये रोज का डीए बनता था। मतलब अगर होटल में न रहें तो पंद्रह रुपये मिलते थे और खर्च की रसीद भी नहीं देनी होती थी।अगर होटल में रहें तो तीस रुपये रोज़ के मिलते थे पर रूम रेंट और खाने पर किये ख़र्च की रसीद देनी होती थी। । शहर में आने जाने का टैक्सी भाड़ा ऊपर से मिलता था। मैं सात दिन अम्मा बाबूजी के पास घर पर रहा ।कुल 105 रुपये डीए का हुआ। 95 रुपये में दिल्ली से बड़ौदा का रेल भाड़ा फ़र्स्ट क्लास का होता था । जो मुझे मिलता । चूँकि घर पर रहा इसलिये तो 105 रूपये बच गये। 95 रूपये रेल भाड़ा तो मिलना ही था। इस तरह 200 यात्रा उपरांत मुझे एनडीडीबी से मिलने ही थे । हवाई यात्रा की हुड़क तो थी ही। दिल्ली से अहमदाबाद का हवाई जहाज़ का किराया 230 रुपये का होता था। अपनी जेब से 30 रुपया खर्च कर हवाई यात्रा करने का सुख अलग ही था। 

सोचा था अहमदाबाद से आणंद की यात्रा बस या ट्रेन से कर लेंगे। पर आश्चर्य कब हो पता नहीं होता । हुआ यह कि उसी जहाज़ में यात्रा कर रहे थे, डाक्टर माइकल हाल्स जो एनडीडीबी मे तब बोर्ड मेंबर और 1970 से 1983 तक संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य एवं कृषि संस्था से एनडीडीबी में नियुक्त विशेषज्ञों के टीम लीडर भी थे। फिर क्या था मेरी अहमदाबाद से आणंद यात्रा का प्रबंध भी हो गया। रजनी ड्राइवर GMH 805 एनडीडीबी की काली एंबेसडर गाड़ी माइक के लिये ले कर अहमदाबाद एयरपोर्ट माइक के इंतज़ार में खड़े थे। अपुन भी उसी गाड़ी में आणंद पहुँच गये । यार लोग अचंभित हो गये बोले “अबे तू तो कल दोपहर आने वाला था ?” “हम बोले “उड़ कर आ गया यार “। 

    अंगिआं, पंडित जी के टूटिगइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

झ से झोला ,झ से झक्की

झोला सामान रखने के काम आता है विशेषकर कंधे में लटका कर चलते समय बड़ा आराम देता है। जिसके पास झोला नहीं होता वह अपना सामान गठरी में बांध लेता है। झोला छाप बुद्धिजीवी एक अलग प्रकार का प्राणी होता है। वह अपने को बुद्धिमान मानता है और दूसरों को मूर्ख। पर दूसरों में बहुतेरे उसे महामूर्ख मानते हैं । मूर्ख और महामूर्ख की विवेचना कभी बाद में अभी तो बात करते है झ से झोला की । झ से झक्कड भी होता है। झक्की लोग झक्कड कहलाते हैं। झक्की आदमी को सनकी या खब्ती भी कहा जाता है। सनकी यानी वह जो सनक में पड़ जाये । सनक अच्छी यानी सर्व हितकारी और बुरी यानी विनाशकारी भी होती है। 

गांधी जी की सनक ने भारत को स्वतंत्रता दिला दी। वैसे कुछ सनकियों का मानना है कि यह कर के गांधी जी ने अच्छा नहीं किया । उनका मानना है कि यदि भारत अब भी ब्रिटेन के अधीन होता तो लंदन जाने के लिये वीसा न लगवाना पड़ता। पैसे बचते। 

हिटलर की सनक के कारण मानवता को दूसरा विश्वयुद्ध झेलना पड़ा। हिटलर न होता तो गोला बारूद की इतनी खपत न होती। बारूद के उपयोग से इतने विनाशकारी अस्त्र शस्त्र न बनते। बारूद के आविष्कारक नोबल इतने धनी और मशहूर न होते। उनका नोबल प्राइज़ न होता। डाक्टर अमर्त्य सेन, मलाला, ओबामा, रवींद्र नाथ टैगोर आदि जैसे बडमनई लोगों को नोबल पुरस्कार नहीं मिलता । वह सब लोग भी गांधी जी की तरह इस पुरस्कार से वंचित हो जाते।

सनक और सठियाने में अंतर है। वैसे सठिया जाने पर झक्की या सनकी या खब्ती होना आसान है। 

अमरीका की खोज कहते हैं कोलंबस ने की। कुछ का कहना है कि कोलंबस सनकिया गया और भारत की खोज मे निकला पर पहुँच गया अमरीका। ख़ैर स्वतंत्र भारत देर से ही सही जाग गया है। अब भारत के लोगों को अमरीका की खोज की ज़हमत नहीं उठाने की ज़रूरत है क्योंकि अमरीका की खोज हो चुकी है और अमेरिका कहाँ है लोगों को पता है । इसलिये भारत से लोग अमेरिका कमाने और बस जाने के लिये जाते हैं। उन्हें भाभाभा यानि “भारत से भागे भारतीय” कहा जाता है। किसी ने मुझे बताया कि अंग्रेज़ी वर्णमाला सिखाने के लिये कुछ झोलाछाप मास्टर एबीसीडीईएफजी को समझाने के लिये मज़ाक में कहते है एबीसीडीईएफजी यानि A अमरीका B बार्न C कन्फ्यूज्ड D देसी E इमिग्र्ट्ड F फ्राम G गुजरात । 

आज कल हम भी संयुक्त राज्य अमरीका से सटे और उसके उत्तर में स्थित केनेडा में रहने लगे हैं। केनेडा आते समय हर बार झोला भारत में ही भूल जाते हैं। अटैची ले कर चले आते हैं। झोला भारत में हो तो लगता है भारत अभी छूटा नहीं। और यहाँ केनेडा में अटैची तो है ही।

    अंगिआं, पंडित जी के टूटिगइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था

ञ माने कुछ नही 

    अंगिआं, पंडित जी के टूटिगइलिआ टंगिया

बचपन में सीखी “नर्सरी राइम” तब जब नर्सरी और राइम का मतलब भी पता न था


By Vrikshamandir

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