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वृक्षमंदिर हिंदी मे व्यंग

गुरु जी कहिन

 

 

चेला – गुरू जी बहुतै चिंता हुइ रई है, तबियत भी ठीक नाईं चल रई, कमाई का कोई साधन नही, बैंक में रखे कुछ पैसों के व्याज से घर चल रिया है।सोच सोच कर दम घुटता है। चिंता खाए जा रई है।

गुरू- बेटा, चिंता को भुलवाने की कोचिस तो कर के देखो । चिंता का झुनझुना ले कर हर बखत बजाये जात हो ओकि जगह कोई और झुनझुना पकरो । जानूँ हूँ मुश्किल काम है चिंता भुलवाना ।पर चूँकि हम, मने तुम्हरे गुरु, कै रिये हैं इस वास्ते कर के तो देखो।

चेला- बड़ी मुश्किल है गुरु जी । समझै नहीं आ रहा कि कइसे करूँ?

गुरू- सही कै रये हो बेटा, चिंता को भुलवाना कठिन है । और तो और अगर चिंता कुछ देर हटी तो आशा आ जाती है।

चेला- वही तो, गुरू जी आप ही समझे हैं हमरे पेट की गुरुची । चिंता और आशा। हम एक ले कर आये आप जोड़ी बनाइ दिये । चिंता और आशा, गजब । वाह वाह, धन्न हो गुरू जी ।

गुरु- बचवा, डाइन की तरह चिंता अदिमी को अंदर ही अंदर सताती है ।

चिंता ऐसी डाकिनी , काटि करेजा खाय । बैद बिचारा का करे कितनी दवा खवाय।

एक तरफ़ चिंता अदिमी को अंदर ही अंदर खाती है तो दूजा ओर आशा अदिमी को ज़िंदगी से जुआ खेलने के लिये उकसाती रहती है। जुआ जानते हो न ? जुआ ? अरे जुआ कभी खेला नही का ? ठीक है नही खेला तो देखा तो होगा दूसरों को खेलते हुये?

चेला- हाँ देखे है । गुरू जी आप पकड़ लिये हमको। हमारी का मजाल कि हम आप से झूठ बोलें ? हम जाने हैं जुआ का होत है। हम खेले भी हैं जुआ। पर हम अपनी अम्मा को वचन दिये थे जुआ या पैसा लगा कर ताश नईं खेलने का । इसी लिए जब भी खेले तो बिना पैसे के खेले । कब्बी कब्बी जब बोली लगाई तो दुई रुपया से ज़्यादा की बोली कब्बी ना लगाई । अम्मा ने शराब पीने के लिये कोई मनाही ना की थी इसलिये हम शराब पी लेते हैं।

गुरू- बड़े बुडबक हो हम शराब के बारे में पूछे थे का ? नहीं न ? तुम्हारी आदत बड़ी ख़राब है। बिना सोचे बोल देते हो। जितना पूछा जाय उतना ही जबाब दो ।

चेला- ठीक है गुरू जी !

गुरू-अच्छा बताओ, जिजीविषा का है? सुना है ?

चेला- नाहीं


 

 


गुरू- यही तो ? बीए पास हो पर हिंदी भी ठीक से नहीं समझते ।

चेला- गुरु जी ई हिंदी थोड़े है, ई तो संस्कृत है !

गुरू- हम समझ गये तुम अल्पज्ञानी हो ।

चेला-गुरू जी अल्पज्ञानी का होत है ?

गुरु- अल्पज्ञानी मने कम समझ मने पढ़ा लिखा अनपढ़ । तुम्हारे जैसा ! बच्चा जिजीविषा यानि जीने की अदम्य इच्छा । जिजीविषा चूल्हा है ज़िंदगी का । यह जो आशा है न ऊ लकड़ी डालती है जिजीविषा के चूल्हा मा।

चेला- गुरू जी हमरे महरमंड में एक बिचार आइ रहा है। जिजीविषा विजीविषा तो हम नाईं जानत रहे पर हम्ने तो लागत है कि ई दुनिया का वायुमंडल भी एक चूल्है ही है। जिसमें कुछ तो जल कर भस्म हुई रहा है। कुछ जल कर भस्म होने के लिये लाइन में खड़ा है। अनजान । लाइन में लगे में से कुछ को लगने लगा है कि जल जाना है । पर कुछ तो अनजान जिये जा रहे हैं जइसे ऊ कबहुँ मरिहैं नाईं। उनको इस बात का भान भी नहीं कि उनकी बारी भी आने वाली है।

गुरु जी- साधो ये मुरदों का गांव,

पीर मरे पैगम्बर मरिहैं, मरि हैं ज़िन्दा जोगी,राजा मरिहैं परजा मरिहै,

मरिहैं बैद और रोगी, चंदा मरिहै सूरज मरिहै, मरिहैं धरणि आकासा,

चौदह भुवन के चौधरी मरिहैं इन्हूं की का आसा, नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं,

मरि हैं सहज अठ्ठासी, तैंतीस कोट देवता मरि हैं, बड़ी काल की बाजी

नाम अनाम अनंत रहत है, दूजा तत्व न होइ,

कहत कबीर सुनो भाई साधो, भटक मरो ना कोई

चेला- पर गुरू जी हमरी दशा कुछ ग़ज़ब ही है। न जीने की इच्छा न मरने का मन।कैसे जियें गुरू जी ? चिंता खाए जा रई है। सोच सोच कर दम घुटता है।वैसे बतायें इस अवस्था को क्या कहेंगे ?

गुरु- मरने की इच्छा या मर कर मोक्ष प्राप्ति का का मन हो तो उसे मुमुर्षु कहते हैं। मुमुक्षु का मतलब भी यही होता है। मरने का मन न होना मुमुर्षु का अभाव । तुम अभी मोक्ष नही पाना चाहते।

जीने की इच्छा का न होना मतलब जिजीविषा का अभाव। बेटा जी तुम पैसे के अभाव के साथ साथ मुमुर्षु और जिजीविषा दोनों का अभाव झेल रहे हो ।


 

 


अभाव, पैसे का, अभाव जिजीविषा का और गजब बात कि मुमुर्षु का भी अभाव आशा ही बची है तुम्हरे पास। लेकिन सिर्फ़ आशा के सहारे तो ज़िंदगी नहीं चलती। अपने मे बिस्वास और ज़िंदगानी में कुछ कर जाने की कोचिस भी तो ज़रूरी हैं।

भगवान जी ने जब अदिमी को अदिमी बना पृथिवी पर भेजा तब अदिमी से ओका बिन मांगे दुई ठो नौकरानी भी ओके दिमाग़ मा फिट कर दिये। जानत हौ उन दोनों का नाँव का है। आशा और चिंता ! समस्या की मूल जड़ है अदिमी ख़ुद।

अदिमी जब आशा अउर चिंता को नौकरानी की जगह घरवाली की तरह रखने लगता है तब वायुमंडल में बादरेशन होने लगे है।

तुम आशा और चिंता नामवाली नौकरानियों को घराली बना बैठे हो। उन दोनों के साथ ही समय बिताने में तुम्हें आनंद आता है। 

ई दूनों अदिमी को अपने अंदर मने अकेला रहने ही नहीं देते । अदिमी अपने अंतर्मन से जुड़ने के लिये समय ही नहीं निकाल पाता । आशा और चिंता अकेली नहीं आती साथ में और सहेलियों भी को ले कर आती हैं।

विचार करो किसी भी आदमी की असलियत क्या है? सोचो तो बहुत कुछ है पर कुछ और सोचो तो और कुछ नही ? है न ग़ज़ब की बात । अदिमी असल में चूतिया है । हम तुम सब !

खुश रहो और गाना सुनो !

 

 

 


By Vrikshamandir

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