मै अपना मौन हूँ
I AM MY silence. 1 am not the busyness of my thoughts or the daily rhythm of my actions. 1 am not the stuff that constitutes my world. I am not my talk. 1 am not my actions. 1 am my silence. 1 am the consciousness that perceives all these things.
When I go to my consciousness, to that great pool of silence that observes the intricacies of my life, 1 am aware that 1 am me. I take a little time each day to sit in silence so that I can move outward in balance into the great clamour of living.





From “Embers, One Ojibways’s Meditations” by Richard Wagamese ( 1955-2017) an Ojibway from Wabaseemoong First Nation in Northwestern Ontario.
एम्बर्स: वन ओजिब्वे’स मेडिटेशन्स
(हिंदी में: चिंगारियाँ — एक ओजिब्वे के ध्यान-चिंतन)
लेखक: रिचर्ड वागामीज़ (Richard Wagamese, 1955–2017) वाबासीमूंग फर्स्ट नेशन (Wabaseemoong First Nation) के ओजिब्वे (Ojibway) उत्तर-पश्चिमी ओन्टारियो, कनाडा से थे।
यह पुस्तक छोटे-छोटे ध्यान-चिंतनों (meditations) का संग्रह है, जिसमें जीवन, दर्द, शांति, प्रकृति, कृतज्ञता और आत्मा की गहरी अंतर्दृष्टियाँ हैं। उनकी लेखनी बहुत ही सरल, काव्यात्मक और आत्मिक है।
चिंगारियों में छिपी शांति: रिचर्ड वागामीज़ की ध्यान-चिंतनाओं से ‘मैं’ की खोज
रिचर्ड वागामीज़ (1955-2017) की पुस्तक Embers: One Ojibway’s Meditations (चिंगारियाँ: एक ओजिब्वे के ध्यान) छोटे-छोटे, गहरे और काव्यात्मक ध्यान-चिंतनों का संग्रह है। वागामीज़ वाबासीमूंग फर्स्ट नेशन के ओजिब्वे लेखक थे, जो उत्तर-पश्चिमी ओन्टारियो से थे। उनकी लेखनी में आदिवासी ज्ञान, प्रकृति से जुड़ाव और आधुनिक जीवन की हलचल के बीच संतुलन की तलाश साफ दिखती है।
इस पुस्तक में सबसे मार्मिक और बार-बार आने वाला विषय है — ‘मैं’ (I) कौन हूँ? और आंतरिक शांति कैसे पाएँ? वागामीज़ बार-बार मौन (silence), चेतना (consciousness) और उपस्थिति (presence) की बात करते हैं। आइए, पुस्तक के कुछ खास ध्यान-चिंतनों के माध्यम से इस यात्रा को समझते हैं।
“मैं अपनी शांति हूँ”
पुस्तक के शुरुआती हिस्से में वागामीज़ लिखते हैं:
“I am my silence. I am not the busyness of my thoughts or the daily rhythm of my actions. I am not the stuff that constitutes my world. I am not my talk. I am not my actions. I am my silence. I am the consciousness that perceives all these things. When I go to my consciousness, to that great pool of silence that observes the intricacies of my life, I am aware that I am me.”
मैं अपनी शांति हूँ। मैं अपने विचारों की व्यस्तता या अपनी दैनिक क्रियाओं की लय नहीं हूँ। मैं उस सामग्री का नहीं हूँ जो मेरी दुनिया बनाती है। मैं अपनी बातें नहीं हूँ। मैं अपनी क्रियाएँ नहीं हूँ। मैं अपनी शांति हूँ। मैं वह चेतना हूँ जो इन सब चीज़ों को देखती है। जब मैं अपनी चेतना में जाता हूँ, उस महान शांति के सागर में जो मेरे जीवन की बारीकियों को देखती है, तब मुझे एहसास होता है कि मैं मैं हूँ।
यह अंश बहुत शक्तिशाली है। वागामीज़ कह रहे हैं कि हम जो कुछ भी करते, सोचते या बोलते हैं — वह हम नहीं हैं। हमारा असली स्वरूप उस मौन में छिपा है जो इन सबके पीछे खड़ा देखता रहता है। आधुनिक जीवन में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हम अपने विचारों, उपलब्धियों या समस्याओं के साथ खुद को जोड़ लेते हैं। वागामीज़ हमें याद दिलाते हैं कि असली “मैं” इन सबके पार है — शांत, साक्षी और मुक्त।
शोर के बीच “मैं” को सुनना
एक और गहरा ध्यान है सुबह की शांति को लेकर:
“I am constantly surrounded by noise: TV, texts, the internet, music, meaningless small talk, my thinking. All of it blocks my consciousness, my ability to hear the ME that exists beneath the cacophony. I am my consciousness, my awareness of my circumstance, my presence in every moment. So I cultivate silence every morning. I sit in it, bask in it, wrap it around myself, and hear and feel me. Then, wherever the day takes me, the people I meet are the beneficiaries of my having taken that time—they get the real me, not someone shaped and altered by the noise around me.”
लगातार शोर से घिरा रहता हूँ — टीवी, संदेश, इंटरनेट, संगीत, व्यर्थ की बातें और अपने विचार। यह सब मेरी चेतना को रोकता है, उस “मैं” को सुनने की क्षमता को जो इस कोलाहल के नीचे मौजूद है। मैं अपनी चेतना हूँ, अपनी परिस्थिति की जागरूकता हूँ, हर पल में अपनी उपस्थिति हूँ। इसलिए मैं हर सुबह शांति का अभ्यास करता हूँ। मैं उसमें बैठता हूँ, उसमें डूबता हूँ, उसे अपने चारों ओर लपेट लेता हूँ और उस “मैं” को सुनता और महसूस करता हूँ। फिर जहाँ भी दिन मुझे ले जाए, जिन लोगों से मैं मिलता हूँ, उन्हें मेरे द्वारा लिए गए उस समय का लाभ मिलता है — उन्हें असली मैं मिलता है, न कि शोर से प्रभावित कोई दूसरा संस्करण।
यह ध्यान आज के डिजिटल युग में और भी प्रासंगिक लगता है। हममें से ज्यादातर लोग सुबह उठते ही फोन उठा लेते हैं। वागामीज़ सुझाव देते हैं कि अगर हम पहले कुछ मिनट मौन में बिताएँ — बिना किसी शोर के — तो दिन भर हम अधिक वास्तविक, अधिक संतुलित और अधिक उपस्थित रहते हैं।
शांति जीवन का मूल तत्व है
वागामीज़ बार-बार दोहराते हैं — “Silence is the stuff of life.” (शांति जीवन का मूल तत्व है।) उनके लिए मौन कोई खालीपन नहीं, बल्कि एक जीवंत, रचनात्मक और उपचारात्मक शक्ति है। जब हम बाहरी और आंतरिक शोर को शांत करते हैं, तब हम अपने असली स्वरूप से जुड़ पाते हैं। यही आंतरिक शांति है — न कि कोई लक्ष्य, बल्कि एक निरंतर अभ्यास।
इन ध्यानों से हम क्या सीख सकते हैं?
1. “मैं” विचारों से अलग है — हमारे विचार आते-जाते रहते हैं, लेकिन हम वह साक्षी हैं जो उन्हें देखता है।
2. शांति का अभ्यास रोज़ाना करना चाहिए — सुबह कुछ मिनट मौन में बैठना हमारे पूरे दिन को बदल सकता है।
3. शांति दूसरों को भी लाभ पहुँचाती है — जब हम शांत होते हैं, तो हमारे आसपास के लोग भी अधिक वास्तविक हमसे जुड़ पाते हैं।
4. शांति कोई भागना नहीं, बल्कि घर लौटना है — अपने असली “मैं” की ओर लौटना।
रिचर्ड वागामीज़ की ये चिंगारियाँ हमें याद दिलाती हैं कि आंतरिक शांति कोई दूर की चीज़ नहीं है। यह हमारे भीतर पहले से मौजूद है — बस हमें शोर के बीच उसे सुनना और महसूस करना सीखना है।
